ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
२९० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-११-१२
एतच्चेति, यत् त्रिदशादीनां भविनां चैतन्यं कर्तृतांशस्य प्राधान्यान्मलेन संविद्भागस्य
निमज्जितत्वात् कर्तृतामयं चिद्रूपस्य तत्त्वं स्वातन्त्र्यं कलारूपेण परमेश्वरशक्त्यात्मना तत्त्वेन
'उपोद्वलितम्' अनुप्राणितं मलेन न्यक्कृतं सद्बुद्धोधितं शून्यादेर्देहपर्यन्तस्य मायाप्रमातुः संबन्धि,
'गुणत्वेन अप्रधानत्वेन स्थितं, यतो 'मितम्' इदन्तापन्नदेहादिशून्यान्तप्रमेयभागनिमग्नत्वात्
प्रमेयं, यो गौरो, यः सुखी, यस्तृषितो, यः सर्वरूपरहितः सोऽहम्,—इति हि इदन्तैवान्तर्ली-
नाहंभावा संसारिणां परिस्फुरति । सेयं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तरूपा संसारावस्था । यदा तूक्तगुरूपदेशा-
दिदिशा तेनैवाहंभावेन स्वतन्त्र्यात्मना व्यापकत्वनित्यत्वादिसंपरामर्शाभात्मनि विदधता ततः
शून्यादेः प्रमेयादुन्मज्ज्येवास्यते तदा तुर्यातीतावस्था । यदापि परामृष्टतथाभूतवैभवनित्यैश्वर्यादि-
धर्मसंभेदेनैवाहंभावेन शून्याविदेहधात्वन्तं सिद्धरसयोगेन विध्यते, तदास्यां तुर्यदशायां तदपि
प्रमेयतामुज्झतीव । सेयं द्वय्यपि जीवन्मुक्तावस्था 'समावेश' इत्युक्ता शास्त्रे । सम्यगावेशनमेव
हि तत्र तत्र प्रधानं, तत्सिद्धये तूपदेशान्तराणि । यथा गीतम्—'मय्यावेश्य मनो ये मां ।'
(गी० १२।२) इति 'अथावेशयितुं चित्तं ।' (गी० १२।९) इत्यादि च । समावेशपल्लवा एव च
प्रसिद्धदेहादिप्रमातृभागप्रह्वीभावभावनानुप्राणिताः परमेश्वरस्तुतिप्रणामपूजाध्यानसमाधिप्रभृतयः
जो देव लोग हैं उनमें कर्तृत्व का अंश प्रधान होने के कारण और मल से संवित् ज्ञानांश
तिरोहित हो जाने से कर्तृत्वमय जो चेतन है उसके स्वातन्त्र्य कलारूप परमेश्वर की शक्तिरूप तत्त्व
से तिरस्कृत हो जाने के कारण शून्यादि से लेकर देह पर्यन्त माया प्रमाता का सम्बन्धी बनता है,
वह 'गुणत्वेन' अप्रधान होकर रहता है जिससे 'मितं' परिमित कहलाता है और देहादिरूप में
आया हुआ देह से लेकर शून्य तक प्रमेय भाग में डूबा हुआ होने के कारण वह प्रमेय भी कहलाता
है, जिस कारण यह भान होता है कि यह गौर है, यह सुखी-समृद्ध है, यह प्यासा है, सब रूप से
रहित वही मैं हूँ, इसी इदन्ता के भीतर लीन होकर अहंभावना जीवों में स्फुरित होती है । वही
यह जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्तिरूप से संसार अवस्था कही जाती है । जब गुरु के उपदेशामृत को
सुन कर उस स्वतन्त्ररूप अहंभाव से व्यापकत्व, नित्यत्व, शुद्धत्वादि अपने धर्मों का परामर्श करता
हुआ उन शून्यादि प्रमेय से ऊपर उठ जाता है तब उस की तुर्यातीत अवस्था हो जाती है । उस
परामर्श में अपना नित्य ऐश्वर्यादि धर्मों का परामर्श करके अहंभाव के द्वारा शून्यादि देहधातु तक
छेदा हुआ रहता है । जैसा कि सिद्धरस से स्वर्ण, तब प्रमेयत्व को छोड़ता हुआ सा उस तुर्यातीत
अवस्था में भी आत्मा के स्वरूप का बोध करने लगता है । इसलिए इन दोनों को जीवन्मुक्त
अवस्था 'समावेश' शास्त्र में कहा है; क्योंकि उसमें अच्छी प्रकार समाहित ही जाना ही प्रधान
माना जाता है, उसकी सिद्धि के लिए दूसरे उपदेश भी कहते हैं । 'मय्यावेश्य मनो ये मां
नित्य युक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः [ १२-२ ] श्रीमद्भगवद्-
गीता में श्री कृष्णचन्द्र ने कहा है कि मुझ वासुदेव परमात्मा में जो भक्त अपने मन को
श्रद्धा एवं भक्ति से स्थिर करता है वह परम उत्तम योगी माना जाता है । 'अथ चित्तं
समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ।।' [ १२-९ ]
हे अर्जुन ! जो मुझ में चित्त को समाहित करने में असमर्थ हो, ता तुम अभ्यास के बल से
भी मुझे पाने की इच्छा कर तुच्छ समावेश ही प्रसिद्ध प्रमातृभाव के अपने में लीन होने से
अ.-३, आ.-२, का.-१३-१४-१५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९१
कर्मप्रपञ्चाः । यद्गीतमपि—'अभ्यासेऽप्यसमर्थः सन्मत्कर्मपरमो भव ।' (गी० १२।१०) इति ।
देहपाते तु परमेश्वर एवैकरसः,—इति कः कुत्र कथं समाविशेत् । तदेतदाह यत् पुनः कर्तृताया
मुख्यत्वं तन्नान्तरीय Broadway कश्च शून्यादेर्गुणभावः, तस्मिंश्चाप्यचिद्रूपे गुणीभूते 'स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता'
इति मलव्यापारस्यापहस्तनात् चितो योऽपरोऽप्यात्मभागो बोधलक्षणो मलेन न्यक्कृतोऽभूत्
तस्यापि अधुनोन्मग्नत्वेन मुख्यत्वम् । यच्च कर्तृताया 'मुख्यत्वम्' उन्मग्नता, इदमेव ज्ञानमज्ञा-
नात्मकमलप्रतिपक्षत्वात्; तदेतन्मुख्यत्वं समावेशस्य लक्षणं येन देहस्थितोऽपि 'पतिः' इति 'मुक्त'
इति शास्त्रेषूक्तः ॥ ११-१२ ॥
नन्वेवं पत्युः समावेशात्मिका तुर्यतदतीतरूपा भवतु दशा, पशोस्तु कथं सुषुप्तस्वप्न-
जाग्रद्दशाभेद आगमेषूक्तः,—इत्याशङ्क्य सुषुप्तस्वरूपमेव तावदाचष्टे श्लोकत्रयेण—
शून्ये बुद्ध्याद्यभावात्मन्यहन्ताकर्तृतापदे ।
अस्फुटारूपसंस्कारमात्रिणि ज्ञेयशून्यता ॥ १३ ॥
साक्षाणामान्तरी वृत्तिः प्राणादिप्रेरिका मता ।
जीवनाख्याथवा प्राणेऽहन्ता पुर्यष्टकात्मिका ॥ १४ ॥
परमेश्वर को स्तुति-प्रार्थना, प्रणाम, पूजा, ध्यान, समाधि प्रभृति प्रपञ्च बहुत से करने पड़ जाते
हैं । जो कि गीता भी यही कहती है 'अभ्यासेऽप्यसमर्थः सन्मत्कर्मपरमो भवः । मदर्थमपि कर्माणि
कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि [१२-१०] अभ्यास करने में भी समर्थ न हो, तो मुझे प्रसन्न करनेवाले व्रत,
नियम, दान, पूजन, अर्चन, जप, तप, स्तवन, कीर्त्तन, श्रवण इत्यादि कर्म करने में तत्पर हो;
इससे भी चित्त की शुद्धि होगी और चित्तशुद्धि के द्वारा मोक्षरूपी सिद्धि को प्राप्त कर लेगा ।
शरीर के छूट जाने पर तो परमेश्वर में एकता हो ही जाती है, इस प्रकार कौन कहाँ और कैसे
संमिलित हो सकता है ? इसका उत्तर देते हैं कि उसमें जो कर्तृत्व की प्रधानता है वह आवश्यक
शून्यादि का गौणभाव नहीं है, उसका जडरूप गौण हो जाने पर स्वतन्त्रता का भी बोध नहीं
होता है—'स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता' इसी कारण मल के व्यापार दब जाने से चेतन का जो दूसरा
ज्ञान लक्षण आत्मांश था, वह भी मल से तिरस्कृत हो जाता है इसलिए उस भाग के भी स्फुटित
होने से उसमें मुख्यत्व आ जाता है । जिसको कर्तृता का मुख्य स्फुरण कहते हैं, यही अज्ञानात्मक
मल प्रतिपक्षी हो जाने से वह ज्ञान स्वरूप होता है; इसी का नाम मुख्य समावेश है वही देह में
रहनेवाला 'पतिः' पशुपतिरूप और मुक्त इत्यादि शब्दों से शास्त्रों में कहा जाता है ॥ ११-१२ ॥
इस पर आशङ्का करते हैं कि पशुपति की तुर्यातीत समावेशरूप अवस्था भले ही हो, किन्तु
पशुजीव की जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्त अवस्थाओं का भेद जो शास्त्रों में बताया है वह कैसे होगा ?
इस पर आशङ्का कर कहते हैं कि बुद्ध्यादि की अभावरूप शून्यता अहन्ता और कर्तृता के स्थान
में अस्फुटरूपता संस्कारमात्र से रहती है और उसी में ज्ञेय की शून्यता भी रहती है ॥ १३ ॥
इन्द्रिय सहित प्रमाताओं की आन्तरी वृत्ति ही प्राणादि की प्रेरिका होती है अथवा प्राण
में अहन्ता या पुर्यष्टकरूप से जीवनप्रद होती है ॥ १४ ॥
२९२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१३-१४-१५
तावन्मात्रस्थितौ प्रोक्तं सौषुप्तं प्रलयोपमम् ।
संवेद्यमपवेद्यं च मायामलयुतायुतम् ॥ १५ ॥
इह चित्तत्त्वं स्वस्वरूपमाच्छादयत् ज्ञेयरूपेण बुद्ध्यादिना देहान्तेन घटादिना वा भासते ।
एकमेव चेदं स्वातन्त्र्यविजृम्भितं, न त्वत्र वास्तवः क्रमो वा भेदो वा । तत्रापि तु स्वातन्त्र्यात्
क्रमश्च भेदश्चाभासते । तदेवंस्थिते यश्चित्तत्त्वस्य स्वरूपाच्छादनभागः स एवोत्तरभागान्तरा-
संकीर्णो यदा विश्राम्यति तदनुदयाद्वा तत्प्रध्वंसाद्वा प्रलय इव तदनादरणाद्रानिद्रासमाधि-
मूर्च्छादाविव, तत्रैव चाहन्तारूपं कर्तृतायाः पदं परामर्शोऽस्फुटत्वादरूपात्मना संस्कारेण शुद्धेन
वेद्यपदवोमप्राप्तेन युक्तो भवति, तदा सैवावस्था नेत्येवपरामर्शशेषा अनपेक्षितनिषेध्यबुद्ध्यादि-
विषयसुस्पष्टपरामर्शसंभेदापि अवश्यंभाविनिषेधयोगात् 'अकिञ्चनोऽहम्' इत्येवंभूतपरामर्शवत्
स्वीकृतसामान्याकारनिषेध्या, अत एव संस्कारशेषीकृतज्ञेयरूपा 'शून्य' इत्युच्यते । तथाविधे
बुद्ध्यादीनां देहादिनीलान्तानामभावरूपे शून्यत्वमुच्यते, यतस्तत्र ज्ञेयानां 'शून्यता' अभावरूपता
संस्कारशेषता । इयमेव हि सर्वत्राभावो न तु सतां सर्वात्मना विनाशः । तत्रैव शून्ये प्रमातरि
केवल इतनी स्थिति में ही प्रलय तुल्य सुषुप्त अवस्था कही जाती है। जिसमें वेद्यसहित
और वेद्यभावों को छोड़कर मायामल से मिली या नहीं मिली हुई अवस्था रहती है ॥ १५ ॥
चित्तत्त्व अपने स्वरूप प्रकाश को आवृत्त करता हुआ बुद्ध्यादि ज्ञेयरूप से अथवा घटादि
देहान्तरूप से भासित होता है और यह एक ही स्वातन्त्र्य का प्रभाव है, वस्तुतः यहाँ कोई क्रम
या भेद नही होता है, फिर भी तो स्वातन्त्र्य के कारण क्रम और भेद भासित होता है। ऐसी
स्थिति में भी जो चेतनतत्त्व का अपने स्वरूप का आच्छादन भाग है अर्थात् देह बुद्धि से संमिलित
होना रूप वही जब अन्य उत्तर भाग से असंकीर्ण होकर विश्राम लेता है तब तो उसके उदय
न होने से अथवा ध्वंस हो जाने से प्रलय के समान उसका अनादर कर देने से निद्रा, मूर्च्छा,
समाधि के समान रहता है, इस प्रकार उसमें ही अहन्तारूप कर्तृता से परामर्श के दब जाने पर
शुद्ध संस्कार से वेद्यपद को प्राप्त होकर रह जाता है, तब वही अवस्था परामर्श के अभावरूप
होकर निषेध बुद्ध्यादि से विषयों के स्पष्ट परामर्श न होने के कारण निश्चित होनेवाले निषेध
के संपर्क से 'अकिंचनोऽहम्' अर्थात् मैं कुछ भी नहीं हूँ इस प्रकार परामर्श के समान सामान्य
निषेध का बोध होता है, इसीलिए संस्कार शेष ज्ञेयरूप 'शून्य' कहा जाता है।
उसी प्रकार बुद्ध्यादि से लेकर देहादि नील-पदार्थ पर्यन्त अभावरूप में शून्यत्व कहलाता
है; क्योंकि उसमें ज्ञेयों की 'शून्यता' अभावरूपता संस्कार शेषता रहती है। इसी को सर्वत्र
दर्शनों में अभाव नाम से प्रतिपादन किया है सद्भूभाव-पदार्थों का सर्वतो भावेन विनाश नहीं
१. बोध मात्र ही संकुचित शून्य है, शून्यता में स्फुटता नहीं रहती है—
ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः ।
पदद्वये विभुर्भाति तदन्यत्र तु चिन्मयः ॥
जाग्रत एवं स्वप्न अवस्थाओं की अवस्थागत द्विरूपता का आधार ज्ञान और ज्ञेय है। सुषुप्ति
और चतुर्थ [ शिवावस्था ] में मात्र अनुभव रहता है, अपने स्वरूप की प्राप्ति चिद्रूप की स्थिति
सुषुप्ति एवं चतुर्थावस्था के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं पर भी नहीं रहती है ।
अ.-३, आ.-२, का.-१३-१४-१५] विमर्शिनीटीकोपेता [२९३
समवेता प्राणापानसमानोदानव्यानात्मके वायुचक्रे प्रेरणात्मिका शक्तिः, सा च विद्याकलयोः
प्रपञ्चभूतौ यौ क्रमेण बुद्धीन्द्रियकर्मेन्द्रियवर्गौ तयोरान्तरी वृत्तिः। बाह्या हि तयोः शब्दाद्यालोचन-
शब्दाभिव्यक्तिस्थानाभिहननादिका वृत्तिः। तदुक्तम् 'सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः
पञ्च।' (सां० २९ का०) इति। एवं शून्य एवाहन्ता अक्षचक्रोपोद्वलिता जीवनम्, —इति स
शून्य एव जीवः संसरति। यदि वेन्द्रियशक्तीनामेव यान्तरी साधारणप्राणात्मिका प्राणशब्द-
वाच्या प्राणादिमारुतविशेषप्रेरणामयी सैव 'अहम्' इत्यधिशयाना जीवनं, तदा प्राण एव जीवः
संसारी स एव शून्यः, प्राणश्च पुर्यष्टकशब्दवाच्यः, प्राणादिपञ्चकं बुद्धीन्द्रियवर्गः कर्मेन्द्रियगणो
निश्चयात्मिका च यतो धीर्व्यज्यते। तन्मात्रपञ्चकं मनोऽहंबुद्धय, इत्यन्ये 'तन्मात्रोदयरूपेण
मनोऽहंबुद्धि०।' (स्व० ४।१९) इति। 'भूमिरापोऽनलो०।' (गी० ७।४) इति च वदन्तः। एवं
होता है। शून्य प्रमाता में समवेत प्राण, अपान, समान, उदान, व्यानरूप पाँचों वायु को प्रेरणा
करनेवाली शक्ति रहती है और वह विद्या एवं कला के प्रपञ्चरूप जो क्रम से ज्ञानेन्द्रिय और
कर्मेन्द्रिय वर्ग हैं उन दोनों के भीतर रहनेवाली वृत्ति होती हैं; क्योंकि उन दोनों की बाह्यवृत्ति
शब्दात्मिकारूप, आलोचनरूप, शब्दरूप से अभिव्यक्त होनेवाली वृत्ति है, इस विषय में सांख्य
कारिका में कहा भी गया है—'सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः पञ्च।' [सां० २९ का०]
इन्द्रियों की सामान्यकरण वृत्ति प्राणादि पाँच वायु है। इस प्रकार शून्य प्रेरणात्मिका शक्तिरूप
आन्तरिक वृत्ति ही इन्द्रिय तक प्रकाशित होकर जीवन कहलाता है। वही शून्यरूप होकर जीव
संसार में संसरण करता रहता है अथवा इन्द्रिय-शक्तियों में जो भीतरी प्राणात्मिका-शक्ति है उसी
का नाम प्राण है; क्योंकि वह प्राणादि श्वास-प्रश्वास को प्रेरणा देती है, वही 'अहम्' में रह कर
जीवन कही जाती है, तब प्राण ही जीव संसारी हो जाता है और वही शून्य कहा जाता है, प्राण
पुर्यष्टक शब्द का वाच्य है, जिससे प्राणादि पाँच, बुद्धीन्द्रिय समूह, कर्मेन्द्रिय वर्ग एवं निश्चयात्मक
अन्तःकरण की वृत्तियाँ और बुद्धिरूप में व्यक्त होता है। कुछ लोग उसको तन्मात्र पञ्चक, मन,
बुद्धि और अहंकार कहते हैं—'तन्मात्रोदयरूपेण मनोऽहं बुद्धि०।' (स्प० ४।१९) तथा गीता
में कहा है 'भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकारं इतीयं मे भिन्ना प्रकृति-
रष्टधा' (७।४) सूक्ष्म पञ्चभूत सहित पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश ये पञ्च महाभूत;
१. वही प्रेरणात्मिका शक्ति वृत्ति है।
यतः करणवर्गोऽयं विमूढोऽमूढवत्स्वयम् ।
............प्रवृत्तिस्थितिसंहृतीः ॥
लभते.....................।
इत्यत्र
सहान्तरेण चक्रेणेति.............।
जिसके सामर्थ्य बल से ही, अनन्त-शक्ति चक्र के साथ-साथ उस बाह्य इन्द्रियों को भी चेतन
के जैसा सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है जिससे स्वतन्त्र होकर सृष्टि, स्थिति, और संहारादि करने में प्रवृत्त
होते हैं। इसलिए उस तत्त्व को जानने के लिए योगी को यत्न करना चाहिए। क्योंकि यह
अकृत्रिम स्वभाववाली स्वतन्त्रता रोम-रोम में भरी हुई है। इस रीति से अपने आवेशवशात् उठाती
हुई जीव ऐसा कहा जाता है। जो शून्य को उठानेवाली है वही जीवन क्रिया कही जाती है।
२९४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१६-१७
यदुभयात्मकं पुर्यष्टकं तावत्येव शुद्धे या विश्रान्तिः, तस्यां सत्यां यदहन्तायाः सुषुप्ताया बोधलक्षणं
भावरूपं कर्म च क्रियास्वभावं तत् सौषुप्तम् । मलेन हि प्रमाता सुप्तः कलया त्वसुप्त इव, अत्र
तन्निमज्जनेन सुष्ठु सुप्रस्तस्य भावः कर्म वा, —इति । तत्र शून्यसौषुप्ते न किञ्चिद्व्यतिरिक्तं
वेद्यम्,—इति मायीयमलाभावादपवेद्यं तत्; प्राणसुषुप्ते तु स्पर्शकृतस्य सुखदुःखादेर्भावात् माया-
ख्यमस्ति मलम्,—इति सवेद्यं तत् । एवं गाढागाढसुषुप्तद्वितयवत् प्रलयोऽपि मन्तव्यः । स परं
देहादिप्रध्वंसानुदयकृतश्चिरतरकालश्च । सुषुप्तं तु देहानादरकृतमचिरकालं च,—इति विशेषः ।
तत्रापि श्रमकृतं निद्रा, धातुदोषकृतं मूर्च्छा, द्रव्यकृतं मदोन्मादादि, स्वातन्त्र्यकृतं समाधिः,—
इत्याद्यवान्तरभेदाः । केचित्तु समाधिरूपं सवेद्यमन्यदपवेद्यम्,—इति प्रपन्नाः ॥ १३-१४-१५ ॥
नन्वेवं स्फुटवेद्यपदविनिर्मुक्ता सुषुप्तावस्थास्तु, स्वप्नजाग्रद्दशयोस्तु स्फुटवेद्यावभासयोगिन्योः
को भेदः ? इत्याशङ्क्य श्लोकद्वयेन भेदमाह—
मनोमात्रपथेऽध्यक्षविषयत्वेन विभ्रमात् ।
स्पष्टावभासा भावानां सृष्टिः स्वप्नपदं मतम् ॥ १६ ॥
सर्वाक्षगोचरत्वेन या तु बाह्यतया स्थिरा ।
सृष्टिः साधारणी सर्वप्रमातॄणां स जागरः ॥ १७ ॥
इन सबके कार्यरूप इन्द्रियाँ तथा अहङ्कार, बुद्धि अर्थात् महत्तत्त्व, मन इस प्रकार यह मेरी प्रकृति-
शक्ति अष्ट भेद से युक्त है ।
इस प्रकार ज्ञान और कर्मरूप पुर्यष्टक में विश्रान्ति लेते हुए जो अहन्ता सोई हुई रहती है
उस सुषुप्त का बोधरूप भाव कर्म और क्रिया स्वभाव सुषुप्ति है; क्योंकि मल से प्रमाता सुप्त कहा
जाता है और कला से असुप्त के जैसा रहता है, उसमें डूब जाने से भली-भाँति सुप्त हो जाता है
एवं शून्य सुषुप्त हो जाने पर कोई भिन्न वेद्यभाव नहीं रहता है, मायीय मल के अभाव में अपवेद्य
हो जाता है, प्राण सुषुप्त में तो सुख-दुखादि का स्पर्श होने से मायीय मल रहता है अर्थात् मायीक
नाम का मल उसमें रहता है इसलिए वह सवेद्य रहता है। इस प्रकार गाढ, अगाढ, सुषुप्ति के
समान प्रलय भी समझना चाहिए। वह देहादि प्रध्वंस के उदय न होने से चिरकाल तक रहता
है। सुषुप्त तो देहादि के अनादर से होता है इसी कारण वह शीघ्र नष्ट हो जाता है यही दोनों में
विशेषता है। उसमें अत्यधिक परिश्रम के करने से निद्रा, धातु के दोष से मूर्च्छा, मद्यपानादि से
उन्माद, स्वतन्त्रता से समाधि होती है, इत्यादि सब अवान्तर भेद कहे जाते हैं। किन्तु कुछ
लोग तो समाधि को सवेद्य और दूसरे को अपवेद्य मानते हैं ॥ १५ ॥
अब शङ्का करते हैं कि सुषुप्त अवस्था भले ही स्फुटवेद्य पद से शून्य रहित हो, किन्तु
जाग्रत् और स्वप्न तो स्फुटरूप से वेद्य को अवभास करनेवाली अवस्था है उसमें कौन सा भेद है ?
इस पर आशङ्का करके दो श्लोकों से उत्तर देते हैं—
मनोमात्र मार्ग में इन्द्रियों के विषय का प्रत्यक्ष प्रमाण भ्रम से भाव-पदार्थों में स्पष्ट अव-
भासपूर्वक सृष्टि का होना स्वप्न कहा जाता है ॥ १६ ॥
सभी प्रमाणों के भासित होने से जो बाहर की स्थिर सृष्टि है वह सभी प्रमाताओं के लिए
साधारण सृष्टि है वही जाग्रत अवस्था है ॥ १७ ॥
अ.-३, आ.-२, का.-१६-१७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९५
बाह्येन्द्रियाधिष्ठानानि चक्षुर्गोलकादीनि निमीलितानि निद्रायमाणस्य लक्ष्यन्ते, न च तेषु
निमीलितेषु बाह्येन्द्रियग्रहणव्यापारो दृष्टः तेन शुद्ध एव मनोमार्गे रूपस्पर्शादयो भावा अक्षग्रहण-
समुचितेन स्पष्टेन वपुषा भासनयोग्याः परमेश्वरेण सृज्यन्ते, न त्वणुना अनिष्टस्यैव दर्शनात्
इष्टस्यापि देशकालान्तरादियोगेन । अत एव मनोमात्रस्थितत्वादेव न प्रमात्रन्तरसाधारणीयं
सृष्टिः । यत्तु तत्र बाह्येन्द्रियविषयत्वं प्रमात्रन्तरसाधारण्यं चकास्ति, तद्यद्यपि यावद्भाति तावत्
तथैव, तथाप्युत्तरकालं प्रबुद्धस्य न तथा,—इति परामर्शेन तद्रूपं निर्मूलत्वेनावभाति, —इति
भ्रान्तम् । यानि हि प्रमात्रन्तराणि स्वप्ने स्वेन्द्रियाणि च भ्रान्ति, एतानि प्रबोधकालभाविभिरेव
तैरभिन्नानि,—इति निश्चयः, प्रबोधकाले च न तथा,—इति निश्चयानुवृत्तिरपहृतैव । तेनोभयमपि
भ्रान्तमुच्यते; भ्रान्तत्वमेव चास्थैर्यम् । एवमिन्द्रियाविषयत्वेनैवासाधारणत्वमाक्षिप्तम्, 'विभ्रमेणैव
चास्थैर्यं........' इति स्वकण्ठेन, तत् जाग्रत्प्रतियोगिधर्मनिरूपणावसरेऽपि न दर्शितम् । एवं भूता
या सृष्टिः सा पशोः स्वप्नसमये भावात् 'स्वप्नपदं' स्वप्नकाले विषयः, —इति तथाभूतविषयं
प्रमातृत्वं पशोः स्वप्नावस्था,—इति यावत् । अक्षग्रहणं बाह्येन्द्रियदशकस्योपलक्षणम् । यत्र तु
बाह्याक्षविषयं सर्वप्रमातृसाधारणत्वं च निश्चयानुवृत्त्या बाधारहितया परमार्थत्वेन चकास्ति,
तत एव स्थैर्यं विषयस्य सा सृष्टिः पशोः जागरः; तद्विषयं प्रमातृत्वं जाग्ररावस्था,—इति यावत् ।
बाह्येन्द्रियों के अधिष्ठान चक्षुगोलक इत्यादि जब निद्रा में पुरुष आ जाता है तो सम्बन्ध
बन्द हो जाता है, और उन सबके बन्द हो जाने पर बाह्येन्द्रियों का व्यापार नहीं दिखायी देता
है, इससे सिद्ध होता है कि रूप-स्पर्शादि जो भाव हैं वे सभी इन्द्रियों के बाह्य शरीर से परमेश्वर
के द्वारा ही सृष्ट हुए हैं, जीव के द्वारा नहीं हुए हैं; क्योंकि जीव को अभीष्ट नहीं है, अभीष्ट
तो भिन्न देश-कालादि से सम्बन्धित होता है। इसीलिए मनोमात्र में ही रहने के कारण सर्व
साधारण प्रमाताओं के लिए यह सृष्टि नहीं होती है और न तो बाह्येन्द्रियों का विषय भी साधारण
दूसरे प्रमाताओं के द्वारा प्रकाशित होता है, यद्यपि वह जब तक भासता है तब तक ही उसकी
सत्ता रहती है उत्तरकाल में प्रबुद्ध के लिए वैसा नहीं रहता है उसका बाध हो जाता है, ऐसा
इस परामर्श से वह उस रूप में निर्मूल भासता है, यही भ्रान्ति है। जो कि स्वप्न में अन्य
प्रमाताओं की अपनी इन्द्रियाँ भासती हैं, प्रबोधकाल में होनेवाले आभासों से अभिन्न होते हैं,
यही निश्चय होता है, उसी प्रकार प्रबोधकाल में नहीं होता है, इस प्रकार निश्चय ही अनुवृत्ति
अपहृत रहती है। इसीसे ये दोनों भ्रान्त कहे जाते हैं और भ्रान्ति ही एक प्रकार से अस्थिरता
है। इस प्रकार इन्द्रियों की अविषयता बता करके उनकी असाधरणता पर आक्षेप किया गया है,
'विभ्रमेणैव चास्थैर्यं......।' ऐसा अपने मुख से ही कहा है, उसे जाग्रत अवस्था के प्रतियोगी
धर्म के निरूपण अवसर में भी नहीं दिखाया है। इस प्रकार जो सृष्टि है वह पशु जीव के स्वप्न
काल में होती है 'स्वप्नपदं' अर्थात् स्वप्नकाल का विषय होती है, उसी प्रकार का विषय पशु
प्रमातृत्व कहलाता है। जो कि पशु जीव की स्वप्न अवस्था है, अक्ष ग्रहण से पञ्च ज्ञानेन्द्रिय ओर
पञ्च कर्मेन्द्रिय का ग्रहण करना चाहिए। किन्तु जिसमें बाह्येन्द्रियों का विषय रहता है वह सब
प्रमाताओं के लिए साधारणत्व रहता है और वह निश्चयवृत्ति के कारण बाधा रहित होने से
ठीक-ठीक प्रकाशित होता है, इसीलिए वह विषय की स्थिरता है और उसे ही पशुजीव की जाग्रत
अवस्था कहते हैं, जो कि स्थिर विषयवाला सृष्टि है तो भी पशु का वह जागरण माना जाता है,
२९६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१८
यावच्चानुवृत्तिस्थैर्यं निश्चयस्य चकास्ति, तावज्जागरः। तन्मध्य एव च निश्चयानुवृत्तिनिर्मूलनात्
स्वप्नः,—इत्यवभाससारत्वात् वस्तूनां; स्वप्नेऽपि दीर्घे यत्र स्वप्नान्तरं, स तदपेक्षया जाग्रदेव;
जाग्रदभिमतमपि वा दीर्घदीर्घं कालान्तरे निश्चयानुवृत्तिनिरोधाज्जाग्रदन्तरापेक्षया स्वप्न एवेति
मन्तव्यम् ॥ १६-१७ ॥
आसां तिसृणां हेयत्वप्रदर्शनेन तुर्यावस्थातः प्रभृत्युपादेयत्वं सूचयति—
हेया त्रयीयं प्राणादेः प्राधान्यात्कर्तृतागुणे ।
तद्धानोपचयप्रायसुखदुःखादियोगतः ॥ १८ ॥
यत्रायं प्रमाता त्यागोपादानतदिच्छाप्रयत्नादिकं परिक्लेशं पश्यति, तदेवास्य हेयतया
भाति । स चास्य सुखदुःखयोगवैचित्र्येणैव कृतः, तच्चैतदवस्थात्रये संभवति; यतः कर्तृतारूपं
स्वात्मविश्रान्त्यानन्योन्योन्मुख्यलक्षणमानन्दैकघनं यच्चिन्मयं वपुः, तद्यदा प्राणादिवृत्तिशून्यपुर्यष्टक-
देहादिभूमिषु गुणतामभ्येति, तदा तस्मिन् गुणीभूते प्राणादेः प्राधान्यं स्फुरति । तथा च तस्य
चिद्रूपस्य यथातथा हानिस्तथातथा दुःखोपचयो, यथातथा किञ्चिदुन्मज्जनं तथा तथा सुखोपचयः ।
तथाहि—बुभुक्षाकाले प्राणस्यैवोद्रेकात् दुःखं, तृप्तौ तस्य न्यग्भावादहन्तोद्रेके सुखम् । एवं
जब तक विषय की स्थिरता का निश्चय प्रकाशित रहता है तब तक जागरण काल रहेगा ।
उसी बीच में निश्चय की अनुवृत्ति के निर्मूल होने पर स्वप्न प्रारम्भ हो जाता है । इसलिए
वस्तु-पदार्थों में अवभास ही सार तत्त्व माना गया है; चिरकाल पर्यन्त होनेवाले स्वप्न में जो भी
अन्य-अन्य स्वप्न होते हैं वे सब के सब उसकी अपेक्षा से ही है, जाग्रत का अभिमान होने पर
भी दीर्घ-दीर्घ दूसरे काल तक निश्चय की अनुवृत्ति के रुक जाने से दूसरे जागरण की अपेक्षा से
उसे स्वप्न ही मानना चाहिए ॥ १७ ॥
जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं की हेयता को दिखा करके तुर्यावस्था ही
उपादेय है, इसे सूचित करते हैं—
कर्तृंता के गुण में प्राणादि की प्रधानता होने से जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति को हेय समझना
चाहिए । सुख-दुःखादि के योग से उसके भी प्रायः उपचय का त्याग करना चाहिए ॥ १८ ॥
यह प्रमाता छोड़ना एवं ग्रहण करना और उसकी इच्छा पर्यन्त करना आदि में क्लेशादि
दुःख देखता है, वही उसकी हेयता प्रतीत होती है और सुख-दुःख की विचित्रता से क्लेश होता है ।
इस प्रकार सुख-दुःखादि तीनों अवस्थाओं में ही हो सकता है; क्योंकि अपने स्वरूप में विश्रान्ति
लेना किसी दूसरे की अपेक्षा न रखना यह जो आनन्दघन चिन्मयरूप है वही परमेश्वर का
स्वरूप है, जब वह प्राणादि वृत्तियों से शून्य पुर्यष्टक की भूमि में गौण हो जाता है उसी गुणीभूत
अवस्था में प्राणादि की प्रधानता रहती है । उस काल में चिद्रूप परमात्मा को जैसी जैसी हानी
होती जायेगी वैसी वैसी दुःख की अभिवृद्धि भी होती रहेगी, जब जब परमेश्वर सम्बन्धी कुछ भाव
ऊपर उठता है तब तब सुख की अभिवृद्धि होती है । जैसा कि क्षुधाकाल में प्राण की उद्रेकरूपता
से दुःख होता है और क्षुधा की परितृप्ति हो जाने पर उसके दब जाने से तो अहन्ता के उद्रेक
से आनन्द का अनुभव होता है । इसी प्रकार थके हुए व्यक्ति का मर्दन करने पर और न करने
अ.-३, आ.-२, का.-१९-२० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९७
श्रान्तस्य मर्दनामर्दने देहप्राधान्याप्राधान्ये मन्तव्ये । यस्तु समावेशतत्त्वज्ञस्तस्य तत्तत्काले
दुःखानुदय एव । यदाह—
'दुर्बलोऽपि तदाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते ।
आच्छादयेद्बुभुक्षां च तथा योऽतिबुभुक्षितः ॥' (स्प० ४।८)
इति । एवं प्राणादेः प्राधान्ये कर्तृताया गुणभावे सुखदुःखवैचित्र्यशतयोगः प्रयासभूमिः,—इति
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ते प्राणादिप्राधान्यं कर्तृतान्यग्भावश्चास्ति,—इति तत् त्रयमेव हेयम् । कर्तृता-
प्राधान्योन्मेषात्तु तुर्यरूपातप्रभृति तत्स्थैर्यात्मकतुर्यातीतदशान्तमुपादेयम्, एकरसानन्दघनस्वभाव-
लाभे उपादित्साजिहासावैवश्यपरिश्रमप्रशमात्,—इति तात्पर्यम् ॥ १८ ॥
ननु प्राणादिप्राधान्यं हेयताया कारणमुक्तं तच्चेज्जाग्रदादित्रय एव, तर्हि तुर्यादौ
तदभावात् तत्समावेशे व्युत्थानानुपपत्तिः,—इति श्लोकद्वयेन शङ्कां परिहरति—
प्राणापानमयः प्राणः प्रत्येकं सुप्तजाग्रतोः ।
तच्छेदात्मा समानाख्यः सौषुप्ते विषुवत्स्रव ॥ १९ ॥
मध्योध्वर्गाम्युदानाख्यस्तुर्यगो हुतभुङ्मयः ।
विज्ञानाकलमन्त्रेशो व्यानो विश्वात्मकः परः ॥ २० ॥
पर देह की प्रधानता और अप्रधानता माननी चाहिए। जो कि समावेश स्थिति में रहनेवाले
ज्ञानिजन को तो उस-उस काल में दुःख का अभाव ही रहता है। इस विषय में कहा है कि—
दुर्बल भी जिसको आक्रमण करके कार्य में प्रवर्तित होता है और अत्यन्त क्षुधा से आक्रान्त
रहता है वह अपनी क्षुधा की निवृत्ति करे।
प्राणादि की प्रधानता में और कर्तृता की गौणता में असंख्य सुख-दुःख के विचित्र योग
से ही प्रयास भूमि होती है, उस जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति काल में प्राणादि की प्रधानता रहती
है और कर्तृत्वभाव दबा रहता है, इसीलिए इन तीनों अवस्थाओं को विवेकपूर्वक छोड़ देना
चाहिए। कर्तृत्वभाव की प्रधानता का उन्मेष होने से तुर्यरूप से लेकर उसकी तुर्यातीत अवस्था
तक ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि इससे आनन्दघन स्वभाव की प्राप्ति होती है, ग्रहण करने की
और त्याग करने की विवशता को शान्ति हो जाती है, यही इसका तात्पर्य है ॥ १८ ॥
अब शङ्का करते हैं कि प्राणादि के प्राधान्य को हेयता में कारण कहा गया है, वह यदि
तीनों अवस्थाओं में है तो तुर्यादि में प्राणादि का अभाव रहने के कारण देहपात हो हो जायेगा,
उसकी समाधि में व्युत्थान की अनुपपत्ति रहती है, इस प्रकार दो श्लोकों से इस आशङ्का का
परिहार करते हैं—
प्राण, अपान से युक्त होकर प्राण स्वप्न और जाग्रत प्रत्येक में रहता है। उन दोनों के अभाव
में प्राण समान वायु होकर सुषुप्ति अवस्था में विषुवत् संक्रान्ति के समान रहता है ॥ १९ ॥
मध्य में उर्ध्वगामी होकर उदान नाम का वायु और अग्निरूप होकर तुर्य अवस्था में रहता
है। विज्ञानाकल, मन्त्र, मन्त्रेश्वर के रूप में व्यान वायु विश्वात्मक उत्तम होता है ॥ २० ॥
३८
२९८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१९-२०
'प्राण' इति प्राणनरूपा जीवनस्वभावा येयं चिद्रूपस्य स्थितिः, सा तावत्सामान्यपरिस्पन्द-
रूपा, देहप्राणादेरचेतनस्य चेतनावानतासंपादनात्मिका 'अहम्' इति स्वातन्त्र्यारोपसारा सती
विकल्परूपपरामर्शमयी सैव प्राणादिविशेषात्मना पञ्चरूपतां भजते। तत्र किञ्चिज्जहती
क्वचित्पतन्ती च प्रश्वास-निःश्वासरूपा क्रमेण प्राणत्वमपानत्वं च विशेषं दर्शयति। तदिदं
विशेषद्वयं जाग्रति तावत् स्फुटमेव देहात् प्रसृत्य विषये विश्रान्तेः, ततोऽपि देहे; स्मृत्यादौ
वाभ्यन्तरे वेद्ये विश्रान्तेः प्राणापानयोः सुस्पष्टत्वात् । स्वप्नेऽपि तद्वयमस्त्येव; स्वपतोऽपि हि
प्राणापानौ निर्गमप्रवेशात्मानौ स्फुटेनैवापरेण लक्ष्येते। स्वयमेव च वेद्यसंवेदनात् त्यागोपा-
दानरूपा स्थितिः संवेद्यत एव, तेन प्राणना प्राणपानविशेषद्वयमयी जाग्रति, तथा स्वप्ने; सुप्तं
स्वप्नः, तदेव तु यदा सुतरां पुष्टं भवति, तदा सुषुप्तः प्रमाता, तस्येदं सौषुप्तं पदम्। तत् द्विविध-
मपि समानरूपं विशेषं प्रागीयं स्वीकरोति। सवेद्ये तावत्सुषुप्ते यद्यपि प्राणापानस्पन्दो लक्ष्यते,
तथापि तयोर्मध्ये या विश्रान्तिर्हृदयसदने निरिन्द्रिये प्रदेशे तदेव मुख्यतः सुषुप्तमिति। तत्र प्राणा-
पानयोर्यश्छेदो विश्रान्तिः कंचित्कालं तदात्मा सकलरसादिवर्गस्योर्ध्वाधरतिर्यक्षु समानीकरण-
व्यापारात्मा, तत एव हृत्पद्मविकासदानाद्भुक्तपीतजरणकारी समानो दिनरात्रिरूपयोः प्राणा-
पानयोः कंचित्कालं साम्याद्विच्छेदाच्च विषुवत्कालतुल्यः। विषुं व्याप्तिं समानीकरणमर्हति,—
इति, 'तदर्हम्' ( पा०सू० ५।१।११७ ) इति वतिः। उपमाने वतेरेव चाव्ययत्वम् 'उद्वतो निवतः'
'प्राण' प्राणनरूप जीवन को चलानेवाली जो चेतन की स्थिति है, वह सामान्यरूप से
स्फुरण कराती है, अचेतन जो देह-प्राणादि है उसे चेतनता देनेवाली यह 'अहम्' स्वातन्त्र्य-शक्ति
है स्वतन्त्रता का आरोप करना जिसकी यही विशेषता है कि विकल्परूप परामर्श करनेवाली
प्राणादिरूप से पाँचोरूपों में विभक्त हो जाती है। उसमें कुछ छोड़ती हुई और कहीं गिरती हुई
श्वासप्रश्वासरूप होने से प्राणत्व और अपानत्व को विशेषरूप से बताती है। ये दोनों जाग्रत काल
में स्पष्ट रहते हैं देह से फैलती हुई विषय में जाकर विश्राम लेती है, फिर उसके देह में; स्मृति
आदि में अथवा वेद्य में विश्रान्त होकर प्राण, अपान के रूप में सुस्पष्ट प्रतीत है। स्वप्नकाल में
भी दोनों रहते हैं; क्योंकि सोने पर प्राण, अपान दोनों का निर्गम और प्रवेश स्पष्ट ही दूसरे लोग
देखते हैं और वेद्य अर्थात् ज्ञानरूप होने से स्वयं त्याग और ग्रहणरूप स्थिति की अवगति होती
है, इस प्रकार जाग्रत काल में प्राणना, प्राण और अपान दोनों में विशेषरूप से रहती है, उसी
प्रकार स्वप्न में भी 'सुप्तं' स्वप्न ऐसा प्रयोग आया है, वही जब भली भाँति पुष्ट हो जाता
है, तब प्रमाता सुषुप्ति में पहुँच जाता है, उसका यह सौषुप्तपद है। वह सवेद्य और अपवेद्यरूप
में भी समानरूप से विशेष भावपूर्वक जीवित रहना स्वीकार करता है। पहले यद्यपि सवेद्य सुषुप्ति
में प्राण और अपान का स्पन्दन लक्षित होता है, तो भी दोनों के बीच में जो इन्द्रिय से रहित
हृदय स्थान में विश्रान्ति है वही मुख्यतः सुषुप्ति अवस्था मानी जाती है। प्राण और अपान का
जो भेदक है जिसको विश्रान्ति कहते हैं वही कुछ काल पर्यन्त उस रूप में रह कर सकल रसादि
वर्ग का ऊपर-नीचे तथा चारों तरफ बराबर कर देना जिसका व्यापार है, उससे ही हृदय-
कमल विकसित होने के कारण खाये-पीये पदार्थ को पचा देना यह सब समान वायु का कार्य
है एवं दिन और रात्रिरूप जो प्राण और अपान वायु है वह कुछ अंश तक भेद करने के कारण
विषुवत् काल के समान वह भी रहता है। चारों तरफ ठीक-ठीक व्यापकरूप में कर देने का
अ.-३, आ.-२, का.-१९-२० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९९
इति प्रयोगात्; तद्धि न्यायसिद्धं न वाचनिकं, विशेषं वा दिनरात्रितदूनाधिकत्वलक्षणं सुवति
प्रेरयत्यविरतम्,—इति शतरि विषुवत् । तत्र च विषुवति विच्छिद्यमानस्य प्राणापानस्य
संस्काररूपतया सद्भावः, सैव हि विच्छेदो न तु सर्वात्मना नाशोऽस्ति,—इत्युक्तमसकृत् । ततश्च
हानादानयोर्बीजरूपता सुषुप्ते; इयति च सर्वः प्रलयाकलान्तः पशुवर्गः। यदा तु सा प्राणना
वृत्तिर्वामदक्षिणमार्गौ खिलीभावयन्ती मध्यरूपेणोर्ध्वेन प्रवहति, तदा तत्प्रवहणं सकलस्य
भेदस्याभेदसारतादानलक्षणं विलापनमाश्यानस्येव सर्पिषो विदधती उदानवृत्तिर्विज्ञानाकलादारभ्य
सदाशिवान्तं, सा च तुर्यात्मिका दशा। मायोर्ध्वे हि विज्ञानाकलाः,—इति ततःप्रभृति भेदगलनं
प्रवर्तते। विलीने तु भेदे सर्ववेद्यराशिरूपतत्त्वभूतभुवनवर्गात्मकदेहव्यापाररूपेण प्राणवृत्तिर्व्यानि-
रूपा विश्वात्मकपरमशिवोचिता तुर्यातीतरूपा। प्राण एव प्रमाता प्राणापानरूपः समानरूप
नाम विषुवत् है। 'तदर्हम्' (पा० सूत्र ५।१।११७) इस सूत्र से वतिप्रत्यय होकर विषुवत् बना है और
वतिप्रत्यय उपमान में अव्यय होता है 'उद्धतो निवतः' इत्यादि प्रयोगों में देखा जाता है; क्योंकि
यह युक्तिपूर्वक भी सिद्ध है कोई मौखिक नहीं है अथवा तो दिन और रात्रि को न्यूनाधिक
जो निरन्तर प्रेरित करता है,—शतृ प्रत्यय करके भी विषुवत् शब्द बनता है। इस प्रकार
विषुवत् में विच्छिद्यमान जो प्राण-अपान है उसमें संस्काररूप से रहने के कारण उसे विच्छेद
कहते हैं अर्थात् संस्काररूप से सद्भाव होना ही विच्छेद है सारा का सारा विनष्ट नहीं हो जाता
है, यह हमने अनेक बार कहा है। आदान-प्रदान करना भी सुषुप्ति में बीजरूप से रहना सिद्ध
है; इतने अंश में ही प्रलयाकल तक सभी पशुवर्ग रहते हैं। जब जीवन वृत्ति वाम और दक्षिण
भाग को छोड़कर मध्यरूप से बहती है, तब उसका बहना सब भेदों में अभेद देनारूप जैसा कि
पिघले हुए घी का स्वरूप, उसी में उदानवृत्ति विज्ञानाकल से लेकर सदाशिव दशा पर्यन्त जो
दशा है उसे तुर्यावस्था कही जाती है माया तत्त्व के ऊपर विज्ञानाकल रहते हैं और वहां से
ही भेद गलने लगता है। भेद के विलीन हो जाने पर सारी संवेद्यराशि भुवनवर्ग, देह व्यापार-
रूप प्राणों की वृत्तियां विश्वात्मक परम शिव में रहने के कारण तुर्यातीतरूप हो जाती है, इसलिए
१. ब्रह्मादिकीटान्तमनन्तकं यल्लोकत्रये वेदकचक्रवालम् ।
तद्वैतदृष्टयैव सुपूर्णमित्थं तदीयचक्षुर्युगलं व्यनक्ति ॥
इत्थं विमृश्याहमनन्तशक्तिविश्रान्तधीर्द्वैतदृशं जिहासुः ।
त्वद्भक्तिसंदर्शितशुद्धमार्ग निरर्गलोभावितभूरिभावः ॥
समं समप्रोद्गतवेदानाख्यबिन्दुस्थनेत्रान्तरशोभमानम् ।
भवन्तमन्तःकृतविश्वरूपमद्वैतदृष्टि शिवसंश्रितोऽस्मि ॥
शैव दर्शन में परम शिव को त्रिनेत्र शब्द से कहा गया है। हे भगवन् ! तीनों लोकों में
ब्रह्मा से लेकर कीट-पतङ्ग पर्यन्त जितने भी वेदक पदार्थ हैं अर्थात् ज्ञाता वर्ग हैं, वे सभी द्वैतभाववाले
हैं इसी कारण उन लोगों की द्वैतरूपी दो आँखें मानी जाती हैं, इसका विचार करके मैं आपकी अनन्त-
शक्तियों में विश्राम लेकर अर्थात् द्वैतभाव को छोड़कर आपकी विशुद्ध-विमल भक्ति द्वारा अपने आपके
द्वारा माने हुए बन्धन से मुक्त होकर सर्वत्र समभाववाले तृतीय बिन्दु स्थानीय नेत्र के खुल जाने से
अपने में सारे विश्व को किये हुए अद्वैत दृष्टिवाले परम शिव को ही देख रहा हूँ अर्थात् मैं तो सारे
त्रिलोकी विश्व को अन्तःसात् करनेवाले अद्वैत शिव को ही तृतीय-नेत्र से शोभायमान् देख रहा हूँ।
३०० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१९-२०
उदानरूपो व्यानरूपश्च,-इति सामानाधिकरण्यात् विज्ञानाकलश्चासौ मन्त्रश्चासौ वर्गापेक्षया,
ईशश्च सदाशिवेश्वररूपो योऽसौ,-इति स उदानः। एतदुक्तं भवति यद्यपि तुर्यतदतीतयोरप्यस्ति
प्राणना—अन्यथा जीवत्वस्य व्युत्थानस्य चानुपपत्तेः—तथापि भेदोपसंहारेणाभेदविश्रान्ति-
प्राधान्यादनयोर्दशयोः सुखदुःखादिवैचित्र्यायोगात् एकघनस्वात्मविश्रान्त्यात्मकपरमानन्दमयत्वे-
नोपादेयतैव। सुषुप्तादौ तु संस्काररूपत्वास्र्फुटवेद्योल्लासस्फुटवेद्यावभासरूपस्य भेदस्य विद्यमान-
त्वात् अस्ति सुखदुःखादिवैचित्र्यम्,-इति हेयतैव,-इति युक्तमुक्तं 'हेया त्रयीयम्' इत्यादि।
भगवतश्च विश्वशरीरस्य प्राणापानसमानोदानव्यानरूपतयैव सकलगतोल्लासप्रवेशप्रलयाकल-
विज्ञानाकलादिवर्गसदाशिवरूपता,-इत्यप्यनेन दर्शितम्। यथोक्तम्—'षट्त्रिंशदात्मकं विश्वं
शम्भोः प्राणादिशक्तयः।' इति ॥ १९-२० ॥ आदितः ॥ १७१ ॥
इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीमदाचार्याभिनवगुप्त-
विरचितविमर्शिन्याख्यटीकोपेतायामागमाधिकारे प्रमातृतत्त्व-
निरूपणाख्यं द्वितीयमाह्निकम् ॥ २ ॥
•
प्राण ही प्रमाता है वही प्राणरूप, अपानरूप, समानरूप, उदानरूप और व्यानरूप होकर रहता
है, इस प्रकार यह सामानाधिकरण्यरूप होने से विज्ञानाकल, मन्त्र, मन्त्रेश्वर भी है और वर्ग
की अपेक्षा से ईश्वर और सदाशिवरूप उदान है।
अब यह कहा जाता है कि परमेश्वर के विषय में जो कहना था सब कह दिया, अनन्तर
जीव के विषय में प्रतिपादन किया जायेगा, तुर्यावस्था और तुर्यातीत अवस्था में भी जीव रहता
है; नहीं तो, जीवत्व का उत्थान नहीं हो सकेगा, फिर भी भेदों का उपसंहार करके अभेद में
विश्रान्ति लेने से उसकी प्रधानता से दोनों दशाओं में सुख-दुःखादि की विचित्रता से एकघन
आत्मा में विश्राम पा लेने से परमानन्द स्थिति स्थिर हो जाती है, इस दर्शन में यही उपादेय
है। सुषुप्ति अवस्था में तो संस्काररूप से अस्फुट वेद्य का उल्लास होना और स्फुटरूप से वेद्य
का भास होना एवं दोनों रूपों में भेद के विद्यमान रहने से सुख-दुःखादि की विचित्रता बनी
रहती है। इसलिए यह छोड़ने योग्य ही है, ठीक ही कहा है कि 'हेया त्रयीयम्' इत्यादि। भगवान्
विश्व शरीर के प्राण, अपान, समान, उदान, व्यानरूप से ही सभी जीवों में उल्लासपूर्वक प्रवेश
करने के कारण प्रलयाकल, विज्ञानाकल आदि वर्ग से लेकर सदाशिव तक दिखा दिया। जैसा कि
कहा है—'छत्तीस तत्त्वोंवाला यह विश्व भगवान् सदाशिव की प्राणादि शक्तियाँ हैं' ॥ १९-२० ॥
द्वितीय आह्निक समाप्त
इति सर्वदर्शनाचार्यश्रीकृष्णानन्दसागरविरचिता
तृतीयागमाधिकारहिन्दीव्याख्या
शिवरञ्जनी
इति तृतीयः आगमाधिकारः समाप्तः
•
अथ चतुर्थः तत्त्वसंग्रहाधिकारः
अथ चतुर्थे तत्त्वसंग्रहाधिकारे गुरुपर्वक्रमाख्यं
प्रथममाह्निकम्
अनन्तमानमेयादिवैचित्र्याभेदशालिनम् ।
आत्मानं यः प्रथयते भक्तानां तं स्तुमः शिवम् ॥
एवं स्वसंवेदनोपपत्त्यागमसिद्धं महेश्वररूपमात्मस्वरूपं यदधिकारत्रयेण वितत्य निर्णीतं
तदेव संक्षेपेण शिष्यबुद्धिषु निवेशयितुमाग़मार्थसंग्रहं श्लोकाष्टादशकेन दर्शयति ‘स्वात्मैव सर्वजन्तू-
नाम्’ इत्यादिना ‘उत्पलेनोपपादिता’ इत्यन्तेनैकेनाह्निकेन । तत्र श्लोकेन पारमार्थिकं रूपमुक्तवा
श्लोकनवकेन बन्धस्वरूपं प्रमातृप्रमेयतत्त्वदर्शनदिशा, सप्तकेन प्रत्यभिज्ञात्मकं मोक्षतत्त्वं, श्लोके-
नोपसंहारं दर्शयति, — इति तात्पर्यम् । ग्रन्थार्थस्तु निरूप्यते—
स्वात्मैव सर्वजन्तूनामेक एव महेश्वरः ।
विश्वरूपोऽहमिदमित्यखण्डामर्शबृंहितः ॥ १ ॥
इह जडास्तावच्चेतननिमग्ना एव भान्ति; इदमिति हि जडपरामर्शोऽहमिति संवित्परामर्श
एव विश्राम्यति; ततश्च जडा निरात्मान इति, जन्तव एव जीवाः सात्मानस्तेषां च महेश्वर एव
अनन्त प्रमाता, प्रमेय, प्रमाणादि के वैचित्र्य भावों को अभेद से युक्त एवं भक्तजनों के
स्वरूप को जो प्रकाशित करते हैं, उसकी हम स्तुति करते हैं।
इस प्रकार अपने संवेदन ज्ञान की उपपत्ति से आगम सिद्ध महेश्वर के स्वरूप को ज्ञाना-
धिकार, क्रियाधिकार और आगमाधिकार में विस्तारपूर्वक निरूपण किया है उसका संक्षेप से
शिष्यों की बुद्धि में प्रवेश करने के लिए आगमार्थ संग्रह के रूप में अठारह श्लोकों से दिखाया जाता
है ‘स्वात्मैव सर्वजन्तूनाम्’ इत्यादि लेकर ‘उत्पलेनोपपादिता’ अन्तिम इस एक आह्निक तक। प्रथम
श्लोक से पारमार्थिकरूप को कह कर नव श्लोकों द्वारा प्रमाता, प्रमेय तत्त्व दर्शन दिशा से बन्ध
का स्वरूप कहेंगे, इसके बाद सात श्लोकों से प्रत्यभिज्ञारूप मोक्ष तत्त्व का प्रतिपादन करेंगे, एक
श्लोक से उपसंहार दिखायेंगे, इसका यही तात्पर्य है। अब ग्रन्थ के अर्थ की व्याख्या करते हैं—
सभी जन्तु जीवों का आत्मा ही एक महेश्वर है। मैं विश्वरूप अखण्ड इस विमर्श से
व्याप्त हूँ ॥ १ ॥
सभी जड समूह चेतन तत्त्व में ही ओतप्रोत होकर भासते हैं; क्योंकि ‘इदम्’ जो जड परा-
मर्श है वह अहं इस संवित् ज्ञान परामर्श में ही विश्राम लेता है, इससे यह निष्कर्ष निकलता है
कि जड वर्ग चेतन शून्य ही रहता है, जन्तु ही जीव होते हैं और चेतन आत्मा से विशिष्ट रहते हैं,
३०२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-२-३
स्वात्मा स एव महेश्वरो न त्वन्यः कश्चित् । यतः संवित्स्वभावोऽसौ, संविदश्च न देशेन न कालेन
न स्वरूपेण कोऽपि भेदः, कामं देहप्राणादयो भिद्यन्तां, ते तु जडपक्ष्याश्चेतनमग्ना एव, —इत्येक
एव चिदात्मा स्वातन्त्र्येण स्वात्मनि यतो वैश्वरूप्यं भासयति, ततो महेश्वरोऽन्तर्नीतामिदन्तां
कृत्वा परानुन्मुखस्वात्मविश्रान्तिरूपाहंविमर्शपरिपूर्णः, अत एव सर्वज्ञत्वसर्वकर्तृत्वे नास्य यत्नो-
पपाद्ये । विचित्रबुद्धिकर्मेन्द्रियविषये हि यथा ज्ञातृत्वकर्तृत्वे एकस्यैवात्मनस्तथेन्द्रियस्थानीयरुद्र-
क्षेत्रज्ञसहस्रविषयस्य भावराशेर्यज्ज्ञानं करणं च तदेकत्र चिदात्मनि,—इति ॥ १ ॥
ननु यद्येक एवायं महेश्वररूप आत्मा कर्त्तर्हि बन्धो यदवमोचनायायमुद्यमः ?
इत्याशङ्क्याह—
तत्र स्वसृष्टेदंभागे बुद्ध्यादिग्राहकात्मना ।
अहङ्कारपरामर्शपदं नीतमनेन तत् ॥ २ ॥
'तत्रैवं स्वात्मनि महेश्वरे स्थिते तस्मिन्नेव प्रकाशरूपे स्वात्मदर्पणे तेनैव परमेश्वरेण
स्वातन्त्र्यात् तावत्सृष्टः सङ्कोचपुरःसर इदंभागः, तन्मध्ये यदेतद्बुद्धिप्राणदेहरूपमिदन्तया वेद्यं
तद्भिन्नस्य वेद्यस्य ग्राहकत्या समुचितम् इदंभावाभिभवप्रभविष्णुत्वात् कृतकेनापूर्णेनाहंभावेन
परामर्शेन भासमानं चकास्ति 'अहं देवदत्तोऽहं चैत्र' इति ॥ २ ॥
नन्वेवमप्यस्तु, तथापि कस्य बन्धः ईश्वरव्यतिरिक्तो हि कोऽन्योऽस्ति ? तदेतत्
उन सब का आत्मस्वरूप महेश्वर ही है, इस प्रकार वही महेश्वर है अन्य कोई नहीं है। जिससे
ज्ञात होता है कि यह संवित् ज्ञान स्वभाववाला है और संवित् का देश, काल और स्वरूप से कोई
भेद नहीं है, भले ही देह प्राणादि का भेद होता हो, वे जड के पक्षपाती होते हुए भी चेतन में
निमग्न रहते हैं। इस प्रकार एक ही चिदात्मा स्वतन्त्ररूप से अपने स्वरूप में विश्वरूप होकर
भासित होता है, इससे महेश्वर इदन्ता को अन्तर्लीन करके किसी अन्य की ओर न उन्मुख होने-
वाले अहं विमर्श में परिपूर्ण रहता है, इसीलिए सर्वज्ञत्व एवं सर्वकर्तृत्व के लिए कोई विशेष यत्न
नहीं करना पड़ता है । [ इसीको दृष्टान्त से दृढ़ करते हैं ] जैसे विचित्र ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय के
विषय में एक चिदात्मा का ज्ञातृत्व-कर्तृत्व रहता है उसी प्रकार इन्द्रिय स्थानीय रुद्ररूप अनेक
क्षेत्रज्ञ भावराशि के जो ज्ञान और करण एक ही चिदात्मा में संसक्त रहता है ॥ १ ॥
अब शङ्का करते हैं कि यदि यह एक ही महेश्वररूप आत्मा है तो कौन बन्धन ग्रस्त होगा
और प्रपञ्च से छूटने के लिए उद्यम करता है ? इस पर आशङ्का कर उत्तर में कहते हैं—
अपने से सृष्ट इदंभाग में बुद्ध्यादि के ग्रहणरूप से अहङ्कार के परामर्श पद तक पहुँचा
देना है वही वह पद है ॥ २ ॥
इस प्रकार स्वात्मस्वरूप महेश्वर के रहते-रहते वही प्रकाश स्वात्मदर्पण में परमेश्वर की
स्वतन्त्रता के कारण संकुचित होकर इदंभाग का सर्जन करता है, उसके बीच में जो यह बुद्धि,
प्राण, देहरूपी इदन्ता का वेद्य होती है उससे भिन्न वेद्य ग्राहक बनता है इदंभाग के प्रभाव को
दबा देने से कृत्रिम अहंभाव के परामर्श से भासित हुआ 'अहं देवदत्तोऽहं चैत्रः' मैं देवदत्त हूँ, मैं
चैत्र हूँ, ऐसा प्रकाशित होता है ॥ २ ॥
अच्छा तो, ऐसा भले ही हो; क्योंकि ईश्वर से भिन्न दूसरा कोई नहीं है तो फिर किस का
अ.-४, आ.-१, का.-३-४ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३०३
परिहर्तुमाह—
स्वस्वरूपापरिज्ञानमयोऽनेकः पुमान् मतः ।
तत्र सृष्टौ क्रियानन्दौ भोगो दुःखसुखात्मकः ॥ ३ ॥
सत्यं, परमार्थतो न कश्चिद्बन्धः केवलं स्वस्मादनुत्तरात् स्वातन्त्र्यात् यदा स्वात्मानं संकु-
चितमवभासयति स एव, तदा स्वस्थ पूर्णस्य रूपस्य यदपरिज्ञानं भासमानत्वेऽप्यपरामर्शरूपं,
तदेव कारणत्वेन प्रकृतं यस्य स पूर्णत्वाख्यातिमात्रतत्त्वः ‘पुरुष’ इत्युच्यते । अत एवानेकस्तत्तद्देह-
प्राणबुद्धिविशेषेण सङ्कोचग्रहणात् स च पुमान् भोक्ता सम्बन्धं भोगलक्षणमनुभवति, भोगश्च नाम
तस्य यौ कल्पितौ क्रियानन्दौ, कल्पिता क्रिया दुःखं, रजो हि प्रकाशाप्रकाशचाञ्चल्यरूपं दुःख-
मुच्यते; प्रकाशरूपं च सत्त्वं सुखं; तमस्त्वप्रकाशरूपो मध्ये विश्रमः प्रलयस्थानीयः ॥ ३ ॥
ननु सृष्टावित्यनेन किं व्यवच्छेद्यं किं च संग्राह्यम् ? इत्याह—
स्वाङ्गरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या ।
मायातृतीये ते एव पशोः सत्त्वं रजस्तमः ॥ ४ ॥
विश्वरूपस्य भगवतः स्वरूपभूत एव विश्वत्रयः प्रकाशो यश्च विमर्शः, ते तावज्ज्ञानक्रिये
स्वरूपपरामर्शापरित्यागेनैव तु यद्विभिन्नतयापि विमर्शनं स्वरूपपरामर्श एव विश्रान्तम् ‘अहमिदम्’
बन्धन होगा ? इस आशङ्का को दूर करने के लिए कहते हैं—
अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं होने से अनेक पुरुष मानने लगता है । उसकी सृष्टि में क्रिया
और आनन्द है एवं सुख-दुःखात्मक भोग होता है ॥ ३ ॥
ठीक है, ईश्वर से भिन्न दूसरा तो कोई नहीं है और जो बन्धन से युक्त होता हो । पर-
मार्थतः कोई भी बन्धन ग्रस्त नहीं है, चिद्रूप स्वतन्त्र ही एक शिव है केवल अपने से अनुत्तर परम-
स्वातन्त्र्यरूप जब अपने आपको संकोचरूप मानता है वही बन्धन है, उससे भिन्न दूसरा कोई
बन्धन नहीं है । तब अपने पूर्ण स्वरूप का अज्ञान भासमान रहने पर भी अपरामर्शरूप रहता है,
वही एक प्रकार से कारण बन जाता है उससे पूर्णता का ज्ञान नहीं होता जिस वजह से वह कहा
जाता है । इसलिए देह, प्राण, बुद्धि आदि में विशेषरूप से संकोच हो जाने के कारण वह पुरुष
भोक्ता भोग के सम्बन्ध रूप का अनुभव करता है, [ अत एव बद्ध कहा जाता है ] और भोग नाम
उसका है जो कल्पित क्रिया आनन्द है, [ विमर्श और प्रकाशमय है ] कल्पित क्रिया ही दुःख है;
क्योंकि रजोगुण प्रकाश-अप्रकाश चाञ्चल्यरूप है इसलिए उसे दुःख कहा जाता है, सतोगुण
प्रकाशरूप होने से सुखात्मक होता है, किन्तु तमोगुण अप्रकाशरूप मायामय होने से मध्य में प्रलय
अवस्था जैसा रहता है अर्थात् गहन सुषुप्ति में तम अप्रकाशरूप रहता है ॥ ३ ॥
सृष्टि में भोग पदार्थ सुख-दुःखात्मक है तो फिर क्या छोड़ना और क्या ग्रहण करना ? इस
आशङ्का के उत्तर में कहते हैं—
अपने अङ्गरूप भाव-पदार्थों में पशुपति की जो ज्ञान और क्रिया रहती है । पशु के लिए
तीसरी माया के रहने पर वे ही सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण हो जाते हैं ॥ ४ ॥
विश्वरूप भगवान् के स्वरूपभूत ही ये तीनों ज्ञान, क्रिया और माया के प्रकाश हैं और
जो विमर्श है, वह ज्ञान और क्रिया के स्वरूप परामर्श को न छोड़ने के कारण भिन्नरूप से भी
३०४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-५
इति सदाशिवेश्वरपरमार्थं सा भगवतो मायाशक्तिः, ता एतास्तिस्रः शक्तयो भगवति नैसर्गिक्यो
दृष्टाः । स्वरूपापरिज्ञाने तु भिन्नेषु भावेषु ज्ञानं, क्रिया, शुद्धमेव भिन्नत्वं प्रकाशविमर्शशून्यम्,—
इति पशोः प्रकाशः प्रकाशाप्रकाशावप्रकाशश्च,—इति क्रमेण सुखदुःखमोपलक्षणानि प्रकाशक्रिया-
नियमनशीलानि सत्त्वरजस्तमांसि ॥ ४ ॥
ननु चैवं सति यथा परमेश्वरस्य ज्ञानक्रियामाया अव्यतिरेकिण्यः शक्तयः,—इत्युच्यन्ते,
तद्वत् पशोः सत्त्वरजस्तमांसि प्रसज्यन्ते, व्यतिरिक्तानि च तानि पुंस्तत्त्वाद्गण्यन्ते; तदेतत् कथम् ?
इति संशयं शमयति—
भेदस्थितेः शक्तिमतः शक्तित्वं नापदिश्यते ।
एषां गुणानां करणकार्यत्वपरिणामिनाम् ॥ ५ ॥
सत्यम्, एवं स्यात् यदि भेदग्रहो न भवेत्, भेदव्यवहारस्त्वयं विचार्यते । तत्र च संकुचित-
स्वभावः पुरुषो, नास्य नैसर्गिकं भावविषयं प्रकाशनादिरूपं सर्वदा तत्प्रसङ्गात्, अपि त्वन्यसंबन्ध-
कृतम्; ततश्च तस्मात् पशोः शक्तिमत्त्वेन शङ्क्यमानाद् भेदेन यत एतानि सत्त्वादीनि, ततः
शक्तयो व्यतिरेकमुक्ता;—इति नोच्यन्ते किं तूपकरणत्वात् 'गुणा' इत्युच्यन्ते । ननु पुरुषात् किमिति
ते भेदेनोच्यन्ते ?' उच्यते, सुखदुःखमोहपरिणामरूपमेतत्करणत्रयोदशकं कार्यदशकं च सुखादि-
विमर्श स्वरूपपरामर्श में ही विश्रान्त लेता है। 'अहमिदम्' मैं ही यह हूँ ऐसी वह भगवान् की
माया-शक्ति है परमार्थतः सदाशिव एवं ईश्वररूप से कही जाती है। ज्ञान, क्रिया और माया ये
तीनों शक्तियाँ भगवान् में स्वाभाविक देखी जाती हैं। स्वरूप के परिज्ञान न रहने पर तो भिन्न-
भिन्न रूपों से पदार्थों में ज्ञान एवं क्रिया दिखायी देती है और प्रकाशविमर्श तो शुद्ध ही रह कर
सब से भिन्न ही रहता है, पशु का प्रकाश तो प्रकाश और अप्रकाश तथा इन दोनों से मिला हुआ
भी जो अप्रकाशरूप में रहता है, क्रमशः ये सुख-दुःख एवं मोहात्मक होते हैं। सतोगुण-रजोगुण-
तमोगुण ये तीनों गुण सुख-दुःख और मोह स्वरूप हैं, सतोगुण का कार्य प्रकाश करना है, रजोगुण
का कार्य विभिन्न कार्यों के करने में प्रवृत्तिशील रखता है और तमोगुण का कार्य कर्मशील व्यक्ति
के कार्य में रुकावट डालकर प्रमादी बना देना है ॥ ४ ॥
अब शङ्का करते हैं कि जैसे परमेश्वर को ज्ञान, क्रिया और माया अभिन्न शक्तियाँ कही
जाती हैं, उसी प्रकार पशु से सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण होते हैं और ये तीनों भिन्नरूप से
पुरुष में रहती हैं, इस प्रकार यह कैसे होगा ? इस संशय का समाधान करते हैं—
परमेश्वर में अभिन्नरूप से रहनेवाली ज्ञानादि शक्तियाँ पशु जीव में भेदपूर्वक रहती है ऐसा
नहीं कह सकते हैं। त्रयोदशकरण एवं दशविधकार्यरूप इन गुणों के परिणामस्वरूप से रहती हैं ॥ ५॥
आपका कहना ठीक है, ऐसा होगा यदि भेद ग्रह नहीं होता हो, तो ऐसा हो सकता है,
इसलिए भेद व्यवहार का विचार करते हैं। पुरुष संकुचित स्वभाववाला है इस पुरुष का नैसर्गिक
भाव विषय नहीं होता; क्योंकि वह स्वाभाविक होता तो सदा सर्वदा प्रकाशित हुआ करता, यह
तो दूसरों के सम्बन्ध से होता है; इस कारण पशु की शक्तिमत्ता की शङ्का करके भेद से सतोगुण,
रजोगुण और तमोगुण होते हैं, इसलिए ये शक्तियाँ भिन्न हैं यह कहा जाता है; यद्यपि इन्हें भिन्न
नहीं कहते हैं किन्तु उपकरण होने के कारण वे सतोगुण आदि इनके 'गुणाः' गुण हैं ऐसा कहते
अ.-४, आ.-१, का.-६] विमर्शिनीटीकोपेता [३०५
स्वभावत्वेनानुभूयते, —इति सुखदुःखमोहाः कारणकार्यवर्गतादात्म्यवृत्तयो यदि पुरुषव्यापि
तादात्म्यं भजेरन् तर्हि पुरुषः कार्यकारणपर्यन्तसृष्टिमयः संपन्नः, परिणामश्च दूषितः, —इति
स्वातन्त्र्यशक्त्या पुरुषो विश्वरूपः, इत्यायातम् । तथा च—न कश्चित् पुरुष ईश्वर एव, तस्मात्
अप्रत्यभिज्ञानमयपुरुषस्वरूपविचारे सत्त्वादयो भिन्ना एव, —इति स्थितम् ॥ ५ ॥
ननु ज्ञानादीनि कथं सत्त्वादिरूपाणि पशुं प्रति ? इत्याह—
सत्तानन्दः क्रिया पत्युस्तदभावोऽपि सा पशोः ।
द्वयात्मा तद्रजो दुःखं श्लेषि सत्त्वतमोमयम् ॥ ६ ॥
इह तावत् पतिर्विश्वस्यावभासमानवैचित्र्यलक्षणेन सृष्ट्यादिना पालयिता स्वप्रकाशस्वभावः,
तस्य विश्वपतेर्या सत्ता भवनकर्तृता स्फुरत्तारूपा पूर्वं व्याख्याता 'सा स्फुरत्ता महासत्ता' (ई०
प्र० १।५।१४ ) इत्यत्र, सैव प्रकाशस्य विमर्शाव्यतिरेकात् विमर्शात्मकचमत्काररूपा सती क्रिया-
शक्तिरुच्यते, परोन्मुख्यत्यागेन स्वात्मविश्रान्तिरूपत्वाच्च सैन आनन्दः; तदेवं भगवतश्चिदात्मतयै-
वेयद्रूपता । पशोस्तु सत्ता तदभावश्च आनन्दश्च तदभावश्च संकुचिततद्रूपत्वात्; तेन योऽसौ सत्ता-
नन्दभागस्तत्प्रकाशसुखवृत्ति सत्त्वं, यस्तदभावस्तदावरणमोहरूपं तमः, एते च ते सत्त्वतमसी
हैं । अच्छा तो, पुरुष से इन सबका भेद क्यों किया जाता है ? उत्तर में कहते हैं कि सुख, दुःख
और मोह के परिणाम होकर त्रयोदश करण हो जाते हैं और दश कार्य हो जाते हैं और सुख
दुःखादि का स्वभाविक अनुभव होता है, सुख, दुःख और मोह ये करण कार्य वर्ग से तादात्म्यरूप
होकर पुरुष में व्याप्त अर्थात् पुरुष से अभिन्नता सम्पादन करके उससे भी तादात्म्य प्राप्त
कर लेते हैं, इसी से पुरुष कार्य-करण पर्यन्त सृष्टिमय होकर सम्पन्न हो जाता है और इसके
परिणाम को दूषित करते हैं, इस प्रकार स्वातन्त्र्य-शक्ति से पुरुष विश्वरूप बन जाता है, यही
निष्कर्ष निकलता है। इसलिए कोई पुरुष नहीं है सब ईश्वर ही है, जब तक प्रत्यभिज्ञा नहीं होती
है इसलिए प्रत्यभिज्ञा से शून्य पुरुष के स्वरूप का विचार-विमर्श करने पर ये सतोगुण, रजोगुण
एवं तमोगुण भिन्न-भिन्न ही प्रतीत होते हैं, यही स्थिर अर्थ है ॥ ५ ॥
अच्छा तो, पशु जीव के लिए ये सत्त्वादि ज्ञान कैसे होते हैं ? इस पर कहते हैं—
पशुपति की सत्ता आनन्द एवं क्रिया है उससे रहित होकर पशु के लिए वह रजोगुण होकर
दुःखरूप हो जाता है और सतोगुण एवं तमोगुण मिल कर सुख-दुःख-मोहरूप हो जाता है ॥ ६ ॥
ईश्वर विश्व को विचित्र प्रकार से अवभासित करके सृष्टि-स्थिति और अपने विल्यादि
कार्य प्रपञ्च करते हैं, उसमें ईश्वर का स्वप्रकाशरूप रहता है, उस विश्वपति की सत्ता है 'सा
स्फुरत्ता महासत्ता' जो भवनकर्तृता स्फुरत्तारूपा पूर्व में बता दी है वही विमर्श से अभिन्न होकर
विमर्शात्मक चमत्कारवाली क्रिया-शक्ति कही जाती है, जब अन्य की उन्मुखता का त्याग कर
और अपने में विश्राम कर लेती है तब वही आनन्द कहा जाता है; भगवान् चिद्रूप से इतने
परिणाम की प्राप्ति कर लेते हैं। पशुजीव में तो सत्ता और उसका अभाव रहता है, आनन्द और
उसका अभाव रहता है उस जीव पशु के संकुचितरूप होने के कारण; इसलिए यह सत्ता एवं
आनन्द भाग है उसका प्रकाश सुखवृत्ति सतोगुण है, उन दोनों का अभाव और उसका जो आवरण
करनेवाला मोहरूप तमोगुण है, ये दोनों सतोगुण और तमोगुण नील और अनील के जैसा यद्यपि
३९
३०६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-७
नीलानीलवत् परस्परपरिहारेण यद्यपि वर्तेते कार्यत्वकारणत्ववत् तथापि एकपरामर्शगोचरी-
कार्यधर्ममपेक्षया चित्रपतङ्गसंगतनीलानीलात्मकरूपन्यायेनान्योन्यमिश्रतयापि भातः, अतो योऽयं
'द्वयात्मा' मिश्रस्वभावः तद्रजोगुणः, अत एव प्रकाशाप्रकाशस्वरूपयोः सत्त्वतमसोरत्र श्लेषेणाव-
स्थानम्,—इति दुःखत्वम्; प्रियपुत्रादेरेकघन एव हि प्रकाशः सुखम्; एकघन एवाप्रकाशो मोहः ।
यस्तु कथञ्चित्प्रकाशो यथा सव्याधिकदेहरूपतयानभिमतया, कथञ्चिच्चाप्रकाशो यथा गतगद-
कल्पौषधसंयोगितयाभिमतया तदेव दुःखत्वम्; अयमेव च पूर्वापरीभावसारः क्रिया परमार्थः
अत्रानुभयरूपत्वं तु नास्ति, प्रतीतौ कस्याञ्चित् कल्पिताकल्पितरूपायामननुप्रवेशात् तस्य । तथा
हि—नीलं तावदकल्पितरूपायां धियि भाति; नीलाभावस्तु तुच्छोऽपि कल्पनाकल्पित आभास-
मानत्वात् तावद्व्यवहारपरमार्थः, तदुभयव्यामिश्रणात्तु नीलानीलं भातु नाम; यत्त्वनुभयरूपं
तन्नीलप्रतीत्या तावदकल्पितया न विषयीकृतं चेत् तत् कल्पितामनीलधियमनुधावेत्; अथ तां
कल्पितां धियं नाविशत्यकल्पितया विषयीकृतं नीलमेव स्यात्,—इति न पशोश्चतुर्थोऽस्ति गुणः ।
अपिश्चार्थे, पशोः सा सत्ता सत्त्वं, तदभावस्तमो, द्वयात्मा रजश्च,—इति संबन्धः ॥ ६ ॥
एवं तावत् पशुपशुरूपं प्रमातृतत्त्वं संक्षेपेण निर्णीतम्; अथ प्रमेयत्तत्त्वं निर्णैतुं पत्यौ तावत्
'इत्थमिदं प्रमेयत्तत्त्वम्' इति निर्णैतुमाह—
येऽप्यसामयिकेदन्तापरामर्शभुवः प्रभोः ।
ते विमिश्रा विभिन्नाश्च तथा चित्रावभासिनः ॥ ७ ॥
परस्पर परिहाररूप से कार्य-कारणभाव बन कर रहते हैं, तो भी एकविषयक परामर्श करनेवाले धर्म
की अपेक्षा से 'चित्रपतङ्गसंगतनीलानीलात्मकन्यायेन' परस्पर संमिलित होकर एक परामर्श
बलात् भासते हैं, जो यह 'द्वयात्मा' द्वित्वभाव से संमिलित स्वभाव है वही रजोगुण है, इसलिए
प्रकाश और अप्रकाशरूप दोनों सतोगुण और तमोगुण में मिश्रित होकर रहना दुःख कहलाता है,
प्रिय पुत्रादि के साथ एकघन ही आनन्द सुख है और एकघन प्रकाश का अप्रकाश होना मोह है ।
जो कि किसी प्रकार प्रकाशित रहता है । जैसा कि व्याधि रोग से सहित देह में कभी-कभी
अनभिमत प्रकाश रहता है वह अभिमत रोग के औषध से युक्त होकर दुःख कहा जाता है यही
पूर्वोत्तर भावरूप परामर्श क्रिया कही जाती है । किन्तु इसमें दोनों का अभाव नहीं रहता है;
क्योंकि किसी भी कल्पित एवं अकल्पित प्रतीति में इसका प्रवेश नहीं होता है । देखो-पहले नील
अकल्पितरूप बुद्धि में भासना है; नील का अभाव यद्यपि तुच्छ है तो भी कल्पना से कल्पित होकर
इसका व्यवहार परमार्थतः होता है, उन दोनों के व्यामिश्रण से नील और अनील भले भासित
हो; किन्तु जो दोनों से भिन्न रूप में अकल्पित नील प्रतीति से विषयी न होकर वह कल्पित नील
बुद्धि का पीछा करने से उस कल्पित बुद्धि में यदि प्रवेश न करेंगे तो वह विषयीकृत नील ही हो
जाता है, इसलिए पशुजीव का कोई चतुर्थ गुण नहीं होता है । 'अपि' शब्द 'चकार' के अर्थ में
है, पशुजीव की वह सत्ता सतोगुण से युक्त रहता है, उसका अभाव तमोगुण है और दोनों का
मिलना रजोगुण कहलाता है, यही इसका सम्बन्ध है ॥ ६ ॥
इस प्रकार ईश्वर पशुपतिरूप और पशुजीवरूप प्रमातृत्व का संक्षेप में निर्णय कर दिया
गया । अब प्रमेयत्तत्त्व निर्णय करने के लिए पशुपति में 'इत्थमिदं प्रमेयत्तत्त्वम्' ऐसा ही यह
प्रमेयत्तत्त्व है, इस का निर्णय करते हैं—
अ.-४, आ.-१, का.-८-९-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ३०७
इहाभासा एव तावदर्थाः, — इत्युक्तं, ते च परामर्शैक्येन कदाचिन्मिश्रीक्रियन्ते यदा विशेष-
रूपता, कदाचिदमिश्रा एव परामृश्यन्ते यदा सामान्यरूपता, ते एते उभयात्मानोऽप्यसामयिकेना-
कल्पितेनेदंभावेन सहजभेदपरामर्शरूपेणाङ्गुलिनिर्देशादिप्रत्ययेन गोचरीकार्याः प्रभोरपि न केवलं
सद्योजातबालादेर्यावदीश्वरस्यापि, 'तथा' येन सामान्यविशेषप्रकारेण चित्रतयावभासन्ते । चित्रत्वं
हि तयोः — यन्मिश्रत्वममिश्रत्वं च युगपदेकाहन्ताविश्रान्तं भाति, — इति ईश्वरदशायां भावोल्ला-
सनान्तरीयकत्वेन संवित्संकोचरूपं निषेध्यानुपरक्तनञर्थमात्ररूपं शून्यं संवित्प्रकाशेनैव प्रकाश-
मानमहन्तानिषेधरूपामसामयिकीमिदन्तामुल्लासयति ॥ ७ ॥
एवं तावदीश्वररूपस्य पत्युरित्थं प्रमेयतत्त्वं, परमशिवे तु भगवति प्रमेयकथैव कथमुत्ति-
ष्ठति, प्रमेयकथोत्थापकत्वमेव भगवतः सदाशिवेश्वरत्वम्; अतोऽधुना पशुं प्रति कीदृक् प्रमेयस्य
वृत्तान्तः, — इति सन्देहमपोहति श्लोकत्रयेण—
ते तु भिन्नावभासार्थाः प्रकल्प्याः प्रत्यगात्मनः ।
तत्तद्विभिन्नसंज्ञाभिः स्मृत्युत्प्रेक्षादिगोचरे ॥ ८ ॥
तस्यासाधारणी सृष्टिरीशसृष्ट्युपजीविनी ।
सैषाप्यज्ञतया सत्यैवेशशक्त्या तदात्मनः ॥ ९ ॥
ये जो प्रभु की असामयिक इदन्तांश का परामर्श स्थानीय आभास हैं । वे मिश्रित और
भिन्न-भिन्न हैं तथा चित्र विचित्र आभासवाले होते हैं ॥ ७ ॥
इस शास्त्रमें आभासों को ही अर्थ कहा जाता है, उनको परामर्श की एकता से कभी
मिला दिये जाते हैं जब उसमें विशेषता आ जाती है और कभी पृथक् होकर भिन्नरूप में परामृष्ट
होते हैं जब सामान्यरूपता रहती है, तब ये दोनों असामयिक कल्पित इदंभाव स्वाभाविक भेद
परामर्शरूप से अङ्गुलि द्वारा निर्देश किये हुए के जैसा इन्द्रियों के विषय किये जाते हैं यह केवल
ईश्वर को नहीं होता है अपि तु सद्योजात बालक को भी सामान्य विशेषरूप से चित्र-विचित्र
होकर भासते हैं; क्योंकि उनकी विचित्रता मिश्रत्व और अमिश्रत्व रूप से एक साथ अहन्ता में
विश्रान्त होती है, इसलिए ईश्वर दशा में उसका अवश्य उल्लास होने के कारण ज्ञान का संकु-
चितरूप निषेध से मिला हुआ नञर्थ शून्य ज्ञान प्रकाशित होता है वह ज्ञानप्रकाश अहन्ता के
निषेधरूप असामयिक इदन्ता को उल्लासित करता है ॥ ७ ॥
ऐसा ही ईश्वररूप पशुपति का प्रमेयत्त्व है, भगवान् परम शिव में प्रमेयता का होना
नहीं घटता है, प्रमेयता तो सदाशिव और ईश्वर पर्यन्त ही रहती है; इसके आगे पशुजीव में कैसी
प्रमेयता होती है यह बतायेंगे, तीन श्लोकों से इस सन्देह को दूर करते हैं—
जीवात्मा के लिए भिन्न-भिन्न अवभासवाले पदार्थ कल्पित होते हैं । स्मृति, उत्प्रेक्षा आदि
के विषय में उन उन विभिन्न संज्ञाओं से उनका कथन होता है ॥ ८ ॥
उस पशुजीव की असाधारण सृष्टि ईश्वर की सृष्टि का आधार लेकर होती है । वह भी
अज्ञरूप से सत्य ही ईश्वर की शक्ति द्वारा तद्रूप होकर भासती है ॥ ९ ॥
३०८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-४, आ.-१, का.-८-९-१०
स्वविश्रान्त्युपरोधायाचलया प्राणरूपया ।
विकल्पक्रियया तत्तद्वर्णवैचित्र्यरूपया ॥ १० ॥
तुविशेषं द्योतयति प्रत्यगात्मनस्तु इत्थं प्रमेयरूपा अर्था, न त्वीश्वरवदुक्तनयेनेति । 'भिन्न'
इति मिश्रामिश्रतया भिद्यमान आभासो येषामर्थानां ते विशेषसामान्यात्मानोऽर्थाः प्रत्यगात्मनः
प्रतिपुरुषमविमिश्रस्वसंवेदनावगमरूपस्यासंकीर्णाऽहंप्रकाशात्मनः प्रकल्प्या विकल्पनीयाः, प्रतिप्राणि
स्ववासनानुसारेण विभिन्नाभिः संज्ञाभिः 'प्रियोऽयं शत्रुरयम्' इत्यादिकाभिर्भावनाविशेषानुसारेण
तत्तद्विचित्रसुखदुःखाद्युपयुक्ताभिः स्मरणे उत्प्रेक्षणे संकल्पनेऽन्यत्रान्यत्र च विकल्पयोगे । एतदुक्तं
भवति— ईश्वरस्य विकल्पात्मकतामन्तरेण शुद्धविमर्शविषयीभाव्या अर्थाः, पशोस्त्वन्योन्यापोहन
हेवाकिनि विकल्पे समारूढातेऽर्था भवन्ति, सांसारिकहानादानादिव्यवहारोपयोगात् इति । नन्व-
विकल्पत्वे यावानेवार्थस्तावोनेव यदि विकल्पत्वे तत्को विशेषः प्रमेयस्य पतिपशुरूपतायाम्, ?
उच्यते, तस्येति पशुकर्तृका सृष्टिस्तेषामर्थानामीश्वरसृष्टानामुपरिवर्तिनी, अत एव तामीश्वर-
सृष्टिमुपजीवन्ती असाधारणी प्रतिप्रमातृनियता । तद्यथा 'इदं हृद्यम्' इति येन सृष्टं तत् तस्यैव
तदा नान्यस्य । ननु यदि पशोरपि सृष्टिशक्तिरस्ति तर्हीश्वर एव; सत्यम्, ईश्वर एवासौ । नन्वेवं
साधारणत्वं कस्मात् सृष्टेर्न भवति ?; भवेत् यदि स्वशक्तिं परिजानीयात्, यावता सा तस्यापरि-
अपने में विश्रान्त होनेवाली विश्राम के उपरोध के लिए अचल प्राणरूप से, विकल्प क्रिया
से, उन उन वर्णों में विचित्ररूप से रहती है ॥ १० ॥
'तु' शब्द विशेषता को द्योतित करता है । जीवात्मा का ऐसा हो प्रमेयरूप अर्थ होता है,
उक्त नीति से ईश्वर के समान नहीं होता । 'भिन्नः' मिला हुआ अर्थात् भेद एवं अभेदरूप
से भिन्न भिन्न जो आभास हैं वे ही विशेष और सामान्यरूप होकर जीवात्मा के पदार्थ होते हैं
जो कि प्रतिपुरुष भिन्न भिन्न अपने संवेदन के अनुरूप असंकीर्ण अहं प्रकाशरूप से कल्पित होते हैं
और प्रतिप्राणी अपनी वासना के अनुसार विभिन्न विभिन्न संज्ञाओं से 'प्रियोऽयं शत्रुरयम्' अर्थात्
'यह प्रिय है, यह शत्रु है' इत्यादि भावना विशेष के अनुसार विचित्र सुख-दुःखादि के स्मरण
करने पर अथवा उत्प्रेक्षा करने पर अथवा संकल्प करने पर दूसरी दूसरी जगह विकल्पना से
योग्य होने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि ईश्वर की विकल्परूपता को अन्तःकरण में शुद्ध
विमर्श के विषय बनाने पर ईश्वर के ही पदार्थ हो जाते हैं, पशुजीव का तो परस्पर अपोहन
को नहीं छोड़नेवाले विकल्प में आरूढ होकर जो पदार्थ भासते हैं, सांसारिक ग्रहण और त्याग
इत्यादि व्यवहार के योग से पदार्थ कहलाते हैं ।
इस पर शङ्का होती है कि यदि अविकल्प में जितने भी अर्थ रहते हैं उतने ही अर्थ यदि
विकल्प में भी हो तो फिर क्या विशेषता हुई, पशुपति के प्रमेय में और पशुजीव के प्रमेय में भेद
क्या हुआ ? इसका उत्तर देते हैं, 'तस्यासाधारणेति' पशुजीव कर्तृक सृष्टि ईश्वर से सृष्ट पदार्थों
में जो इसके ऊपर रहते हैं, इसीलिए इसी ईश्वर सृष्टि का आधार मान करके जीव प्रमाता की
असाधारणी सृष्टि होती है । इसीलिए कहा गया है कि 'इदं हृद्यं' इस मनोहर संसार को जिसने
बनाया है उसी की यह शक्ति है, किसी अन्य की नहीं है । अच्छा तो, अब कहो कि पशुजीव में
में भी यदि सृष्टि करने की शक्ति है, तो वह भी ईश्वर हो गया; आपका कहना ठीक ही है,
ईश्वररूप ही जीव है । अच्छा तो, इस प्रकार ईश्वर सृष्टि के समान साधारण क्यों न हो जाय ?
अ.-४, आ.-१, का.-११] विमर्शिनीटीकोपेता [३०९
ज्ञाता परवशस्यैव सतो विकल्पक्रिया विकल्पनशक्तिरुदेति । ननु केन सा तस्योत्थाप्यते ?; आह—
ईश्वरस्य परामर्शरूपतया शब्दराशिलक्षणस्य या शक्तिः स्वरूपविश्रान्तिलक्षणपारमैश्वर्योपरोध-
प्रयोजना ब्राह्म्यादिदेवताचक्रमयी तैस्तैः ककारादिवर्णवैचित्र्यैर्विचित्रा, तया यासौ विकल्पक्रिया
तस्य पशोरेकत्र निरूढचभावात् चञ्चला तेन 'मित्रमयं शत्रुरयम्' इत्यादिवर्णवैचित्र्यानुविद्धतया
विकल्पनक्रियया तदात्मन ईश्वरस्वभावस्यैव पशोरसाधारणी सृष्टिः, 'पञ्चवक्त्रश्चतुर्दन्तो हस्ती नभसि
धावति ।' इत्यपि विमिश्रतया विकल्प सृष्टिः, तानाभासान् ईश्वरसृष्टानेवोपजीवति,—इति सर्वा
पाशवी प्रत्ययसृष्टिरीश्वरसृष्ट्युपजीविनीत्युक्तम् ॥ ८-९-१० ॥
नन्वेवं यदि पाशवी सृष्टिः संसाररूपा तर्हि पारमेश्वरी सृष्टिः पशोः किं कुर्यात् ? इति
निर्णीयते—
साधारणोऽन्यथा चैशः सर्गः स्पष्टावभासनात् ।
विकल्पहानेनैकाग्र्यात् क्रमेणेश्वरतापद्म् ॥ ११ ॥
ऐश्वरः सर्गो द्विधा, साधारणश्च घटादिरसाधारणश्च 'अन्यथा' इति निर्दिष्टो द्विचन्द्रादिः;
तस्य च सामान्यलक्षणं स्पष्टावभासनं नाम । सोऽयं सर्गो यदा विकल्पहानक्रमेण तस्मिन्निर्विकल्पक-
उत्तर में कहते हैं कि यदि अपनी शक्ति को जानेंगे तो निश्चित हो सकता है जब तक वह
शक्ति पशुजीव को ज्ञान नहीं है तब तक वह परवश रहता है और तब तक ही विकल्प क्रिया,
विकल्प-शक्ति उदय होतो रहती है । शङ्का होती है कि वह किससे उठती है ? उत्तर में कहते
हैं कि ईश्वर की शब्दराशिरूप परामर्श करनेवाली जो शक्ति है अपने में विश्रान्त रहती है जब
कि परम ऐश्वर्य का उपरोध करती है ब्राह्मी-शक्ति आदि देवता चक्र में अधिष्ठित ककारादि
वर्णों की विचित्रता से विचित्र बनी हुई जो विकल्प है वही पशुजीव मे एक जगह एकत्र होकर
बढे हुए प्राण एवं अपान आदि संमिश्रण से चंचल हुई यह मित्र है यह शत्रु है इत्यादि वर्णों की
विचित्रता से मिले रहने के कारण विकल्पन क्रिया के द्वारा तादात्म्यरूप ईश्वर भाव को प्राप्त
हुए पशुजीव की ही असाधारणी सृष्टि कही जाती है।
'पाँच मुखवाला और चार दातोंवाला हाथी आकाश में दौड़ता है।' यह विमिश्ररूप
होने से विकल्प सृष्टि है, ईश्वर से बनाये गये उन्हीं आभासों का यह भी आधार रखती है,
पशुजीव की अपनी भावना के अनुसार सृष्टि ईश्वर परमात्मा की सृष्टि का ही आधार लेकर होती
है ऐसा कहा गया है ॥ ८-९-१० ॥
अच्छा तो, पाशवी सृष्टि संसाररूपा है तो फिर ईश्वर सम्बन्धी सृष्टि पशुजीव के लिए क्या
उपकार करेंगी ? इसका निर्णय करते हैं ।
स्पष्ट अभाव होने के कारण ईश्वर की सृष्टि साधारण होती है । विकल्प की हानि
करके एकाग्रता के कारण क्रम से ईश्वर पद तक पहुँचा देती है यही ईश्वर सृष्टि का उसके लिए
उपकार है ॥ ११ ॥
ईश्वर सम्बन्धी सृष्टि दो प्रकार की होती हैं, साधारणरूप से और घटादि असाधारण
रूप से होती है नहीं तो, द्विचन्द्रादि का निर्देश तो ही है और ईश्वर सृष्टि का सामान्यरूप
तो स्पष्ट ही सब के सामने भासता है । जब वह यह ईश्वर सृष्टि विकल्प की हानि के क्रम से
उस पशु में निर्विकल्परूप से गृहीत होती है तब तो एक ही पदार्थ में एकाग्ररूप का अवलम्बन