ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
२७४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-८
सुषुप्ते प्रलये 'न' इत्यभावसमाधौ च तावच्छून्यमाकाशकल्पमनात्मरूपं वेद्यभावोचितम्
'अहम्' इत्यात्मत्वेन वीक्ष्यते; उच्छ्वसननिःश्वसनादौ वा अहमुच्छ्वसिमि,—इति प्राणो वायु-
कल्पः, स्थावरजङ्गमजिघत्सामन्युप्रज्वलनादौ वा प्राण एव तेजः समुपबृंहितः, स्वच्छोदकाशयकल्पा
सुषुप्ति दशा, प्रलयदशा और 'न' नकारात्मक जिसमें कुछ भी नहीं है—ऐसी अभावरूप
समाधिदशा में शून्य आकाश के सदृश स्मर्यमाण होने कारण परमार्थतः अनात्मरूप वेद्यभाव ही
'अहम्' आत्मरूप होने से भासता है ।
१. नाभावो भाव्यतामेति न च तन्नास्त्यमूढता । यतोऽभियोगसंस्पर्शात्तदासीदितिनिश्चयः ॥
भावना का विषय अभाव तीनों कालों में भी नहीं हो सकता है, अभाव भावना की स्थिति
तो जडता की ही स्थिति है जिससे कि योगी को समाधि से उठने के बाद अभिलाप भाषण के साथ
संपर्क हो जाने पर मन में ज्ञान होने लगता है कि मेरी अवस्था थी वह तो शून्य सी निश्चय होने लगती
है । चिति-शक्ति का उसी प्रकार का स्वभाव नहीं है; क्योंकि चिति-शक्ति तो सर्वोदिता स्वभाववाली
होती है उसमें मूढता की स्थिति की भाँति स्मरण नहीं होता । वह तो सदैव एकरस, अखण्ड, देदीप्य-
मान रूप में रहनेवाली होने के कारण प्रति समय अनुभव करनेवाला अनुभव स्मरण स्वातन्त्र्य-शक्ति के
रूप में करता रहता है । अभाव भावना का विषय है । इस प्रकार कि अभाव ब्रह्मवादियों का मानना
है । तथा माध्यमिक शाखा के बौद्धों का सर्वाभाव अर्थात् •सर्वशून्यरूप है । जब कि इस अवस्था में
रहनेवाला आत्मतत्त्व अभाव में मिल जाता है—ऐसा मानना युक्ति युक्त नहीं है । यदि अभाव ब्रह्मवाद
के अनुसार आत्मा का वास्तविक स्वरूप अभाव मान कर उससे किसी भी प्रकार की सत्ता के अनस्तित्व
का सिद्धान्त स्वीकारलिया जाये तो एक बाधा उपस्थित होती है । वह यह है कि अभाव अवस्था में
किसी की वेदन सत्ता का अस्तित्व शेष न रहने के कारण उस अभाव अवस्था का अनुभव कौन
करेगा ? ऐसे अभाव से कारणरूप सत् जगत् का उदय कैसे हो सकेगा; क्योंकि असत् तो जड आकाश
पुष्प के समान है उससे फिर उत्पत्ति कैसे बन पायेगी अर्थात् असत् से सत् की उत्पत्ति होना कदापि
संभव नहीं है और न ऐसा तर्क करना ही ठीक है ।
'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ २।१६ गीता
सद्रूप का अभाव कभी भी नहीं हो सकता एवं असद्रूप का भाव ही होता है; क्योंकि तत्त्व-
दर्शी लोगों ने दोनों को बड़ी सूक्ष्मता से देख कर प्रतिपादन किया है कि 'इदमित्थम्' यह ऐसा ही है ।
अतस्तत्कृत्रिमं सेयं सौषुप्तपदवत्सदा । न त्वेवं स्मर्यमाणत्वं तत्तत्त्वं प्रतिपद्यते ॥
जो पशु प्रमाताओं को अभाव की भावना समाधि होती है वह तो मात्र [ सुषुप्ति ] तामसिक निद्रा के
सदृश कृत्रिम ही है । वह तत्त्व [ चिद्रूप ] इस जडभावना के समान कदापि स्मर्यमाण का विषय नहीं
हो सकता है—अर्थात् अभाव भावना का साक्षात्कार करनेवाले किसी को इस भूमिका का लाभ हो
जायें, तो भी अनुभूति तो तन्द्रा जैसी ही होती है । इसलिए अनित्य, कृत्रिम उसे मानना चाहिए ।
एवं आत्मा का स्वरूप अनवच्छिन्न 'त्रिकाल बाध्यत्वम्' अर्थात् जिसका तीनों कालों में भी बाध नहीं
हो सकता है, इस युक्ति से सिद्ध है । इस स्वरूप की सतत गुरु परम्पराक्रमपूर्वक उपासना करते
रहना चाहिए ।
अ.-३, आ.-१, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७५
वेद्यप्रतिबिम्बनवती वा बुद्धिरभिनिविश्यते । अन्तरहं वेद्मि दुःख्यहमिति चिन्ताद्यवस्थासु,
शरीरमेव पृथिवीप्रायं कृशोऽहमित्यादिदशासु अहमित्यात्मतया भाति । सर्वं चैवेदं शून्यादि
वस्तुतश्चिन्मात्रसारमेव माययैव तावदचिद्रूपतया भासितम् । तथाविधमेव तु सत् अहमिति
संविद्रूपताभिनिवेशस्थानं संपादितमप्रशान्तजडभावमेव, - इति दुष्करतमवस्तुसंपादनाप्रतिघात-
रूपा परमेश्वरस्य मायाशक्तिः, - इत्येतत् 'विजृम्भते' इत्यनेन दर्शितम् । वाग्रहणेन वेद्यरूपाणां
सुतधनदारादीनामप्यहंताभिनिवेशविषयत्वमसंख्यातं सूचयति ॥ ८ ॥
नन्वचिद्रूपत्वादनात्मा यदि शून्यादिस्तदात्मतयाऽसौ अभिनिविश्यमानश्चिद्रूप एव, - इति
सर्वज्ञत्वसर्वकर्तृत्वादिविशुद्धैश्वर्यधर्मैव स्यात्, - इत्याशङ्क्याह-
श्वास अर्थात् प्राण वायु लेने में और श्वास निकालने में अथवा तो मैं स्वयं श्वास को
लेता हूँ और स्वयं ही श्वास को बाहर की ओर निकालता हूँ,- मानो कि वायु के समान प्राणतत्त्व
ही रहता है, जड-जीवजङ्गम को खा डालने के लिए क्रोध की अभिव्यक्ति होने पर तेजपुञ्ज से
बढा हुआ प्राण ही रहता है, स्वच्छ निर्मल जलाशय के समान वेद्यभावों में प्रतिबिम्बित होनेवाली
बुद्धि का अभिनिवेश देखा जाता है। मैं भीतर जानता हूँ, मैं दुःखी हूँ इस तरह चिन्तादि
अवस्थाओं में, जब कि शरीर प्रायः पृथिवी तत्त्व से बना हुआ है; उसी में भी मैं गौरवर्ण हूँ, मैं
स्थूल-सुन्दर हूँ इत्यादि अवस्थाओं में 'अहम्' आत्मरूप से भासता है यह सब शून्यादि तत्त्ववस्तु
का चिन्मात्र सार ही है जो माया के द्वारा अचिद्रूप अर्थात् वेद्यभाव से भासता है,-"तद्विहीनं
किञ्चित्" इस न्याय से शुद्ध चिन्मात्र का ही यह सारा का सारा विलास-उल्लास दृष्टिगोचर होता
है, समस्त वेद्यगत भाव तो माया का स्वरूप है। अचिद्रूप का तिरस्कार न करना, मैं सद्रूप हूँ-
ऐसे संविद्रूपता का अभिमान करना मायीय अप्रशान्त जडभाव ही तो है, इस प्रकार दुष्करतम
अवस्तुरूप के सम्पादन करने में कभी कहीं भी न रुकनेवाली परमेश्वर की माया-शक्ति कहलाती
है। [मायातत्त्व स्वरूप का गोपन कर देती है और अपरिमेय भेदों की जननी है। जिसमें परमेश्वर
का स्वरूप तिरोहित हो जाता है। यह तिरोभाव माया और उसके पञ्च कञ्चुकों द्वारा होता है।
'मा' धातु से माया शब्द सिद्ध हुआ है जिसका आशय यह है कि मापना अर्थात् मापकर अलग
कर देना एक निर्धारित सीमा में सीमित कर देना। पदार्थों को एक दूसरे से पृथक् कर देती है
'अहम्' अंश को इदमंश से एवं इदमंश को अहमंश से भिन्न कर देती है, नाना भेदों के सर्जन
करनेवाली होने के कारण माया-शक्ति कहलाती है ।] यह कारिका में दिया गया 'विजृम्भते'
क्रियापद से अवगत होता है। 'वा' शब्द के ग्रहण से द्योतित होता है कि पुत्र, कलत्र, कनक
इत्यादि वेद्य-पदार्थों में असंख्य प्रकार से अहन्ता का अभिमान करना भी तो माया-शक्ति का
सब व्यापार है ॥ ८ ॥
अब शङ्का की जाती है कि शून्यादि प्रमातृवर्ग अचिद्रूप होने के कारण अनात्मा होते हुए
भी आत्मरूप से जाने जाते हैं। इसी कारण वे सब के सब अभिनिविश कर लेने से चिद्रूप ही हो
गये, जिससे उनमें सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्वादि विशुद्ध ऐश्वर्यधर्म भी मिल जायेंगे, -इस आशङ्का
का उत्तर देते हैं-
२७६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-९
यश्च प्रमाता शून्यादिः प्रमेये व्यतिरेकिणि ।
माता स मेयः सन्कालादिकपञ्चकवेष्टितः ॥ ९ ॥
स्यादैश्वर्यधर्मयोगः शून्यादेः, यदि अहमित्याभिनिविश्यमानोऽपि नेयतां जह्यात्; तथा हि
सति प्रमेयमध्यस्य नीलादिव्यतिरिक्ततया नैव भासेत । यावता यः शून्यादिः प्रमाता कथितः, स
यावदेव स्वरूपाद्व्यतिरेकाभिमते नीलादौ प्रमेये माता तावदेव स्वयमपि मेयभूत एव सन् माता ।
मेयं हि मीयमानत्वाव परिमितम्,—इति तादृशादेव मेयान्तरादुपपन्नव्यतिरेकं, न त्वेवं चिद्रू-
पमपरिमितत्वात् । परिमितत्वं च शून्यादेरहंभावस्य यत् तदेव कालादिपञ्चकम् । तथा हि कालः
क्रममासूत्रयन् प्रमातरि विजृम्भमाणस्तदनुसारेण प्रमेयेऽपि प्रसरति, योऽहं कृशोऽभवं स स्थूलो
वर्ते भविष्यामि स्थूलतरः,—इत्येवमात्मानं देहरूपं क्रमवन्तमिव परामृशंस्तत्सहचारिणि
प्रमेयेऽपि भूतादिरूपं क्रमं प्रकाशयति । अस्य शून्यादेर्जडस्य विद्या किंचिज्ज्ञत्वोन्मीलनरूपा
बुद्धिदर्पणसंक्रान्तं भावराशिं नीलसुखादिं विविनक्ति । कला किंचित्कर्तृत्वोपोहलनमयी कार्य-
मुद्भावयति, किंचिज्जानामि किंचित्करोमि,—इति । अत्र चांशे तुल्ये किंचित्त्वे कस्मादिदमेव
किंचित्,—इत्यत्रार्थेऽभिष्वङ्गरूपः प्रमातरि देहादौ प्रमेये च गुणारोपणमय इव रागो व्याप्रियते ।
जो शून्यादि प्रमाता हैं उनसे भिन्न प्रमेय के रहने पर, वह प्रमाता प्रमेयरूप होकर ये
कालादि पञ्च कञ्चुकों के द्वारा आवेष्टित हो जाता है ॥ ९ ॥
विशुद्ध ऐश्वर्य सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्वदि धर्म का योग, शून्यादि प्रमाताओं में भले ही होवें
'अहम्' इस अभिनिवेश से युक्त होकर यदि वह प्रमेयता को छोड़ दे, ऐसा रहने पर ही प्रमेय भी
इसका नीलादि-पदार्थों से भिन्न होकर नहीं भासित हो सकेगा । इसलिए यह सब शून्यादि प्रमाता
कहा जाता है, जब तक वही स्वरूप से भिन्नरूप नीलादि प्रमेय में प्रमाता बनता है तब तक ही
प्रमेय बना हुआ कहलाता है, प्रमेय भी सीमित होने के कारण परिमित अर्थात् संकुचित हो जाता
है, इसलिए उसी प्रकार के दूसरे घटादि प्रमेयों से भिन्नरूप में प्राप्त होने के कारण, वह चिद्रूप नहीं
हो सकता, चिद्रूप का स्वरूप तो अपरिमित-अपरिच्छन्न होता है । परिमितरूपता शून्यादि
प्रमाताओं में अहंभाव का प्राप्त होना है वही कालादि पञ्चक है। देखिये—कालक्रम को दिखाता
हुआ प्रमाता में प्रकाशित होकर उसके अनुसार प्रमेय में भी फैल जाता है, तब वह कहने लगता
है कि मैं कृश था, वही अभी मैं स्थूल हो गया हूँ तथा आगे इससे भी अधिक स्थूलता को प्राप्त
हो जाऊँगा । इस प्रकार देहरूप आत्मा को क्रमवाले के समान मानता हुआ एवं उसका सहचारी
प्रमेय में भी भूतादिरूप से क्रम को प्रकाशित करता है। इसी कारण इस शून्यादि जड़ की विद्या
जो [ प्रमाता में आरोप करती है ] किञ्चित् ज्ञत्व उन्मीलनरूप बुद्धि दर्पण में संक्रान्त नील-
सुखादि भावराशि के पृथग्रूप से विवेक करती है। कला-महेश्वर का स्वरूप तिरोहित कर देने
पर, अणुरूप में ढल जाने पर जिससे उसका सर्वकर्तृत्व संकुचित होकर एक सीमा में सीमित
हो जाता है, किञ्चित् कर्तृत्व में विनिमय हो जाता है वही कला है अर्थात् किञ्चित् कर्तृत्व को
प्रकाशित करती हुई कार्य को उद्बुद्ध करती है, जिससे कि मैं जानता हूँ—ऐसा अनुभव होता है
और किञ्चित् मैं सम्पादन भी करता हूँ । इसी अंश में किञ्चिद्रूप से समानता होने पर ही क्यों
इतना ही किञ्चित् है, इस अर्थ में अभिष्वङ्गरूप प्रमाता, देहादि और प्रमेय में गुण का आरोप
अ.-३, आ.-१, का.-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७७
न च तद्बुद्धिगतमवैराग्यमेव, तद्धि स्थूलं वृद्धस्य प्रमदायां न भवेदपि रागस्तु भवत्येव । बुद्धि-
धर्मष्टकेऽपि च दृष्टोऽभिष्वङ्गः । अत्रैव कस्मादभिष्वङ्ग, — इत्ययमर्थो नियत्या नियम्यते इति ।
एवं कलाविद्याकालरागनियतिभिरोतप्रोतो माययापहृतैश्वर्यसर्वस्वः सन् पुनरपि प्रतिवितीर्णतत्सर्व-
स्वराशिवमद्ध्यगतभागमात्र एवंभूतोऽयं मितः प्रमाता भाति—इदानीमिदं किंचिज्जानानः, इदं
कुर्वाणोऽत्र रक्तोऽत्रैव च यः सोऽहम्—इति । एषां च भिन्नविषयत्वमपि भवति कदाचित्—
यथान्यत्र रक्तोऽपि नियत्यान्यत् कार्यते—इति । एते च प्रमातृलग्नतयैव भान्ति,—इति तस्यैव
शक्तिरूपाः प्रतिप्रमातृभिन्ना एव, कदाचित् तु नटमल्लप्रेक्षादावीश्वरेच्छया एकीभवेयुरपि ।
न ह्येषामीश्वरेच्छातिरिक्तं निजं किमपि जीवितमस्ति,—इत्यसकृदुक्तं वक्ष्यते च ॥ ९ ॥
यदुक्तमिदमित्यत्र प्रमेये व्यतिरेकिणि माता,—इति तत्र तत्प्रमेयं दर्शयति—
त्रयोविंशतिधा मेयं यत्कार्यकरणात्मकम् ।
तस्याविभागरूप्येकं प्रधानं मूलकारणम् ॥ १० ॥
यत् कार्यकारणरूपं त्रयोविंशतिप्रकारं, यच्च तस्य मूलभूतं कारणं सर्वकार्यकरणाविभागरूपं
प्रधानं नाम तत्सर्वं मेयम्,—इति सम्बन्धः । योगिमन्त्रतदीश्वरप्रभृतीनां हि भूततन्मात्रकरण-
कर देने के समान राग होता है और वह बुद्धि में होनेवाली आसक्ति नहीं है; क्योंकि वह स्थूल है,
वृद्धजन की कामिनी में आसक्ति बढ़ती ही जाती है चाहे काम करने की शक्ति भले ही न हो इस
प्रकार वृद्धावस्था न भी हो किन्तु अनुराग तो देखा जाता है । अभिष्वङ्ग बुद्धि ऐश्वर्यादि धर्म
अष्टक में भी देखा गया है । इसीमें क्यों आसक्ति होती है ? इसलिए यह अर्थ नियति से नियमित
होता है एवं कला, विद्या, काल, राग और नियति से ओतप्रोत होकर, जिसका ऐश्वर्य माया के
द्वारा अपहृत हो जाता है अर्थात् समस्त ऐश्वर्य लूट जाने पर भी उसमें कुछ अंश को लेकर ऐसा
ही परिमित प्रमाता के रूप में भासित होता हुआ, मैं इस समय कुछ जानता हुआ, कुछ करता
हुआ संसक्त होकर इसीमें जो कि वह मैं स्वयं हूँ । इनकी भिन्न विषयता भी कभी-कभी हुआ करती
है—जैसे जिससे अन्यत्र आसक्त होता हुआ भी नियति के कारण दूसरा कार्य कराया जाता है ।
ये सभी प्रमाताओं में ही संलग्न होकर भासित होते हैं, उसीकी शक्तिरूपवाले प्रत्येक प्रमाताओं
में भिन्न-भिन्न रूपों में भासित होते हैं, कदाचित् नट-मल्ल इत्यादि की कला देखने के समान ईश्वर
की इच्छा से दर्शकों की दृष्टि एकत्र हो जाती है । इनकी ईश्वर की इच्छा से भिन्न अपनी निजी
इच्छा विशेष नहीं रहती है, इस विषय में हम अनेक बार कह चुके हैं, आगे भी कहेंगे ॥ ९ ॥
प्रमेय में भिन्नरूप से प्रमाता रहता है—इस विषय में कह दिया गया है । अब उस प्रमेय
को दिखाते हैं—
जो कार्य-कारणात्मक तैइस प्रकार के प्रमेय तत्त्व हैं । उनका संमिलितरूप एक प्रधान
तत्त्व ही मूल कारण माना गया है ॥ १० ॥
जो कार्य-कारणरूप तैइस प्रकार के प्रमेय तत्त्व हैं जो कि समस्त कार्य-कारणभाव के
अविभागरूप प्रधान ही उन प्रमेयों का मूलभूत कारण हैं यही इन सबका सम्बन्ध है । योगी, मन्त्र
अर्थात् विद्येश्वर, ईश्वर-मन्त्रेश्वर और मन्त्र महेश्वर इत्यादिकों में प्रमेय तत्त्व ही रहते हैं; क्योंकि
भूत तन्माएँ, इन्द्रियवर्ग, प्रधान-प्रकृति के वशीभूत हो जाने के कारण ये सब के सब प्रमेय कह-
२७८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-११
प्रधानवशीकारयोगित्वात् सर्वमेव प्रमेयम् । संसारिणामप्यनुमानागमादिविशा प्रमेयमेव, —
इतीयत् प्रमेयम् । कालादयस्तु प्रमेया अपि प्रमातर्येव लग्नाः, —इति प्रमातृशक्तिस्वभावत्वात्
न प्रमेयत्वेनेहावसरे मायाप्रमातृव्यतिरिक्तप्रमेयप्रस्तावात्मनि गणिताः । वस्तुतो हि अत्र योऽयं
प्रमातापि स प्रमेय एव, स तु प्रमात्रीक्रियमाण आच्छादितप्रमेयताक इहोच्यते ॥ १० ॥
नन्वत्र त्रयोविंशतौ किं कार्यं किं करणम् ? इत्याशङ्क्याह—
त्रयोदशविधा चात्र बाह्यान्तःकरणावली ।
कार्यवर्गश्च दशधा स्थूलसूक्ष्मत्वभेदतः ॥ ११ ॥
प्रमातुः पूर्वं करणोपयोगः, —इत्यत्रादौ त्रयोदश करणानि; तत्र बुद्धिरध्यवसायसामान्य-
मात्ररूपा, ग्राह्यग्राहकाभिमानरूपोऽहंकारः, सङ्कल्पादिकारणं मनः, —इत्यन्तःकरणं त्रिधा ।
बुद्धौ शब्दाद्यध्यवसायरूपायामुपयोगीनि बुद्धीन्द्रियाणि पञ्च—श्रोत्रं, त्वक्, चक्षुः, जिह्वा,
घ्राणम्, —इति । कर्मणि तूपयोगीनि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि । तथा हि—त्यागो ग्रहणं द्वयम्, —इति
बहिर्विषयं यत् तत्र पाणिः पायुः पादः, —इति करणानि । एतद्देवान्तः प्राणे येन क्रियते तद्वा-
लाते हैं । सांसारिक जीवों की भी अनुमान एवं आगम शास्त्र के द्वारा प्रमेयता सिद्ध होती है,
इतने तक प्रमेय तत्त्व की सीमा है । कालादि भी तो प्रमेय तत्त्व के अन्तर्गत हैं किन्तु प्रमाता में
मिले हुए रहते हैं, इसलिए वे सभी प्रमातृ-शक्ति के स्वभाववाले होने के कारण प्रमेयरूप से इस माया
प्रमाता से व्यतिरिक्त प्रमेय के प्रस्ताव में नहीं गिने गये हैं । वस्तुतः इसमें जो प्रमाता है वह भी
प्रमेय ही है, प्रमेयता से आच्छादित कर देने के कारण उसे प्रमाता बना दिया जाता है ॥ १० ॥
अब शङ्का करते हैं कि इन तेइस प्रकार के प्रमेय तत्त्वों में कौन कार्य है और कौन करण
कहलाते हैं ? इस आशङ्का के समाधान के लिए कहते हैं—
पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रि, मन, बुद्धि और अहङ्कार इन तेरह को करण कहते हैं ।
पञ्चमहाभूत, पञ्चतन्मात्राएँ स्थूल-सूक्ष्म के भेद से ये दस प्रकार के कार्य हैं ॥ ११ ॥
सर्वप्रथम प्रमाता करण अर्थात् इन्द्रियों का उपयोग करता है; इसी कारण इसमें पहले तेरह
प्रकार के करण का ही निरूपण किया गया है । निश्चय करना बुद्धि का धर्म माना जाता है,
ग्राह्य [ प्रमेय और ग्राहक प्रमाता ] में अभिमान करना अहङ्कार का लक्षण है, संकल्प-विकल्प
करना मन का धर्म है, इस प्रकार इन तीनों को लेकर अन्तःकरण कहा जाता है । बुद्धि में
शब्दादि ज्ञान का निश्चय करनेवाली पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ हैं इनका नाम जैसे श्रोत्र, त्वक्, नेत्र,
रसना और घ्राण हैं । कर्म में उपयोगी होने के कारण कर्मेन्द्रियाँ भी पाँच प्रकार की होती हैं ।
देखिये—त्याग करना एवं ग्रहण करना ये दोनों बाहरी विषय कहलाते हैं जो हस्त, पायु और पाद
१. इस प्रकार पुरुष की दो करणेन्द्रियाँ रहती हैं ज्ञान में विद्या और क्रियायें कला । अत एव अन्धे व्यक्ति
में ज्ञान नहीं रहता और पङ्गु में क्रिया का अभाव रहता है ।
विद्यातत्त्व के बिना इन्द्रियवर्ग की अपनी स्वयं की कार्य इत्यादि संपादन में कुछ भी गति
नहीं हो सकती है और कला के बिना उसमें कर्तृत्व-शक्ति एवं ज्ञातृत्व-शक्ति का भी उद्भव नहीं हो
सकता । इसलिए पुरुषों में मुख्यरूप से तो विद्या और कला को ही इन्द्रियकरण माना गया है ।
अ.-३, आ.-१, का.-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७९
गिन्द्रियम् । तत्प्रक्षोभप्रशान्त्या विश्रान्तिक्रियोपयोगी उपस्थः । सर्वदेहव्यापकानि च कर्मेन्द्रियाण्य-
हङ्कारविशेषात्मकानि । तेन च्छिन्नहस्तो बाहुभ्यामादधानः पाणिनेवादत्ते, एवमन्यत् । केवलं
तत्तत्स्फुटपूर्णवृत्तिलाभस्थानत्वात् पञ्चाङ्गुलिरूपमधिष्ठानमस्योच्यते, —इत्येवं करणानि त्रयोदश ।
एषां च कार्यत्वेऽप्यसाधारणेन कारणत्वेन व्यपदेशः । स्थूलं कार्यं पृथिवी, आपः, तेजो, वायुः,
नभः, —इति पञ्च भूतानि । सूक्ष्ममेषामेव रूपं, गन्धो, रसो, रूपं, स्पर्शः, शब्द, —इति । तत्रैकैक-
गुणमाकाशादि, एकैकवृद्धगुणं वा, —इति दर्शनभेदः, —इति न विवेचितोऽनुपयोगात् । तत्र स्थूलं
विभक्तमविभागस्यानुमापकम्, —इति स्थूलरूपोपक्रममुक्तम् । तत्र पृथिव्याद्याभासा एव मिश्रीभूय
घटादिस्वलक्षणभूताः कर्मेन्द्रियैरुपसर्पिता, बुद्धीन्द्रियैरालोचिता, अन्तःकरणेन सङ्कल्पिताभिमत-
निश्चितरूपा, विद्यया विवेचिताः, कलादिभिरनुरञ्जिताः, प्रमातरि विश्राम्यन्ति, —इति तात्पर्यम् ।
एतच्च विस्तरतस्तत्प्रधानेषु तन्त्रालोकसारादिषु मया निर्णीतम्, —इतीहानुपयोगान्न वितानितम्, —
इति शिवम् ॥ ११ ॥
इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीम-
दाचार्यभिनवगुप्तविरचितविमर्शिनीनाख्यटीकोपेतायामाग-
माधिकारे तत्त्वनिरूपणाख्यं प्रथममाह्निकम् ॥ १ ॥
हैं वे तीनों इन्द्रियाँ करण कही जाती हैं। इसीको दिखाते हैं—भीतर प्राण को रोक कर जिससे
बोला जाता है वही वागिन्द्रिय है। जिसके द्वारा प्रक्षोभ और प्रशान्त क्रिया होती हो उसे उपस्थ
इन्द्रिय कहा जाता है और सारे शरीर में व्यापकरूप से रहनेवाली अहङ्कार से युक्त कर्मेन्द्रियाँ
कहलाती हैं। इसलिए हस्त के कट जाने पर भी बाहु से लेनेवाला हाथ से ही लिया है—ऐसा
कहा जाता है। स्पष्टरूप से ग्रहण तो पाँच अङ्गुलियों के रहने पर ही होता है अतः इसका
अधिष्ठान पञ्च अङ्गुलीरूप माना जाता है, इस प्रकार ये तेरह करण कहे जाते हैं। इनमें कार्यता
रहने पर भी असाधारणतया कारणरूप से व्यपदेश किया जाता है। इसका स्थूल कार्य पृथिवी,
जल, तेज, वायु और गगन है इस प्रकार पञ्च महाभूत हुए, इनके सूक्ष्मरूप को कहते हैं—
यथा गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द हैं। इनमें आकाशादि एक गुणवाले हैं किसी-किसी दर्शन
में क्रमशः एक-एक बढ़ते भी जाते हैं। यथा आकाश में एक शब्द ही मात्र गुण रहता है, वायु में
शब्द और स्पर्श दो गुण हैं, तथा तेज में शब्द, स्पर्श और रूप ये तीन गुण रहते हैं, जल में
शब्द, स्पर्श, रूप और रस चार गुण रहते हैं। पृथिवी में शब्द, स्पर्श; रूप, रस और गन्ध
ये पाँच गुण रहते हैं। इस सम्बन्ध में यहाँ पर अधिक विवेचन अनुपयोगी होने के कारण नहीं
किया गया है। इसमें स्थूलरूप का विवेचन इसलिए किया गया है कि इसका विभाग करना
अविभाग का अनुमापक होता है, इसी कारण स्थूलरूप का उपक्रम बता दिया है। पृथिवीरूप
स्थूल भाग आपस में मिल करके घटादिरूप वस्तु का निर्माण करता है जो कि कर्मेन्द्रिय से होकर
ज्ञानेन्द्रियों से समझ कर, अन्तःकरण से संकल्प किया हुआ अभीष्ट निश्चितरूपवाला, विद्या से
विवेचन किया हुआ, कलाओं से अनुरञ्जित, प्रमाता में परम विश्रान्ति लेते हैं, यही इसका आशय
है। इसका अधिक विस्तारपूर्वक विवेचन मैंने तन्त्रालोकसार आदि ग्रन्थों में किया है, अतः इस
स्थल में विस्तार के साथ वर्णन करना अनुपयोगी होने से नहीं किया है। शिवम् ॥ ११ ॥
प्रथम आह्निक समाप्त
अथ तृतीये आगमाधिकारे प्रमातृतत्त्वनिरूपणाख्यं
द्वितीयमाह्निकम्
अखण्डितस्वभावोऽपि विचित्रां मातृकल्पनाम्।
स्वहृन्मण्डलचक्रे यः प्रथयेत्तं स्तुमः शिवम्॥
एवं तत्त्वराशौ निर्णीते एतदन्तर्भाविनोक्तमपि मुख्यतया निर्णेतव्यं प्रमातृतत्त्वं वितत्य
निर्णेतुं 'तत्रैतन्मातृतानात्र' इत्यादि 'व्यानो विश्वात्मकः परः' इत्यन्तैर्विंशतिश्लोकैराह्निकान्तरं
प्रस्तूयते। तथाहि—प्रमातुरत्र स्वरूपप्रत्यभिज्ञानमुपदिश्यते शास्त्रे। स हि हेयमुपादेयं च स्वं
स्वभावं विद्वान् परमोपादेयरूपं शिवस्वभावं स्वात्मनमभेदेनाविशन् जीवन्नेव मुक्तो भवति, -इति।
तत्र श्लोकेन ब्रह्मादित्रयस्वरूपम्, ततोऽपि द्वयेन हेयोपादेयप्रमातृतत्त्वम्, ततस्तदुपयोगिमलस्वरूपं,
तत्कृतं च प्रमातृभेदं श्लोकसप्तकेन, द्वयेन समावेश स्वरूपं श्लोक पञ्चकेन प्रमातुरेव सुषुप्ताद्यवस्थाः,
त्रयेण तासां हेयोपादेयविभागं निरूपयति, —इत्याह्निकतात्पर्यम् । ग्रन्थार्थस्तु निरूप्यते—
तत्रैतन्मातृतानात्रस्थितौ रुद्रोऽधिदैवतम् ।
भिन्नप्रमेयप्रसरे ब्रह्मविष्णू व्यवस्थितौ ॥ १ ॥
तत्रेति, एवंभूतेऽस्मिन्नागमसिद्धे युक्त्यनुगते च तत्त्वस्वरूपे सति यदेतत् कालादिपञ्चक-
वेष्टितं प्रमातृत्तारूपं, तदेव यस्यां शुद्धमुपसंवृतप्रमेयजातं भवति दशायां संहाराख्यायां तस्यामधि-
जो हृदय कमल चक्र [ परावाग्रूप ] में अखण्डित स्वभाववाले परम शिव विचित्र-विचित्ररूप
से प्रमाताओं की भाँति प्रकट हो जाते हैं, हम उस शिव की स्तुति करते हैं।
इस प्रकार तत्त्वराशि प्रमेयरूप से निर्णय कर लेने पर इसके अन्तर्भाव में कहा गया भी
मुख्यरूप से निर्णय करना चाहिए, प्रमातृतत्त्व का भी विस्तारपूर्वक निर्णय करने के लिये
'तत्रैतन्मातृतानात्र' इत्यादि से लेकर 'व्यानो विश्वात्मकः परः' यहाँ तक बीस श्लोकों से दूसरे
आह्निक का प्रस्ताव करते हैं। जैसा कि इस प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में प्रमाता के अपने स्वरूप की
पहचान करने के लिए उपदेश दिया जाता है; क्योंकि वह हेय एवं उपादेयरूप अपने-अपने स्वभाव
को जानता हुआ, परम उपादेयरूप शिवभाव को अपने में अभेदपूर्वक समझता हुआ जीवन्मुक्त हो
जाता है। प्रथम श्लोक से ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र इन तीनों देवों के स्वरूप का वर्णन किया जायेगा,
इसके पश्चात् दो श्लोकों से हेय-उपादेयरूप से प्रमातृतत्त्व के विषय में कहेंगे। इसके बाद सात
श्लोकों से उस प्रमातृतत्त्व में जो उपयोगी मल का स्वरूप और उसके द्वारा होनेवाले प्रमाताओं
में भेदों का विवेचन किया जायगा। अनन्तर दो श्लोकों से समावेश अर्थात् समाधि अवस्था का
स्वरूप बतायेंगे। इसके बाद पाँच श्लोकों से प्रमाता की सुषुप्ति अवस्थाओं अर्थात् उन अवस्थाओं
के विषय में विवेचन करेंगे। इसके पश्चात् तीन श्लोकों से हेय-उपादेयता का विभाग प्रस्तुत
किया जायेगा, यही इस आह्निक का आशय है। अब ग्रन्थ के अर्थ का निरूपण करते हैं—
इस प्रकार केवल प्रमातृत्ता की स्थिति में भगवान् रुद्ररूप से अधिष्ठातृदेव रहते हैं। भिन्न-
भिन्न रूपों में प्रमेयतत्त्व के विस्तार होने पर तो ब्रह्मा और विष्णु की व्यवस्था की जाती है ॥ १ ॥
'तत्रेति' इससे यह अर्थ प्रकट होता है कि आगमसिद्ध तत्त्व स्वरूप की युक्तिपूर्वक सिद्धि
हो जाने पर जो यह कालादि पञ्चक से प्रमाता का स्वरूप आवेष्टित है, वही जिसमें प्रमेयरूप
अ.-३, आ.-२, का.-१] विमर्शिनीटीकोपेता [ २८१
ष्ठातृदेवतात्वं तद्दशासंपादनेन स्वोपासकलोकस्य तद्दशाध्यानावेशसमापन्नस्य स्वाभिमुख्यसंपादनेन
च भजमानो भट्टारक ईश्वर एव रुद्रो भगवान्, यो मायापदेऽपि प्राणापानात्मकधर्माधर्मसूर्येन्दु-
दिननिशाविमुक्तमध्यमज्योतीरूपप्रमातृस्वरूपस्पर्शाद् उन्मीलिततृतीयनेत्रो, भिन्नस्य तु प्रमेयस्य
‘प्रसरे’ संपादनेऽधिष्ठातृदेवतात्वं भजन् ब्रह्मा, प्रसृते भिन्ने प्रमेये तत्संतानप्रवहणलक्षणे प्रसरेऽधि-
ष्ठातृदेवता विष्णुः, अत एव तयोः प्रमेयप्रसररूपस्य ‘इदं नीलम्’ इत्येवं प्रकाशात्मनः प्राधान्यात्
‘अहम्’ इति प्रमातृदशावेशशून्यत्वात् न तृतीयनेत्रोन्मीलनम् । देवतैव दैवतम् । ‘प्रसर’ उत्पत्तिः
संतानश्च ॥१॥
शुद्धरूप से उपसंहृत रहता है और संहार अवस्था में अधिष्ठातृदेवता तत्त्व अपनी अवस्थिति के
सम्पादन से अपने उपासक लोगों को उस समावेश-समाधि अवस्था की प्राप्ति करने के लिए और
अपनी ओर उन्मुख करने से तो सेव्य भट्टारक ईश्वर ही रुद्ररूप से अधिष्ठाता हैं। जो कि मायापद
में भी प्राण एवं अपानरूप, सूर्य-चन्द्ररूप, धर्म-अधर्मरूप, रात्रि-दिनरूप इत्यादि से विभाग रहित
रहते हैं। उस महाव्योम स्वरूप में प्रमाताओं का अनुप्रवेश कर लेने मात्र से तृतीय नेत्र का
उन्मीलन हो जाता है, प्रमेयतत्त्व का भिन्न रूप में विस्तार हो जाने पर तो इसके सम्पादन करने
के लिए ब्रह्मा अधिष्ठातृदेव के रूप में रहते हैं, प्रमेयतत्त्व के प्रसृत हो जाने पर भिन्न भिन्नरूप से,
उसके समूह बढ़ने लगते हैं तब अधिष्ठातृदेव विष्णु होते हैं। अत एव उन दोनों का प्रमेय विस्तार
‘इदं नीलम्’ इसमें प्रकाशरूप के प्राधान्य होने के कारण, ‘अहम्’ इस प्रमातृ दशा की समावेशता
में शून्यरूपता होने के कारण तृतीय नेत्र का विकास नहीं होता है। देवता का भाव ही दैवत है।
‘प्रसर’ शब्द को उत्पत्ति एवं सन्तान अर्थ में लिया गया है॥१॥
१. अत एव प्रपञ्च के गल जाने पर बुद्धि गुण का परम ऐश्वर्य विनष्ट हो जाता है; विनष्ट हो जाने का अर्थ
यह है कि उसका दब जाना है न कि अत्यन्त अभाव हो जाना है—
तदा तस्मिन्महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे ।
सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्थानावृतः ॥
उस महा आकाश में पहुँचने पर चन्द्रमा और सूर्य ये दोनों ही उसमें प्रलीन हो जाते हैं,
प्रबुद्ध साधक को उस दशा में कुछ भी विक्षेप-आवरणादि नहीं होते हैं, किन्तु अज्ञानी लोगों के लिए
तो उस अवस्था में भी सुषुप्त-पद के समान अत्यन्त गाढ अन्धकार अवस्था में पड़े हुए जैसी स्थिति
रहती है।
२. जैसे जाग्रर अवस्था में ब्रह्मा हृदयकमल नाल से उत्पन्न होने के कारण कमलासन कहे जाते हैं इसलिए
प्रथम क्षण में उस भाव का आभास रहता है। विष्णु तो स्मृति अवस्था में एवं स्वप्न अवस्था में भी
रहते हैं इसलिए पालक कहे जाते हैं। मध्यमा-वैखरीरूप का उल्लासपद, परमेश्वर से लेकर पशु प्रमाता
तक प्रामातृवर्ग कण्ठभूमि में वर्तमान रहता है; क्योंकि हृदय में प्रथम पश्यन्ती प्रसरात्मक के प्रतिभास-
रूप होने के कारण प्रथम सृष्टि होती है। इसका स्पन्द शास्त्र में उल्लेख किया है—
यथेच्छाभ्यर्थितो धाता जाग्रतोऽर्थान् ।
जिसकी अभी अपने स्वरूप की पूर्ण भाव से अभिव्यक्ति नहीं हुई है, जाग्रत दशा में अपनी
इच्छा के अनुकूल, कोई विशेष अभीष्ट वस्तु नहीं दिखायी देती है, फिर क्यों न उसके सामने पदार्थों का
ढेर ही हो ? इसीलिए अन्तर्हृदय में विद्यमान धाता चिद्रूप उस साधक के हृदय में सोम एवं सूर्य का
३६
२८२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-२-३
यदेतन्मातृतामात्रमुक्तं तस्य विभागमागमकिं च संज्ञाभेदं निरूपयति—
एष प्रमाता मायान्धः संसारी कर्मबन्धनः ।
विद्याभिज्ञापितैश्वर्यश्चिद्धनो मुक्त उच्यते ॥ २ ॥
स्वाङ्गरूपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते पतिः ।
मायातो भेदिषु क्लेशकर्मादिक्लुषः पशुः ॥ ३ ॥
मायान्धो विमोहितः, अत एव कर्माणि स्वात्मनो बन्धकान्यभिमन्यमान 'एष' इति
कालादिवेष्टितः शून्यादिप्रमाता संसरति, —इत्यतः संसारी । देहोऽपि हि स्वरूपसादृश्यं बाल्य-
यौवनादिष्वनुवर्तयन् संसरतीव । बुद्ध्यादेस्तु जन्मान्तरेऽपि संसरणम् । विद्यया तु स्वरूपप्रकाशन-
शक्त्या प्रत्यभिज्ञापदं प्रापितमैश्वर्यं यस्य, अत एव शरीराद्यपि विश्वमपि संवेदनमेवाभिमन्य-
मानोऽत एव चिदेव घना अन्याचिद्रूपव्यामिश्रणशून्या यस्य रूपं, स पुनर्जन्मबन्धविरहात् देहेऽपि
स्थिते 'मुक्त' इति व्यपदेशयोग्यः पतिते तु शिव एकघनः,—इति कः कुतो मुक्तः । भूतपूर्वगत्या तु
यह जिसमें प्रमातृरूपता मात्र कह दिया गया है उसका आगमिक विभाग और संज्ञाभेद से
निरूपण करते हैं—
यह माया से अन्धा होकर प्रमाता कर्म-बन्धन में बद्ध जाता है अतः संसारी जीव हो
जाता है । जब विद्या के द्वारा अपने आत्मरूप ऐश्वर्य के समझ लेने पर तो चिद्रूप जीवन् मुक्त
कहलाता है ॥ २ ॥
वही प्रमाता अपने अङ्गरूप पदार्थों का स्वामी कहलाता है । माया के द्वारा इन पदार्थों
के भेद हो जाने पर क्लेश-कर्मादि से कलुषित होकर पशु [ जीव ] बन जाता है ॥ ३ ॥
माया से अन्धा होकर यह प्रमाता विमोहित हो जाता है, इसीलिए कर्मों को बन्धनरूप
मानता हुआ । 'एष' यह प्रमाता कालादि पञ्च कञ्चुकों से आवेष्टित होकर शून्यादि संकुचितरूप
में संसरण करता है, इसी कारण यह संसारी जीव हो जाता है; क्योंकि शरीर भी स्वरूप-
सादृश्यता को ग्रहण करता हुआ, बाल्य, यौवनादि अवस्थाओं में रहता हुआ संसरण-विचरण
करता सा दिखायी देता है । स्वरूप को प्रकाशित करनेवाली विद्या-शक्ति के द्वारा जिसने
प्रत्यभिज्ञारूप ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया है, इसी कारण शरीरादि विश्वमात्र को संवेदनमय मानता
हुआ, अतः चिद्रूप में ही स्थिर रहता हुआ जिसका स्वरूप अचिद्रूप के मिश्रण से शून्य हो गया है,
वह तो जन्म-मृत्यु से रहित होकर देहादि में रहता हुआ भी 'जीवन्मुक्त' कहलाता है । शरोर पात
उदय करा देता है अर्थात् उसकी ज्ञानेन्द्रियों में जो वधनात्मक नहीं है ऐसी तीव्र गतिशील शक्ति का
प्राकट्य करा देते हैं तथा अपने अभीष्ट वस्तुओं के दर्शन जाग्रत काल में भी करा देते हैं जिसको देखने
की साधक को तीव्र इच्छा बनी है ।
रुद्र अवस्था तो समस्तवाद के उपसंहारात्मक अनाहत परावाग्रूप के अनुप्रवेश करने पर
प्रारम्भ भूमि तालु में सब का उपसंहार करनेवाली होने से सुषुप्त अवस्था कही जाती है, इसी कारण
ब्रह्मा का हृदय स्थान है, विष्णु का कण्ठ स्थान है, रुद्र का तालु में निवास स्थान है, ईश्वर का
भ्रूमध्य भाग में निवास स्थान है तथा सदाशिव का ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर निवास है, अनाश्रितात्मक-शक्ति
सोपान के ऊपरी भाग में इन छः कारण धारी परमेश्वर के पद हैं ।
अ.-३, आ.-२, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २८३
प्रमात्रन्तरापेक्षया मुक्तः शिवः, —इति व्यवहारः । यश्चासौ मुक्तः स भगवान् स्वाङ्गवदभिमन्य-
मानः प्रमिमीते, —इति स तेषां स्वामी स्वरूपपरमार्थसमर्पणाच्च पालकः, —इति पतिरुपदिष्टः
शास्त्रे । मायाशक्तिकृतभेदान् व्यतिरिक्तानेव सतो यदा मिमीते तदा तैरेव मेयैः पाशरूपैः
पाशितः, —इति पशुरुक्तः । तथाहि वेद्यराशिवशादेवास्याविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशादयः
क्लेशाः, धर्माधर्मादिरूपाणि कर्माणि, आदिपदादाशयरूपा वासना, फलभोगरूपो विपाकः, —इति
कालुष्यमनन्तप्रकारं, यतः पाशितत्वात् 'पशुः, इत्युक्तः ॥ ३ ॥
यदेवैतत्पशुरूपं तदेवागमेषु त्रिविधं मलम्, —इत्याह—
स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता ।
द्विधाणवं मलमिदं स्वस्वरूपापहानितः ॥ ४ ॥
भिन्नवेद्यप्रथात्रैव मायाख्यं जन्मभोगदम् ।
कर्तर्यबोधे कार्मं तु मायाशक्त्यैव तत्त्रयम् ॥ ५ ॥
इह ज्ञातृकर्तृरूपं तावच्चित्तत्त्वस्य स्वरूपं, तस्यापहारो नामाणवं मलं येनासावणुः संकु-
चितो जातः । तत्र स्वरूपस्य निमीलनं संकोचः, तत्स्थिते बोधरूपे कर्तृत्वलक्षणस्य स्वातन्त्र्यात्मनः
जाने पर तो परम शिव में मिल ही जाता है, इस प्रकार कौन किस से मुक्त होता है ? भूतपूर्वगति
के अनुसार तो अन्य प्रमाता की अपेक्षा से मुक्त दशावाले परम शिव की स्थिति में ही रहता
है—इस प्रकार व्यवहार होता है ।
अब द्वितीय श्लोक की व्याख्या करते हैं। जो मुक्त दशा में रहनेवाले साधक पदार्थों को
अपने अङ्ग स्वरूप मानते हुए, उन्हीं सब का स्वामी हो जाता है और अपने स्वरूप को परमार्थ-
रूप से समर्पित कर देने पर तो पालन-पोषण करनेवाला हो जाता है इसी से शास्त्र में पति कहा
गया है। माया-शक्ति के द्वारा किये हुए पदार्थों में भेद जब अपने स्वरूप से व्यतिरिक्त मानते हैं
तब तो उन्हीं पाशरूप प्रमेयों से पाशित होकर पशु [ जीव ] हो जाता है । इसीलिए इसे पशु कहा
गया है । देखिये—वेद्यराशिव शात् अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश आदि क्लेश इनमें
होते हैं, धर्म और अधर्मरूप कर्म होते हैं, आदि पद से आशयरूप वासना भी होती है, एव फल
भोगरूप विपाक भी होता है, इस प्रकार जीव में असंख्य प्रकार के कालुष्य है; क्योंकि पाश में
पाशित होने के कारण पशु बन जाता है इसी कारण शास्त्र में इसे पशु कहा गया है ॥ ३ ॥
यह जो पशुरूप जीव है उसे आगम शास्त्रों में त्रिविध मल से युक्त कहा जाता है,—इस
विषय में कहते हैं—
स्वातन्त्र्य की हानि और बोधरूप स्वातन्त्र्य का भी ज्ञान न होने देना । यह दो प्रकार का
मल है जिसमें कि अपने स्वरूप छिप जाता है ॥ ४ ॥
भिन्न-भिन्न वेद्य प्रथा के फैलाव होने पर माया नामक मल जन्म और भोग को देनेवाला
होता है। माया-शक्ति के द्वारा कर्त्ता को अबोधता में तो कार्ममल रहता है ये ही आणव, कार्म
और मायीक मल हैं ॥ ५ ॥
इसमें चित्तत्त्व का स्वरूप ज्ञातृत्व और कर्तृत्वरूप से ही माना जाता है, उसके ज्ञान-
स्वरूप को छिपा देनेवाला आणव मल है जिस वजह से जीव अणु संकुचितरूप को प्राप्त हो जाता
स्वरूपान्तरस्य निमीलनं विपर्ययो वा, — इत्युभयथाप्याणवं मलं स्वरूपापहानिरूपमेकमेव ।
अत्रैवेति, सत्याणवे मले द्विप्रकारे स्वरूपसंकोचे वृत्ते भिन्नस्य यत्प्रथनं तस्य 'मायीयम्' इति
संज्ञामात्रम् । मायाकृतत्वेन मायीयता मलत्रयस्यापि । तत्र कर्तुर्बोधरूपस्य देहादेर्भिन्नवेद्यप्रथने
सति धर्माधर्मरूपं कार्मं मलं, यतो जन्म भोगश्च स च नियतावधिकः, — इति 'जात्यायुर्भागफलं
कर्म' इत्युक्तं भवति ॥ ४-५ ॥
अथैषां मलानां विविक्तविषयनिरूपणात् स्वरूपं स्फुटीकर्तुं 'स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य' इत्यस्य
तावद्विषयमाह—
शुद्धबोधात्मकत्वेऽपि येषां नोत्तमकर्तृता ।
निर्मिताः स्वात्मनो भिन्ना भर्त्रा ते कर्तृतात्ययात् ॥ ६ ॥
येषां चिन्मात्रमेव परमार्थो न तु 'अहम्' इति स्वात्मविश्रान्त्यानन्दरूपं परमं स्वातन्त्र्यं,
ते परमेश्वरेण तथा निर्मिताः स्वात्मनः सकाशाद्व्यतिरिक्ताः । अत्र हेतुः—'कर्तृताया' उत्तम-
है, जीव को अपने स्वातन्त्र्य का ज्ञान जिसमें नहीं होता, इसी कारण संकुचितता की सीमा में
रह जाता है। उसी बोधरूप अवस्थिति में कर्तृत्वरूप अपने स्वातन्त्र्यरूपता का स्वरूपान्तर हो
जाना अथवा विपरीत रूप में भान होने लगना, इस प्रकार उभयथा आणव मल स्वरूप को
छिपानेवाला ही होता है। 'अत्रैव' जो कारिका में दिया गया है उससे ज्ञात होता है कि दो
प्रकार के आणवमल के रहते हुए, स्वरूप की संकुचितता होने पर जो भिन्नता भासती है उसी का
नाम 'मायीय' मल है अर्थात् जिसमें जीव-अणु संकुचितता को प्राप्त हो जाता है। जब कि माया के
द्वारा किया हुआ होने के कारण इन तीनों मलों को भी मायीय ही कहा जाता है। देहादि की
भिन्नता का फैलाव होने पर तो धर्माधर्मरूप कार्ममल रहता है। जिसमें कि कर्त्ता को अज्ञानता
रहती है; क्योंकि यह जन्म और भोग देनेवाला है और वह नियत-निर्धारित अवधि तक ही
रहता है, जिसका निरूपण पातञ्जल योग दर्शन में 'जात्यायुर्भागफलं कर्म' इस रूप से किया
गया है ॥ ४-५ ॥
अब इन मलों के भिन्न-भिन्न विषयों के निरूपण से स्वरूप की स्पष्टता करने के लिए
'स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य' इस पद का पहले विषय दिखाते हैं—
जिनमें शुद्ध बोधता रहने पर भी उत्तम कर्तृता नहीं रहती । परमेश्वर ने अपने से भिन्न
कर्तृत्व से शून्य उन प्रमाताओं का निर्माण किया है ॥ ६ ॥
जिन प्रमाताओं का केवल चिन्मयरूप ही परमार्थ है उनमें 'अहम्' स्वात्मविश्रान्ति
आनन्दरूप प्रत्यवमर्श का अभाव रहता है अर्थात् अहं विमर्श की स्वतन्त्रता नहीं रहती, वे तो
परमेश्वर के द्वारा उसी प्रकार अपने स्वरूप से व्यतिरिक्त निर्मित हुए हैं। इसमें हेतु देते हैं—
'कर्तृताया' उन प्रमाताओं में उत्तम स्वातन्त्र्यरूपता का 'अत्ययात्' अभाव होने के कारण;
१. जब कि विज्ञानाकल इत्यादि प्रमातृ वर्ग परमेश्वर शिव से अभिन्नरूप ही हैं, इससे किसका स्वातन्त्र्य
माना जाय, क्या भगवान् शिव का है अथवा उन विज्ञानाकल प्रमातृ वर्ग का ? इसके समाधान में
उत्तर देते हैं कि जिसमें वैसी-वैसी इच्छा से होने की अप्रतिहत स्वभावता है वही स्वतन्त्र कहलाता है ।
और वैसी तो भगवान् शिव की ही हो सकती है; क्योंकि अपने आप में परिपूर्ण हैं ।
अ.-३, आ.-२, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २८५
स्वातन्त्र्यलक्षणाया 'अत्ययात्' अभावात्; परमेश्वरस्य तूत्तमस्वातन्त्र्यावियुक्तबोधरूपत्वम्, — ]
इत्यभिप्रायशेषः ॥ ६ ॥
नन्वस्माद्धेतोर्भवतु परमेश्वरात् तेषां भिन्नत्वमन्योन्यतस्तु कथं भेदो बोधरूपस्य व्यापकत्व-
नित्यत्वकृतस्य च देशकालाभेदस्य समानत्वात्; अन्योन्यभेदाभावे च 'निर्मितास्ते' इति कथं
बहुवचनम् ? इत्याशङ्कां व्यपोहति—
बोधादिलक्षणैक्येऽपि तेषामन्योन्यभिन्नता ।
तथेश्वरेच्छाभेदेन ते च विज्ञानकेवलाः ॥ ७ ॥
इह हि सर्वत्राप्रतिहतशक्तिः परमेश्वर एव तथाबुभूषुस्तथा तथा भवति, नत्वन्यः कश्चित्
परमार्थतोऽस्ति,—इत्यसकृदुक्तम्; ततश्च व्यापकनित्यबोधस्वभावोऽपि 'अहं भेदेन निर्भासे' इत्येवं-
भूतेनेश्वरेच्छाविशेषेण तेषां शरीरादिशून्यान्तप्रमातृपदोत्तीर्णानां बोधत्वनित्यत्वविभुत्वादिधर्मजा-
तस्यैक्येऽप्यन्योन्यं भेदः, ते च शास्त्रे विज्ञानकेवला उक्ताः । तत्र विज्ञानकेवलो मलैकयुक्तः,—
किन्तु परमेश्वर में उत्तम कर्तृत्वरूप स्वातन्त्र्य अवियुक्त सदैव बना रहता है, यही इसका
आशय है ॥ ६ ॥
इस प्रकार शङ्का होती है कि इस हेतु को लेकर भले ही परस्पर उनकी परमेश्वर से
भिन्नता रहे, किन्तु ज्ञानरूप के व्यापकत्व-नित्यत्व तथा देश-काल के अभेद की समानता होने के
कारण कैसे भेद रहेगा अर्थात् देश-काल के भेद का बोधस्वभाव के प्रति अभेदरूपता होने से और
उनका आपस में परस्पर भेद न रहने पर 'निर्मितास्ते' इस पद में क्यों बहुवचन का प्रयोग किया
हुआ है ? इस आशङ्का का निराकरण करते हैं—
बोधादिरूप की एकता रहने पर भी परमेश्वर की इच्छा भेद से वैसा ठीक होने की रहती
है, इससे परस्पर उन प्रमाताओं की भिन्नता भासती हैं और वे विज्ञानाकल कहलाते हैं ॥ ७ ॥
इसमें तो सर्वत्र अप्रतिहत-शक्ति संपन्न परमेश्वर ही वैसे-वैसे अनेकरूपों में अपनी स्वयं
की इच्छा से हो जाते हैं। उससे भिन्न कोई अन्य परमार्थ नहीं दिखता, ऐसा हमने अनेक बार
कहा है, इसलिए यह व्यापक नित्य बोध स्वभाववाला होने पर भी 'अहं भेदेन निर्भासे' अहं
भेदपूर्वक निर्भासित होता है, इस प्रकार ईश्वर की इच्छाविशेष रहने के कारण उन शरीरादि से
लेकर शून्यान्त प्रमातृपद से उत्तीर्ण होनेवालों का बोधरूपत्व, व्यापकत्वादि धर्मसमूह के ऐक्यरूप
रहने पर भी परस्पर भेद रहता है, उन्हें शास्त्र में विज्ञानाकल शब्द से पुकारते हैं । इन विज्ञाना-
१. जब 'अहम्' प्रत्यवमर्श नित्य, व्यापक, बोधसार स्वभाववाले होते हुए भी भेद से भासते हैं तब तो
विज्ञानाकल इत्यादि प्रमाताओं का तो भेद पूर्वक भासना स्वाभाविक ही है; क्योंकि वे परस्पर ग्राह्यों से
और ग्राहकान्तरों से भिन्न होकर रहते हैं इसलिए शास्त्र में इन्हीं को विज्ञानाकल कहा है । इस शब्द
की व्युत्पत्ति है कि विज्ञान + अकल इसमें विज्ञान मात्र रहता है, कर्तृत्व-शक्ति से शून्य है, पूर्व
अवस्थावाला जो सकल प्रमाता और प्रलयाकल प्रमाता का प्रमेय क्षेत्र था वही प्रमेय क्षेत्र इस विज्ञाना-
कल में कुछ विकसित हो जाता है, शेष तो पूर्ववत् ही रहता है। इसमें अपना अभेद देखता है; क्योंकि
इसमें से मायीय और कार्ममल का अभाव रहता है, मात्र आणवमल रह जाता है। इससे सिद्ध हुआ
कि कर्तृत्व से शून्य इन विज्ञानाकल आदि का स्वभाव है ।
२८६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-८
इत्यादौ 'विज्ञानं' बोधात्मकं रूपं 'केवलं' स्वातन्त्र्यविरहितमेषामिति ॥ ७ ॥
एवं 'स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य' इत्यस्य भागस्य विज्ञानाकलविषयतामुक्त्वा 'स्वातन्त्र्य-
स्याप्यबोधता' इत्यमुमंशं विषयप्रदर्शनेन स्पष्टयति—
शून्याद्यबोधरूपास्तु कर्तारः प्रलयाकलाः ।
तेषां कार्मों मलोऽप्यस्ति मायोयस्तु विकल्पितः ॥ ८ ॥
शून्ये जडत्वादबोधरूपे एव, यदि वा प्राणे बुद्धौ वा येषाम् अहमिति चमत्कारयोगात्
कर्तृत्वं ते प्रलयेन कृताः 'अकल:' कलातत्त्वोपलक्षितकरणकार्यरहिता अबोधरूपाः कर्तारश्च ।
प्रलयावधि हि ते तथाभूता उत्तरकालं तु कार्यकारणसंबद्धा एव भवन्ति; यतस्तेषां न केवलमुक्त रूप
आणव एव मलो यावत् कार्मोऽपि वासनासंस्काररूपो धर्माधर्मात्मास्त्येव । यद्येवं, भिन्नवेद्य-
प्रथाप्येषां स्यात् । सत्यम्, संवेद्यरूपे सुषुप्तपदे, ऽपवेद्ये तु न भवति; तेन मायीयो मल एषां
विकल्पितो व्यवस्थितविषयत्वेन । तथा हि—केऽपि शून्यादिभागविश्रान्ता गाढनिद्राजडीकृता
अपवेद्यसुषुप्तपदभाजः । अन्ये तु बुद्ध्यादिनिष्ठाः सुखदुःखावशेषसामान्यात्मकभिन्नवेद्यसंवेदन-
कलों में मात्र एक ही मल रहता है, 'विज्ञानं' ज्ञानात्मक रूपता ही 'केवलं' मात्र इनमें है, परम
स्वातन्त्र्य का अभाव विज्ञानकलों में रहता है ॥ ७ ॥
इस प्रकार 'स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य' इस भाग से विज्ञानाकल की विषयता को लेकर
कह दिया 'स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता' इस अंश का विषय दिखाने के लिए स्पष्ट करते हैं—
शून्यादि प्रमातृवर्ग तो अबोधरूप होने से प्रलयाकल कर्ता कहे जाते हैं। उन प्रलयाकलों
में कार्ममल भी रहता है, किन्तु मायीयमल तो विकल्परूप से रहता है ॥ ८ ॥
जडरूप होने के कारण अबोधरूप प्राण और बुद्धि में जिनकी 'अहन्ता' अर्थात् चमत्कार
सारपूर्वक कर्तृत्व-शक्ति रहती है वे प्रलयाकल कहे जाते हैं; कलातत्त्व से उपलक्षित कार्य-कारण से
रहित बोधरूप कर्ता होते हैं; क्योंकि वे लोग प्रलय पर्यन्त वैसे के वैसे रहते हैं और उत्तरकाल
में तो कार्य-कारणभाव से सम्बन्धित होकर अवस्थित रहते हैं; जब कि उनमें केवल पहले कहा
हुआ आणवमल ही नहीं रहता, अपितु वासना संस्काररूप धर्मा-धर्मात्मक कार्ममल भी रहता
है। यदि ऐसी बात है, तब तो इनमें भिन्न प्रथा भी रहेगी। [ आपका कहना ] ठीक ही है,
सवेद्यरूप सुषुप्तपद में तो है, किन्तु अपवेद्य में तो नहीं होता है; इसलिए इन प्रलयाकलों में
मायीयमल विकल्पित विषयरूप से व्यवस्थित होकर रहता है। देखो—कोई तो शून्यादि भाग में
विश्रान्त होकर गाढनिद्रा में जडीभूत हुए कुछ भी नहीं समझते और सुषुप्तपद में पड़े रहते हैं।
दूसरे प्रमातृवर्ग तो बुद्धि इत्यादि में रहनेवाले सुख एवं दुःख को सामान्य विशेषरूप से भिन्न-
यह ठीक नहीं है, जब ईश्वर की इच्छा बोधसार स्वभाववाले को भेद से युक्त करती है तो
बोधात्मक स्वभाववाले का ही भेद क्यों करते हैं ? प्रमातृ-तत्त्व से भिन्न घटादि वर्ग में भेद उत्पन्न करे ?
क्योंकि हमने इस विषय में अनेक बार कह दिया है कि इसको छिपाना बड़ा ही कठिन होगा इसमें ऐसा
होना तो स्वाभाविक है और मैं कृश हूँ, मैं सुखी हूँ, इत्यादि भेद तो इसमें कदम-कदम पर भरे पड़े
हुए दिखायी देते हैं ।
अ.-३, आ.-२, का.-९-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २८७
योगिनः सवेद्यसौषुप्तपदलीनाः। स्थूलदेहेन्द्रियात्मककार्यकरणवियोगरूपत्वं तु प्रलयाकललक्षणं
सर्वेषां तुल्यम् ॥ ८॥
एवं 'स्वातन्र्यस्याप्यबोधता' इत्येवमंशः स्फुटीकृतः, प्रसङ्गाच्च कार्ममलस्य विषयो
दर्शितः, मायामलस्य च पाक्षिकत्वमुक्तम् । अधुना पुनराणवकार्ममलद्वयाभावेऽपि शुद्धोऽस्ति
मायाख्यस्य मलस्य विषयः,–इति दर्शयति—
बोधानामपि कर्तृत्वजुषां कार्ममलक्षतौ ।
भिन्नवेद्यजुषां मायामलो विद्येश्वराश्च ते ॥ ९ ॥
ये चिन्मात्रमेवात्मतया पश्यन्ति 'अहम्' इति च चमत्का रोल्लासात् कर्तारस्तत एव सर्वज्ञाः
सर्वकर्तारश्च ते विद्येश्वराः। किन्तु तनुक रणभुवनादि यदेषां वेद्यतया कार्यतया च भाति तत्
कुविन्दपटदृष्ट्या भिन्नमेव सत्,—इत्यास्ति विद्येश्वराणां मायाख्यमलयोगः ॥ ९ ॥
अथ मलत्रयस्यापि यौगपद्येन यो विषयस्तं दर्शयितुमाह—
देवादीनां च सर्वेषां भविनां त्रिविधं मलम् ।
तत्रापि कार्ममेवैकं मुख्यं संसारकारणम् ॥ १० ॥
भिन्न वेद्य संवेदन ज्ञानवाले संवेद्य सौषुप्तपद में लीन रहते हैं। स्थूलेन्द्रियात्मक कार्य-कारण के
अभाव में तो इन सभी प्रलयाकल लक्षणवालों में समानरूपता बनी रहती है ॥ ८ ॥
इस प्रकार 'स्वातन्र्यस्याप्यबोधता' इस अंश की स्पष्टतापूर्वक व्याख्या कर दी और
प्रसङ्ग को लेकर कार्ममल का भी विषय दिखा दिया तथा मायामल का पाक्षिकत्व [ कभी रहना
एवं कभी न रहना ] कह दिया । अधुना पुनः आणवमल एवं कार्ममल इन दोनों के अभाव में भी
माया नामक मल का विषय शुद्ध होता है, इसी को दिखाते हैं—
मायामल के विनष्ट हो जाने पर कर्तृत्व प्राप्त करनेवाले ज्ञानियों में भी जो कि भिन्नरूप से
वेद्य को जानते हैं उन्हीं में मायामल रहता है और वे विद्येश्वर कहे जाते हैं ॥ ९ ॥
जो चिन्मात्र को ही आत्मरूप से देखते हैं, उन्हीं में 'अहम्' इस चमत्कार उल्लास से
अप्रतिहत ज्ञान-क्रिया रहती है इसी से वे सर्वज्ञ, सर्वकर्ता विद्येश्वर कहलाते हैं । किन्तु जिनको
सूक्ष्मरूप में करण भुवनादि अनेक वेद्यरूप से और कार्यरूप से दिखायी देता है, तन्तुवाय वस्त्र की
दृष्टि से अत्यन्त भिन्न ही वह सद्रूप में रहता है, अतः विद्येश्वरों में मायामल का योग रहता है ॥९॥
अब आणव, कार्म और मायीय इन मलों का एक साथ जो विषय है उसे दिखाने के लिए
कहते हैं—
सभी देवताओं और सांसारिक जीवों में ये तीनों मल रहते हैं। उनमें भी एकमात्र
कारण संसार के लिए कार्ममल ही है ॥ १० ॥
१. अहम् प्रत्यवमर्श में अभिन्नरूप से भाव विद्येश्वर लोगों का होने के कारण कर्तृत्व-शक्ति से युक्त रहते हैं
इसीलिए सर्वज्ञ सर्वकर्तार भी कहे जाते हैं जब अप्रतिहतरूप से ज्ञान एवं क्रिया-शक्ति के रह जाने पर तो
आणवमल का न रहना स्वाभाविक ही सिद्ध हो जाता है; क्योंकि अप्रतिहत ज्ञान एवं क्रिया-शक्ति तो
सर्वकर्तृत्ववालों में ही रहती है और उनमें आणवमल का सर्वथा अभाव ही रहता है । वे लोग संसार
से उत्तीर्ण हो जाने के कारण कर्म संसार से शून्य हो जाते हैं ।
२८८] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१०
इह विद्येश्वरविज्ञानाकलास्तावन्न भविनो मायान्ताध्वातिक्रमणात्; प्रलयाकला अपि
कंचित्कालमविद्यमानभवाः । ये त्वेते मायातत्त्वान्तरालपरिवर्तिनो देवादयः स्थावरान्ताश्चतुर्द-
र्शधा शास्त्रेषु परिगणितास्ते सर्वे 'भविनः' संसारिणः, तेषां च त्रयोऽपि युगपन्मलाः । ननु
मलत्रयमध्ये कतमो मलः संसरणमेषां संपादयेत् ? आह, 'तत्रापि' तेषु त्रिष्वपि सत्सु कार्मं मलं
विद्येश्वर और विज्ञानाकल इत्यादि लोग संसारी नहीं होते; क्योंकि ये लोग तो मायाध्व
से ऊपर उठे हुए होते हैं; प्रलयाकल प्रलय पर्यन्त ही रहते हैं इसके बाद मुक्त हो जाते हैं। ये जो
भी मायातत्त्व के भीतर हैं वे सब के सब परिवर्तन गतिवाले देवताओं से लेकर स्थावर तक सभी
जीव तथा शास्त्रों में जो चतुर्दश भुवनों में रहनेवाले को गिने गये हैं वे सभी 'भविनः' संसारी हैं
और उनमें आणवमल, कार्ममल और मायीयमल एक साथ ही रहते हैं। अब शङ्का होती है कि
इन तीनों मलों में से कौन सा मल संसार के लिए हेतु माना जाय ? इस पर कहते हैं कि 'तत्रापि'
१. प्रलयाकल को प्रलय केवली एवं शून्य-प्रमाता के नामों से भी कहे जाते हैं। प्रलयाकल प्रमाता में माया
का प्राधान्य है जिससे अहं प्रत्यवमर्श का स्फुट रूप में ज्ञान नहीं हो पाता है और न तो 'इदम्' का ही
स्फुट बोध हो पाता है इसमें प्रायः चेतना-शक्ति की शून्य अवस्था बनी रहती है जिस तरह सुषुप्ति
अवस्था में शून्य जैसा बोध होता है वैसा ही इसको भी शून्य बोध होता है। प्रलयाकल में सृष्टि और
संहार के मध्य में प्रकृति से तादात्म्य रहता है और शून्य दशा में गये हुए साधक की भी स्थिति वैसी
होती है।
प्रलय अर्थात् संहार अवस्था में कला इत्यादि के विलीन हो जाने पर नूतन सृष्टि के प्रारम्भ
काल में होने तक प्रलयाकल मायातत्त्व में विद्यमान रहते हैं इनमें आणवमल और मायीयमल
मुख्यरूप से रहते हैं एवं कार्ममल का अभाव रहता है।
२. अष्टविकल्पो दैवस्तैर्यग्योनश्च पञ्चधा भवति। मानुष्यश्चैकविधः समासतो भौतिकः सर्गः। संक्षेप में
भौतिक सृष्टि चौदह प्रकार की होती है। जिसमें ब्राह्म, प्राजापत्य, ऐन्द्र, पैत्र, गान्धर्व, याक्ष तथा
पैशाच यह आठ प्रकारकी सृष्टि देवताओंकी मानी जाती है। इनमें ब्रह्म सम्बन्धी ब्रह्मलोक तीन हैं
सत्यलोक, तपलोक, जनलोक । सत्य लोक में स्वयं ब्रह्मा का निवास रहता है, अथवा 'ब्रह्मवित् ब्रह्मैव
भवति' इस न्याय से स्वयं ब्रह्मभूत जीव जो कि प्रत्यक्ष दर्शी ॐकार के उपासक परमहंस रूप उसमें
निवास करते हैं। तपलोक सत्यलोक के नीचे हैं- अभास्कर, महाभास्कर, सत्यमहाभास्करसंज्ञक
देवता लोग जो कि ब्रह्मा के साक्षात् निकट रहते हैं। इसके नीचे तपलोक है जितेन्द्रिय, ब्रह्मपुरोहित,
ब्रह्म कायिक, ब्रह्म महाकायिक लोग निवास करते हैं। महातापक प्रजापति के लोक में कुमुद,
ऋभव, पतर्दन, अजनाभ, अमिताभ संज्ञक एक सहस्र कल्प की आयुवाले देवता लोग निवास
करते हैं। इसके नीचे स्वर्ग नामक ऐन्द्रलोक में अणिमा, लघिमा, वशित्व इत्यादि सिद्धिवाले सिद्ध लोग
जो कि स्वेच्छा से शरीर धारण करनेवाले होते हैं उनकी एक कल्प की मात्र आयु होती है। पैत्रलोक
में पितृ लोग रहते हैं। सुमेरु पर्वत के पृष्ठ भाग में गान्धर्व लोक है जिसमें गन्धर्व, किन्नर आदि रहते
हैं गन्धमादन पर्वत पर यक्ष लोग हैं जिसमें यक्ष कुबेर सयूथ निवास करते हैं। वितल लोक को छोड़कर
अतल सुतल, तलातल, रसातल आदि छः लोकों में राक्षसों का निवास है। वितल में भूत पिशाच,
ब्रह्मराक्षस, कूष्माण्ड विनायक आदि लोग निवास करते हैं और पशु, पक्षी, मृग, सर्प, वृक्ष इत्यादि,
तिर्यक् जातीय सृष्टि पाँच प्रकार की है और एक प्रकार की मानुषी सृष्टि है।
अ.-३, आ.-२, का.-११-१२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २८९
मुख्यतया संनिपत्य संसरणे कारणम् । यथोक्तम् 'कर्मतस्तु शरीराणि विषयाः करणानि च ।'
इति । तनूकरणविषयसंबन्ध एव च वर्तमानो भविष्यंश्च, — इत्यनवरतं प्रबन्धतो वर्तमानः
संसरणमुच्यते । आणवमायामलौ तु यद्यपि न कारणं संसारे, तथापि कार्मण विना तौ देहादि-
विचित्रभावाभिनिर्वर्तनशक्तिशून्यौ विज्ञानाकलादिषु, — इति मुख्यं कार्ममेव मलं संसारकारणं
तत्र तत्र शास्त्रे गण्यते । अत एव तदुपक्षये वृत्ते दत्तस्तावदसंसरणसोपानपदबन्धः, — इत्याशयेन
कर्मबन्धाभिमानपरिहानिरेव यत्नतः सांख्यपुराणभारतादिशास्त्रेषूपदिश्यते । एवं मलत्रयस्यैकैक-
भेदैस्त्रिभिर्द्विभेदैस्त्रिभिश्चैकभेदेनैकेन, — इति सप्त प्रमातार उत्तिष्ठन्ति । तथा च शास्त्रे 'शिवादि-
सकलान्ताश्च शक्तिमन्तः सप्त ।' इत्युक्तम् । तत्राप्यवान्तरभेदेन गुणमुख्यताभेदेन विकल्पसमुच्चयता-
विभेदेन चानन्तप्रकारत्वमिति ॥ १० ॥
अस्य च मलत्रयस्योद्भवतिरोभावभेदात् संसारिणां प्रकारद्वयम्, — इति दर्शयति—
कलोद्बलितमेतच्च चित्त्तत्त्वं कर्तृतामयम् ।
अचिद्रूपस्य शून्यादेर्मितं गुणतया स्थितम् ॥ ११ ॥
मुख्यत्वं कर्तृतायाश्च बोधस्य च चिदात्मनः ।
शून्यादौ तद्गुणे ज्ञानं तत्समावेशलक्षणम् ॥ १२ ॥
उन मलों में मुख्यरूप से तो संसरण-आवागमन चक्र में डालनेवाला कार्ममल है। इस विषय में
कहा गया है कि कर्म से शरीरादि विषय और इन्द्रिय वर्ग हुआ करते हैं।
तनूकरण इन्द्रियों का जो विषम सम्बन्ध है वही वर्तमान और भविष्य है, इस प्रकार
निरन्तर अबाध्य गतिपूर्वक अनादिकाल से चलनेवाला संसार कहा जाता है, आणवमल और
मायामल यद्यपि संसार के लिए निमित्त नहीं होते, तथापि कार्ममल के बिना आणवमल और
मायीमल दोनों देहादि विचित्रभाव के निर्माण के लिए असमर्थ होते हैं। जैसे विज्ञानकलों में देखा
जाता है, इस प्रकार शास्त्र में कार्ममल को ही संसार के लिए मुख्य कारण माना गया है। अत एव
उसके क्षय हो जाने पर तो जीव संसरण अर्थात् जन्म-मरणरूपी सोपान से मुक्त हो जाता है, इस
आशय से कर्म बन्धन के अभिमान को यत्न के साथ बन्द करने के लिए ही सांख्य, पुराण,
महाभारतादि शास्त्रों में उपदेश दिया गया है। इस प्रकार तीनों मलों का एक भेद से, दो भेदों से
और तीनों भेदों से तथा एक भेद से सात प्रमाता हो जाते हैं। तथा शास्त्र में कहा गया है—
शिव से लेकर [ शिव, मन्त्रमहेश्वर, मन्त्रेश्वर, विद्येश्वर, विज्ञानाकल, प्रलयाकल और
सकल ] प्रमाता तक सात प्रमाता शक्तिशाली होते हैं।' उनमें भी अवान्तर भेद, मुख्य गौण
के भेद और विकल्प समुच्चय के भेद से असंख्य प्रमाता हो जाते हैं ॥ १० ॥
इस प्रकार इन तीनों मलों के उत्पन्न एवं तिरोहितभाव के भेद से संसारी जीवों के दो
प्रकार की गति हो जाती है, इसे दिखाते हैं—
कला से प्रकाशित होकर चित्तत्त्व कर्तृता से मिला हुआ, अचिद्रूप शून्यादि के गौणभाव से
रहनेवाला परिमित-परिच्छिन्न हो जाता है ॥ ११ ॥
वह चिदात्मक ज्ञान का एवं कर्तृत्व का मुख्य कारण होता है। गौणशून्यादि में वही समा-
वेशरूप ज्ञान कहा जाता है ॥ १२ ॥
३७
२९० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-११-१२
एतच्चेति, यत् त्रिदशादीनां भविनां चैतन्यं कर्तृतांशस्य प्राधान्यान्मलेन संविद्भागस्य
निमज्जितत्वात् कर्तृतामयं चिद्रूपस्य तत्त्वं स्वातन्त्र्यं कलारूपेण परमेश्वरशक्त्यात्मना तत्त्वेन
'उपोद्वलितम्' अनुप्राणितं मलेन न्यक्कृतं सद्बुद्धोधितं शून्यादेर्देहपर्यन्तस्य मायाप्रमातुः संबन्धि,
'गुणत्वेन अप्रधानत्वेन स्थितं, यतो 'मितम्' इदन्तापन्नदेहादिशून्यान्तप्रमेयभागनिमग्नत्वात्
प्रमेयं, यो गौरो, यः सुखी, यस्तृषितो, यः सर्वरूपरहितः सोऽहम्,—इति हि इदन्तैवान्तर्ली-
नाहंभावा संसारिणां परिस्फुरति । सेयं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तरूपा संसारावस्था । यदा तूक्तगुरूपदेशा-
दिदिशा तेनैवाहंभावेन स्वतन्त्र्यात्मना व्यापकत्वनित्यत्वादिसंपरामर्शाभात्मनि विदधता ततः
शून्यादेः प्रमेयादुन्मज्ज्येवास्यते तदा तुर्यातीतावस्था । यदापि परामृष्टतथाभूतवैभवनित्यैश्वर्यादि-
धर्मसंभेदेनैवाहंभावेन शून्याविदेहधात्वन्तं सिद्धरसयोगेन विध्यते, तदास्यां तुर्यदशायां तदपि
प्रमेयतामुज्झतीव । सेयं द्वय्यपि जीवन्मुक्तावस्था 'समावेश' इत्युक्ता शास्त्रे । सम्यगावेशनमेव
हि तत्र तत्र प्रधानं, तत्सिद्धये तूपदेशान्तराणि । यथा गीतम्—'मय्यावेश्य मनो ये मां ।'
(गी० १२।२) इति 'अथावेशयितुं चित्तं ।' (गी० १२।९) इत्यादि च । समावेशपल्लवा एव च
प्रसिद्धदेहादिप्रमातृभागप्रह्वीभावभावनानुप्राणिताः परमेश्वरस्तुतिप्रणामपूजाध्यानसमाधिप्रभृतयः
जो देव लोग हैं उनमें कर्तृत्व का अंश प्रधान होने के कारण और मल से संवित् ज्ञानांश
तिरोहित हो जाने से कर्तृत्वमय जो चेतन है उसके स्वातन्त्र्य कलारूप परमेश्वर की शक्तिरूप तत्त्व
से तिरस्कृत हो जाने के कारण शून्यादि से लेकर देह पर्यन्त माया प्रमाता का सम्बन्धी बनता है,
वह 'गुणत्वेन' अप्रधान होकर रहता है जिससे 'मितं' परिमित कहलाता है और देहादिरूप में
आया हुआ देह से लेकर शून्य तक प्रमेय भाग में डूबा हुआ होने के कारण वह प्रमेय भी कहलाता
है, जिस कारण यह भान होता है कि यह गौर है, यह सुखी-समृद्ध है, यह प्यासा है, सब रूप से
रहित वही मैं हूँ, इसी इदन्ता के भीतर लीन होकर अहंभावना जीवों में स्फुरित होती है । वही
यह जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्तिरूप से संसार अवस्था कही जाती है । जब गुरु के उपदेशामृत को
सुन कर उस स्वतन्त्ररूप अहंभाव से व्यापकत्व, नित्यत्व, शुद्धत्वादि अपने धर्मों का परामर्श करता
हुआ उन शून्यादि प्रमेय से ऊपर उठ जाता है तब उस की तुर्यातीत अवस्था हो जाती है । उस
परामर्श में अपना नित्य ऐश्वर्यादि धर्मों का परामर्श करके अहंभाव के द्वारा शून्यादि देहधातु तक
छेदा हुआ रहता है । जैसा कि सिद्धरस से स्वर्ण, तब प्रमेयत्व को छोड़ता हुआ सा उस तुर्यातीत
अवस्था में भी आत्मा के स्वरूप का बोध करने लगता है । इसलिए इन दोनों को जीवन्मुक्त
अवस्था 'समावेश' शास्त्र में कहा है; क्योंकि उसमें अच्छी प्रकार समाहित ही जाना ही प्रधान
माना जाता है, उसकी सिद्धि के लिए दूसरे उपदेश भी कहते हैं । 'मय्यावेश्य मनो ये मां
नित्य युक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः [ १२-२ ] श्रीमद्भगवद्-
गीता में श्री कृष्णचन्द्र ने कहा है कि मुझ वासुदेव परमात्मा में जो भक्त अपने मन को
श्रद्धा एवं भक्ति से स्थिर करता है वह परम उत्तम योगी माना जाता है । 'अथ चित्तं
समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ।।' [ १२-९ ]
हे अर्जुन ! जो मुझ में चित्त को समाहित करने में असमर्थ हो, ता तुम अभ्यास के बल से
भी मुझे पाने की इच्छा कर तुच्छ समावेश ही प्रसिद्ध प्रमातृभाव के अपने में लीन होने से
अ.-३, आ.-२, का.-१३-१४-१५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २९१
कर्मप्रपञ्चाः । यद्गीतमपि—'अभ्यासेऽप्यसमर्थः सन्मत्कर्मपरमो भव ।' (गी० १२।१०) इति ।
देहपाते तु परमेश्वर एवैकरसः,—इति कः कुत्र कथं समाविशेत् । तदेतदाह यत् पुनः कर्तृताया
मुख्यत्वं तन्नान्तरीय Broadway कश्च शून्यादेर्गुणभावः, तस्मिंश्चाप्यचिद्रूपे गुणीभूते 'स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता'
इति मलव्यापारस्यापहस्तनात् चितो योऽपरोऽप्यात्मभागो बोधलक्षणो मलेन न्यक्कृतोऽभूत्
तस्यापि अधुनोन्मग्नत्वेन मुख्यत्वम् । यच्च कर्तृताया 'मुख्यत्वम्' उन्मग्नता, इदमेव ज्ञानमज्ञा-
नात्मकमलप्रतिपक्षत्वात्; तदेतन्मुख्यत्वं समावेशस्य लक्षणं येन देहस्थितोऽपि 'पतिः' इति 'मुक्त'
इति शास्त्रेषूक्तः ॥ ११-१२ ॥
नन्वेवं पत्युः समावेशात्मिका तुर्यतदतीतरूपा भवतु दशा, पशोस्तु कथं सुषुप्तस्वप्न-
जाग्रद्दशाभेद आगमेषूक्तः,—इत्याशङ्क्य सुषुप्तस्वरूपमेव तावदाचष्टे श्लोकत्रयेण—
शून्ये बुद्ध्याद्यभावात्मन्यहन्ताकर्तृतापदे ।
अस्फुटारूपसंस्कारमात्रिणि ज्ञेयशून्यता ॥ १३ ॥
साक्षाणामान्तरी वृत्तिः प्राणादिप्रेरिका मता ।
जीवनाख्याथवा प्राणेऽहन्ता पुर्यष्टकात्मिका ॥ १४ ॥
परमेश्वर को स्तुति-प्रार्थना, प्रणाम, पूजा, ध्यान, समाधि प्रभृति प्रपञ्च बहुत से करने पड़ जाते
हैं । जो कि गीता भी यही कहती है 'अभ्यासेऽप्यसमर्थः सन्मत्कर्मपरमो भवः । मदर्थमपि कर्माणि
कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि [१२-१०] अभ्यास करने में भी समर्थ न हो, तो मुझे प्रसन्न करनेवाले व्रत,
नियम, दान, पूजन, अर्चन, जप, तप, स्तवन, कीर्त्तन, श्रवण इत्यादि कर्म करने में तत्पर हो;
इससे भी चित्त की शुद्धि होगी और चित्तशुद्धि के द्वारा मोक्षरूपी सिद्धि को प्राप्त कर लेगा ।
शरीर के छूट जाने पर तो परमेश्वर में एकता हो ही जाती है, इस प्रकार कौन कहाँ और कैसे
संमिलित हो सकता है ? इसका उत्तर देते हैं कि उसमें जो कर्तृत्व की प्रधानता है वह आवश्यक
शून्यादि का गौणभाव नहीं है, उसका जडरूप गौण हो जाने पर स्वतन्त्रता का भी बोध नहीं
होता है—'स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता' इसी कारण मल के व्यापार दब जाने से चेतन का जो दूसरा
ज्ञान लक्षण आत्मांश था, वह भी मल से तिरस्कृत हो जाता है इसलिए उस भाग के भी स्फुटित
होने से उसमें मुख्यत्व आ जाता है । जिसको कर्तृता का मुख्य स्फुरण कहते हैं, यही अज्ञानात्मक
मल प्रतिपक्षी हो जाने से वह ज्ञान स्वरूप होता है; इसी का नाम मुख्य समावेश है वही देह में
रहनेवाला 'पतिः' पशुपतिरूप और मुक्त इत्यादि शब्दों से शास्त्रों में कहा जाता है ॥ ११-१२ ॥
इस पर आशङ्का करते हैं कि पशुपति की तुर्यातीत समावेशरूप अवस्था भले ही हो, किन्तु
पशुजीव की जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्त अवस्थाओं का भेद जो शास्त्रों में बताया है वह कैसे होगा ?
इस पर आशङ्का कर कहते हैं कि बुद्ध्यादि की अभावरूप शून्यता अहन्ता और कर्तृता के स्थान
में अस्फुटरूपता संस्कारमात्र से रहती है और उसी में ज्ञेय की शून्यता भी रहती है ॥ १३ ॥
इन्द्रिय सहित प्रमाताओं की आन्तरी वृत्ति ही प्राणादि की प्रेरिका होती है अथवा प्राण
में अहन्ता या पुर्यष्टकरूप से जीवनप्रद होती है ॥ १४ ॥
२९२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१३-१४-१५
तावन्मात्रस्थितौ प्रोक्तं सौषुप्तं प्रलयोपमम् ।
संवेद्यमपवेद्यं च मायामलयुतायुतम् ॥ १५ ॥
इह चित्तत्त्वं स्वस्वरूपमाच्छादयत् ज्ञेयरूपेण बुद्ध्यादिना देहान्तेन घटादिना वा भासते ।
एकमेव चेदं स्वातन्त्र्यविजृम्भितं, न त्वत्र वास्तवः क्रमो वा भेदो वा । तत्रापि तु स्वातन्त्र्यात्
क्रमश्च भेदश्चाभासते । तदेवंस्थिते यश्चित्तत्त्वस्य स्वरूपाच्छादनभागः स एवोत्तरभागान्तरा-
संकीर्णो यदा विश्राम्यति तदनुदयाद्वा तत्प्रध्वंसाद्वा प्रलय इव तदनादरणाद्रानिद्रासमाधि-
मूर्च्छादाविव, तत्रैव चाहन्तारूपं कर्तृतायाः पदं परामर्शोऽस्फुटत्वादरूपात्मना संस्कारेण शुद्धेन
वेद्यपदवोमप्राप्तेन युक्तो भवति, तदा सैवावस्था नेत्येवपरामर्शशेषा अनपेक्षितनिषेध्यबुद्ध्यादि-
विषयसुस्पष्टपरामर्शसंभेदापि अवश्यंभाविनिषेधयोगात् 'अकिञ्चनोऽहम्' इत्येवंभूतपरामर्शवत्
स्वीकृतसामान्याकारनिषेध्या, अत एव संस्कारशेषीकृतज्ञेयरूपा 'शून्य' इत्युच्यते । तथाविधे
बुद्ध्यादीनां देहादिनीलान्तानामभावरूपे शून्यत्वमुच्यते, यतस्तत्र ज्ञेयानां 'शून्यता' अभावरूपता
संस्कारशेषता । इयमेव हि सर्वत्राभावो न तु सतां सर्वात्मना विनाशः । तत्रैव शून्ये प्रमातरि
केवल इतनी स्थिति में ही प्रलय तुल्य सुषुप्त अवस्था कही जाती है। जिसमें वेद्यसहित
और वेद्यभावों को छोड़कर मायामल से मिली या नहीं मिली हुई अवस्था रहती है ॥ १५ ॥
चित्तत्त्व अपने स्वरूप प्रकाश को आवृत्त करता हुआ बुद्ध्यादि ज्ञेयरूप से अथवा घटादि
देहान्तरूप से भासित होता है और यह एक ही स्वातन्त्र्य का प्रभाव है, वस्तुतः यहाँ कोई क्रम
या भेद नही होता है, फिर भी तो स्वातन्त्र्य के कारण क्रम और भेद भासित होता है। ऐसी
स्थिति में भी जो चेतनतत्त्व का अपने स्वरूप का आच्छादन भाग है अर्थात् देह बुद्धि से संमिलित
होना रूप वही जब अन्य उत्तर भाग से असंकीर्ण होकर विश्राम लेता है तब तो उसके उदय
न होने से अथवा ध्वंस हो जाने से प्रलय के समान उसका अनादर कर देने से निद्रा, मूर्च्छा,
समाधि के समान रहता है, इस प्रकार उसमें ही अहन्तारूप कर्तृता से परामर्श के दब जाने पर
शुद्ध संस्कार से वेद्यपद को प्राप्त होकर रह जाता है, तब वही अवस्था परामर्श के अभावरूप
होकर निषेध बुद्ध्यादि से विषयों के स्पष्ट परामर्श न होने के कारण निश्चित होनेवाले निषेध
के संपर्क से 'अकिंचनोऽहम्' अर्थात् मैं कुछ भी नहीं हूँ इस प्रकार परामर्श के समान सामान्य
निषेध का बोध होता है, इसीलिए संस्कार शेष ज्ञेयरूप 'शून्य' कहा जाता है।
उसी प्रकार बुद्ध्यादि से लेकर देहादि नील-पदार्थ पर्यन्त अभावरूप में शून्यत्व कहलाता
है; क्योंकि उसमें ज्ञेयों की 'शून्यता' अभावरूपता संस्कार शेषता रहती है। इसी को सर्वत्र
दर्शनों में अभाव नाम से प्रतिपादन किया है सद्भूभाव-पदार्थों का सर्वतो भावेन विनाश नहीं
१. बोध मात्र ही संकुचित शून्य है, शून्यता में स्फुटता नहीं रहती है—
ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः ।
पदद्वये विभुर्भाति तदन्यत्र तु चिन्मयः ॥
जाग्रत एवं स्वप्न अवस्थाओं की अवस्थागत द्विरूपता का आधार ज्ञान और ज्ञेय है। सुषुप्ति
और चतुर्थ [ शिवावस्था ] में मात्र अनुभव रहता है, अपने स्वरूप की प्राप्ति चिद्रूप की स्थिति
सुषुप्ति एवं चतुर्थावस्था के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं पर भी नहीं रहती है ।
अ.-३, आ.-२, का.-१३-१४-१५] विमर्शिनीटीकोपेता [२९३
समवेता प्राणापानसमानोदानव्यानात्मके वायुचक्रे प्रेरणात्मिका शक्तिः, सा च विद्याकलयोः
प्रपञ्चभूतौ यौ क्रमेण बुद्धीन्द्रियकर्मेन्द्रियवर्गौ तयोरान्तरी वृत्तिः। बाह्या हि तयोः शब्दाद्यालोचन-
शब्दाभिव्यक्तिस्थानाभिहननादिका वृत्तिः। तदुक्तम् 'सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः
पञ्च।' (सां० २९ का०) इति। एवं शून्य एवाहन्ता अक्षचक्रोपोद्वलिता जीवनम्, —इति स
शून्य एव जीवः संसरति। यदि वेन्द्रियशक्तीनामेव यान्तरी साधारणप्राणात्मिका प्राणशब्द-
वाच्या प्राणादिमारुतविशेषप्रेरणामयी सैव 'अहम्' इत्यधिशयाना जीवनं, तदा प्राण एव जीवः
संसारी स एव शून्यः, प्राणश्च पुर्यष्टकशब्दवाच्यः, प्राणादिपञ्चकं बुद्धीन्द्रियवर्गः कर्मेन्द्रियगणो
निश्चयात्मिका च यतो धीर्व्यज्यते। तन्मात्रपञ्चकं मनोऽहंबुद्धय, इत्यन्ये 'तन्मात्रोदयरूपेण
मनोऽहंबुद्धि०।' (स्व० ४।१९) इति। 'भूमिरापोऽनलो०।' (गी० ७।४) इति च वदन्तः। एवं
होता है। शून्य प्रमाता में समवेत प्राण, अपान, समान, उदान, व्यानरूप पाँचों वायु को प्रेरणा
करनेवाली शक्ति रहती है और वह विद्या एवं कला के प्रपञ्चरूप जो क्रम से ज्ञानेन्द्रिय और
कर्मेन्द्रिय वर्ग हैं उन दोनों के भीतर रहनेवाली वृत्ति होती हैं; क्योंकि उन दोनों की बाह्यवृत्ति
शब्दात्मिकारूप, आलोचनरूप, शब्दरूप से अभिव्यक्त होनेवाली वृत्ति है, इस विषय में सांख्य
कारिका में कहा भी गया है—'सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः पञ्च।' [सां० २९ का०]
इन्द्रियों की सामान्यकरण वृत्ति प्राणादि पाँच वायु है। इस प्रकार शून्य प्रेरणात्मिका शक्तिरूप
आन्तरिक वृत्ति ही इन्द्रिय तक प्रकाशित होकर जीवन कहलाता है। वही शून्यरूप होकर जीव
संसार में संसरण करता रहता है अथवा इन्द्रिय-शक्तियों में जो भीतरी प्राणात्मिका-शक्ति है उसी
का नाम प्राण है; क्योंकि वह प्राणादि श्वास-प्रश्वास को प्रेरणा देती है, वही 'अहम्' में रह कर
जीवन कही जाती है, तब प्राण ही जीव संसारी हो जाता है और वही शून्य कहा जाता है, प्राण
पुर्यष्टक शब्द का वाच्य है, जिससे प्राणादि पाँच, बुद्धीन्द्रिय समूह, कर्मेन्द्रिय वर्ग एवं निश्चयात्मक
अन्तःकरण की वृत्तियाँ और बुद्धिरूप में व्यक्त होता है। कुछ लोग उसको तन्मात्र पञ्चक, मन,
बुद्धि और अहंकार कहते हैं—'तन्मात्रोदयरूपेण मनोऽहं बुद्धि०।' (स्प० ४।१९) तथा गीता
में कहा है 'भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकारं इतीयं मे भिन्ना प्रकृति-
रष्टधा' (७।४) सूक्ष्म पञ्चभूत सहित पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश ये पञ्च महाभूत;
१. वही प्रेरणात्मिका शक्ति वृत्ति है।
यतः करणवर्गोऽयं विमूढोऽमूढवत्स्वयम् ।
............प्रवृत्तिस्थितिसंहृतीः ॥
लभते.....................।
इत्यत्र
सहान्तरेण चक्रेणेति.............।
जिसके सामर्थ्य बल से ही, अनन्त-शक्ति चक्र के साथ-साथ उस बाह्य इन्द्रियों को भी चेतन
के जैसा सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है जिससे स्वतन्त्र होकर सृष्टि, स्थिति, और संहारादि करने में प्रवृत्त
होते हैं। इसलिए उस तत्त्व को जानने के लिए योगी को यत्न करना चाहिए। क्योंकि यह
अकृत्रिम स्वभाववाली स्वतन्त्रता रोम-रोम में भरी हुई है। इस रीति से अपने आवेशवशात् उठाती
हुई जीव ऐसा कहा जाता है। जो शून्य को उठानेवाली है वही जीवन क्रिया कही जाती है।