ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २०१
स्वभावा इति चेत्, आह—स एव बोधरूप आभासो मितिः प्रमाणफलम् इति सम्बन्धः ।
ननु एवं पर्यायत्वं स्यात् भवेत् न तु फलस्वरूपम्, आह—बाह्योन्मुखतया प्रकाशरूपतया
तत्र तत् प्रमाणं, या तु तस्यैव अन्तर्मुखात्मा विमर्शरूपता प्राक् उपपादिता तत्स्वभावेन केवलं
विषयदशासंकुचितेन स एव बोधः फलं, यथा हि 'यः शूरोऽहं स एव विजयी' इति एकनिष्ठे शूर-
त्वविजयत्वे विवेकवता हेतुफलभावेन व्यवस्थाप्येते, यतो हि 'अहं शूरः ततो विजयी' इत्येवं,
यतो नीलप्रकाशः ततो 'नीलमिदम्' इति परामर्श इति एकरूपत्वेऽपि हेतुफलभावः, यथोक्तं
'तद्वशात्तद्व्यवस्थानात्........'४ इति । किं च इह व्यापाररूपमेव फलं, व्यापारश्च व्याप्रीयमाणात्
व्यापार्यमाणात् वा अनन्याकार एव सिद्धः, इति—अभेदः प्रमाणफलयोः, विमर्शबलेन च यतः
प्रमेयों के उन्मुख होते रहने के कारण नये-नये वे प्रमाण हैं, जिस से कि प्रमा होती है। वह कैसी
प्रमा है ? यदि फल स्वभाववाली प्रमा मानी जाय, तो इस पर कहते हैं कि वही बोधरूप आभास
ही प्रमा है—जो कि प्रमाण का फल मानी जाती है।
अब इस प्रकार प्रश्न करते हैं कि प्रमा और फलस्वभाव इन दोनों को पर्यायत्व
( अनर्थान्तरत्व ) माना जाये, वह फलस्वरूप नहीं बन सकता; क्योंकि दूसरा अनर्थ हो जायेगा,
इसका उत्तर देते हैं—बाह्यरूप से उन्मुख होने के कारण प्रकाशरूप होने से वह वहाँ पर उस
आभास में प्रमाण माना जाता है; जिसे हम कह चुके हैं, वही अन्तर्मुख होकर विमर्शरूप होने
से वही बोध प्रमा और फल कहा जाता है, जैसे 'जो मैं शूरवीर था—वही मैं विजयी हूँ, इस
प्रकार एक में ही शूरत्व और विजयत्व को विवेकी पुरुष हेतु एवं फल इन दोनों में रखते हैं;
क्योंकि मैं शूरवीर था तभी मैं विजयी हुआ, जब कि नील प्रकाश यह है इसीसे 'नीलमिदम्' यह
नील है ऐसा प्रकाशित होना है तब तो फिर नील ही है, एक ही आधार में हेतु और फल
( प्रमाण एवं प्रमा ) ये दोनों रह गये, जैसे कहा जाता है कि [ तद्वशात्तद्व्यवस्थानात्...... ]
प्रकाश विमर्श के द्वारा ही ..... इस प्रकार यहाँ पर व्यापाररूप ही फल है और व्यापार कर्ता
तथा करण से भिन्न नहीं सिद्ध होता, वह अभेद प्रमाण और फल का ही मानना चाहिए, विमर्श
१. माया प्रमाता का अनन्तकाल पर्यन्त अन्तर्मुख संवेदन-ज्ञानरूप से आभास है वह प्रमेय की ओर उन्मुख
स्वभाववाला रहता है इसी से देश, काल और आकार में आभासों का भेद हो जाने के कारण भिन्न-भिन्न
रूपों में नया-नया सा अभ्युदय होता है, वही अन्तर्मुख स्वभाव कहलाता है इसलिए प्रमेय की उन्मुखता से
रहित होने के कारण देश, काल एवं आकार के भेद का अभाव से बोधरूप नया अभ्युदय नहीं होता है ?
२. समान अर्थक है ।
३. जैसे दुग्ध और जल आपस में मिल जाने पर किस भाग में दुग्ध है और किस अंश में जल है । वैसे ही
सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर भी हेतु और फल में भेद का ज्ञान नहीं हो पाता है ।
४. वाचक से अवच्छिन्न वाच्य का प्रतिभास ऐसी बुद्धियों में होता है, वही यह शब्दविशिष्ट अर्थ के
प्रतिभास से शब्द जीव कहलाता है, शब्द के अनुसंधान से रहित कुछ भी ज्ञान नहीं देखा
जाता—अनुल्लिखित शब्दवाले ज्ञानों में भी सामान्यतः शब्द का कुछ न कुछ उल्लेख रहता ही हैं;
क्योंकि उल्लेख के बिना प्रकाशात्मक प्रवृत्ति का उदय नहीं होता । इस विषय में भर्तृहरि ने कहा है कि
न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन गृह्यते ॥
२६
२०२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२
प्रमाणं विमर्शश्च शब्दजीवितः शब्दैश्च आभासान्तरैः देशकालादिरूपैरनामृष्टे एकत्रैव आभासमात्रे
प्रवर्तते—घट इति लोहित इति, ततो देशकालाभासयोः स्वलक्षणत्वार्पणप्रवणयोः अनामिश्रणात्
सामान्यीयमाने आभासे प्रमाणं प्रवर्तते, 'अयम्' इत्यपि हि अवभास आभासान्तरानामित्रे पुरोव-
स्थितावभासमात्रे, इति उक्तं श्रीमदाचार्यपादैरेव—'नियतेऽप्ययमित्येव परामर्शः पुरःस्थिते ।
सर्वभावगतेदन्तासामान्येनैव जायते ।।' इति, तत एव आभासमात्रं वस्तु, स्वलक्षणं तु तदाभास-
के बल से प्रमाण और विमर्श शब्द प्रमाणित होता है और शब्द भी भिन्न-भिन्न आभासों से देश-
कालादि के द्वारा अनवभासित होकर एक आभास में ही केवल स्थिर रहता है—जैसे घट में
लालिमा का आभास, इसलिए अपने स्वरूप को देनेवाले देश-काल के आभास का मिश्रण न होने
से सामान्य आभास ही प्रमाण माना जाता है। 'अयम्' यह आभास दूसरे आभास से न मिला
हुआ विद्यमान हो आभास है, जिसको कि आचार्यपाद ने कहा है—
निश्चित सामने स्थित पदार्थ में जो परामर्श है वह सब भावों में रहनेवाले सामान्य
इदन्ता भास से उत्पन्न होता है।
सामान्यरूप से प्रमाण की स्थिति होने से ही आभासमात्र वस्तु का धर्म होता है, स्वलक्षण
सभी लौकिक ज्ञान शब्द के बिना बोध के विषय नहीं हो सकते हैं। सब ज्ञान शब्द से अनुगत
होकर ही गृहीत होते हैं। अतः विमर्श ही फल है उसके सामर्थ्य से ज्ञान का उपाय प्रमाण माना जाता है।
१. जैसे पुरुष है अथवा घट है इस निरतिशय ज्ञान उत्पादन में मात्र उतनी ही विषय की प्रत्यक्षता रहती है,
उसमें ज्ञान का प्रकाश नहीं होता है, ज्ञान का ग्रहण न होने पर भी ज्ञान में तो केवल विषय ही प्रति-
भासित होता है, वैसे ही दिशा, काल इत्यादि विशिष्ट अतिशय ज्ञान के उत्पादन में भी जानना चाहिए।
पूर्वापरचिरक्षिप्रक्रमाद्यवगमेष्वपि ।
दिक्कालादि विशिष्टोऽर्थः स्फुरत्यतिशयात्मकः ॥
प्रत्यक्षं किं स कालादिः प्रतीतिं पृच्छ किं मया ।
गृह्यते तद्विशिष्टोऽर्थः स च नोत्यद्भुतं महत् ॥
एतेन समवायेऽपि प्रत्यक्षत्वं प्रकाशितम् ।
इहेति तन्तुसंबद्धपटप्रत्ययदर्शनात् ॥
पूर्वोत्तर, शीघ्र एवं चिरकाल इत्यादि क्रम का ज्ञान होने पर भी अतिशयात्मक दिशा-कालादि
से युक्त अर्थ स्फुरित होता है। क्या वह कालादि प्रत्यक्ष होते हैं; क्या हम लोग ग्रहण करते हैं? नहीं
ग्रहण होते हैं ? यही बड़ी विचित्रता है। इससे समवाय में भी प्रत्यक्षत्व प्रकाशित हो जाता है; क्योंकि
'तन्तुषु पटः' इसमें तन्तु से सम्बन्ध रखनेवाले पर का ज्ञान देखा जाता है।
२. केवल विशेष संनिवेश रूप ही घट शब्द का वाच्य होता है, 'एष' ऐसा कहने पर तो देश का आभास
होने लगता है, 'इदानीं' इससे काल का अवभास दिखाई देने लगता है, 'मृन्मय' इस कथन में विशिष्ट
स्वभाव झलकता है, इस प्रकार भिन्न-भिन्न वाचकों से उपलक्षित होता हुआ उस-उसमें भिन्न-भिन्न अभि-
संधान से युक्त होकर भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार वालों की परस्पर निरपेक्ष भिन्न-भिन्न वृत्तियाँ होती हैं।
३. आभास मात्र वस्तु है—ऐसा सिद्धान्ती का कहना है, अब स्वलक्षण किसको कहोगे ? इसका समाधान
करते हैं—आभास सामानाधिकरण्य रूप से पाँच प्रकार के होते हैं। जैसे जाति, गुण, क्रिया, नाम और
द्रव्य भेद से और वे कल्पनाएँ कहीं अभेद रहने पर भी भेद से युक्त नहीं होती हैं और कहीं अभेद
अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७३
सामानाधिकरण्याभासरूपम् आभासान्तरम् एकम् अन्यदेव, तत्रे च पृथगेव च प्रमाणं, तत्परं
तो उन आभासों का सामानाधिकरण्यरूप आभास हो होता है । दूसरा आभास तो दूसरा ही कहा
जायेगा और वहाँ पर प्रमाण भी भिन्न ही माना जायेगा, मिले हुए आभासों में गृहीत को ग्रहण
में भी भेद से कल्पना कही जाती है, इनमें सामानाधिकरण्य दिखाते हैं, जैसे-
जाति जातिमतोर्भेदो न कश्चित्परमार्थतः ।
भेदारोपणरूपा च जायते भेदकल्पना ॥
वस्तुतः जाति और जातिवान् में कोई भेद नहीं होता है, इन दोनों में जो भेद की प्रतीति हो
रही है, वह तो कल्पना मात्र ही है अविद्यमान भेद का आरोप किया गया है।
गौ और गोत्व में कोई भेद नहीं हैं, इसलिए अभेद कल्पना होती है-
एतया सदृशन्याया मन्तव्या गुणकल्पना ।
तत्राप्यभिन्नयोर्भेदः कल्प्यते गुणतद्वतोः ॥
इस प्रकार गुण और गुणी में भी कोई भेद नहीं है, गुण और गुणी के विषय में भी भेद की
कल्पना मात्र रहती है, परमार्थतः गुण और गुणी अभिन्न ही है।
भेदारोपणरूपैव गुणकर्मवत्कल्पना ।
तत्स्वरूपातिरिक्ता हि न क्रिया नाम काचन ॥
यही बात क्रिया और क्रियावान् के विषय में भी घटती है। जैसे गुण और गुणी में
अविद्यमान् भेद का आरोप मात्र है, वैसे क्रिया और क्रियावान् के स्वरूप से अतिरिक्त क्रिया नाम की
कोई वस्तु ही नहीं है।
इन अभिन्न वस्तुओं में भेद का भ्रम मात्र होता है। जैसे कहीं-कहीं पर भिन्न-भिन्न वस्तुओं
में अभेद का भ्रम होता है। कहाँ पर ? इसके समाधान में उत्तर देते हैं कि नाम और नामी [ संज्ञा
एवं संज्ञी ] में, ये दोनों कभी एक साथ नहीं रह सकते हैं, तथापि इनकी एकत्वरूप से प्रतीति देखने में
आती है। कहाँ ? देखिए-
एवं दण्ड्यमित्यादिर्मन्तव्या द्रव्यकल्पना । सामानाधिकरण्येन भेदितोग्रहणात्तयोः ॥
दण्डी अयम्, देवदत्त अयम्, अर्थात् यह दण्डी है एवं यह देवदत्त है इत्यादि स्थलों में नाम
एवं नामी का अभेद दिखायी देता है तभी तो दोनों का सामानाधिकरण्य स्पष्ट दीख पड़ रहा है।
देवदत्त तो नाम शब्द मात्र है 'अयम्' यह नामी-पिण्ड है, फिर दोनों में अभेद कैसे ? तथापि
दिखायी दे रहा है।
१. उसमें भी प्रमाण भिन्न ही रहता है-ऐसा कहना युक्ति युक्त नहीं बैठता है-इन दोनों के व्यवहार की
प्रतीति कौन छिपा सकता है ? इस विषय में कहते हैं-
जातिर्जातिमतो भिन्ना गुणी गुणगणात्पृथक् ।
तथैव तत्प्रतीतेश्चाभासत्वं बाधवर्जितम् ॥
जाति जातिमान् से भिन्न होती है, एवं गुणी गुण समूह से भिन्न होता है; क्योंकि भिन्न रूप
से प्रतीति देखी जाती है इसलिए यह प्रतीति मात्र भ्रममूलक है, भ्रम का तो कभी न कभी बाध हो
जाता है, किन्तु इसका बाधक भी नहीं होता।
द्रव्य और नाम की भिन्नता ही दिखायी देती है; यह देवदत्त है इसलिए देवदत्त का अर्थ नहीं
२०४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२
मिश्रकारेषु तेषु आभासेषु गृहीतग्राहि न प्रमाणम्, इति अग्रे भविष्यति, अध्यवसायस्य अस्मदुक्त-
नयेन शब्दप्राणितस्य प्रत्याभासविश्रान्तौ तदपेक्षमपि प्रामाण्यं वदता प्रत्याभासनिष्ठमेव प्रामाण्यमु-
पेत्यम्, इत्यास्ताम्—किमवान्तरेण ।
ननु यदि विमर्शः प्रमाणव्यापारः स र्तार्ह द्विचन्द्रेऽपि अस्ति ? मैवम्—स हि संस्कार-
योगात् आत्मानमभिमतप्रसिद्धार्थक्रियाप्राप्तिपर्यन्तमनुवर्तयन् अनुन्मूलितवृत्तिः स्थिरः सन् तथा
भवति, मध्ये पुनरुन्मूलनं चेत् सहते न र्तार्ह असौ तथा विमर्शः, नायं विमर्शः पूर्वमपि—एकेन
अन्तर्मुखेन वपुषा पूर्वमेव तस्य निर्मूलनात्, स्वसंवित् अत्र च साक्षिणी, तदैव 'न इदं रजतम्'
इति वृत्तपूर्वस्यैव विमर्शस्य अविमर्शीकरणं संवेद्यते । उक्तं च एतत् बाधविचारे, वक्ष्यते च
'रजतैकविमर्श'.............' इत्यत्र, एवं स्थिते द्विचन्द्रेऽपि यावत् परकूतूहलसंपादनसमर्थक्रियासंमतम्
करनेवाला आभास प्रमाण नहीं माना जाता, ऐसा आगे कहेंगे । निश्चित प्रमाण को हमारी कही
हुई नीति के द्वारा शब्द से प्राणित प्रत्याभास को विश्रान्ति होने पर उसकी अपेक्षा करके
प्रामाण्य करना प्रत्याभास में ही प्रमाणता मानना है, इसीलिए अन्य आभास की आवश्यकता
नहीं देखी जाती ।
अब 'ननु' कहकर प्रश्न करते हैं कि यदि विमर्श को ही प्रमाण का व्यापार मानते हो, तो
जहाँ पर दो चन्द्र का भान होता है वहाँ पर भी विमर्श को प्रमाण का व्यापार मानना होगा ?
इसके उत्तर में कहते हैं कि ऐसा मानना कोई युक्ति युक्त नहीं दिखता; क्योंकि वह संस्कार
के सम्बन्ध से अपने को प्रसिद्ध अर्थ की क्रिया प्राप्ति तक स्थिर रखता हुआ उसी में स्थिर रह कर
वैसा रहता है, बीच-बीच में उन्मूलित होता जाता है तब वह वैसा विमर्श नहीं होता, यह विमर्श
पूर्व में भी नहीं था; क्योंकि इस रूप में वह पहले ही उन्मूलित हो चुका था और इस में अपना
ज्ञान ही साक्षी है, इसी को 'न इदं रजतम्' ऐसा जो पूर्व में रजत का भान हुआ था उसी को
अविमर्शीकरण कहा जाता है । इस प्रकार आचार्य ने बाध विचार में यह बात कही है और कहेंगे
भी—रजतैकविमर्श'.......। इस प्रकार दो चन्द्र के विमर्श में भी दूसरे के कुतूहलार्थ अपूर्व
है, अर्थज्ञान में शब्द अर्थ से युक्त नहीं भासित होता है, शब्द का विवर्तरूप से अर्थ नहीं स्फुरित होता
है । तथा यह दण्डी है इत्यादि में अभेद की कल्पना मूर्खों ने ही की है, दण्ड शब्द से देवदत्त का बोध
नहीं होता है अपितु दण्डी कहने पर ही होता है और उसमें तो प्रकृति एवं प्रत्यय अलग से ही दिखायी
पड़ते हैं कि दण्ड इसके पास में रहता है । जैसी वस्तु रहती है वैसा ही आरोप होता है, वैसे क्रिया
को भी समझना चाहिए ।
क्रियाहि तद्वतो भिन्ना भेदेनैव प्रगृह्यते ।
चलतीत्यादि बोधेषु तत्स्वरूपावभासनात् ॥
क्रियावान् से क्रिया भिन्न होकर भेदपूर्वक ही ग्रहण होती है । चलता है, खाता है इत्यादि,
क्रियाओं के ज्ञानों में क्रिया के स्वरूप का मात्र आभास देखा जाता है ।
१. निर्विकल्प में तो आभास का भेद भले रहे, किन्तु सविकल्प में कैसे रहेगा ? इसके उत्तर में कहते हैं कि
'अध्यवसायस्य'—'निर्विकल्पानुसारेण सविकल्पक संभवात् । ग्राह्यं तदानुगुण्येन सविकल्पस्य मन्महे ।
निर्वकल्पके अनुसार ही सविकल्प की उत्पत्ति होती है इसलिए जो निर्विकल्प का विषय है वही सविकल्प
का भी विषय होना चाहिए ।
अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २०५
अपूर्ववस्तुदर्शनाय चिकीर्षति तावत् अवज्ञोपहासशोकादिविवशः परजनवचनाकर्णनेन समुन्मूल्य-
मानं प्राच्यं 'द्विचन्द्रोऽयम्' इति परामर्शं स्वसंवेदनादेव अभिमन्यते । ननु एवं यत्र अर्थक्रियां न
अन्विच्छति तत्र कथं बाधाबाधव्यवहारः ? मा भूत—किं नः त्रुटितम्, प्रवृत्तिर्हि न सर्वत्र प्रमाणत
एव, किं तर्हि क्वचन संशयत एव अर्थपक्षाधिक्यात् अर्थित्वतारतम्यादपि वा—कृष्यादौ सविषान्न-
भोजने निश्चितसम्भावितदृष्टप्रत्यवाये च चौर्यादौ प्रवृत्तिदर्शनात्, तत् अर्थित्वातिशयः प्रवृत्तौ
तावत् निबन्धनम्, लोकश्च प्रवृत्तः क्वचन अनुन्मूलितप्रमितिकः प्रयाणतां प्रतिपद्यते, क्वचित्
तन्व्यथाभवन् विपर्ययमिति, एवम् आ जन्म यतोऽनेन अभ्यस्त आ पूर्वजन्मशतेभ्योऽपि वा प्रमाणा-
प्रमाणविभागः ततो मणिरूप्यादिवत् तत्स्वरूपम् आपातमात्र एव विलक्षणम् ईक्षते, अस्ति हि
तस्य परमार्थतो वैलक्षण्यं कारणभेदादिकृतं, ततश्च यदार्तं परिमितां सह्याम् अभिमन्यते तत एव
अर्थितामहाग्रहेण यत्र तत्र न प्रेर्यते तदा विसंवादभीरुः निश्चितप्रामाण्यात् बोधात् अदृष्टे दृष्टेऽपि
वा प्रवर्तमानो न विसंवाद्यते, इति स--प्रेक्षापूर्वकारी भण्यते, तेन लौकिकं प्रमाणस्वरूपम् अनूदितं
वस्तु का दर्शन कराने की इच्छा से तिरस्कारपूर्वक उपहास करने में विवश होकर दूसरे की बात
सुन करके पूर्व के 'द्विचन्द्रोऽयम्' इस परामर्श को अपने परामर्श का अभिमान करता है । १
ऐसा होने पर प्रश्न करते हैं कि जहाँ पर अर्थक्रिया की इच्छा नहीं है वहाँ पर बाध का
व्यवहार कैसे सम्भव हो सकेगा ?
इसके उत्तर में कहते हैं कि न हो, इस में हमारी कोई भी हानि नहीं होगी; क्योंकि प्रमाण के
द्वारा प्रवृत्ति सब जगह नहीं होती, किन्तु संशय से भी प्रवृत्ति देखी जाती है, अर्थपक्ष के अधिक
होने से या अर्थित्व के तारतम्य से भी जैसे कि कृषि आदि के विषयुक्त भोजन में और संभावित प्रत्यक्ष
प्रत्यवाय करनेवाले चौर्यादि कर्म में अर्थिता को अधिकता के कारण ही प्रवृत्ति देखी जाती है, इस
प्रकार प्रवृत्त हुई जनता कहाँ प्रमा का न छोड़कर प्रमाणता को प्राप्त करती है, कहीं उससे भिन्न
होकर अप्रमाणता को प्राप्त हो जाती है, इस प्रकार जन्मभर जिसका अभ्यास किया है, सहस्र जन्म-
जन्मान्तर से प्रमाणता और अप्रमाणता के विभाग को ऊपर से हो मणि आदि की तरह विलक्षणता
को रखती है, ठीक-ठीक विलक्षणता तो कारण भेद इत्यादि से ही होती है और कष्ट को सह्य मानती
है तभी अर्थितारूपो महाग्रह से जहाँ-तहाँ प्रेरित नहीं होती है; तब न घटने के कारण डरता हुआ
निश्चित प्रमाण के ज्ञान से चाहे दृष्ट अथवा अदृष्ट वस्तुओं में प्रवृत्त होकर प्रमाणता का नहीं
प्राप्त होता है, इसीको प्रेक्षापूर्वक कार्य करनेवाला कहा जाता है, इसी से लौकिक प्रमाणरूप
१. इसका फलित अर्थ यह है कि सर्वत्र अन्वेषण करने का प्रयास नहीं करना चाहिए । जहाँ पर विभाग
की व्युत्पत्ति रहेगी वहाँ पर ही प्रमाण में निर्णय का अवकाश रहेगा और वह विभाग व्युत्पत्ति यत्न-
पूर्वक छोड़ने में और यत्नपूर्वक ग्रहण करने में अवश्य उपयुक्त होता है । देखिये — गाँव गया हुआ
व्यक्ति गाँव से पुनः अपने गृह लौट आता है तो न वह दग्ध ही होता रहता है और न तो लौटाता
हुआ ही रहता है एवं न तो उसके धन और दारा आदि को ही कोई व्यक्ति अपहृत किये हुए रहते हैं,
इस प्रकार प्रमाण के बिना कैसे निश्चय होगा ? अर्थपक्ष की अधिकता होने के कारण संशय में भी
प्रवृत्ति देखी जाती है, जैसा कि क्षुधा से आक्रान्त व्यक्ति की प्रवृत्ति भी विपरीत ज्ञानपूर्वक ही विष
संपृक्त अन्नग्रहण करने में अर्थिता की तारतम्यता के कारण ही होती है ।
२०६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२
सामान्यसम्बन्धादिज्ञानेऽपि मोहात् अप्रामाण्याशंकां शमयितुम्, अत एव विभागविशेषलक्षणपरी-
क्षादिभिरिह न आयासितो लोकः, यत् यत् अबाधितस्थैर्यम् अत एव अप्रतिहतानुवृत्तिकं विमर्श-
फलं विधत्ते, तत्तद्बोधरूपं बोध्यनिष्ठं प्रमातृस्वरूपविश्रान्तं प्रमाणम् इति, तच्च ऐन्द्रियिके बोधे
सुखादिसंवेदने योगिज्ञाने च अविवादमेव—मुख्यतयैव प्रमेयरूपे आभासे साक्षात् विश्रान्तेः, अनु-
अनुवाद को सामान्य सम्बन्धादि के ज्ञान होने पर भी मोहवश अप्रामाण्य की आशंका को दबा देने
के लिए विभाग, विशेष, लक्षण, परीक्षा इत्यादि कारणों से लोग प्रयत्न युक्त नहीं होते, जो-जो
अबाधित स्थिरता के अप्रतिहत अनुवर्तन को विमर्शफल मानता है, उस-उस बोधरूप की ही
बोध्यवस्तु का प्रमाता में होनेवाला प्रमाण माना जाता है और वह इन्द्रिय सम्बन्धी ज्ञान में तथा
सुखादि के संवेदनरूप योगिज्ञान में निर्विवाद मुख्य प्रमेयरूप से भासित होता है और उसी में
ही साक्षात् विश्रान्त हो जाता है, अनुमान प्रमाण से होनेवाली प्रमा कार्यरूप दूसरे स्वाभाविक
आचार्य धर्मकीर्ति का कथन है—
१. प्रसिद्धानि प्रमाणानि व्यवहारश्च तत्कृतः ।
प्रमाणलक्षणस्योक्तौ ज्ञायते न प्रयोजनम् ॥
प्रमाण प्रसिद्ध ही होते हैं और उन्हीं के द्वारा व्यवहार होता हुआ सर्वत्र देखा भी जाता है ।
प्रमाण के लक्षण कहने पर प्रयोजन का ज्ञान नहीं होता । दूसरों को आक्षेप की आशंका कर प्रामाण्य-
व्यवहार मात्रेण शास्त्रं मोहनिर्वतनम्—ऐसा कहा है ।
२. योगी को दूर-समीप का प्रत्यक्षरूप से बोध हो जाता है । इस विषय में भट्टजयन्त ने विवेचन किया है ।
यथानुवाकग्रहणे संस्थाभ्यासेन कल्पितः । स्थिरः करोति संस्कारः पाठस्मृत्यादिपाटवम् ॥
यथा वा पुटपाकेन शोध्यमानं शनैः शनैः । हेमनिष्प्रतिकाशं तद्याति कल्याणतां पराम् ॥
तथैव भावनाभ्यासाद्योगिनामपि मानसम् । ज्ञानं सकलविज्ञेयसाक्षात्कारक्षमं भवेत् ॥
अस्मदादेश्च रागादिमलाव रणदूषितम् । मनो न लभते ज्ञानप्रकर्षपदवीं पराम् ॥
प्रत्यहं भावनाभ्यासक्षपिताशेषकल्मषम् । योगिनां तु मनः शुद्धं किमिवार्थं न पश्यति ॥
तदेवं क्षीणदोषाणां ध्यानावहितचेतसाम् । निर्मलं सर्वविषयं ज्ञानं भवति योगिनाम् ॥
जैसे वेद शाखाओं के शब्दों को ग्रहण करने पर भली-भांति किये हुए अभ्यास के बल से
पाठ-स्मरणादि में दक्षता, स्थिर संस्कार करा देता है। अथवा पुट देकर धीरे धीरे शोधा हुआ स्वर्ण
अद्वितीय रूप को प्राप्त कर लेता है। वैसे ही भावनादि-ध्यान, धारणा, समाधि के द्वारा योगियों के
मानस को भी संपूर्ण ज्ञेय पदार्थ का साक्षात्कार करने का ज्ञान हो जाता है। हम लोगों के चित्त में
रागादि मल का आवरण होने के कारण ज्ञान की उत्कर्ष स्थिति प्राप्त नहीं होती है। सब को अपने
स्वरूप में देखने के कारण संपूर्ण पापों का नाश हो जाता है इसलिए योगियों का मन शुद्ध होकर
क्या नहीं देख लेता है ? सब दोषों से मुक्त योगियों का ध्यान में लगा हुआ मन होने से निर्मल होकर
सब विषयों को देख लेता है ।
३. पुरोवर्ती पदार्थों में प्रत्यक्ष व्यापार का साधन है एवं परोक्ष में अनुमान से होनेवाला ज्ञान होता है
और वह अनुमान लिङ्ग अर्थात् धूम ज्ञान से होता है, वह पांच प्रकार का है ।
पञ्चलक्षणकाल्लिङ्गाद्गृहीतान्नियमस्मृतेः ।
परोक्षे लिङ्गिनि ज्ञानमनुमानं प्रचक्षते ॥
अ.-२, आ.-३, का-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २०७
मानजा तु प्रतीतिः आभासान्तरात् कार्यरूपात् स्वभावभूतात् वा आभासान्तरे प्रतिपत्तिः,
वस्त्वन्तरस्य च तेन साकं कार्यकारणभावनियमः सामानाधिकरण्यनियमश्च ईश्वरेरनियतिशक्त्युप-
आभास से दूसरे आभास का ज्ञान होता है, दूसरी वस्तुओं का भी, उसी के साथ कार्य-कारण
नियम को तथा सामानाधिकरण्य नियम को ईश्वर की नियति-शक्ति से उपजीवित ही मानता है;
कार्य, कारण, संयोगी, विरोधी और समवायी रूप से पाँच प्रकार के हेतु कहे जाते हैं ऐसे
हेतुओं को देख कर और इनसे व्याप्ति का स्मरण कर न देखी गयी वस्तु के विषय में जो निश्चयात्मक
कल्पना होती है उसको विद्वान् लोग अनुमान शब्द से कहते हैं। इस श्लोक में जो 'पञ्चलक्षणात्' यह
पद दिया है उस हेतु का भी कारण इत्यादि पाँच प्रकार के होते हैं, इसका यह तो अर्थ ही है। इससे
अतिरिक्त एक-दूसरा भी अर्थ निकलता है। वही सच्चा हेतु है जिस पर पाँच हेतु देते हैं, वे इस प्रकार
हैं कि—पक्षसत्त्व, -सपक्षसत्त्व, विपक्षसत्त्व, असत्प्रतिपक्षत्व, अबाधितत्व । पक्ष में रहना पक्षसत्त्व
है, विपक्ष में रहना विपक्षसत्त्व है, किसी भी शत्रु से शून्य होकर रहना असत्प्रतिपक्ष माना जाता
है, अपने अभाव का पक्ष में ज्ञान न होना अबाधितत्त्व कहलाता है। सिषाधयिषा विशिष्ट सिद्धि जहाँ
पर नहीं होती वह पक्ष है, साध्य का निश्चय जिसमें हो वह सपक्ष, साध्य के अभाव का निश्चय जिसमें
हो वह विपक्ष कहा जाता है।
इन सभी रूपों की आवश्यकता केवल अन्वय व्यतिरेकी की हेतु में पड़ती है, केवलान्वयी
और केवल व्यतिरेकी हेतु केवल चार-चार की [ क्रमशः विपक्षसत्त्व और सपक्षसत्त्व को छोड़कर ]
आवश्यकता होती है।
१. परमार्थतः पदार्थों का कार्य-कारणभाव स्वाभाविक नहीं है। यदि कोई अग्नि होती तो धूम होता
अथवा अग्नि और धूम का जो पौर्वापर्यलक्षण अपना स्वभाव यावत्काल दोनों का बना रहना संवित्
प्रकाश को छोड़कर नहीं होता है; क्योंकि संवित् ही वैसी-वैसी प्रकाशित होती है, स्वप्न और संकल्प के
समान योगी का निर्माण रहता है, केवल संवित् ज्ञान के फैलाव की समाप्ति में ही जहाँ तहाँ नियति-
शक्ति के द्वारा पूर्वापर भाव का नियम नहीं अवभासित रहता है। जैसे अग्नि से धूमादि का होता है,
इस प्रकार कहते हैं—
सूर्यास्तमयालोक्य कल्प्यते तारकोदयः ।
पूर्णचन्द्रोदयवृद्धिर्ह्रम्बुधेरवगम्यते ॥
उदितेनानुमीयन्ते सरितः कुम्भयोनिना ।
शुष्यत्पुलिनपर्यन्तविश्रान्तखगपङ्क्तयः ॥
पिपीलिकाण्डसंचारचेष्टानुमितवृष्टयः ।
भवन्ति पथिकाः पर्णकुटीकरणोदिताः ॥
अन्येषामपि हेतूनां भूम्नां जगति दर्शनम् ।
उपलक्षणत्रेतावद्धिहास्माभिः प्रदर्शितम् ॥
सूर्य अस्ताचल की ओर चले गये इस बात को जान कर नक्षत्रों का उदय गगनमण्डल पर
हो रहा है इसका अनुमान किया जाता है, पूर्णिमा के चन्द्रमा को देख कर समुद्र में [ ज्वार भाटा ]
आने का अनुमान हो जाता है, अगस्त्य नक्षत्र के उदय होने पर अनुमान हो जाता है कि नदियाँ अधिक
मात्रा में सूख गयी हैं जिससे सूखे हुए उनके किनारों पर पक्षिगण विश्राम कर रहे हैं, पथिक लोग अण्डे
२०८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२
जीवन एव अवधार्यो भवति न अन्यथा, तेन यावति नियतिर्जाता तावति देशे काले वा अनुमानं
प्रमाणम्, आगमस्तु नामान्तरः शब्दनरूपो द्रढीयस्तमविमर्शात्मा चित्स्वभावस्य ईश्वरस्य अन्तरङ्ग
एव व्यापारः प्रत्यक्षादेरपि जीवितकल्पः तेन यत् यत् आमृष्टं तत् तथैव, यथा नैतत् विषं मां
मारयति, गरुड एव अहम् इति, तत्र तु तथाविधे शब्दनात्मनि विमर्शे आनुकूल्यं यो भजते
शब्दराशिः सोऽपि प्रमाणं, यथा—वेदसिद्धान्तादिः, अन्योऽपि वा बौद्धाहुंतागमादिः, तेन हि यत्
शब्दनम् उत्पादितं ‘ज्योतिष्टोमकारी अहं स्वर्गं गन्ता’ इति, ‘दीक्षितोऽहम् अपुनरावृत्तिभागी’
इति, ‘कारुणिकोऽहं बुद्धपदं गन्ता’ इति, ‘गाढक्लेशसहिष्णुरहम् अर्हत्पदं प्रपत्ता’ इति, तत्र न
विपर्यय उदेति—तदाश्वस्तस्यैव तत्र अनुष्ठानयोग्यत्वात्, अन्यस्य तु दृढप्रतिपत्तिरूपत्वाभावात्
अप्रमाणमेव तथाविमर्शनात्मकं शब्दनम् ।
इसीलिए वह निश्चित ही ज्ञान होता है अनिश्चित नहीं, उसी से जितना ज्ञान नियति का होता
है उतना ही देश एवं काल में अनुमान प्रमाण का माना जाता है और शब्दरूप आगम प्रमाण तो
दूसरा नाम है, वह तो चिद्रूप ईश्वर का आन्तरिक व्यापार है, वह प्रत्यक्षादि प्रमाण के भी
जीवन सदृश है, उससे जिस-जिस का परामर्श होता है वह वैसा ही होता है। जैसे यह विष मुझे
नहीं मार सकता; क्योंकि मैं गरुड हूँ, सारी शब्दराशि मेरे अनुकूल है, वह भी प्रमाण है। जैसे
वेद सिद्धान्तादि प्रमाण माना जाता है वैसे ही अन्य भी बौद्ध, अर्हत् आदि के शास्त्रादि माने जाने
चाहिए, इसी से वेद में आता है कि मैं ज्योतिष्टोम यज्ञादि करनेवाला स्वर्ग में जाऊँगा, जिसमें
दीक्षित होकर मैं इस संसार को पुनः न प्राप्त होऊँ, दयालु बुद्धपद को प्राप्त करूँगा, गाढ क्लेश
सहिष्णु मैं अर्हत्पद को प्राप्त करूँगा इत्यादि, वहाँ पर कुछ भी विपरीत भान नहीं होता है—
परलोक में विश्वास रखनेवाले का यज्ञादि करने में अनुष्ठान की योग्यता मानी जाती है, दूसरे
लोग (बौद्धजैनादि) को उसमें दृढ विश्वास न होने के कारण ऐसा कहा गया है।
के साथ संचरण करती हुई चींटियों को देख कर वृष्टि होने का अनुमान लगा लेते हैं और घास-फूस की
कुटीरों का निर्माण कर लेते हैं। यहाँ पर हमने इतना ही मात्र दिखाया है, यह तो केवल उपलक्षण
है अर्थात् इस प्रकार बहुत से हेतु [ चिह्न ] संसार में देखे जाते हैं जिससे कि न देखी हुई वस्तुओं का
अनुमान हो जाता है।
१. शास्त्रों की युक्तियों देकर विषय प्रतिपादन किया जाता है उसमें थोड़ा सा भी अनुचित-विपरीत नहीं
होता है और विश्वास कर अनुष्ठान करने योग्य ही है; क्योंकि वाणी भी अज्ञान कर्तृक है और जिसका
वक्ता नियत होता है, नियत, परिमित और प्रतिवक्ताओं में प्रतीति को उत्पन्न करती हुई, प्ररूढ
होकर पारमेश्वर्य अंश से निकली हुई उन नियत वक्ताओं के मुखरूपी गुफाओं में प्रस्फुटित होती है,
किसी पशु प्रमाता में निरोध करने की इच्छा हो तो भी नहीं रोकी जा सकती है। इसी कारण वह
आगम संज्ञा की प्रसिद्धि से प्रमाण ही रहती है, तथा वेद, बौद्धादिकों में शास्त्रनिबद्ध प्रसिद्धि अपने यूथ
के प्रति बाधित न होती हुई प्रमाणरूप से मानी जाती है। सांप्रदायिक लोगों के प्रति नहीं रहती है—
धर्मस्य चाव्यवच्छिन्नाः पन्थानो ये व्यवस्थिताः ।
न ताँल्लोकप्रसिद्धत्वात्कश्चित्तर्केण बाधते ॥
जो अनादि अनवच्छिन्न परम्परा से धर्म का मार्ग व्यवस्थित है, वे तो सब से अधिक लोक में प्रसिद्ध हैं।
अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २०९
ननु एवं तदेव शास्त्रं 'कंचित्प्रति प्रमाणं कंचित्प्रति न' इति स्यात्, न चैतद्युक्तम्—
'अपक्षपातित्वात्प्रमाणस्य' इति, अतत्त्वज्ञोऽसि प्रतीतिवृत्तस्य, तथापि नोपेक्ष्यसे, 'अपक्षपाति
प्रमाणम्' इति कः अस्य वचनस्य अर्थः किं यत् एकस्य नीलज्ञानं भासयति धूमज्ञानं वा अग्निम्,
'त्वं प्रातर्निधिमनेन विधाना लब्धासे' इति च यः सिद्धादेशरूप आगमः स किं सर्वान्प्रति प्रमाणम्,
अथ कस्यापि कदाचित् किंचित्, तथा इहापि दृढविमर्शनरूपं शब्दनम् आ—समन्तात् अर्थं गमयति
इति आगमसंज्ञकं प्रमाणं सर्वस्य तावत् भवति, तत्र यथा मिथ्याज्ञाने सहायतां भजमानम् आलो-
केन्द्रियादिकम् अप्रमाणतासचिवम् अप्रमाणं, न च एतावता सम्यग्ज्ञानस्वरूपस्य प्रत्यक्षस्य काचित्
पक्षपातिता, तथा स एव ज्योतिष्टोमादिशब्दः शूद्रादेरदृढविमर्शात्मनि अत एव अप्रमाणे आगमा-
भासे साचिव्यं विदधदपि दृढविमर्शात्मकसत्यागमरूपशब्दनलक्षणप्रमाणोपयोगितायां प्रामाण्यं
भजन् न पक्षपातापक्षपातदोषप्रतिक्षेपयोग्यः, सर्व एव हि आगमो नियताधिकारिदेशकालसहका-
र्यादिनियन्त्रितमेव विमर्शं विधत्ते—विविधरूपो निषेधात्मा वा, अत एव—'प्रसिद्धिरविगीता हि
ऐसा होने पर प्रश्न उठता है कि क्या यह शास्त्र किसी के प्रति प्रमाण होता है और किसी
के प्रति प्रमाण नहीं भी होता—ऐसा होना ठीक नहीं है; क्योंकि प्रमाण तो किसी का पक्षपाती
नहीं होता, अपक्षपात करना ही प्रमाण का कार्य है। तुमने हमारा आशय नहीं समझा, फिर भी
हम तुम्हारी उपेक्षा नहीं करते हैं प्रमाण तो अपक्षपाती होता है इसका क्या अर्थ समझते हो, क्या
किसी को नील ज्ञान का प्रत्यक्ष हुआ तो क्या सभी को नील ज्ञान हो जायेगा इसी प्रकार किसी को
धूम से अग्नि का ज्ञान हुआ तो क्या सभी को हो जायेगा, वैसे तो वहाँ पर 'तुम प्रातःकालीन
खजाना भी प्राप्त कर सकते हो, ऐसा जो कोई सिद्ध पुरुष कहे तो क्या वह सब के लिए प्रमाण
होगा ? किसी को प्रमाण ज्ञान होता है किसी को नहीं भी होता है, यह संसार का व्यवहार है,
विजातीय परलोक पर विश्वास करके ज्योतिष्टोमादि यज्ञ का अनुष्ठान करेंगे; शूद्रादि को विश्वास
न होने से नहीं करते हैं इसीलिए प्रमाण में कोई पक्षपात और अपक्षपात का दोष नहीं लगता;
कोई भी आगम-नियत अधिकारी, देश-काल सहकारी कारण से नियमित होकर ही विधि या
निषेधरूप परामर्श करता है। इसीलिए आचार्य ने कहा है कि अनिन्दित प्रसिद्धि ही सत्य होती
है, उसमें प्रतिपादित विषय का ही निःशंक होकर ग्रहण करना चाहिए।
सब कोई इनके विषय में यथार्थतापूर्वक जानते हैं। यदि कोई बड़ा भारी 'तर्क' देकर उन्हें असत्य
अथवा असिद्ध करें तो यह तीनों कालों में भी नहीं होने वाला है; क्योंकि पुण्य एवं पाप के विषय
में प्रत्येक व्यक्ति को "शास्त्रादि" की प्रमाणता की भी अहर्निश आवश्यकता पड़ती है। अखण्ड
अनवच्छिन्नरूप में बहनेवाली शास्त्रीय धारा को हेतुवाद से बाधित नहीं किया जा सकता है।
१. 'सम्यक्ज्ञायते अनेन' जिससे भली-भांति ज्ञान किया जाता है उसे इन्द्रिय-आलोक कहते हैं जिस प्रत्यक्ष
का वही रूप है। प्रत्यक्ष के निमित्त होने से इन्द्रियाँ, आलोक इत्यादि भी प्रत्यक्ष शब्द से कहे जाते हैं।
२. आगम शास्त्रों की युक्तियों की लोक व्यवहार में अबाध्यरूप से प्रसिद्धि देखी जाती है, यद्यपि
स्मृति शास्त्र से विरुद्ध दिखाई देने पर भी विशिष्ट देश-काल में अवस्थित होकर प्रमाण रहती है।
'कामसागमनिःश्रेयेण निर्मितमपि लोकाचारविरुद्धं चरणं प्रतिपद्यन्ते तत्र हि तावति देश काले
वा सा निरोद्धुमिष्टाऽपि कस्यचिदनिरोध्या।'
२७
सत्या वागैश्वरी मता। तथेति यत्र हि यदा यत्तद्ग्राह्यमशङ्कितैः ॥' इति श्लोके 'यत्र यदा'
इत्युक्तम्, तेन—प्रत्यक्षागमौ बाधकौ अनुमानस्य, इति तत्रभवद्भर्तृहरि-न्यायभाष्यकृत्प्रभृतयः,
तस्मात् प्रमाणलक्षणे ज्ञाते सर्वं प्रमाणस्वरूपं ज्ञातं भवति किं विशेषलक्षणैः, यस्तु अविसंवादकत्वं
तस्य लक्षणम् आह तेनापि 'प्रापकत्वं प्रवर्तकत्वं प्रवृत्तियोग्यशक्यप्राप्तिकवस्तुप्रदर्शकत्वं' प्रमाण-
लक्षणं ब्रुवता न किंचित् प्रमाणाभिमतबोधविश्रान्तं स्वरूपम्, तत् चेत् अनेन लक्षणेन निर्वाह्यते तत्
निर्व्यूढं भवति, अन्यथा मुखभङ्गमूर्धकम्पाङ्गुलिमोटनादिमात्रतत्त्वं तत्, इति अलं विस्तरेण ॥१-२॥
ननु च 'एकाभिधानविषये मितिः' इति यत् उक्तं, तत्र—एकमभिधानं बाह्ये स्वलक्षण एव
प्रवर्तते यदि, तत्कथम् उक्तं—प्रत्याभासं प्रमाणम्, आभासमिश्रीकरणाभासस्तु स्वलक्षणम् ?
इत्याशङ्कां शमयन् प्रमाणस्य यत् प्रमेयं तत् परमार्थतो निरूपयितुम् आह—
यथारुचि यथार्थित्वं यथाव्युत्पत्ति भिद्यते ।
आभासोऽप्यर्थ एकस्मिन्ननुसन्धानसाधिते ॥ ३ ॥
इसीलिए श्लोक में 'यत्र यदा' ऐसा कहा गया है, इससे सिद्ध होता है कि प्रत्यक्ष और
आगम अनुमान के बाधक होते हैं, इसको भर्तृहरि एवं न्यायभाष्यकर्ता आदि सभी लोगों ने माना
है; प्रमाण के लक्षण को जान लेने पर प्रमाण के सभी स्वरूप ज्ञात हो जाते हैं, विशेष लक्षण करने
का कोई आवश्यकता नहीं; जो लोग यह कहते हैं कि व्यर्थ न होना यही प्रमाण का लक्षण होता
है, उसकी भी प्राप्ति करना ही प्रवर्तकता मानना पड़ेगा, प्रवृत्ति प्राप्ति योग्य शक्य वस्तु को दिखा
देना ही प्रमाण का लक्षण है—ऐसा कहनेवाले भी तो प्रमाण का कोई अभिमत निष्कर्ष नहीं
बताते हैं। इससे सिद्ध होता है कि जो इस लक्षण से प्राप्त होता है वही उत्तम लक्षण माना जाता
है, नहीं तो मुख घुमा देना, मस्तक हिला देना और अंगुली के द्वारा चुटकी बजा करके बात
को उड़ा देना इत्यादि दूसरी चीज है, इस पर अधिक कहना व्यर्थ है ॥ १-२ ॥
अब इस पर शङ्का करते हैं कि 'एकाभिधानविषये मितिः' इस प्रकार अविसंवादि विज्ञान
को प्रमाण सौगतादि मानते हैं, इस वाक्य में एक अभिधान बाह्य स्वलक्षण में प्रवृत्त होता है,
यदि ऐसा ही तात्पर्य है—तो प्रत्याभास ही प्रमाण सिद्ध होगा वह कैसे कहा गया है ? आभास
का मिश्रीकरण तो प्रत्याभास होगा ? इस शङ्का को दबाते हुए प्रमाण का जो प्रमेय है उसके
ठीक-ठीक निरूपणार्थ अब कहा जा रहा है—
आभास भी एक ही अर्थ में अनुसन्धान से विचार करने पर रुचि, अर्थिता एवं व्युत्पत्ति
के अनुसार भिन्न-भिन्न हो जाते हैं ॥ ३ ॥
यद्यपि आगमशास्त्र का निर्माण मोक्ष के लिए ही हुआ है तथापि लोकाचार के विरुद्ध आचरण
करनेवाले के लिए निषेध का भी प्रतिपादन किया गया है। देश-काल की परिस्थिति को लेकर इस का
निरोध करना चाहे तो भी निरोध नहीं किया जा सकता है। इस का उल्लेख किया गया है।
श्री भर्तृहरि ने वाक्यदीय में उल्लेख किया है—
प्रसिद्ध आगमो लोके युक्तिमान्नेतरः । विद्यायामप्यविद्यायां प्रमाणमविगानतः ॥
लोक में प्रसिद्ध आगम युक्तिवाला ह् अथवा न भी हो; विद्या और अविद्या में भी अनिन्दित
होकर ही प्रमाण रहता है।
अ.-२, आ.-३, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २११
यद्यपि घट इति बहिः परिदृष्ट एकोऽर्थः तथापि तावानेव असौ न, अपि तु पृथक् निर्भज्य-
मानतामपि सहते, तथाहि—स्वतन्त्रं वा विवेचनम् अर्थित्वानुसारेण वा पूर्वप्रसिद्धद्युपजीवनेन
वा, तत्र त्रिधापि विवेचने क्रियमाणे पृथगेव भान्ति आभासाः, ननु एवं चेत् कथम् एकं स्वल-
क्षणम् ? उच्यते—तेषां पृथक् भासमानानामपि आभासानां यो विमर्शः अनुप्राणितभूतः स
कदाचित् प्रत्याभासमेव विश्राम्यति, तदा परापरसामान्यव्यवहारः, कदाचित् पुनः गुणप्रधानता-
पादनेन 'अत्र इदम् इत्थम्' इति व्यामिश्रणाप्राणो विमर्शः तदा तदेकं स्वलक्षणं अपिः भिन्नक्रमः,
अनुसन्धानेन मिश्रताविमर्शेन साधितो य एकोऽर्थः स्वलक्षणात्मा तत्र एकस्मिन्नपि सति रुचि—
स्वातन्त्र्यम्, अर्थित्वम्—अर्थक्रियाभिलाषपरवशतां, व्युत्पत्ति—वृद्धव्यवहारशरणतां च अनति-
क्रम्य विद्यत एव आभासः ॥ ३ ॥
क्व यथा ? इति निदर्शयितुम् आह—
दीर्घवृत्तोर्ध्वपुरुषधूमचन्दनतादिभिः ।
यथाभासा विभिद्यन्ते देशकालाविभेदिनः ॥ ४ ॥
तथैव सद्घटद्रव्यकाञ्चनोज्ज्वलतादयः ।
आभासभेदा भिन्नार्थकारिणस्ते पदं ध्वनेः ॥ ५ ॥
यद्यपि घट बाहर में एक ही अर्थ के रूप से दिखायी पड़ता है फिर भी उतना ही घट का
यह रूप है—ऐसा स्वीकार नहीं करना होगा, किन्तु पृथक् विभाग को भी वह सह सकता है,
देखिये—अर्थिता के अनुसार स्वतन्त्र विचार करने पर पूर्व प्रसिद्धि को लेकर तीन प्रकार के
विवेक पृथक्-पृथग्रूप से आभासित होते हैं। इस प्रकार एक ही स्वलक्षण कैसे हो सकेगा ? इसका
उत्तर देते हैं कि ये अलग-अलग भासित होनेवाले आभासों के जो विमर्श प्राणभूत हैं वे प्रत्याभास
में ही विश्रान्त हो जाते हैं, तब परत्व एवं अपरत्व सत्ता का व्यवहार सामान्यतया होता है, कभी
गौण प्रधान भेद से 'अत्र इदं इत्थम्' यहाँ पर यह ऐसा है; यह मिला हुआ विमर्श एक स्वालक्षण्य-
रूप में हो जाता है, 'अपि' शब्द भिन्न क्रम के अर्थ में दिया गया है, जिससे सिद्ध होता है कि
अनुसन्धान के द्वारा मिश्रित विमर्श से सिद्ध किया गया एक पदार्थ भी रुचि की स्वतन्त्रता से,
अर्थिता से और व्युत्पत्ति से, भिन्न-भिन्न आभासों से युक्त हो जाता है और वृद्धजनों के उपदेश से
प्राप्त ईश्वर संकेतरूप व्युत्पत्ति के बिना भी व्यवहार का होना असम्भव है ॥ ३ ॥
यह कहाँ पर ? उसे बताया जाता है—
अत्यन्त लम्बा चौड़ा व्यक्ति धूम, चन्दनादि के द्वारा देश एवं काल के भेद से भिन्न-
भिन्न रूपों में भासित होता है। उसी प्रकार विद्यमान घट भी स्वर्ण के घटियाँ-बढ़िया के भेद से
तथा उच्चारण के भेद से भिन्न-भिन्न पदार्थ रूपों में भासित होता है ॥ ४-५ ॥
पहले एक चेतन पुरुष में ही देखिये; फैले हुए देश में व्याप्त होना इसी दीर्घता को परामर्श
करता है जो कि वृक्षादि में भी है, जिसमें जोड़ (अदृश्य सन्धि का स्थान) मालूम न हो, ऐसी
२१२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-४-५
इह तावत् एकस्मिन्नपि चेतनतया प्रसिद्धे पुरुषस्वलक्षणे विततदेशव्यापितां दीर्घतामेव
कदाचित् विमृशति, या—तरूणामपि अस्ति, निःसन्धिबन्धरूपतां वा वृत्ततां, या—शिलानामपि
संभविनी, ऊर्ध्वदिगाक्रमणरूपां वा ऊर्ध्वतां, या—स्थाणोरपि सम्बन्धिनी गमनागमनादि-
स्वतन्त्रभावयोग्यतारूपं वा पुरुषत्वं, यत्—अन्यपुरुषसाधारणं, तथाहि—स्वतन्त्रया वा इच्छया
रुचिरूपया एवं कुर्यात्, यथोक्तं—‘या तु व्याक्षेपसारत्वाच्चेतसः स्वरसोद्गता ।’ इति विततदेश-
व्यापिन एव वा अर्थान् तिरोधिलक्षणाम् अर्थक्रियाम् अर्थयमानो विभजेत्, एवं व्यवहारे वृद्धैः
कीदृक् दीर्घं नाम गीयते इति व्युत्पित्समानो व्युत्पादयितुमिच्छुः वा विभागं कुर्यात्, इत्येवं—
तत्र आभासानां भेदः, एकस्वलक्षणं तु—एकस्मिन् देशाभासे कालाभासे च विश्रान्तेः, देशकाला-
भासावेव हि सामान्यरूपताप्रयोजकव्यापित्वनित्यत्वखण्डनाविधानसविधवृत्ती विशेषरूपतां
वितरतः, एवं पुरुषत्ववत् अन्येऽपि ब्राह्मणाद्याभासा अपि निरूप्याः, एवम् अत्र तावत् प्रसिद्धतर
आभासभेदो—जडाजडसाधारणबहुतरधर्मास्पदत्वात्, अनेन निदर्शनेन धूमेऽपि धूमत्वचन्दनत्व-
श्रीखण्डचन्दनोत्थितत्वादयः प्रसिद्धा आभासभेदा विभजनीयाः, अनेन तु प्रसिद्धेन दृष्टान्तेन
अप्रसिद्धभागोऽपि यो घटः तत्रापि आभासभागभेदो भवति, तथाहि—किञ्चिदपि अत्र नास्ति इति
हृद्भङ्गमिव आपद्यमानो घटं पश्यन् ‘अस्ति इदम्’ इति सत्ताभासमेव पश्यति, अपरान् आभासान्
नाम्नापि तु न आद्रियते, तथा उदकाहरणार्थी घटाभासम्, स्वतन्त्रनयनानयनयोग्यत्वस्वर्थी
द्रव्याभासम्, मूल्याद्यर्थी काञ्चनाभासम्, हृद्यतार्थी औज्ज्वल्याभासम्, आदिग्रहणात् दृढतर-
गोलाई को भी परामर्श करेगा तो ऐसी गोलाई शिलाओं में भी रहती है और ऊपर की ओर
फैलाव रहता है; ले जाना और ले आनारूप आवागमन स्थाणु में भी तो पायेगा और रहती ही
है । एवं दूसरे पुरुषों भी है, इसीलिए स्वतन्त्रता से अपनी-अपनी रुचि के अनुसार जैसा चाहे वैसा
परामर्श कर सकता है, जिसके विषय में कहा गया है—
चित्त की व्याकुला के कारण अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार अनेक परामर्श होते हैं ।
फैले हुए देश में व्याप्त पदार्थों को छिपाना रूप अर्थक्रिया को चाहता हुआ यदि व्यवहार करे तो
वृद्धजनों ने दीर्घ का लक्षण तब कैसा किया है यह माना जाय; इसकी व्युत्पत्ति करनेवाले की
इच्छा का यदि विभाग करें तो आभासों का भेद निश्चित ही होगा । इसमें संशय नहीं है, एक ही
देशाभास और एक ही कालाभास में विश्रान्ति होने से, देश और काल ही सामान्यरूप से
प्रयोजक व्यापिता और नित्यता का वितरण करेंगे, इस प्रकार से पुरुषत्व के परामर्श में भी
ब्राह्मण और क्षत्रियादि का परामर्श हो सकता है, जड और अजड इत्यादि साधारणतया बहुत
प्रकार के धर्मों का विमर्श हो सकता है, इसी दृष्टान्त से धूम में धूमत्व एवं चन्दनत्वादि भेद भी
निकल सकते हैं, इस प्रसिद्ध दृष्टान्त से घटादि परामर्श को भी समझ लेना चाहिए, देखिये—कुछ
भी यहाँ पर नहीं है—ऐसा कहनेवाला घट देख लेता है तो ‘अस्ति इदम्’ ऐसी वस्तु की सत्ता का
ही परामर्श करता है और अन्य तो आभासों के नाम से भी ग्रहण नहीं करते, जल ले आनेवाला
उसको घडे का परामर्श करेगा; स्वतन्त्र द्रव्यरूप से लेनेवाला उसे द्रव्य ही समझेगा; मूल्यार्थी
उसे स्वर्ण घट मानेगा; और स्वच्छता को चाहनेवाला उसकी शुभ्रता का परामर्श करेगा, इस
प्रकार अनेक तरह से दृढता का आभास हुआ करता है, एवं रुचि और व्युत्पत्ति में भी जोड देना
अ.-२, आ.-३, का.-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २१३
भावार्थो वाढर्चाभासम् इति द्रष्टव्यम्, एवं रुचिव्युत्पत्त्योरपि योजनीयम्, एवम् एते आभासभेदा
एव वस्तु-आभासमानतासारत्वात् वस्तुतायाः, योऽपि आभासस्य प्राणभूतो विमर्शः सोऽपि
प्रत्याभासमेव-शब्दस्य अभिजल्पात्मनो बोधजीवितप्रख्यस्य प्रत्याभासमेव विश्रान्तेः, सन् घटो
लोहितः इत्याद्यर्थक्रियाकारित्वमपि अन्वयव्यतिरेकाभ्यां प्रत्याभासमेव नियतं-सदाभासेन
हृद्द्रङ्गपरिहारमात्रस्य सम्पादनात्, तत्र आभासान्तरस्य या अपेक्षा सा अग्न्याभासेन-अर्थ-
क्रियायां साध्यायां पात्राभासस्य इव तदाभासनान्तरीयकत्वेन आभासान्तरस्याप्यनियतस्य
अपेक्षणात्, एवं येन येन मुखेन अर्थो विचार्यते तेन तेन आभासमात्रतात्मैव-तथैव प्रतिभासनात्
विमर्शनात् अर्थक्रियाकरणाच्च, इति सिद्धम्, एवं प्रसिद्धतरप्रसिद्धाप्रसिद्धत्वातिशयेन एकोऽपि
अर्थो ग्रन्थकारेण त्रैधं निरूपितो 'दीर्घवृत्तेति धूमेति सद्घटेति' ॥ ५ ॥
ननु एवं प्रत्याभासमेव वस्तुत्वे एको घटात्मा न वस्तु स्यात् ? इत्याशङ्क्याह-
आभासभेदाद्वस्तूनां नियतार्थक्रिया पुनः ।
सामानाधिकरण्येन प्रतिभासादभेदिनाम् ॥ ६ ॥
आभासानां मिश्रं यद्रूपं तत्र अवश्यं कश्चिदाभासः प्रधानत्वेन अन्याभासानां विश्रान्ति-
पदीकर्तव्यः स तेषां समानमधिकरणं, तेन सह यस्तेषां सम्बन्धः तत् सामानाधिकरण्यं, तेन
उपलक्षितो यः प्रतिभासः-अर्थोन्मुखः प्रकाशः तदनुप्राणकश्च कश्चन पदात्मा परामर्शः-तस्य
सर्वस्य एकाभासविश्रान्ततानियमात्, तस्मात् तं सामानाधिकरण्याभासं समनुप्राणयति वाक्यात्मा
चाहिए, इस प्रकार ये सभी आभासों के भेद ही वस्तुओं के आभासों में हुआ करते हैं, इसीको
आभास का प्राणभूत विमर्श कहा जाता है। इन सभी की प्रत्याभास में ही विश्रान्ति समझना
चाहिए, अन्वय व्यतिरेक से घट है, परन्तु वह घट रक्त है, इत्यादि अर्थक्रियाकारिता के कारण
प्रत्याभास ही नियत माना जाता है, आभास तो हृद् भंग का परिहार मात्र सम्पादन करता है,
दूसरे आभास की अपेक्षा अग्नि के आभास से अर्थक्रिया सिद्ध करने में दूसरे की आवश्यकता केवल
पड़ती है। उसी प्रकार जहाँ पर जिन-जिन वस्तुओं में दूसरी-दूसरी वस्तुओं की अपेक्षा हो उन-उन
पदार्थों का परामर्श कर लेना चाहिए। इसी कारण ग्रन्थकार ने प्रसिद्धतर और प्रसिद्ध एवं
अप्रसिद्धत्व अतिशय अर्थात् विशेष के योग से एक ही अर्थ को तीन प्रकार से दिखाया है
'दीर्घवृत्तेति धूमेति सद्घटेति' ॥ ५ ॥
अब शङ्का करते हैं कि यदि एक प्रत्याभास ही वस्तु है तो एक घटरूप जो वस्तु है, वह
पदार्थ नहीं हो सकता ? इस शङ्का का उत्तर देते हैं-
आभासों के भेद से ही वस्तुओं में भेद होता है; अर्थक्रिया तो सामानाधिकरण्य के कारण
प्रतिभास द्वारा अभेद रखनेवाली वस्तुओं से होती है ॥ ६ ॥
जो आभासों का मिला हुआ रूप है उसमें निश्चित् कोई न कोई आभास प्रधान रहता
है। यही आभासों का समान अधिकरण है, उसके साथ जो उनका सम्बन्ध है वही सामानाधि-
करण्य कहलाता है। इससे युक्त जो आभास है वह आभास क्या है ? अर्थ की ओर उन्मुख प्रकाश
उसी से अनुप्राणित होकर तद्रूप परामर्श रहता है; क्योंकि वे सभी एक ही आभास में जाकर
विश्रान्ति लेते हैं, इसीलिए उस सामानाधिकरण्य आभास को वाक्यरूप वाक्यार्थ का परामर्श
२१४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-७
वाक्यार्थपरामर्शरूपो विमर्शः—इह इदानीं एष घटोऽस्ति इत्येवंरूपः, ततो हेतोः ये अभेदेन
एकस्वलक्षणताम् आप्ना न तु स्वरूपभेदम् उज्ज्हन्तः तेषाम् अन्याविशिष्टा समुदितरूपा अर्थक्रिया,
आभासविमर्शभेदे पुनरन्या नियता एकैकमात्ररूपा, आभासप्रतिभासशब्दाभ्यां सूत्रे विमर्शोऽपि
आक्षिप्तो मन्तव्यः, पुनःशब्दो विशेषद्योतकः काकाक्षिवत् उभयत्र योज्यः, बहुवचनेन ऐक्येऽपि
स्वरूपभेदापरित्याग उक्तः, तत्र च ऐक्यावभासे परतन्त्रं सत् पृथक्त्वं यदा आभासानां तदा
समानरूपव्यक्त्युपरञ्जकत्वेन पारमार्थिकं सामान्यरूपत्वम्, घटाभासस्य तु शुद्धस्य स्वतन्त्रपरामर्शे
योग्यतामात्रेण सामान्यरूपता न वस्तुतो—द्रव्यादन्यो हि सर्वः पदार्थः परतन्त्रतासारः, एवम्
एकोऽपि घटात्मा इत्यपि सत्यमेव—आभ सविमर्शार्थक्रियाबलेन तथा अवस्थापनात् इति ॥ ६ ॥
ननु एकेनैव अर्थक्रिया न तत्र, अपि तु आभाससमुदायात् अर्थक्रियासमुदायः, आभासाश्च
भिन्ना अपि यदि एकांम् अर्थक्रियां कर्तुं मिश्रीभवन्ति, तदा कस्तेषाम् इयत्तावधिः ? इति चोद्यम्
अपवदति—
पृथग्दीपप्रकाशानां स्रोतसां सागरे यथा ।
अविरुद्धावभासानामेककार्या तथैक्यधीः ॥ ७ ॥
पृथक् वर्तिन्यो याः प्रदीपस्य प्रभाः सूक्ष्मतमा अवलोकनसामर्थ्याधानलक्षणां याम् अर्थ-
क्रियां न कृतवत्यः तामेव एकभवनाभ्यन्तरं संमूर्च्छितात्मानो विदधते, न तत्र अर्थक्रियाणां
अनुप्राणित विमर्शरूप से करता है जैसे इस समय यह घट विद्यमान है; ऐसा कहा जाता है।
इसी हेतु से जितने भी अभेदात्मक आभास एकता को प्राप्त होकर अपने स्वरूप के भेद को
न छोड़ते हुए दूसरे से मिलते हुए समुदायरूप में अर्थक्रिया कराते हैं, आभास का विमर्श से भेद
होने पर तो दूसरे नियत एकरूप आभास प्रतिभास शब्दों से विमर्श का आक्षेप मात्र है—ऐसा
सूत्र में मानना होगा । यहाँ पर 'पुनः' शब्द का दोनों वाक्यों में काकाक्षिगोलक' न्याय से अन्वय
होता है । बहुवचन के द्वारा एकता होने पर भी स्वरूप भेद को नहीं छोड़ना होगा, इस प्रकार
वहाँ पर एकता के आभास में परतन्त्र होकर जब आभासों की पृथग्रूपता रहेगी तब तो समानरूप-
वाले व्यक्ति में उपरञ्जकत्व होने से सामान्यरूपता पारमार्थिक ही रहती है । इस प्रकार एक भी
घटरूप परामर्श सत्य ही है, आभास और विमर्श के द्वारा अर्थक्रिया करने के बल से वैसा ही
वह स्थापित होता है ।
अब शङ्का करते हैं कि एक आभास के द्वारा ही अर्थक्रिया नहीं होती है, किन्तु आभास
समुदाय से अर्थक्रिया समुदाय होता है और आभास भी भिन्न-भिन्नरूपों में रहते हुए एक अर्थक्रिया
करने के लिए मिल जाते हैं, तब फिर उनकी इयत्ता ( संख्या ) की अवधि क्या होगी ? इस शङ्का
का अपवाद ( खण्डन ) करते हैं—
अलग-अलग स्वयं प्रकाशित प्रदीप जैसे सरिताएँ सागर में जाकर एक हो जाती हैं । उसी
प्रकार अविरुद्ध ( समान ) अनेक आभास एक कार्य के लिए एकता को प्राप्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥
भिन्न-भिन्न प्रदीप की प्रभा सूक्ष्म से सूक्ष्मतर देखने में असमर्थ होकर जिस अर्थक्रिया को
नहीं कर सकती वही यदि सब एक में मिल करके विस्तृत प्रकाश कर देती है, तो सूक्ष्म से भी
सूक्ष्मतम पदार्थ को दिखा सकते हैं, वहाँ पर अर्थक्रिया का समुदाय तो नहीं होता, उसी प्रकार
अ.-२, आ.-३, का.-८ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ २१५
समुदायोऽस्ति, सागरपतितानि च स्रोतांसि बहुतरङ्गारम्भार्थक्रियाकारीणि, तद्वत् घटः काञ्चनो
लोहितः ततोऽयम् शिवलिङ्गशिरः समावर्जनोचितसलिलाहरणार्थक्रियोचितो दृष्टमात्र एव तीव्र-
प्रीतिलक्षणार्थक्रियाकारी, इति—सिद्धमेवार्थक्रियाकारित्वम्, यत् पुनराभासानां मिश्रणे का
सीमा इति ? तत्र उच्यते—येषाम् अविरोधः त एव आभासा मिश्रीभवन्ति, नहि रूपाभासो
मारुताभासेन मिश्रीभवति—विरोधात्, सोऽपि च नियतिशक्त्युत्थापितः—पृथक् ये दीपप्रकाशाः
तेषां सम्बन्धि यदेकं सागरे स्रोतसां च यदेकं वस्तु तेन कार्या यथा ऐक्यधीः तथा अविरुद्धा ये
अवभासा घटलोहितकाञ्चनादयः तेषां सम्बन्धि यदेकं स्वलक्षणं तत्कार्या ऐक्यधीरिरिति सम्बन्धः,
ऐक्यधिया—प्रतिभासो विमर्शोऽर्थक्रिया च इति स्वीकृतम् ॥ ७ ॥
ननु एवं प्रत्याभासं प्रमाणस्य विश्रान्तत्वात् अग्न्याभासे अग्निज्ञानं प्रमाणं धूमज्ञानं च
धूमाभासमात्रे कार्यकारणभावावभासोऽपि तावन्मात्रे, ततश्च धूमाभासोऽपि अग्न्याभासं व्यभि-
चरेत् इत्यादिबहुपप्लवप्रसङ्गः ? इति शङ्कां व्यपोहितुम् आह—
तत्राविशिष्टे वह्न्यादौ कार्यकारणतोष्णता ।
तत्तच्छब्दार्थताद्यात्मा प्रमाणादेकतो मतः ॥ ८ ॥
तत्रेति—प्रत्याभासं प्रमाणं विश्राम्यति, इत्यस्मिन्नपि पक्षे न कश्चित् दोषः, तथाहि—
सागर में गिरी हुए सभी नदियाँ मिल कर एक तरङ्ग तथा बहुत प्रकार के भी अर्थक्रियाकारिरूप
तरङ्ग किया करती हैं। इसी प्रकार शिवलिङ्गाकार घट स्वर्ण का हो या चाहे तांबे का हो जलाहरण
रूप कार्य तो करतो ही है, इसीलिए अनेक आभासों का अर्थक्रिया करना सिद्ध ही है। आभासों
के मिश्रण में क्या अवधि होनी चाहिए ? इसका यह उत्तर है कि जिन आभासों में विरोध नहीं
हैं वे ही आभास आपस में मिलते हैं। जैसे रूपाभास, मारुताभास से नहीं मिलता; क्योंकि इन
दोनों में परस्पर विरोध है। वायु में रूप का अभाव मिलता है और वह भी विरोध नियति-शक्ति
से उठाया गया है। भिन्न-भिन्न रूपों में होनेवाले दीप प्रकाशों के सम्बन्धी, जो कि एक सागर में
या गृह में वस्तु को प्रकाशित करता है उनसे अविरुद्ध होकर ही प्रकाश करता है, इसी प्रकार
यहाँ घट में लोहित एवं काञ्चन इत्यादि जो कुछ आभास हैं वे भी एक कार्य को सम्पादन करने
के लिए आपस में एकताबुद्धि उत्पन्न कर देते हैं, इसीलिए एकता की बुद्धि से प्रतिभास, विमर्श
और अर्थक्रिया इन तीनों विषयों को स्वीकृत किया गया है ॥ ७ ॥
प्रत्येक आभास में प्रमाण की विश्रान्ति को माना जाय, तो अग्नि के आभास में अग्नि
का ज्ञान प्रमाण होगा और धूम के आभास में धूम का ज्ञान प्रमाण होगा, इसी प्रकार कार्य-
कारणभाव के आभास में कार्य-कारण का ज्ञान प्रमाण होगा, इस प्रकार भिन्न-भिन्न होने के
कारण धूमाभास, अग्नि-आभास का व्यभिचारी हो जायेगा। ऐसे तो बहुत से व्यभिचार उपस्थित
होंगे ? इस शङ्का के समाधान करने के लिए अब कहते हैं कि—
सामान्यतः वह्नि आदि में कार्य-कारणभाव और ऊष्णता उन-उन शब्दों की अर्थता अर्थात्
अभिधेयता एवं गन्ध-रस शून्यता आदि से युक्त स्वभावता वह्नि में एक ही प्रमाण से माननी
पड़ेगी ॥ ८ ॥
प्रत्याभासों में प्रमाण सीमित होता है, इस पक्ष में भी कोई दोष नहीं है—देखो, वह्नि
२१६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-८
अविशिष्टो यद्यपि वह्न्याभासो देशकालाभासप्रमुखैः आभासैः असंकीर्णत्वेन सामान्यमात्ररूपत्वात्
तथापि स एव आभासो यावद्भिूराभासैरविनाभूतो भगवत्या नियतिशक्त्या नियमितः तावतोऽव-
भासान् स्वीकृत्यैव प्रमाणकृतां निश्चयपदवीम् अवतरति, तथा च—वह्याभास इन्धनकार्यत्वा-
भासेन धूमकारणताभासेन उष्णस्वभावताभासेन च स्वाभाविकाव्यभिचरितसाहचर्यः प्रतीयमानो
विश्वत्रैव सर्वदैव च तथा प्रतीतो भवति—एकत्वात् तस्य, अस्वाभाविकोऽपि यः स्वभावः
पुरुषकृतसमयादिमुखप्रेक्षी, तद्यथा—अग्निशब्दवाच्यत्वं घटप्रतिपत्तिकारित्वमित्येवमादिः, सोऽपि
एकप्रत्यक्षादेव निश्चीयते, तस्य हि प्रमातुः कृत्रिमेण इतरेण वा रूपेण—आभासान्तरनान्तरीय-
कतया असौ वह्न्याभासः संविदितः सर्वदेशकालगतः तथैव संविदितः, इति तत्र किं
प्रमाणान्तरेण—तस्य तस्य यथेच्छं पुरुषसमयेन नियुज्यमानस्य शब्दस्य अर्थोऽयं ज्वलद्भास्वराकार
आभास इत्यनेन नियतिशक्तिरेव सर्वत्र शरणम् इति पिशुनयति, एतदुक्तं भवति—यत्किंचित्
कृत्रिमम् इतरद्वा भावाभासस्य आभासान्तरेण नान्तरीयकत्वं प्रतिभाति तत्र नियतिशक्तिमात्रमेव
परं विजृम्भते, तत्तु नियतिशक्तिरूपं पूर्वापरविततकालम्—इन्धनकार्यत्वे धूमकारणत्वे उष्णस्व-
भावत्वे च आभासमाने, अनतिचिरकालं तु वह्न्यादिशब्दवाच्यत्वाभासादाविति विशेषः, ततश्च
नियतिशक्त्युपजीवनेन धूमाभासोऽपि अग्न्याभासाव्यभिचारी इति न कश्चित् विप्लवः, कार्यता
कारणता उष्णता च तस्य तस्य शब्दस्यार्थता तत्तच्छब्दाभिधेयता, आदिग्रहणात्—गन्धरस-
सामान्यरूप है; क्योंकि देश-कालादि के आभासों से असङ्कीर्ण है वह सामान्यरूप से ही रहती है,
फिर भी वह आभास जितने आभासों से संमिलित रहता है यह भगवती नियति-शक्ति से आबद्ध
रहता है और उन नियमित आभासों को प्रमाण करनेवाले के लिए निश्चयपदवी को प्राप्त करता
है। वह्नि का जो आभास इन्धन है उसका कार्य होने के कारण, उसके आभास के साथ धूम के
कारणताभास से और ऊष्ण स्वभाव के आभास से स्वाभाविक अव्यभिचरित इन सबों का आभास
रहता है इस प्रकार सर्वत्र प्रतीयमान होकर प्रतीत होता है। अस्वाभाविक भी पुरुष कल्पित
समयादिक की अपेक्षा करनेवाला ही होता है। जैसाकि अग्नि शब्द का वाच्य घट सम्बन्धी ज्ञान
कराने में कारण नहीं होता, वह भी प्रत्यक्ष से ही निश्चित किया जाता है, उसका प्रमाता चाहे
कृत्रिम हो या अकृत्रिम हो; दूसरे आभास से अवश्य संमिलित होने के कारण वह वह्नि का
आभास सब देश-काल में व्याप्त होकर वैसा ही ज्ञात होगा। अतः वहाँ फिर दूसरे कोई प्रमाण
की आवश्यकता नहीं रहती, उन-उन आभासों को पुरुष नियम के अनुसार इच्छानुकूल नियोग
करना इस शब्द का यही अर्थ है कि चमकता हुआ आभास अर्थात् भास्वर आकार है, इससे
सर्वत्र नियति-शक्ति का ही शरण सूचित होता है।
इसका तात्पर्यार्थ यह है कि जो कुछ कृत्रिम या अकृत्रिम भावाभास के साथ दूसरे आभास
संयुक्त होकर प्रतिभासित होता है और इसमें नियति-शक्ति का ही सामर्थ्य रहता है, वह नियति-
शक्ति पूर्वापर नियमकाल की अपेक्षा करके इन्धन कार्य, धूम कारण और उष्णस्वभाव में
आभासित होने पर शीघ्र ही वह्नि शब्द के वाच्य आभास में विशेषरूप से भासित होती है,
इसीलिए नियति-शक्ति के जीवन से धूमाभास भी अग्नि के आभास से व्यभिचरित नहीं होता,
इसमें भेद नहीं है, कार्यता, कारणता और उष्णता उन-उन शब्दों का अर्थ और उन-उन का
अभिधान ( कथन ) आदि ग्रहण करने से गन्ध-रस से शून्यता और ऊर्ध्वादि दिशाओं से संयोग
अ.-२, आ.-३, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २१७
शून्यता ऊर्ध्वदिक्संयोगिता जलविरोधिता च, इत्येवं-भूतो य आत्मा स्वभावो वह्न्यादौ स
एकस्मादेव प्रमाणात् मतः—संविदित इति यावत्, ‘अर्धेच्छेदः’ इति, काव्ये अयं समयो, न ग्रन्थे,
इति—द्वितीयतृतीयपादयोः सामस्त्येऽपि अदोषः, पृथग्भावप्रत्ययप्रयोगो—वस्त्वन्तरापेक्षानपेक्षातः
कृतकत्वाकृतकत्वाभ्यां वर्गभेदं सूचयितुम् ॥ ८ ॥
एवं भावस्वभावव्यवस्थापनं प्रत्याभासविश्रान्तेन एकेनैव प्रमाणेन क्रियते, तेषामपि
आभासानां यथोचितं यत् अन्योन्यानान्तरीयकतवं तत् एकेन संवेदनरूपेण तदनेकप्रमिताभास-
विषयपूर्वप्रवृत्तसंवेदनकलापानुप्राणकान्तर्मुखस्वरूपेण निश्चीयते, तच्च ऐक्याभासमात्रे अनु-
संधानरूपं प्रमाणं, अनुसन्धीयमानेषु तु आभासेषु गृहीतग्राहित्वात् अप्रमाणं, तत्र तु प्रत्येकं
प्राच्यमेव प्रमाणं, भावस्वभावव्यवस्थापनात्मकमानसप्रवृत्त्यतिरिक्तकायप्रवृत्त्युपयोगस्तु यथा
प्रमाणाविषयः तं प्रकारं दर्शयितुम् आह—
सा तु देशादिकाध्यक्षान्तरभिन्ने स्वलक्षणे ।
तात्कालिकी प्रवृत्तिः स्यादर्थिनः…………………
बाह्या तावत् अर्थक्रिया स्वलक्षणतः, स्वालक्षण्ये च देशकालाभासयोजनस्यैव अन्तरङ्गत्वम्
तत्रापि च विशेषरूपतापि परामर्शं विना न किंचित्, परामर्शद्वारेण तु प्रमातरि विश्राम्यन्ती,
प्रमातुः संवेदनैकरूपस्य देशकालायोगेन ऐक्यात् अभ्युज्झत्येव विशेषरूपताम्, इति—सर्वत्र
और जल से विरोध इत्यादि जितने भी वह्नि के विरोधी भाव हैं वे सभी एक ही प्रमाण से
विदित हो जाते हैं, 'अर्धेच्छेदः' आधे पाद में भेद है; यह काव्य का नियम है, ग्रन्थ में नहीं होता
है, द्वितीय-तृतीय पाद में समास होने पर भी कोई दोष नहीं होता, भाव में जो प्रत्यय लगाया
गया है वह पृथग्रूप से तो दूसरी वस्तु की अपेक्षा और अनपेक्षा की विवक्षा को लेकर कृतकत्व
एवं अकृतकत्व के भेद दिखाने के लिए ही है ॥ ८ ॥
इस प्रकार भाव-स्वभाव की व्यवस्था करना प्रत्याभास में विश्रान्त होनेवाले एक ही
प्रमाण से होता है, उन आभासों का भी आभासों में यथोचित एकता के द्वारा पूर्व से आनेवाले
ज्ञानसमूह से अनुप्राणित होकर अन्तर्मुख स्वरूप से निश्चय करना चाहिए और वह संवेदन
एकता के आभास में केवल अनुसन्धानरूप प्रमाण ही होता है, उनसे अनुसन्धान किये गये
आभासों में गृहीतग्राही होने के कारण अप्रमाणता आ जाती है; क्योंकि वहाँ पर पूर्व के ही
प्रत्येक प्रमाण को माना जाता है। भाव स्वभाव की व्यवस्था करनेवाली मानसिक प्रवृत्ति भी
अतिरिक्त शरीर प्रवृत्ति से भिन्न होती है, उसके प्रमाण विषयक प्रकार दिखाने के लिए अब
कहते हैं—
वह अर्थक्रिया देश-कालादि के ज्ञान से भिन्न रह कर अपने लक्षण में रहती है, उसकी
उस काल में प्रवृत्ति का होना अर्थ के इच्छुक के अनुमान से है ॥ ९ ॥
बाहरी अर्थक्रिया तो अपने लक्षण से होती है और वह अपने लक्षण में देश-कालादि के
आभास की योजना से अन्तरङ्गरूप में रहती है। उसमें भी विशेषरूपता के परामर्श से भिन्न
दूसरा कुछ नहीं है; परामर्श के द्वारा तो प्रमाता में विश्राम लेनेवाली अर्थक्रिया प्रमाता के ज्ञान
से देश-काल से युक्त होकर विशेषरूपता को छोड़ती हुई ऐक्यभाव को प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार
२८
२१८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-९
अद्वयं परमार्थतः, तथापि तु या विशेषरूपता भाति तस्याः परमेश्वरस्वातन्त्र्यमेव निमित्तं यत्,
'मायाशक्तिः' इत्युच्यते, तत्र विशेषसाध्यार्थक्रियाविशेषेण योऽर्थी तस्य या स्वलक्षणे तस्मिन्
विशेषरूपे अर्थे तत्कालभाविनी वाङ्मनःकायप्रवृत्तिः सा देशे, आदिग्रहणात् काले स्वरूपान्तरे,
स्वरूपाऽनुसन्धानादौ च यानि अध्यक्षान्तराणि बहूनि प्रत्यक्षाणि तेषां भिन्ने भेदे निमित्ते सति
भवति, न अन्यथा, न ऐकैकतः प्रमाणात् सा प्रवृत्तिः अपि तु प्रमाणसमूहादेव, समूहता च
परस्य न उपपन्ना; अस्माकं तु एकस्वसंवेदनविश्रान्तिमयी सा युज्यते, —इति उक्तं प्राक् 'न
चेदन्तःकृता........' । (२।३।७) इत्यत्र । इयमेव च सा प्रमाणानां योजना योजिका च
युक्तिरित्युच्यते गन्धद्रव्यादियुक्तित्वात, एवं प्रत्यक्षसमूहादेव प्रवृत्तिरिति तात्पर्यम् । देशादिकेष्वपि
अध्यक्षेषु सत्सु देशाभासयोजनायामपि अन्तः प्रमातरि अभिन्नं यत् स्वलक्षणं तत्र,—इति वा
संगतिः । देशादिकैरध्यक्षान्तरैः प्रत्यक्षभूतैराभासान्तरैर्भिन्ने स्वलक्षणे निमित्ते सति प्रवृत्तिः,—
इति वा योजना । अत्रापि प्रमेयबहुत्वनिरूपणदिशा तदनुयायित्वेन अभिधीयमानः प्रमाणसमूहो
निमित्तत्वेन उक्तो भवति ।
ननु किं प्रात्यक्ष्यामेव प्रवृत्तौ प्रमाणसमूह उपयोगी ? न, इत्याह—
.................................... 'अप्यनुमानतः ॥ ९ ॥
न केवलं प्रत्यक्षतः प्रवृत्तिः देशादिकाध्यक्षान्तरभेदरूपप्रमाणसमूहनिमित्ता, यावत्
सर्वत्र परमार्थरूप से अद्वैत का ही बोध होता है, फिर भी वहाँ पर जो विशेषता भासती है उसका
परमेश्वर के स्वातन्त्र्य में निमित्त है, जिसको 'माया-शक्ति' के नाम से पुकारा जाता है । उस
माया-शक्ति के द्वारा निर्मित विशेषरूप में विशेष साध्य अर्थक्रिया विशेषण से ही जो अर्थी होता
है उसके विशेषरूप अर्थ में तत्काल होनेवाली मन, वचन और शरीर की प्रवृत्ति देश में तथा
काल में व दूसरे स्वरूप में और स्वरूप के अनुसन्धान में, जितने-जितने प्रत्यक्ष होंगे, उन सभी
प्रत्यक्षों के भिन्न-भिन्न निमित्त होने पर भी भेद होंगे, अन्यथा नहीं होंगे । एक-एक प्रमाण से
प्रवृत्ति नहीं होती है किन्तु प्रमाण समूह से ही होतो है, वह प्रमाण समूह दूसरे को नहीं ज्ञात
होता, वह तो एक ज्ञान में ही विश्रान्त होता है—यह पहले ही कह चुके हैं ।
'न चेदन्तःकृता.....' (२.३.७) इस स्थल में और यही प्रमाणों की योजना है, इसकी
योजना करनेवाली युक्ति कही जाती है गन्ध द्रव्यादि की भाँति, इस प्रकार अनेक प्रत्यक्ष प्रमाणों
से ही प्रवृत्ति होती है—यही तात्पर्य है । देश-कालादि से प्रत्यक्ष होनेपर भी देशाभास की योजना
में प्रमाता का अभिन्न अपना लक्षण ही प्रमाण होता है, ऐसी भी सङ्गति लगाई जा सकती है
या देश-कालादि के भिन्न-भिन्न ज्ञान होनेपर प्रत्यक्ष किये गये भिन्न-भिन्न आभासों के द्वारा अन्य
स्वलक्षण रहने पर प्रवृत्ति होती है—ऐसी भी योजना हो सकती है। यहाँ पर भी प्रमेयों के
बहुत से निरूपण के द्वारा उनके अनुयायीरूप से अभिधीयमान प्रमाण समूह निमित्त होते हैं—
यह कहना होगा ।
इस पर शङ्का खड़ी करते हैं कि क्या प्रत्यक्ष में ही प्रमाणों के समूह का उपयोग होता
है ? नहीं, यह बात नहीं है—
किन्तु अनुमान से भी प्रत्यक्ष में प्रमाणों के समूह का उपयोग होता है ॥ ९ ॥
केवल प्रत्यक्ष प्रमाण से ही प्रवृत्ति नहीं होती है; जिसमें देश-कालादि दूसरे प्रत्यक्ष आदि
अ.-२, आ.-३, का.-१०-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २१९
अनुमानतोऽपि तथैव, धूमाभासमात्रे अग्न्याभासमात्रे धूमस्याग्न्याभासाव्यभिचारित्वे पर्वताभासे
च यानि प्रत्यक्षान्तराणि यच्च तद्गृहीतातिरिक्ते अयोगव्यवच्छेदे 'अग्निरत्र' इत्येवं-भूते पृथक्
अनुमानं प्रमाणम् तत्समूहादेव अर्थिनः तात्कालिकी प्रवृत्तिः, —इति सम्बन्धः ॥ ९ ॥
एवं विमर्शबलादेव भेदाभेदव्यवस्था, तदेव हि परमेश्वरस्य संवेदनात्मनः शिवनाथस्य
स्वातन्त्र्यशक्तिविजृम्भितं; ततश्च परैः यत् उच्यते 'दूरान्तिकादौ अर्थस्य अभेदः' इति तदपि
उपपद्यते, न तु अन्यथा कथंचित्,—इति निरूप्यते—
दूरान्तिकतयार्थानां परोक्षाध्यक्षतात्मना ।
बाह्यान्तरतया दोषैर्व्यञ्जकस्यान्यथापि वा ॥ १० ॥
भिन्नावभासच्छायानामपि मुख्यावभासतः ।
एकप्रत्यवमर्शाख्यादेकत्वमनिवारितम् ॥ ११ ॥
प्रतिभासमात्रेण व्यवस्थां कुर्वतः कथं दूरादूरयोर्वस्तुनोरभेदः, ? प्रतिभासस्य सकलासकला-
वृतानावृतादितया यथाकथंचिदपि भेदात् । ननु विमर्शेऽपि प्रत्याभासं तथैव भिन्नता, ? सत्यं;
तथापि तु परो यो विमर्शः स एवायं पदार्थ,—इति एकप्रत्यवमर्शरूपः; तेन प्राणितकल्पेन
भेद प्रमाण समूह निमित्त होते हैं, वहाँ पर अनुमान से भी प्रवृत्ति होती है। उसमें भी प्रमाण
समूह का उपयोग होता है। जैसे धूमाभास मात्र में, अग्नि के आभास मात्र में, धूम अग्नि के
आभास से अव्यभिचरित होने में इस प्रकार पर्वताभास में भी जितने भी भिन्न-भिन्नरूप से प्रत्यक्ष
होते हैं, अयोगव्यवच्छेद में जैसे 'अग्निरत्र' अर्थात् यहाँ पर अग्नि है जिसमें पृथक् अनुमान प्रमाण
होता है, उसमें प्रमाण समूह से अर्थी की तात्कालिक प्रवृत्ति होती है—ऐसा सम्बन्ध लगाना
होगा ॥ ९ ॥
एवं विमर्श के बल से ही भेद और अभेद की व्यवस्था होती है, उसको ज्ञानस्वरूप
शिवनाथ परमेश्वर की स्वातन्त्र्य-शक्ति का विकास कहा जाता है; इस विषय में दूसरे लोगों का
कहना कि—'दूरान्तिकादौ अर्थस्य अभेदः' अर्थात् दूर एवं समीप में अर्थ का अभेद होता है—
ऐसा ही ठीक बैठता है; नहीं तो, किसी प्रकार भी व्यवस्था की संभावना नहीं बन सकेगी—इस
बात का निरूपण किया जा रहा है—
अर्थों के दूर और समीप होने के कारण प्रत्यक्ष प्रमाणरूप से या बाहर एवं आन्तर के
दोषों से व्यक्त न होने के कारण भिन्नरूप से अवभासित होने की छाया को मुख्य अवभास से
ही सिद्धि मान लेनी चाहिए। एक प्रत्यवमर्शन से एक की ही सिद्धि होती है ॥ ११ ॥
जब प्रतिभासमात्र से व्यवस्था करेंगे तो दूर और समीप में होनेवाले भाव-पदार्थों का
अभेद कैसे हो पायेगा ? प्रतिभास तो समूहरूप से या अल्परूप से होने न होने के कारण यथा
कथञ्चित् भी भेद तो हो सकता है। अब शङ्का करते हैं कि विमर्श में भी प्रत्याभास की भिन्नता
ऐसी ही रहेगी ?
यह ठीक है; फिर भी वह दूसरा विमर्श ही यह पदार्थ सिद्ध करेगा, जो कि एक प्रत्यवमर्श-
रूप है, उसी जीवित कल्प के द्वारा सर्वत्र फैला देना ही मुख्य आभास का या एक रूप भाव के
आभास का एक प्रत्यवमर्श कहा जाता है। वह उसके योग्य न होता हुआ भी भिन्नाभास छाया-
२२० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१२
आसमन्तात् ख्यानं प्रथनं यस्य मुख्यावभासस्य एकरूपभावाभासस्य, एकप्रत्यवमर्शोऽतदुच्चितोऽपि हि
अस्त्येवैकावभासः, आभासविमर्शयोरन्योन्यमवियोगात्; तस्मात् मुख्यावभासादेकत्वमप्रतिहत-
मास्ते। यदेवानुमितं तदेव दृष्टम्,—इत्यत्र प्रत्यक्षपरोक्षतारूपेणात्मना स्वभावेन भिन्ना अवभा-
सच्छाया अमुख्योऽवभासो येषां तेषाम् एकत्वं मुख्यावभासत एकप्रत्यवमर्शानुप्रणितात्,—इति
संगतिः। बाह्यान्तरतया भिन्नावभासानामैक्यं यथा—यदेव दृष्टं तदेवान्तरहमुल्लिखामि,—इति।
व्यञ्जकानां दीपालोकादीनां दोषैर्भिन्नावभासानाम् ऐक्यं, यदेव रक्तोत्पलं दीपेन नीलं दृष्टं तदेव
सूर्यांशुभिर्लोहितं पश्यामि,—इति। अन्येन वापि प्रकारेण इन्द्रियापाटवादिना एकपार्श्वसंमुखत्वा-
दिना वा येषामवभासच्छाया भिन्ना, तेषामपि मुख्यप्रत्यवमर्शानुवर्त्यवभासस्वरूपबलात् ऐक्य-
मेव,—इति स्थितम् ॥ १०-११ ॥
ननु दूरादूरादावस्तु स एवार्थः प्रमात्रध्यवसितार्थक्रियांशे तथैवोपयोगात्, बाह्यान्तरत्वादौ
कथम् आन्तरस्यार्थक्रियायां प्रमात्रध्यवसितायामनुपयोगात् ? — इति भ्रान्तिं भङ्क्तुमाह—
अर्थक्रियापि सहजा नार्थानामीश्वरेच्छया ।
नियता सा हि तेनास्या नाक्रियातोऽन्यता भवेत् ॥ १२ ॥
इह 'कार्यकारणतोष्णता' ( २।३।८ ) इत्यत्र स्वरूपमिवार्थक्रियापि या मध्ये गणिता, सा
सहजार्थस्वरूपभूता न भवति; तत्कारित्वं हि यस्मात् ईश्वरेच्छया नियतं भवने चाभवने च । यतो
नैषा स्वरूपं, तेन तस्या अकरणात् हेतोर्भावस्यान्यत्वं नाशङ्कनीयं, स्वरूपभेदात् हि संभाव्येता-
रूप रहता है; क्योंकि आभास और विमर्श का परस्पर वियोग नहीं रहता है। इस बात को लोक
व्यवहार में भी देखा जाता है कि जो अनुमान से किया गया था, उससे ही देखा गया है। यहाँ
पर प्रत्यक्ष और परोक्षरूप स्वभाव से भिन्न होते हुए भी अवभास की छाया ( अमुख्यावभास )
जिनका होगा वैसा वही मुख्यावभास का एकत्वरूप प्रत्यवमर्श कहा जाता है या अनुप्राणित
होता है—ऐसी सङ्गति बैठती है। जो मैंने देखा था उसीका अन्तःकरण में उल्लेख करता हूँ;
यही भिन्न अवभासों की एकता है, पदार्थों को दिखानेवाले प्रदीप का आलोक आदि के दोष से
भिन्न-भिन्न अवभासों की भी एकता होती है जैसे—दीप से रक्तकमल को नीलकमल देखते हैं,
उसीको सूर्य रश्मियों से रक्त मैं देखता हूँ, इत्यादि। दूसरे प्रकार से भी इन्द्रियों में भेद होने से
या एक भाग सन्मुख होने से जिनके आभास की छाया भिन्न दिखायी देती है, उनकी भी मुख्य
प्रत्यवमर्श के पीछे चलनेवाले अवभास बल से एकता हो जाती है, यही स्थिर होता है ।।१०-११।।
अब शङ्का करते हैं कि दूर और समीप में प्रमाता के अभीष्ट क्रियांश उपयोगी होने के
कारण वही अर्थ रहे, किन्तु भीतर और बाहर में तो उपयोग न होने के कारण कैसे भ्रान्ति ही
रहेगी ? इस भ्रान्ति को दूर करने के लिए कहते हैं कि अर्थों की क्रिया स्वाभाविक नहीं होती,
किन्तु ईश्वर की इच्छा से ही अर्थों की क्रिया नियत होती है। इसीलिए प्रमाता की क्रिया से
अर्थक्रिया अन्यथा नहीं हो सकती ।। १२ ।।
कार्यकारणोष्णता ( २-३-८ ) इस कारिका में जब कि स्वरूप के समान अर्थक्रिया को
भी बीच में गिना है, वह स्वभाव से नहीं हो सकती; उसके होने और न होने में ईश्वर की इच्छा
ही कारण होती है; क्योंकि ऐसा उसका स्वरूप नहीं है, इसीलिए प्रमाता उसको नहीं कर