सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

अ.-२, आ.-२, का.-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९३
एकानेकविषया यावत् बहिरप्येकं निःसन्धिबन्धरूपत्वेन भिन्नं च अवयवलक्षणैकदेशद्वारेण
स्वीकुर्वते, घट इति हि निःसन्धिबन्धनैकघनात्मा विततरूपश्च भाति इति ॥ ५ ॥
क्रियाविमर्शविषयः कारकाणां समन्वयः ।
अवध्यवधिमद्भावान्वयालम्बा दिगादिधीः ॥ ६ ॥
कारकाणां कर्त्रादिशक्त्याधाराणां द्रव्याणां च योऽन्योन्यं समन्वयो दृश्यते, यथा मातृ-
मेयमानानां मिथः, सोऽन्तर्लीनप्रमात्मकक्रियाविशेषपरामर्शकनिमित्तकः, नहि प्रमापरामर्शम्
अन्तर्वर्तिनं विहाय वस्तुनः साक्षात् अन्वयोऽत्र संवेद्यते, अनन्यत्र भावरूपतानिमित्तता अत्र
विषयार्थः, कारकणक्तीनामपि यः स्वाश्रयैः संबन्धः सोऽपि क्रियापरामर्शनिमित्तकः, द्रव्याणां च
शक्तीनां च क्रियया साकं साक्षात् संबन्धः, इति इयं क्रियैव भगवती एतावद्विजृम्भितं संबन्धम्
आविर्भावयति अस्मादिदं पूर्वं परं दूरे इत्येवं बहिर्भिन्नतया परामृश्यमानयोः भावयोरन्तर्
अभेदपूर्वकं भेदावमर्शमध्यम् अभेदविश्रान्तं च यत् रूपम् आमृश्यते तत् दिग् इत्युच्यते, अत्र हि
तयोः मुखाद्यवयवविशेषपरामर्शदरः तत्संमुखत्वपराङ्मुखत्वादि निश्चयः संयोगसंयुक्तसंयोगाल्प-
तादिपरिग्रहश्च उपयोगी, कालपरामर्शस्य पूर्वपरादिरूपत्वे जन्मस्थित्यल्पतादिविमर्शाश्चिर-
क्षिप्रदिरूपत्वे च, पक्ष्यति पचति अपाक्षीत् इत्यादौ तु संभावितस्य स्फुटस्य स्फुटभूतपूर्वस्य
बाहर में भी ऐक्यरूप से और भिन्न-भिन्न अवयवों के रूपों में एक देश द्वार से जब स्वीकार
करेंगे तब घटरूपी बुद्धि होगी। वही ऐक्यरूप और विस्तृत एकत्व की दृढता से भासती है ॥ ५ ॥
जो क्रिया के विमर्श का विषय है वही कारकों का समन्वय है । अवधि और अवधिमान्
के भाव का अवलम्बन करनेवाली दिशादि की बुद्धि होती है ॥ ६ ॥
कारकों का और कर्तादि शक्ति के आधारभूत द्रव्यों का परस्पर समन्वय देखा जाता है,
जैसे प्रमाता, प्रमेय, प्रमाणों का परस्पर समन्वय होता है, वह भीतर में रहनेवाले प्रमाणरूप क्रिया-
विशेषण का एक परामर्श निमित्तक है, प्रमापरामर्श जो अन्तर्वर्ती है उसे छोड़कर साक्षात् वस्तु
का अन्वय इसमें नहीं ज्ञात होता है अर्थात् अन्तर्वर्ती वस्तु का ही साक्षात् अन्वय होता है, यहाँ
पर भावरूपता एवं अनिमित्तता ही क्रियाविमर्श विषयार्थ माना जाता है, कारक शक्तियों का
भी जो अपने आश्रयों से सम्बन्ध है, वह भी क्रिया परामर्श के निमित्त से होता है और द्रव्यों के
तथा शक्तियों का क्रिया के साथ साक्षात् सम्बन्ध होता है, इस प्रकार यह भगवती क्रिया का
ही सारा का सारा विस्तार है । वह आविर्भूत करती है कि—इससे यह पूर्व है तथा पश्चिम है
एवं दूर-समीपवर्त्ती है । बाहर में भिन्नरूप से परामर्श होनेवाले दो भाव-पदार्थों का भीतर
अभेदपूर्वक भेद अवमर्श के बीच में और अभेद विश्रान्तरूप का जो आमर्शन करता है उसे दिशा
कहा जाता है; क्योंकि इसमें इन दोनों भाव-पदार्थों के मुखादि अवयवविशेष परामर्श का आदर
तथा उसके सन्मुखत्व या पराङ्मुखत्वादि का निश्चय और संयोग संयुक्त के संयोग की अल्पता
का परिग्रहज्ञान उपयोगी होता है । कालपरामर्श का भी पूर्वोत्तरादिरूप से उत्पत्ति और स्थिति
की अल्पता का विचार चिरकाल और शीघ्रकाल के रूप में होता है, पकायेगा, पकाता है और
पका दिया इत्यादि में तो संभावित स्पष्टता का और उस स्पष्टता से पहले होनेवाले अपना
२५

१९४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-७
आत्मीयसंवेदनस्पन्दितप्राणादित्वादिक्रियान्तरस्य फलविशेषस्य च ओदनादेः परामर्श उपयुज्यते,
एवं संख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागप्रभृतिषु संबन्धरूपतैव वाच्या, सर्वथा अयं संक्षेपः, यत्र
पदार्थाभासस्य आत्मविश्रान्त्या सन्तोषमपुष्यतः आभासान्तरपरामर्शविश्रान्तिसाकाङ्क्षतया
स्वरूपनिष्ठा तत्र संबन्धरूपतैव क्रियाशक्तिविजृम्भामयी, तत्रापि भावान्तरापेक्षया संबन्धान्तरमपि
अस्तु, यथा संख्यादौ समवायं मन्यन्ते, न च अनवस्था भवन्ती अपि दोषाय, पूर्वापरकल्पसृष्ट्य-
नवस्थेव, नहि उत्तरसंबन्धसृष्ट्या विना पूर्वसंबन्धावभासे हानिः काचित् येन मूले क्षतिः
शंक्येत ॥ ६ ॥
एवं सकललोकयात्रानुप्राणितकल्पानल्पसंबन्धबन्धुरीभावभावं क्रियाशक्तिविजृम्भात्मकम्
अभिधाय, तस्य स्थैर्योपयोगो पूर्वसूचितो निरूपयितुमाह—
एवमेवार्थसिद्धिः स्यान्मातुरर्थक्रियार्थिनः ।
भेदाभेदवतार्थेन तेन न भ्रान्तिरीदृशी ॥ ७ ॥
इह भावानां न सत्तासंबन्धः, सत्त्वम्—अव्यापकत्वात् अनवस्थावैयर्थ्यादिदोषात्,
आत्मीय संवेदन ज्ञान, स्पन्दन, प्राण इत्यादि से भिन्न-भिन्न क्रियाओं के फलविशेष ओदनादि हैं,
उन सब का परामर्श उपयुक्त ही होता है । इस प्रकार संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग,
विभागादि गुणों में सम्बन्ध रूपता ही कहनी चाहिए, यही संक्षेप में इसका सार है। यहाँ पर
पदार्थ आभास की अपने स्वरूप में विश्रान्ति हो जाने से भली भाँति सन्तोष का अनुभव न
मिलने के कारण दूसरे आभास के परामर्श को जो विश्रान्ति है उसकी आकांक्षा से अपने स्वरूप
में रहता ही उसमें सम्बन्ध रूपता मानी जाती है और वही क्रिया-शक्ति का विलास भी है, उसमें
भी दूसरे आभास की अपेक्षा से दूसरा सम्बन्ध भी भले ही प्रतीत हो, जैसे संख्यादि में समवाय
सम्बन्ध मानते हैं, इस प्रकार अनवस्था का दोष आ भी जाय तो भी कोई दोष नहीं माना
जाता, जैसे पूर्वोत्तरकल्प की सृष्टि में अनवस्था आ जाती है, उत्तर सम्बन्ध की सृष्टि के बिना पूर्व
सम्बन्ध के अवभास में कोई हानि नहीं होती, जिससे कि मूल में क्षति की शंका खड़ी हो ॥ ६ ॥
इस समस्त लोक व्यवहार से अनुप्राणित प्रायः अनन्तर सम्बन्ध का मिश्रणरूप क्रिया-
शक्ति के विचार को कह कर, उसकी स्थिरता एवं उपयोगिता को भी हम पहले कह चुके हैं ।
पुनः उसका निरूपण करने के लिए कहते हैं—
पदार्थक्रिया के अर्थी प्रमाता की ऐसी अर्थसिद्धि होती है । इसी कारण भेद और अभेदवाले
अर्थ के साथ ऐसी भ्रान्ति नहीं खड़ी होती ॥ ७ ॥
यहाँ पर पदार्थ-भावों की सत्ता का सम्बन्ध नहीं बैठता है; क्योंकि अव्यापक होने से तथा
अनवस्था और व्यर्थता इत्यादि दोषों से सत्ता भी नहीं होती और उससे कोई कार्यत्व की सिद्धि
भी नहीं दिखती; क्योंकि उसमें उसका मिश्रण नहीं देखते [ अव्याप्यवृत्ति का नाम सम्बन्ध है
और पदार्थों का सत्ता सम्बन्ध है । वह व्यापक नहीं होता, इसीलिए सत्ता के सम्बन्ध से पूर्व
पदार्थ रहते हुए भी न रहने के ही बराबर होते हैं ? यदि वे नहीं होते हैं तो न रहने के कारण
शशशृङ्ग के सदृश ही है और उसका न रहना ही अव्यापक-भाव कहलाता है, यदि वे रहते हैं
ऐसा मानते हो, तब तो अनवस्थादि दोषों से ग्रस्त हो जायेंगे ]

अ.-२, आ.-२, का.-७] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९५
न अर्थक्रिया—वस्त्वन्तरत्वात्, न तत्कारित्वं—सर्वदा तदावेशादर्शनात्, उक्तं हि—'अर्थ-
क्रियापि सहजा नार्थानाम्·····॥' इति, तत्कारित्वस्य च प्रत्यक्षानुपलम्भात्मकान्वयव्यतिरेकगम्यस्य
अप्रत्यक्षत्वे सतोऽपि अप्रत्यक्षत्वप्राप्तेः न अर्थक्रियाकरणयोग्यत्वम्—तस्य सत्यासत्यके निश्चयकाले
दुरवधानत्वात्, सर्वस्य च अस्य अप्रकाशमानत्वे नरशृङ्गप्रायत्वम्, अर्थक्रियाकारितान्तरपर्येषणे
च अनवस्था, इति प्रकाशमानतैव अनुन्मूल्यमानतयोचित-विमर्शपरिस्यन्दा भावस्य सत्त्वम्,
सा च भेदाभेदवपुषां सम्बन्धादीनामस्ति, इति—निराशङ्कमेव सत्यत्वमेव तेषाम्, अथापि यदि
परोऽनुबन्धीयात्—इह लोकः प्राचुर्येण अर्थक्रियार्थी तत्कारिणि सत्यत्वं व्यवहरति तत् किं
सम्बन्धादीनाम् अस्ति इति, तदस्य हृदयम् आश्वास्यते, यदि न कुप्यसि तत् सर्वत्रैव व्यवहारे
यत्रापि स्फुटा सम्बन्धादिधीः न उदेति एवमेव तत्रापि, इति सम्बन्धादिरूपतया भेदाभेदवान्
योऽर्थः तेनैव अर्थक्रिया, न तु स्वात्ममात्रविश्रान्तेन काचिदपि कदाचिदपि अर्थक्रिया,
तथाहि—सुखेन स्मर्यमाणेन अभिलाषः, इत्यादिक्रमेण सर्वो व्यवहारः सुखाभासश्च योऽनुभूतः स एव
अभिलष्यते न तु अन्योऽननुभूतः, स एव च यदि प्राप्यते तदभिलषितं प्राप्तम् इति तुष्यते यदि च
तत् तदेव र्तार्ह किम् अभिलष्यते—प्राप्तत्वात्, अथ अतदेव, तथापि कथम् अर्थ्यते—अज्ञातत्वात्,
तस्मात् एतत् एवं भवति—यदि तदेव च अतदेव च तदपि च अतदपि च इति, एवं सुखसाधनेषु
इसलिए कहा भी गया है—'अर्थक्रिया भी पदार्थों के साथ नहीं उत्पन्न होती है' और
इसी कारण उसका कार्यत्व प्रत्यक्षरूप से उपलब्ध नहीं होता है किन्तु अन्वय-व्यतिरेक से ज्ञात
होनेवाले पदार्थ के प्रत्यक्ष न होने पर रहते हुए भी उसका अभाव हो जाता है और वह अर्थ-
क्रिया करने के योग्य नहीं रहता; सत्यता और असत्यता के निश्चयकाल में ध्यान न देने के
कारण इन सबों का अप्रकाश हो रहता है। मनुष्य के शृङ्ग के समान और दूसरी अर्थक्रिया के
अन्वेषण में अनवस्था हो जाती है, इसलिए प्रकाशमान रहना एवं उन्मूलित न हो जाना तथा
समुचित विमर्श होते रहना ही पदार्थ को सत्ता मानो जाती है और वह प्रकाशमानता भेद एवं
अभेद शरीरवाले सम्बन्धादिकों की होती है, इस प्रकार उनकी सत्यता निश्चितरूप से हो रहती
है अर्थात् बिना शङ्का की ही सत्यता उनमें रहतो है, फिर भी यदि कोई दूसरा आग्रह करे और
दोष दिखाये—यहाँ पर अधिकतया लोग पदार्थक्रिया के ही अर्थी होते हैं और उस क्रिया के
कर्त्ता में सत्यता का व्यवहार करते हैं तब क्या वह अर्थक्रियाकारित्व सम्बन्धादिकों में रहता
है ? इसलिए दूसरों के हृदय में विश्वास होता है, यदि क्रोध नहीं करते हो तो सब जगह व्यवहार
में जहाँ पर भी सम्बन्ध बुद्धि स्फुटरूप से रहती है वहाँ पर भेद एवं अभेदमय सम्बन्ध के बिना
कोई भी अर्थक्रिया व्यवहारभूमि में नहीं हो सकती, इस प्रकार सम्बन्धादिरूप से भेद और
अभेदवाले जो पदार्थ हैं उसी से अर्थक्रिया होती है अपने में ही रहनेवाले पदार्थ की तो कोई
भो—कभी भी अर्थक्रिया नहीं होती । देखो—सुखपूर्वक स्मरण करने से अभिलाषा होती है
इत्यादि क्रम से समस्त व्यवहार और सुखाभास जो अनुभव में आता है उसी की अभिलाषा की
जाती है किसी अन्य की नहीं, चाहे वह अनुभूत भी क्यों न हो ? और वह यदि मिल जाता है
तब अभिलषित प्राप्त हुआ ऐसा समझ करके सन्तुष्ट हो जाता है, यदि वह वही है, तब फिर क्या
अभिलाषा होगी ? क्योंकि वह तो रहता ही है, यदि वह नहीं है, तो उसकी चाह क्यों करेंगे ?
क्योंकि वह तो अज्ञात है, इसलिए यह ऐसा होता है—यदि वही है और वह नहीं है और वही

१९६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२
वाच्यम् तदुक्तम् आचार्येण 'इष्टार्थितायामिष्टं वा विमृश्येतेष्टकारि वा । न चाप्यदृष्टमिष्टं
द्यौरपोष्टा दृष्टभोगभूः ॥ दृष्टं च सह दृष्टचैव विनष्टमिति कार्थता । द्रष्ट्रैकेन विमृष्टं तत्.........॥'
इत्यादि, एवं च आभासात्मनि अस्मिन् असंवैद्यमपि आभासान्तरं सामान्यसम्बन्धरूपतया
अनुप्रविष्टम्, अन्यथा न कथंचिद्व्यवहारः इति सकलदेशकालदशापुरुषोपयोगी यदि एषः व्यवहारो
न सत्यः तर्हि न अन्यस्य सत्यत्वं विद्मः —इति न अत्र भ्रान्तिः इति भ्रमितव्यम् । इति शिवम्
॥ ७ ॥ आदितः ॥ १०४ ॥
इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवपादविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीमदाचार्याभिनवगुप्त-
पादकृतविमर्शिन्याख्यटीकोपेतायां क्रियाधिकारे भेदाभेदविमर्शनं
नाम द्वितीयमाह्निकम् ॥ २ ॥
अथ द्वितीये क्रियाधिकारे मानतत्फलमेयनिरूपणाख्यं
तृतीयमाह्निकम्
प्रमाणानि प्रमावेशे स्वबलाक्रमणक्रमात् ।
यस्य वक्रावलोकीनि प्रमेये तं स्तुमः शिवम् ॥ १ ॥
है और नहीं भी है इत्यादि भाव बनते हैं, ऐसा सुख के साधनों में भी करना होगा। इसलिए
आचार्य ने इसका प्रतिपादन भी किया है—
अभीष्ट पदार्थ को चाह में इष्ट का विचार करें अथवा इष्टकारी जो सुख साधन है उसका
विचार करें और इसमें अदृष्टरूप जो स्वर्गादि है उसकी इच्छा नहीं होती है, दृष्ट तो दृष्टमात्र
से ओझल हो जाता है इसी कारण उसकी चाह क्यों होगी ? इसलिए एक द्रष्टा से ही वह विमृष्ट
हुआ करता है..। इत्यादि कहा है ।
इस प्रकार आभासरूप इस भाव-समूह में सूक्ष्मता के कारण ठीक-ठीक उसका ज्ञान न होने
से दूसरा आभास भी सामान्य सम्बन्धरूप से उसमें प्रविष्ट रहता है, अन्यथा किसी प्रकार भी
व्यवहार नहीं हो पायेगा । इस प्रकार सकल देश, काल, दशा पुरुष के उपयोगी यह व्यवहार सत्य
नहीं है तो फिर अन्य को सत्यता को हम नहीं जानते हैं—इस प्रकार इसमें कोई भ्रान्ति नहीं
उठती है और न भ्रम में पड़ना ही चाहिए ॥ ७ ॥
द्वितीय आह्निक समाप्त
जिस शिव के मुखावलोकन करके सभी प्रमाण प्रमा की प्राप्ति के लिए प्रमेय में अपने बल
के आक्रमण क्रम से प्रवृत्त होते हैं, उस शिव को हम स्तुति करते हैं ॥ १ ॥
१. उस महेश्वर का यह स्वरूप स्वतः ही सिद्ध है। 'आदि सिद्धः कर्ता ज्ञाता चैक एव महेश्वरः । ऐसा जो
महेश्वर के विषय में बताया गया है कि एक महेश्वर ही कर्ता और ज्ञाता है ।
प्रमाणसिद्धं यत्किञ्चित्सत्सत्यमिति कथ्यते ।
प्रमाणाविषयं यत्तु तत्खपुष्पेण संमतम् ॥
जो कुछ प्रमाण के द्वारा सिद्ध होता है वह सत्य कहलाता है और जो प्रमाणभूत नहीं है अर्थात् प्रमाण
का अविषय है वह तो आकाश कुसुम के समान है। इत्यादि युक्ति की संभावना करके अन्य लोग कहते

अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९७
एवं क्रियाशक्तिविस्फारनिरूपणप्रसङ्गेन सम्बन्धपुरःसरं सामान्यादीनां तत्त्वम् उपपादि-
तम्, अधुना तु सम्बन्धतत्त्वमेव एकघनतया व्युत्पादनीयम् । तच्च द्विविधमेव परमार्थतो—
ज्ञाप्यज्ञापकता कार्यकारणता च, तत्र पूर्वस्यां मानमेयभावादिचिन्तास्पदभूतायां सर्वम् उक्तचरं
इस प्रकार क्रियाशक्ति का ही यह सारा का सारा विस्तार-स्फुरित होता है; क्रिया-शक्ति के
निरूपणके प्रसंग से सामान्यादिकों के सम्बन्ध उपक्रम का पारमार्थिक तत्त्व दिखा दिया गया, अब
तो सम्बन्ध तत्त्व को ही मुख्यरूप से प्रतिपादन करना है । परमार्थतः सम्बन्ध दो प्रकार के हैं ।
एक तो ज्ञाप्य-ज्ञापकभाव है दूसरा कार्य-कारणभाव वाला है, [ ज्ञाप्य-ज्ञापक सम्बन्ध तो जड
और चेतन इन दोनों में रहता है एवं कार्य-कारणरूप सम्बन्ध मात्र जड में ही रहता है । ] प्रमाण,
हैं कि किस प्रमाण से उस महेश्वर का प्रमाणित होना सिद्ध होता है, प्रस्तुत प्रकरण में ईश्वरता की
सिद्धि के लिए कोई भी प्रमाण उपयुक्त नहीं दिखायी पड़ता है और न तो प्राप्त ही हो रहा है। इस
आशय को लेकर कहते हैं कि—
प्रमाणान्यपि वस्तूनां जीवितं यानि तन्वते ।
तेषामपि परो जीवः स एव परमेश्वरः ॥
उन वस्तुओं का प्रमाण ही जीवन है कि जिसका शास्त्रकार लोग विस्तार करते हैं प्रमाणों से भी
बढ कर जीव होता है और वही परमेश्वर है। इस प्रकार आगम की युक्ति से आह्निक के अर्थ का आशय
आक्षेप किया जाता है; प्रत्यक्षादि प्रमाणों की प्रमा जीवित होकर उसमें रह कर अपने बल के आक्रमण
के अधीन रहती है जिसका मुख परिकर वर्ग अधिकार समर्पणार्थ, जैसे राजा के मुख की ओर देखते रहते
हैं उसी प्रकार प्रमेय विषयमें भी प्रत्यक्षादि प्रमाण को देखते हैं, उस शिव की हम स्तुति करते हैं ।
१. इत्थं च अत्र मुख्यया वृत्त्या प्रस्तुतेश्वरसत्तासिद्धतारूपतया प्रमाणार्थत्वासंभवेऽपि ।
अर्थवत्त्वं न चेज्जातं मुख्यैर्यस्य प्रयोजनैः ।
तस्यानुषङ्गिकैश्वाशा कुशकाशावलम्बनम् ॥
इस प्रकार मुख्य वृत्ति से प्रस्तुत प्रकरण में ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि में प्रमाण का अर्थित्व भाव न
रहने पर भी मुख्य प्रयोजन से यदि अर्थतत्त्व जिसका न होता हो तो भी उसका आनुषङ्गिकों में आशा
रखना कुश के सहारे सागर पार करने के समान है ।
नैयायिकों द्वारा दी गई उक्ति से प्रमा का यथार्थ लक्षण करना अयुक्त ही सिद्ध होगा, फिर
भी यदि कोई कैसा प्रमाण या उसका फल अनुपपत्ति या अनुप्रयोग से महेश्वरता की सिद्धि के विषय में
बतलायेगा, उसके विषय में प्रमाण और उसके फल के कथन काल में ही प्रमाणादि की सम्बन्धरूपता
घोषित करने के लिए क्रिया-शक्ति ऐसा अवतरण देकर कहते है—
अर्थवत्त्वं न चेज्जातं मुख्यैर्यस्य प्रयोजनैः ।
तस्यापि कथनं युक्तमानुषङ्गिकसिद्धये ॥
मुख्य प्रयोजन से यदि अर्थतत्त्व होता हो, तो भी उसका कथन आनुषङ्गिक की सिद्धि के लिए
युक्त ही है ।
२. ज्ञाप्य-ज्ञापकभाव सम्बन्ध जड और चेतन में रहता है एवं कार्य-कारणभाव सम्बन्ध मात्र जड में ही
रहता है ।

१९८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२
वक्ष्यमाणं च आयत्तं—प्रमाणाधीना वस्तुसिद्धिः इति तत्र तत्र प्रसिद्धेः, एवं च प्रकृतसमर्थनीय-
वस्तूपयोगितया स्वयं च सम्बन्धस्वरूपतया अवश्यविचार्य्या मानादिस्थितिं निरूपयितुम् 'इद-
मेतादृक् ................' इत्यावि, '............ईशादिव्यवहारः प्रवर्त्यते ॥' इत्यन्तं श्लोकसप्तदशकेन
आह्निकान्तरमारभ्यते । तत्र श्लोकद्वयेन प्रमाणतत्फलस्वरूपं ततः प्रमेयस्य स्वरूपं निरूपयितुं
प्रत्याभासं प्रमाणस्य व्यापारो न तु स्वलक्षणात्मकवस्त्वेकनिष्ठतानियमेन—इति दर्शयितुं प्रत्यव-
मर्शबलेन आभासव्यवस्था, इति दशभिः श्लोकैः उच्यते, तत्प्रसंगात् मिथ्याज्ञानस्वरूपं श्लोकेन,
प्रमेयस्वरूपसिद्धिश्च प्रकृतमपि ईश्वरवादम् अवलम्ब्य घटते—इति श्लोकेन उपदर्श्यते, स च एष
सर्वः प्रमाणतत्फलप्रमेयादिप्रविभागः सति प्रमातरि प्रदर्शितरूपे ततो न तस्य प्रमेयंता येन अत्रापि
प्रमाणव्यापारसम्भवः केवलं व्यवहारमात्रसिद्धिफलं प्रमाणम् अत्र, इति श्लोकत्रयेण—इति
तात्पर्यार्थः । यदुक्तम् 'क्रियासम्बन्धादिबुद्धयो न भ्रान्तिस्वभावाः' इति, तदेव निर्णेतुं प्रमाण-
तत्फलस्वरूपं तावत् प्रसिद्धमनुवदति—
प्रमेयभाव आदि का विचार-विमर्श करते समय पूर्व में ही सब कुछ दिखा दिया है एवं आगे भी
इस पर विचार प्रकट किया जायेगा । तथा प्रमाण के अधीन ही वस्तु की सिद्धि होती है, यह तो
सर्वत्र प्रसिद्ध ही है ।
प्रकृत विषय में समर्थन करने कारण तथा उस समर्थनीय वस्तु के उपयोगी होने से, प्रत्यक्षादि
प्रमाणों की स्थिति अवश्य विचारणीय है। इसका निरूपण करने के लिए कहते हैं-'इदमेतादृक्...।'
इत्यादि से लेकर'...'ईशादिव्यवहारः प्रवर्त्यते ।।' यहाँ तक, सत्रह श्लोकों से दूसरा आह्निक प्रारम्भ
किया जाता है। दो श्लोकों से प्रमाण और उसके प्रमाणरूप फल का स्वरूप, इसके बाद प्रमेय के
स्वरूप का निरूपण करने के लिए प्रत्याभास प्रमाण का व्यापार नहीं होता, किन्तु स्वरूपात्मक वस्तु
पदार्थ की विश्रान्ति होने से ही है, प्रत्यवमर्श [विमर्श] के बल से आभास व्यवस्था होती है—ऐसा
दश श्लोकों से दिखाया जायेगा—उसके प्रसंग को लेकर मिथ्या-ज्ञान के स्वरूप को एक श्लोक से
से बतायेंगे और प्रमेय के स्वरूप की सिद्धि प्रकृत एक ईश्वरवाद का अवलम्बन करके ही घटित
होती है, यह एक श्लोक से दिखाया जायेगा और वही यह सब प्रदर्शित प्रमाता के रहने पर ही
प्रमाण, प्रमा और प्रमेयादि है, इसलिए प्रमाता की प्रमेयता नहीं होती है जिससे कि भगवान् में भी
प्रमाण का व्यापार सम्भव हो सके; भगवान् में तो केवल व्यवहार की सिद्धिके लिए प्रमाण होता है
तीन श्लोकों से तात्पर्यार्थ दिखायेंगे । 'क्रियासम्बन्धादिबुद्धयो न भ्रान्तिस्वभावाः' अर्थात् क्रिया
सम्बन्ध आदि की बुद्धियाँ भ्रान्ति स्वभाववाली नहीं होती हैं उसे दिखाने के वास्ते प्रमाण और
उसका जो प्रमाणरूप फल है उसे कहते हैं [ प्रसिद्ध वस्तु को फिर से संस्काररूप से कहने का नाम
अनुवाद कहलाता है । ]
१. जाति, व्यक्ति, लिङ्ग, संख्यादि में उपयोगी होने के कारण परम्परा से ईश्वर प्रत्यभिज्ञा में भी
इसका उपयोग सिद्ध होता है, आनुषङ्गिक जाति आदि पदार्थ के व्यवस्थापन करने में और ईश्वर के
व्यवहार साधन में भी इसका उपयोग होता है—इसलिए इसमें लक्षण के निर्माण की उपेक्षा नहीं की
जाती है ।

अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९९
इदमेतादृगित्थं यद्वशाद्व्यवतिष्ठते ।
वस्तु प्रमाणं तत्सोऽपि स्वाभासोऽभिनवोदयः ॥ १ ॥
सोऽन्तस्तथाविमर्शात्मा देशकालाद्यभेदिनि ।
एकाभिधानविषये मितिर्वस्तुन्यबाधिता ॥ २ ॥
यस्य वशात्—सामर्थ्यात्, वस्तु 'नीलसुखादिकं' व्यवतिष्ठते—नियतां प्रकाशमर्यादां न
अतिवर्तते 'इदमिति' स्वरूपेण 'एतादृक्' इति च विशेषणभूतनित्यानित्यत्वादिधर्मान्तरयोगेन,
तल्लोके 'प्रमाणम्' इति स्थितम्, तच्च विवेचकेन विचार्यम्—इह वस्तुनः स्वरूपं स्वात्मवशेनैव
न तावत् व्यवतिष्ठते—जडत्वात्, मम नीलं प्रकाशते चैत्रस्य वेति च तदा कथमवभासः तस्मात्
अन्यवशेन व्यवतिष्ठते, अन्योऽपि चेत् जडः तत् अन्धेन अन्धस्य हस्तादानं, तस्मात् अन्योऽसौ
संविदात्मा, सोऽपि यदि शुद्धो निर्विशेषो न तर्हि नीलस्यैव व्यवस्थाहेतुः भवेत्—पीतादावपि
तस्य तथात्वात्, तदसौ नीलोपरक्तो नीलोन्मुखो नीलप्रकाशस्वभाव इत्याभासः सन् नीलस्य
व्यवस्थापकः, तत्प्रकाशस्वभावतैव हि तद्व्यवस्थापकता, स च नीलस्य प्रकाशो यदि अव्यतिरिक्तस्य,
तत् पीतस्यापि स्यात्—प्रकाशात्मकचित्त्वतत्तादात्म्याविशेषात्, तेन व्यतिरिक्तीकृतस्य नीलस्य
स प्रकाशः नीलं च इत्थम् ततो व्यतिरेकाभासयोग्यं यदि सोऽपि आभासो महतः प्रकाशात् व्यति-
यह ऐसा इत्यादि जिसके कारण व्यवस्थित किया जाता है । वही पदार्थ प्रमाणभूत है और
वह भी अपने आप भासित होता है तथा उसका नवीन उदय होता है ॥ १ ॥
वह अन्तर में उसी प्रकार विमर्शरूप से प्रकाशित रहता है, देश-कालादि से अभेद होने
पर एकतत्त्व के कथन से विषय में वस्तु का अबाधित ज्ञान होता है ॥ २ ॥
जिसके सामर्थ्य से, 'नील सुखादि' वस्तु व्यवस्थित रहती है। व्यवस्थित रहने का अर्थ
यह है कि निश्चित प्रकाश मर्यादा को नहीं छोड़ना, 'इदमिति' इस रूप से और 'एतादृक्' ऐसा
विशेषणभूत नित्य-अनित्यादि दूसरे धर्म के योग से, इस प्रकार का लोक में प्रमाण माना जाता
है, यही सत्य है और इस विषय में प्रबुद्ध पुरुषो का विचार-विमर्श करना चाहिए। जब तक वे
विचार करते हैं तब तक यही सिद्ध होता है कि वस्तु का स्वरूप अपने स्वरूप में प्रकाशित नहीं
रहता; क्योंकि वस्तु का स्वरूप जड होता है, मुझे नील का प्रकाश होता है व चैत्र का प्रकाश
होता हो तो भी वह दूसरे के द्वारा ही प्रकाशित होता है, जिससे वह प्रकाशित होता है उसे
चेतन ही मानना चाहिए, यदि वह दूसरा भी जड है तो एक अन्धा दूसरे अन्धे को हाथ पकड़
कर ले जाता है यही कहना होगा, इसलिए इसे संविद्रूप ही मानो, वह भी शुद्ध नहीं है; क्योंकि
शुद्ध निर्विशेष वेदान्तियों का ब्रह्म माना जायेगा, जिससे नील की व्यवस्था का कारण नहीं बनता;
क्योंकि पीतादि का भी उसी प्रकार प्रकाश वह करता है, यदि वह शुद्ध रहता तो, नील में ही
रह जाता और पीत का नहीं प्रकाश कर सकता, किन्तु करता रहता है। इसलिए वह यहाँ
१. नील-पदार्थ बाह्य वस्तु है और सुख आन्तरिक वस्तु है ।
२. वस्तु के स्वरूप और विशेषण में व्यवस्था करनेवाले का नाम प्रमाण है ।

२०० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२
रिच्येत—महाप्रकाशाव्यतिरेके तस्य ततो नीलादेः व्यतिरेकाभावप्रसंगात्, महाप्रकाशाच्च न
व्यतिरेकं किंचिदपि सहते, इति नूनं महाप्रकाशेन संकोच आत्मनि निर्भासनीयः, संविदो वस्तूनां
च अन्योन्यसंकोचनप्राणो नञर्थरूपोऽसौ शून्य इत्युच्यते, संकोचावभास एव च मायीयप्रमातुः
उत्थानम्, अत एकया सृष्टिशक्त्या प्रमातृप्रमाणप्रमेयोल्लासः परमार्थतः, तेन—शून्यधीप्राण-
देहाद्युपाध्याश्रयस्वीकारात्मकसंकोचपरिग्रहसंकुचितात् मायाप्रमातुः अनन्तकालान्तर्मुखसंवेदन-
रूपात् स प्रमाणाभिमत आभासो यावत् प्रमेयोन्मुखतास्वभावः तावत् प्रमेयस्य देशकालाकाराभास-
संभेदवत्त्वात् सोऽपि तथैव क्षणे क्षणे अन्यान्याभासरूपः स्रष्टव्यः, तदुक्तम् ‘अभिनवोदयः’ इति—
अभिनवः — क्षणवासपरम्लान्यापि न कलङ्कितः, तेन ‘नवनवोदय’ इत्युक्तं भवति, सोऽपि³ यदि
तथाभूतो मायाप्रमातृलग्नो न भवेत् ततो मम नीलाक्भासो यस्य तस्यैव पीताभासो मम इति न
स्यात्, अस्ति च इदं स्वसंवेदनं—यत् सर्वत्र अबाध्यमानम्, इत्येवं स्वत्वेन आभासमानो य
आभासो—नवनवप्रमेयोन्मुख्यात् नवनवोदयः स प्रमाणं यतः प्रमां विधत्ते, कासौ प्रमा ? फल-
प्रकाश है—ऐसा मानना पड़ेगा, उसके स्वरूप में सङ्कोच नहीं करना होगा, यदि वह महा प्रकाश
से भिन्न होता तो नीलादि से भी भिन्न हो जाता किन्तु वह कभी भी महा प्रकाश से भिन्न रूप में
नहीं आता है, इसीलिए उसे अपने में, अवश्य महा प्रकाश से सङ्कुचित करना पड़ेगा संवित्
और वस्तुओं में परस्पर सङ्कुचित होने के कारण न अर्थ स्वरूप शून्य ही कहा जाता है, इसीलिए
मायीय प्रमाता से सङ्कोच का अवभास होना ही उत्थान है, अतः एक ही सृष्टि-शक्ति के द्वारा
प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय का उल्लास परमार्थतः होता है, इसीलिए शून्यप्रमाता, बुद्धिप्रमाता,
प्राणप्रमाता और देहादिप्रमाता की उपाधि के आश्रय को स्वीकार कर, परिग्रह से सङ्कुचित होने
से मायाप्रमाता का अनन्तकाल तक अन्तर्मुख संवेदन होने से, जब तक वह प्रमेय उन्मुख स्वभाव
देश, काल और आकार से उपरक होने के कारण वह भी क्षण-क्षण में दूसरा-दूसरा आभासरूप
हुआ करता है, इसीसे ‘अभिनवोदयः’ नया-नया हुआ करता है ऐसा कहा जाता है; किसी एक
क्षण में आबद्ध नहीं रहता, इसी से वह क्षणमात्र भी मलिनता से युक्त नहीं रहता, अत एव
‘नवनवोदय’ ऐसा इसे कहा गया है।
यदि वह भी मायीय प्रमाता में संलग्न नहीं होता तो नीलाभास जैसा मुझे हुआ वैसा मुझे
ही पीताभास हुआ, यह नहीं कह सकता, किन्तु ऐसा स्वसंवेदन होता है और सर्वत्र अबाध्यरूप
से रहता भी है, इसप्रकार अपने रूप से आभासमान माया प्रमाता में नील-पीतादिरूप से नये-नये
१. आभास के महाप्रकाश से नीलादि पदार्थ में व्यतिरेक अभाव प्रसंग आ जायेगा।
२. क्योंकि ज्ञान ही सब काल में अनुभव-करनेवाला प्रमा हो जाता है, यद्यपि माया-शक्ति से व्याकुल कर देने
के कारण उसका प्रमा मात्र प्रतिभास होता है, उसका प्रतिभास सांसारिक जीवों के लिए अभेदपूर्वक
सिद्ध नहीं कर सकता तथापि सम्बन्धरूप से सिद्ध ही है; क्योंकि ऐसा मुझे भासित होता है, इस विमर्श
से एवं इसमें तो स्वसंवेदन ज्ञान ही प्रमाण माना जाता है।
३. यद्यपि प्रतिभास ज्ञान स्वभाववाला होता है तथापि उसीका माया-शक्ति वशात् मायीय प्रमाता के प्रति-
भासमान विषय वस्तु विच्छेदरूप होकर पृथग्रूप में व्यवहृत नहीं होती है, वैसे ही भिन्न-भिन्न वस्तुओं में
होनेवाले उन-उन प्रमाताओं से चित्तत्त्व में व्यापकत्व इत्यादि विशेषणों का व्यवहार होता है, वस्तु
स्वयं अपने स्वरूप से नहीं भासित होती है—इसलिए इसे प्रमाणरूप नहीं माना जाता है।

अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २०१
स्वभावा इति चेत्, आह—स एव बोधरूप आभासो मितिः प्रमाणफलम् इति सम्बन्धः ।
ननु एवं पर्यायत्वं स्यात् भवेत् न तु फलस्वरूपम्, आह—बाह्योन्मुखतया प्रकाशरूपतया
तत्र तत् प्रमाणं, या तु तस्यैव अन्तर्मुखात्मा विमर्शरूपता प्राक् उपपादिता तत्स्वभावेन केवलं
विषयदशासंकुचितेन स एव बोधः फलं, यथा हि 'यः शूरोऽहं स एव विजयी' इति एकनिष्ठे शूर-
त्वविजयत्वे विवेकवता हेतुफलभावेन व्यवस्थाप्येते, यतो हि 'अहं शूरः ततो विजयी' इत्येवं,
यतो नीलप्रकाशः ततो 'नीलमिदम्' इति परामर्श इति एकरूपत्वेऽपि हेतुफलभावः, यथोक्तं
'तद्वशात्तद्व्यवस्थानात्........'४ इति । किं च इह व्यापाररूपमेव फलं, व्यापारश्च व्याप्रीयमाणात्
व्यापार्यमाणात् वा अनन्याकार एव सिद्धः, इति—अभेदः प्रमाणफलयोः, विमर्शबलेन च यतः
प्रमेयों के उन्मुख होते रहने के कारण नये-नये वे प्रमाण हैं, जिस से कि प्रमा होती है। वह कैसी
प्रमा है ? यदि फल स्वभाववाली प्रमा मानी जाय, तो इस पर कहते हैं कि वही बोधरूप आभास
ही प्रमा है—जो कि प्रमाण का फल मानी जाती है।
अब इस प्रकार प्रश्न करते हैं कि प्रमा और फलस्वभाव इन दोनों को पर्यायत्व
( अनर्थान्तरत्व ) माना जाये, वह फलस्वरूप नहीं बन सकता; क्योंकि दूसरा अनर्थ हो जायेगा,
इसका उत्तर देते हैं—बाह्यरूप से उन्मुख होने के कारण प्रकाशरूप होने से वह वहाँ पर उस
आभास में प्रमाण माना जाता है; जिसे हम कह चुके हैं, वही अन्तर्मुख होकर विमर्शरूप होने
से वही बोध प्रमा और फल कहा जाता है, जैसे 'जो मैं शूरवीर था—वही मैं विजयी हूँ, इस
प्रकार एक में ही शूरत्व और विजयत्व को विवेकी पुरुष हेतु एवं फल इन दोनों में रखते हैं;
क्योंकि मैं शूरवीर था तभी मैं विजयी हुआ, जब कि नील प्रकाश यह है इसीसे 'नीलमिदम्' यह
नील है ऐसा प्रकाशित होना है तब तो फिर नील ही है, एक ही आधार में हेतु और फल
( प्रमाण एवं प्रमा ) ये दोनों रह गये, जैसे कहा जाता है कि [ तद्वशात्तद्व्यवस्थानात्...... ]
प्रकाश विमर्श के द्वारा ही ..... इस प्रकार यहाँ पर व्यापाररूप ही फल है और व्यापार कर्ता
तथा करण से भिन्न नहीं सिद्ध होता, वह अभेद प्रमाण और फल का ही मानना चाहिए, विमर्श
१. माया प्रमाता का अनन्तकाल पर्यन्त अन्तर्मुख संवेदन-ज्ञानरूप से आभास है वह प्रमेय की ओर उन्मुख
स्वभाववाला रहता है इसी से देश, काल और आकार में आभासों का भेद हो जाने के कारण भिन्न-भिन्न
रूपों में नया-नया सा अभ्युदय होता है, वही अन्तर्मुख स्वभाव कहलाता है इसलिए प्रमेय की उन्मुखता से
रहित होने के कारण देश, काल एवं आकार के भेद का अभाव से बोधरूप नया अभ्युदय नहीं होता है ?
२. समान अर्थक है ।
३. जैसे दुग्ध और जल आपस में मिल जाने पर किस भाग में दुग्ध है और किस अंश में जल है । वैसे ही
सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर भी हेतु और फल में भेद का ज्ञान नहीं हो पाता है ।
४. वाचक से अवच्छिन्न वाच्य का प्रतिभास ऐसी बुद्धियों में होता है, वही यह शब्दविशिष्ट अर्थ के
प्रतिभास से शब्द जीव कहलाता है, शब्द के अनुसंधान से रहित कुछ भी ज्ञान नहीं देखा
जाता—अनुल्लिखित शब्दवाले ज्ञानों में भी सामान्यतः शब्द का कुछ न कुछ उल्लेख रहता ही हैं;
क्योंकि उल्लेख के बिना प्रकाशात्मक प्रवृत्ति का उदय नहीं होता । इस विषय में भर्तृहरि ने कहा है कि
न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन गृह्यते ॥
२६

२०२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२
प्रमाणं विमर्शश्च शब्दजीवितः शब्दैश्च आभासान्तरैः देशकालादिरूपैरनामृष्टे एकत्रैव आभासमात्रे
प्रवर्तते—घट इति लोहित इति, ततो देशकालाभासयोः स्वलक्षणत्वार्पणप्रवणयोः अनामिश्रणात्
सामान्यीयमाने आभासे प्रमाणं प्रवर्तते, 'अयम्' इत्यपि हि अवभास आभासान्तरानामित्रे पुरोव-
स्थितावभासमात्रे, इति उक्तं श्रीमदाचार्यपादैरेव—'नियतेऽप्ययमित्येव परामर्शः पुरःस्थिते ।
सर्वभावगतेदन्तासामान्येनैव जायते ।।' इति, तत एव आभासमात्रं वस्तु, स्वलक्षणं तु तदाभास-
के बल से प्रमाण और विमर्श शब्द प्रमाणित होता है और शब्द भी भिन्न-भिन्न आभासों से देश-
कालादि के द्वारा अनवभासित होकर एक आभास में ही केवल स्थिर रहता है—जैसे घट में
लालिमा का आभास, इसलिए अपने स्वरूप को देनेवाले देश-काल के आभास का मिश्रण न होने
से सामान्य आभास ही प्रमाण माना जाता है। 'अयम्' यह आभास दूसरे आभास से न मिला
हुआ विद्यमान हो आभास है, जिसको कि आचार्यपाद ने कहा है—
निश्चित सामने स्थित पदार्थ में जो परामर्श है वह सब भावों में रहनेवाले सामान्य
इदन्ता भास से उत्पन्न होता है।
सामान्यरूप से प्रमाण की स्थिति होने से ही आभासमात्र वस्तु का धर्म होता है, स्वलक्षण
सभी लौकिक ज्ञान शब्द के बिना बोध के विषय नहीं हो सकते हैं। सब ज्ञान शब्द से अनुगत
होकर ही गृहीत होते हैं। अतः विमर्श ही फल है उसके सामर्थ्य से ज्ञान का उपाय प्रमाण माना जाता है।
१. जैसे पुरुष है अथवा घट है इस निरतिशय ज्ञान उत्पादन में मात्र उतनी ही विषय की प्रत्यक्षता रहती है,
उसमें ज्ञान का प्रकाश नहीं होता है, ज्ञान का ग्रहण न होने पर भी ज्ञान में तो केवल विषय ही प्रति-
भासित होता है, वैसे ही दिशा, काल इत्यादि विशिष्ट अतिशय ज्ञान के उत्पादन में भी जानना चाहिए।
पूर्वापरचिरक्षिप्रक्रमाद्यवगमेष्वपि ।
दिक्कालादि विशिष्टोऽर्थः स्फुरत्यतिशयात्मकः ॥
प्रत्यक्षं किं स कालादिः प्रतीतिं पृच्छ किं मया ।
गृह्यते तद्विशिष्टोऽर्थः स च नोत्यद्भुतं महत् ॥
एतेन समवायेऽपि प्रत्यक्षत्वं प्रकाशितम् ।
इहेति तन्तुसंबद्धपटप्रत्ययदर्शनात् ॥
पूर्वोत्तर, शीघ्र एवं चिरकाल इत्यादि क्रम का ज्ञान होने पर भी अतिशयात्मक दिशा-कालादि
से युक्त अर्थ स्फुरित होता है। क्या वह कालादि प्रत्यक्ष होते हैं; क्या हम लोग ग्रहण करते हैं? नहीं
ग्रहण होते हैं ? यही बड़ी विचित्रता है। इससे समवाय में भी प्रत्यक्षत्व प्रकाशित हो जाता है; क्योंकि
'तन्तुषु पटः' इसमें तन्तु से सम्बन्ध रखनेवाले पर का ज्ञान देखा जाता है।
२. केवल विशेष संनिवेश रूप ही घट शब्द का वाच्य होता है, 'एष' ऐसा कहने पर तो देश का आभास
होने लगता है, 'इदानीं' इससे काल का अवभास दिखाई देने लगता है, 'मृन्मय' इस कथन में विशिष्ट
स्वभाव झलकता है, इस प्रकार भिन्न-भिन्न वाचकों से उपलक्षित होता हुआ उस-उसमें भिन्न-भिन्न अभि-
संधान से युक्त होकर भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार वालों की परस्पर निरपेक्ष भिन्न-भिन्न वृत्तियाँ होती हैं।
३. आभास मात्र वस्तु है—ऐसा सिद्धान्ती का कहना है, अब स्वलक्षण किसको कहोगे ? इसका समाधान
करते हैं—आभास सामानाधिकरण्य रूप से पाँच प्रकार के होते हैं। जैसे जाति, गुण, क्रिया, नाम और
द्रव्य भेद से और वे कल्पनाएँ कहीं अभेद रहने पर भी भेद से युक्त नहीं होती हैं और कहीं अभेद

अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७३
सामानाधिकरण्याभासरूपम् आभासान्तरम् एकम् अन्यदेव, तत्रे च पृथगेव च प्रमाणं, तत्परं
तो उन आभासों का सामानाधिकरण्यरूप आभास हो होता है । दूसरा आभास तो दूसरा ही कहा
जायेगा और वहाँ पर प्रमाण भी भिन्न ही माना जायेगा, मिले हुए आभासों में गृहीत को ग्रहण
में भी भेद से कल्पना कही जाती है, इनमें सामानाधिकरण्य दिखाते हैं, जैसे-
जाति जातिमतोर्भेदो न कश्चित्परमार्थतः ।
भेदारोपणरूपा च जायते भेदकल्पना ॥
वस्तुतः जाति और जातिवान् में कोई भेद नहीं होता है, इन दोनों में जो भेद की प्रतीति हो
रही है, वह तो कल्पना मात्र ही है अविद्यमान भेद का आरोप किया गया है।
गौ और गोत्व में कोई भेद नहीं हैं, इसलिए अभेद कल्पना होती है-
एतया सदृशन्याया मन्तव्या गुणकल्पना ।
तत्राप्यभिन्नयोर्भेदः कल्प्यते गुणतद्वतोः ॥
इस प्रकार गुण और गुणी में भी कोई भेद नहीं है, गुण और गुणी के विषय में भी भेद की
कल्पना मात्र रहती है, परमार्थतः गुण और गुणी अभिन्न ही है।
भेदारोपणरूपैव गुणकर्मवत्कल्पना ।
तत्स्वरूपातिरिक्ता हि न क्रिया नाम काचन ॥
यही बात क्रिया और क्रियावान् के विषय में भी घटती है। जैसे गुण और गुणी में
अविद्यमान् भेद का आरोप मात्र है, वैसे क्रिया और क्रियावान् के स्वरूप से अतिरिक्त क्रिया नाम की
कोई वस्तु ही नहीं है।
इन अभिन्न वस्तुओं में भेद का भ्रम मात्र होता है। जैसे कहीं-कहीं पर भिन्न-भिन्न वस्तुओं
में अभेद का भ्रम होता है। कहाँ पर ? इसके समाधान में उत्तर देते हैं कि नाम और नामी [ संज्ञा
एवं संज्ञी ] में, ये दोनों कभी एक साथ नहीं रह सकते हैं, तथापि इनकी एकत्वरूप से प्रतीति देखने में
आती है। कहाँ ? देखिए-
एवं दण्ड्यमित्यादिर्मन्तव्या द्रव्यकल्पना । सामानाधिकरण्येन भेदितोग्रहणात्तयोः ॥
दण्डी अयम्, देवदत्त अयम्, अर्थात् यह दण्डी है एवं यह देवदत्त है इत्यादि स्थलों में नाम
एवं नामी का अभेद दिखायी देता है तभी तो दोनों का सामानाधिकरण्य स्पष्ट दीख पड़ रहा है।
देवदत्त तो नाम शब्द मात्र है 'अयम्' यह नामी-पिण्ड है, फिर दोनों में अभेद कैसे ? तथापि
दिखायी दे रहा है।
१. उसमें भी प्रमाण भिन्न ही रहता है-ऐसा कहना युक्ति युक्त नहीं बैठता है-इन दोनों के व्यवहार की
प्रतीति कौन छिपा सकता है ? इस विषय में कहते हैं-
जातिर्जातिमतो भिन्ना गुणी गुणगणात्पृथक् ।
तथैव तत्प्रतीतेश्चाभासत्वं बाधवर्जितम् ॥
जाति जातिमान् से भिन्न होती है, एवं गुणी गुण समूह से भिन्न होता है; क्योंकि भिन्न रूप
से प्रतीति देखी जाती है इसलिए यह प्रतीति मात्र भ्रममूलक है, भ्रम का तो कभी न कभी बाध हो
जाता है, किन्तु इसका बाधक भी नहीं होता।
द्रव्य और नाम की भिन्नता ही दिखायी देती है; यह देवदत्त है इसलिए देवदत्त का अर्थ नहीं

२०४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२
मिश्रकारेषु तेषु आभासेषु गृहीतग्राहि न प्रमाणम्, इति अग्रे भविष्यति, अध्यवसायस्य अस्मदुक्त-
नयेन शब्दप्राणितस्य प्रत्याभासविश्रान्तौ तदपेक्षमपि प्रामाण्यं वदता प्रत्याभासनिष्ठमेव प्रामाण्यमु-
पेत्यम्, इत्यास्ताम्—किमवान्तरेण ।
ननु यदि विमर्शः प्रमाणव्यापारः स र्तार्ह द्विचन्द्रेऽपि अस्ति ? मैवम्—स हि संस्कार-
योगात् आत्मानमभिमतप्रसिद्धार्थक्रियाप्राप्तिपर्यन्तमनुवर्तयन् अनुन्मूलितवृत्तिः स्थिरः सन् तथा
भवति, मध्ये पुनरुन्मूलनं चेत् सहते न र्तार्ह असौ तथा विमर्शः, नायं विमर्शः पूर्वमपि—एकेन
अन्तर्मुखेन वपुषा पूर्वमेव तस्य निर्मूलनात्, स्वसंवित् अत्र च साक्षिणी, तदैव 'न इदं रजतम्'
इति वृत्तपूर्वस्यैव विमर्शस्य अविमर्शीकरणं संवेद्यते । उक्तं च एतत् बाधविचारे, वक्ष्यते च
'रजतैकविमर्श'.............' इत्यत्र, एवं स्थिते द्विचन्द्रेऽपि यावत् परकूतूहलसंपादनसमर्थक्रियासंमतम्
करनेवाला आभास प्रमाण नहीं माना जाता, ऐसा आगे कहेंगे । निश्चित प्रमाण को हमारी कही
हुई नीति के द्वारा शब्द से प्राणित प्रत्याभास को विश्रान्ति होने पर उसकी अपेक्षा करके
प्रामाण्य करना प्रत्याभास में ही प्रमाणता मानना है, इसीलिए अन्य आभास की आवश्यकता
नहीं देखी जाती ।
अब 'ननु' कहकर प्रश्न करते हैं कि यदि विमर्श को ही प्रमाण का व्यापार मानते हो, तो
जहाँ पर दो चन्द्र का भान होता है वहाँ पर भी विमर्श को प्रमाण का व्यापार मानना होगा ?
इसके उत्तर में कहते हैं कि ऐसा मानना कोई युक्ति युक्त नहीं दिखता; क्योंकि वह संस्कार
के सम्बन्ध से अपने को प्रसिद्ध अर्थ की क्रिया प्राप्ति तक स्थिर रखता हुआ उसी में स्थिर रह कर
वैसा रहता है, बीच-बीच में उन्मूलित होता जाता है तब वह वैसा विमर्श नहीं होता, यह विमर्श
पूर्व में भी नहीं था; क्योंकि इस रूप में वह पहले ही उन्मूलित हो चुका था और इस में अपना
ज्ञान ही साक्षी है, इसी को 'न इदं रजतम्' ऐसा जो पूर्व में रजत का भान हुआ था उसी को
अविमर्शीकरण कहा जाता है । इस प्रकार आचार्य ने बाध विचार में यह बात कही है और कहेंगे
भी—रजतैकविमर्श'.......। इस प्रकार दो चन्द्र के विमर्श में भी दूसरे के कुतूहलार्थ अपूर्व
है, अर्थज्ञान में शब्द अर्थ से युक्त नहीं भासित होता है, शब्द का विवर्तरूप से अर्थ नहीं स्फुरित होता
है । तथा यह दण्डी है इत्यादि में अभेद की कल्पना मूर्खों ने ही की है, दण्ड शब्द से देवदत्त का बोध
नहीं होता है अपितु दण्डी कहने पर ही होता है और उसमें तो प्रकृति एवं प्रत्यय अलग से ही दिखायी
पड़ते हैं कि दण्ड इसके पास में रहता है । जैसी वस्तु रहती है वैसा ही आरोप होता है, वैसे क्रिया
को भी समझना चाहिए ।
क्रियाहि तद्वतो भिन्ना भेदेनैव प्रगृह्यते ।
चलतीत्यादि बोधेषु तत्स्वरूपावभासनात् ॥
क्रियावान् से क्रिया भिन्न होकर भेदपूर्वक ही ग्रहण होती है । चलता है, खाता है इत्यादि,
क्रियाओं के ज्ञानों में क्रिया के स्वरूप का मात्र आभास देखा जाता है ।
१. निर्विकल्प में तो आभास का भेद भले रहे, किन्तु सविकल्प में कैसे रहेगा ? इसके उत्तर में कहते हैं कि
'अध्यवसायस्य'—'निर्विकल्पानुसारेण सविकल्पक संभवात् । ग्राह्यं तदानुगुण्येन सविकल्पस्य मन्महे ।
निर्वकल्पके अनुसार ही सविकल्प की उत्पत्ति होती है इसलिए जो निर्विकल्प का विषय है वही सविकल्प
का भी विषय होना चाहिए ।

अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २०५
अपूर्ववस्तुदर्शनाय चिकीर्षति तावत् अवज्ञोपहासशोकादिविवशः परजनवचनाकर्णनेन समुन्मूल्य-
मानं प्राच्यं 'द्विचन्द्रोऽयम्' इति परामर्शं स्वसंवेदनादेव अभिमन्यते । ननु एवं यत्र अर्थक्रियां न
अन्विच्छति तत्र कथं बाधाबाधव्यवहारः ? मा भूत—किं नः त्रुटितम्, प्रवृत्तिर्हि न सर्वत्र प्रमाणत
एव, किं तर्हि क्वचन संशयत एव अर्थपक्षाधिक्यात् अर्थित्वतारतम्यादपि वा—कृष्यादौ सविषान्न-
भोजने निश्चितसम्भावितदृष्टप्रत्यवाये च चौर्यादौ प्रवृत्तिदर्शनात्, तत् अर्थित्वातिशयः प्रवृत्तौ
तावत् निबन्धनम्, लोकश्च प्रवृत्तः क्वचन अनुन्मूलितप्रमितिकः प्रयाणतां प्रतिपद्यते, क्वचित्
तन्व्यथाभवन् विपर्ययमिति, एवम् आ जन्म यतोऽनेन अभ्यस्त आ पूर्वजन्मशतेभ्योऽपि वा प्रमाणा-
प्रमाणविभागः ततो मणिरूप्यादिवत् तत्स्वरूपम् आपातमात्र एव विलक्षणम् ईक्षते, अस्ति हि
तस्य परमार्थतो वैलक्षण्यं कारणभेदादिकृतं, ततश्च यदार्तं परिमितां सह्याम् अभिमन्यते तत एव
अर्थितामहाग्रहेण यत्र तत्र न प्रेर्यते तदा विसंवादभीरुः निश्चितप्रामाण्यात् बोधात् अदृष्टे दृष्टेऽपि
वा प्रवर्तमानो न विसंवाद्यते, इति स--प्रेक्षापूर्वकारी भण्यते, तेन लौकिकं प्रमाणस्वरूपम् अनूदितं
वस्तु का दर्शन कराने की इच्छा से तिरस्कारपूर्वक उपहास करने में विवश होकर दूसरे की बात
सुन करके पूर्व के 'द्विचन्द्रोऽयम्' इस परामर्श को अपने परामर्श का अभिमान करता है । १
ऐसा होने पर प्रश्न करते हैं कि जहाँ पर अर्थक्रिया की इच्छा नहीं है वहाँ पर बाध का
व्यवहार कैसे सम्भव हो सकेगा ?
इसके उत्तर में कहते हैं कि न हो, इस में हमारी कोई भी हानि नहीं होगी; क्योंकि प्रमाण के
द्वारा प्रवृत्ति सब जगह नहीं होती, किन्तु संशय से भी प्रवृत्ति देखी जाती है, अर्थपक्ष के अधिक
होने से या अर्थित्व के तारतम्य से भी जैसे कि कृषि आदि के विषयुक्त भोजन में और संभावित प्रत्यक्ष
प्रत्यवाय करनेवाले चौर्यादि कर्म में अर्थिता को अधिकता के कारण ही प्रवृत्ति देखी जाती है, इस
प्रकार प्रवृत्त हुई जनता कहाँ प्रमा का न छोड़कर प्रमाणता को प्राप्त करती है, कहीं उससे भिन्न
होकर अप्रमाणता को प्राप्त हो जाती है, इस प्रकार जन्मभर जिसका अभ्यास किया है, सहस्र जन्म-
जन्मान्तर से प्रमाणता और अप्रमाणता के विभाग को ऊपर से हो मणि आदि की तरह विलक्षणता
को रखती है, ठीक-ठीक विलक्षणता तो कारण भेद इत्यादि से ही होती है और कष्ट को सह्य मानती
है तभी अर्थितारूपो महाग्रह से जहाँ-तहाँ प्रेरित नहीं होती है; तब न घटने के कारण डरता हुआ
निश्चित प्रमाण के ज्ञान से चाहे दृष्ट अथवा अदृष्ट वस्तुओं में प्रवृत्त होकर प्रमाणता का नहीं
प्राप्त होता है, इसीको प्रेक्षापूर्वक कार्य करनेवाला कहा जाता है, इसी से लौकिक प्रमाणरूप
१. इसका फलित अर्थ यह है कि सर्वत्र अन्वेषण करने का प्रयास नहीं करना चाहिए । जहाँ पर विभाग
की व्युत्पत्ति रहेगी वहाँ पर ही प्रमाण में निर्णय का अवकाश रहेगा और वह विभाग व्युत्पत्ति यत्न-
पूर्वक छोड़ने में और यत्नपूर्वक ग्रहण करने में अवश्य उपयुक्त होता है । देखिये — गाँव गया हुआ
व्यक्ति गाँव से पुनः अपने गृह लौट आता है तो न वह दग्ध ही होता रहता है और न तो लौटाता
हुआ ही रहता है एवं न तो उसके धन और दारा आदि को ही कोई व्यक्ति अपहृत किये हुए रहते हैं,
इस प्रकार प्रमाण के बिना कैसे निश्चय होगा ? अर्थपक्ष की अधिकता होने के कारण संशय में भी
प्रवृत्ति देखी जाती है, जैसा कि क्षुधा से आक्रान्त व्यक्ति की प्रवृत्ति भी विपरीत ज्ञानपूर्वक ही विष
संपृक्त अन्नग्रहण करने में अर्थिता की तारतम्यता के कारण ही होती है ।

२०६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२
सामान्यसम्बन्धादिज्ञानेऽपि मोहात् अप्रामाण्याशंकां शमयितुम्, अत एव विभागविशेषलक्षणपरी-
क्षादिभिरिह न आयासितो लोकः, यत् यत् अबाधितस्थैर्यम् अत एव अप्रतिहतानुवृत्तिकं विमर्श-
फलं विधत्ते, तत्तद्बोधरूपं बोध्यनिष्ठं प्रमातृस्वरूपविश्रान्तं प्रमाणम् इति, तच्च ऐन्द्रियिके बोधे
सुखादिसंवेदने योगिज्ञाने च अविवादमेव—मुख्यतयैव प्रमेयरूपे आभासे साक्षात् विश्रान्तेः, अनु-
अनुवाद को सामान्य सम्बन्धादि के ज्ञान होने पर भी मोहवश अप्रामाण्य की आशंका को दबा देने
के लिए विभाग, विशेष, लक्षण, परीक्षा इत्यादि कारणों से लोग प्रयत्न युक्त नहीं होते, जो-जो
अबाधित स्थिरता के अप्रतिहत अनुवर्तन को विमर्शफल मानता है, उस-उस बोधरूप की ही
बोध्यवस्तु का प्रमाता में होनेवाला प्रमाण माना जाता है और वह इन्द्रिय सम्बन्धी ज्ञान में तथा
सुखादि के संवेदनरूप योगिज्ञान में निर्विवाद मुख्य प्रमेयरूप से भासित होता है और उसी में
ही साक्षात् विश्रान्त हो जाता है, अनुमान प्रमाण से होनेवाली प्रमा कार्यरूप दूसरे स्वाभाविक
आचार्य धर्मकीर्ति का कथन है—
१. प्रसिद्धानि प्रमाणानि व्यवहारश्च तत्कृतः ।
प्रमाणलक्षणस्योक्तौ ज्ञायते न प्रयोजनम् ॥
प्रमाण प्रसिद्ध ही होते हैं और उन्हीं के द्वारा व्यवहार होता हुआ सर्वत्र देखा भी जाता है ।
प्रमाण के लक्षण कहने पर प्रयोजन का ज्ञान नहीं होता । दूसरों को आक्षेप की आशंका कर प्रामाण्य-
व्यवहार मात्रेण शास्त्रं मोहनिर्वतनम्—ऐसा कहा है ।
२. योगी को दूर-समीप का प्रत्यक्षरूप से बोध हो जाता है । इस विषय में भट्टजयन्त ने विवेचन किया है ।
यथानुवाकग्रहणे संस्थाभ्यासेन कल्पितः । स्थिरः करोति संस्कारः पाठस्मृत्यादिपाटवम् ॥
यथा वा पुटपाकेन शोध्यमानं शनैः शनैः । हेमनिष्प्रतिकाशं तद्याति कल्याणतां पराम् ॥
तथैव भावनाभ्यासाद्योगिनामपि मानसम् । ज्ञानं सकलविज्ञेयसाक्षात्कारक्षमं भवेत् ॥
अस्मदादेश्च रागादिमलाव रणदूषितम् । मनो न लभते ज्ञानप्रकर्षपदवीं पराम् ॥
प्रत्यहं भावनाभ्यासक्षपिताशेषकल्मषम् । योगिनां तु मनः शुद्धं किमिवार्थं न पश्यति ॥
तदेवं क्षीणदोषाणां ध्यानावहितचेतसाम् । निर्मलं सर्वविषयं ज्ञानं भवति योगिनाम् ॥
जैसे वेद शाखाओं के शब्दों को ग्रहण करने पर भली-भांति किये हुए अभ्यास के बल से
पाठ-स्मरणादि में दक्षता, स्थिर संस्कार करा देता है। अथवा पुट देकर धीरे धीरे शोधा हुआ स्वर्ण
अद्वितीय रूप को प्राप्त कर लेता है। वैसे ही भावनादि-ध्यान, धारणा, समाधि के द्वारा योगियों के
मानस को भी संपूर्ण ज्ञेय पदार्थ का साक्षात्कार करने का ज्ञान हो जाता है। हम लोगों के चित्त में
रागादि मल का आवरण होने के कारण ज्ञान की उत्कर्ष स्थिति प्राप्त नहीं होती है। सब को अपने
स्वरूप में देखने के कारण संपूर्ण पापों का नाश हो जाता है इसलिए योगियों का मन शुद्ध होकर
क्या नहीं देख लेता है ? सब दोषों से मुक्त योगियों का ध्यान में लगा हुआ मन होने से निर्मल होकर
सब विषयों को देख लेता है ।
३. पुरोवर्ती पदार्थों में प्रत्यक्ष व्यापार का साधन है एवं परोक्ष में अनुमान से होनेवाला ज्ञान होता है
और वह अनुमान लिङ्ग अर्थात् धूम ज्ञान से होता है, वह पांच प्रकार का है ।
पञ्चलक्षणकाल्लिङ्गाद्गृहीतान्नियमस्मृतेः ।
परोक्षे लिङ्गिनि ज्ञानमनुमानं प्रचक्षते ॥

अ.-२, आ.-३, का-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २०७
मानजा तु प्रतीतिः आभासान्तरात् कार्यरूपात् स्वभावभूतात् वा आभासान्तरे प्रतिपत्तिः,
वस्त्वन्तरस्य च तेन साकं कार्यकारणभावनियमः सामानाधिकरण्यनियमश्च ईश्वरेरनियतिशक्त्युप-
आभास से दूसरे आभास का ज्ञान होता है, दूसरी वस्तुओं का भी, उसी के साथ कार्य-कारण
नियम को तथा सामानाधिकरण्य नियम को ईश्वर की नियति-शक्ति से उपजीवित ही मानता है;
कार्य, कारण, संयोगी, विरोधी और समवायी रूप से पाँच प्रकार के हेतु कहे जाते हैं ऐसे
हेतुओं को देख कर और इनसे व्याप्ति का स्मरण कर न देखी गयी वस्तु के विषय में जो निश्चयात्मक
कल्पना होती है उसको विद्वान् लोग अनुमान शब्द से कहते हैं। इस श्लोक में जो 'पञ्चलक्षणात्' यह
पद दिया है उस हेतु का भी कारण इत्यादि पाँच प्रकार के होते हैं, इसका यह तो अर्थ ही है। इससे
अतिरिक्त एक-दूसरा भी अर्थ निकलता है। वही सच्चा हेतु है जिस पर पाँच हेतु देते हैं, वे इस प्रकार
हैं कि—पक्षसत्त्व, -सपक्षसत्त्व, विपक्षसत्त्व, असत्प्रतिपक्षत्व, अबाधितत्व । पक्ष में रहना पक्षसत्त्व
है, विपक्ष में रहना विपक्षसत्त्व है, किसी भी शत्रु से शून्य होकर रहना असत्प्रतिपक्ष माना जाता
है, अपने अभाव का पक्ष में ज्ञान न होना अबाधितत्त्व कहलाता है। सिषाधयिषा विशिष्ट सिद्धि जहाँ
पर नहीं होती वह पक्ष है, साध्य का निश्चय जिसमें हो वह सपक्ष, साध्य के अभाव का निश्चय जिसमें
हो वह विपक्ष कहा जाता है।
इन सभी रूपों की आवश्यकता केवल अन्वय व्यतिरेकी की हेतु में पड़ती है, केवलान्वयी
और केवल व्यतिरेकी हेतु केवल चार-चार की [ क्रमशः विपक्षसत्त्व और सपक्षसत्त्व को छोड़कर ]
आवश्यकता होती है।
१. परमार्थतः पदार्थों का कार्य-कारणभाव स्वाभाविक नहीं है। यदि कोई अग्नि होती तो धूम होता
अथवा अग्नि और धूम का जो पौर्वापर्यलक्षण अपना स्वभाव यावत्काल दोनों का बना रहना संवित्
प्रकाश को छोड़कर नहीं होता है; क्योंकि संवित् ही वैसी-वैसी प्रकाशित होती है, स्वप्न और संकल्प के
समान योगी का निर्माण रहता है, केवल संवित् ज्ञान के फैलाव की समाप्ति में ही जहाँ तहाँ नियति-
शक्ति के द्वारा पूर्वापर भाव का नियम नहीं अवभासित रहता है। जैसे अग्नि से धूमादि का होता है,
इस प्रकार कहते हैं—
सूर्यास्तमयालोक्य कल्प्यते तारकोदयः ।
पूर्णचन्द्रोदयवृद्धिर्ह्रम्बुधेरवगम्यते ॥
उदितेनानुमीयन्ते सरितः कुम्भयोनिना ।
शुष्यत्पुलिनपर्यन्तविश्रान्तखगपङ्क्तयः ॥
पिपीलिकाण्डसंचारचेष्टानुमितवृष्टयः ।
भवन्ति पथिकाः पर्णकुटीकरणोदिताः ॥
अन्येषामपि हेतूनां भूम्नां जगति दर्शनम् ।
उपलक्षणत्रेतावद्धिहास्माभिः प्रदर्शितम् ॥
सूर्य अस्ताचल की ओर चले गये इस बात को जान कर नक्षत्रों का उदय गगनमण्डल पर
हो रहा है इसका अनुमान किया जाता है, पूर्णिमा के चन्द्रमा को देख कर समुद्र में [ ज्वार भाटा ]
आने का अनुमान हो जाता है, अगस्त्य नक्षत्र के उदय होने पर अनुमान हो जाता है कि नदियाँ अधिक
मात्रा में सूख गयी हैं जिससे सूखे हुए उनके किनारों पर पक्षिगण विश्राम कर रहे हैं, पथिक लोग अण्डे

२०८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२
जीवन एव अवधार्यो भवति न अन्यथा, तेन यावति नियतिर्जाता तावति देशे काले वा अनुमानं
प्रमाणम्, आगमस्तु नामान्तरः शब्दनरूपो द्रढीयस्तमविमर्शात्मा चित्स्वभावस्य ईश्वरस्य अन्तरङ्ग
एव व्यापारः प्रत्यक्षादेरपि जीवितकल्पः तेन यत् यत् आमृष्टं तत् तथैव, यथा नैतत् विषं मां
मारयति, गरुड एव अहम् इति, तत्र तु तथाविधे शब्दनात्मनि विमर्शे आनुकूल्यं यो भजते
शब्दराशिः सोऽपि प्रमाणं, यथा—वेदसिद्धान्तादिः, अन्योऽपि वा बौद्धाहुंतागमादिः, तेन हि यत्
शब्दनम् उत्पादितं ‘ज्योतिष्टोमकारी अहं स्वर्गं गन्ता’ इति, ‘दीक्षितोऽहम् अपुनरावृत्तिभागी’
इति, ‘कारुणिकोऽहं बुद्धपदं गन्ता’ इति, ‘गाढक्लेशसहिष्णुरहम् अर्हत्पदं प्रपत्ता’ इति, तत्र न
विपर्यय उदेति—तदाश्वस्तस्यैव तत्र अनुष्ठानयोग्यत्वात्, अन्यस्य तु दृढप्रतिपत्तिरूपत्वाभावात्
अप्रमाणमेव तथाविमर्शनात्मकं शब्दनम् ।
इसीलिए वह निश्चित ही ज्ञान होता है अनिश्चित नहीं, उसी से जितना ज्ञान नियति का होता
है उतना ही देश एवं काल में अनुमान प्रमाण का माना जाता है और शब्दरूप आगम प्रमाण तो
दूसरा नाम है, वह तो चिद्रूप ईश्वर का आन्तरिक व्यापार है, वह प्रत्यक्षादि प्रमाण के भी
जीवन सदृश है, उससे जिस-जिस का परामर्श होता है वह वैसा ही होता है। जैसे यह विष मुझे
नहीं मार सकता; क्योंकि मैं गरुड हूँ, सारी शब्दराशि मेरे अनुकूल है, वह भी प्रमाण है। जैसे
वेद सिद्धान्तादि प्रमाण माना जाता है वैसे ही अन्य भी बौद्ध, अर्हत् आदि के शास्त्रादि माने जाने
चाहिए, इसी से वेद में आता है कि मैं ज्योतिष्टोम यज्ञादि करनेवाला स्वर्ग में जाऊँगा, जिसमें
दीक्षित होकर मैं इस संसार को पुनः न प्राप्त होऊँ, दयालु बुद्धपद को प्राप्त करूँगा, गाढ क्लेश
सहिष्णु मैं अर्हत्पद को प्राप्त करूँगा इत्यादि, वहाँ पर कुछ भी विपरीत भान नहीं होता है—
परलोक में विश्वास रखनेवाले का यज्ञादि करने में अनुष्ठान की योग्यता मानी जाती है, दूसरे
लोग (बौद्धजैनादि) को उसमें दृढ विश्वास न होने के कारण ऐसा कहा गया है।
के साथ संचरण करती हुई चींटियों को देख कर वृष्टि होने का अनुमान लगा लेते हैं और घास-फूस की
कुटीरों का निर्माण कर लेते हैं। यहाँ पर हमने इतना ही मात्र दिखाया है, यह तो केवल उपलक्षण
है अर्थात् इस प्रकार बहुत से हेतु [ चिह्न ] संसार में देखे जाते हैं जिससे कि न देखी हुई वस्तुओं का
अनुमान हो जाता है।
१. शास्त्रों की युक्तियों देकर विषय प्रतिपादन किया जाता है उसमें थोड़ा सा भी अनुचित-विपरीत नहीं
होता है और विश्वास कर अनुष्ठान करने योग्य ही है; क्योंकि वाणी भी अज्ञान कर्तृक है और जिसका
वक्ता नियत होता है, नियत, परिमित और प्रतिवक्ताओं में प्रतीति को उत्पन्न करती हुई, प्ररूढ
होकर पारमेश्वर्य अंश से निकली हुई उन नियत वक्ताओं के मुखरूपी गुफाओं में प्रस्फुटित होती है,
किसी पशु प्रमाता में निरोध करने की इच्छा हो तो भी नहीं रोकी जा सकती है। इसी कारण वह
आगम संज्ञा की प्रसिद्धि से प्रमाण ही रहती है, तथा वेद, बौद्धादिकों में शास्त्रनिबद्ध प्रसिद्धि अपने यूथ
के प्रति बाधित न होती हुई प्रमाणरूप से मानी जाती है। सांप्रदायिक लोगों के प्रति नहीं रहती है—
धर्मस्य चाव्यवच्छिन्नाः पन्थानो ये व्यवस्थिताः ।
न ताँल्लोकप्रसिद्धत्वात्कश्चित्तर्केण बाधते ॥
जो अनादि अनवच्छिन्न परम्परा से धर्म का मार्ग व्यवस्थित है, वे तो सब से अधिक लोक में प्रसिद्ध हैं।

अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २०९
ननु एवं तदेव शास्त्रं 'कंचित्प्रति प्रमाणं कंचित्प्रति न' इति स्यात्, न चैतद्युक्तम्—
'अपक्षपातित्वात्प्रमाणस्य' इति, अतत्त्वज्ञोऽसि प्रतीतिवृत्तस्य, तथापि नोपेक्ष्यसे, 'अपक्षपाति
प्रमाणम्' इति कः अस्य वचनस्य अर्थः किं यत् एकस्य नीलज्ञानं भासयति धूमज्ञानं वा अग्निम्,
'त्वं प्रातर्निधिमनेन विधाना लब्धासे' इति च यः सिद्धादेशरूप आगमः स किं सर्वान्प्रति प्रमाणम्,
अथ कस्यापि कदाचित् किंचित्, तथा इहापि दृढविमर्शनरूपं शब्दनम् आ—समन्तात् अर्थं गमयति
इति आगमसंज्ञकं प्रमाणं सर्वस्य तावत् भवति, तत्र यथा मिथ्याज्ञाने सहायतां भजमानम् आलो-
केन्द्रियादिकम् अप्रमाणतासचिवम् अप्रमाणं, न च एतावता सम्यग्ज्ञानस्वरूपस्य प्रत्यक्षस्य काचित्
पक्षपातिता, तथा स एव ज्योतिष्टोमादिशब्दः शूद्रादेरदृढविमर्शात्मनि अत एव अप्रमाणे आगमा-
भासे साचिव्यं विदधदपि दृढविमर्शात्मकसत्यागमरूपशब्दनलक्षणप्रमाणोपयोगितायां प्रामाण्यं
भजन् न पक्षपातापक्षपातदोषप्रतिक्षेपयोग्यः, सर्व एव हि आगमो नियताधिकारिदेशकालसहका-
र्यादिनियन्त्रितमेव विमर्शं विधत्ते—विविधरूपो निषेधात्मा वा, अत एव—'प्रसिद्धिरविगीता हि

ऐसा होने पर प्रश्न उठता है कि क्या यह शास्त्र किसी के प्रति प्रमाण होता है और किसी
के प्रति प्रमाण नहीं भी होता—ऐसा होना ठीक नहीं है; क्योंकि प्रमाण तो किसी का पक्षपाती
नहीं होता, अपक्षपात करना ही प्रमाण का कार्य है। तुमने हमारा आशय नहीं समझा, फिर भी
हम तुम्हारी उपेक्षा नहीं करते हैं प्रमाण तो अपक्षपाती होता है इसका क्या अर्थ समझते हो, क्या
किसी को नील ज्ञान का प्रत्यक्ष हुआ तो क्या सभी को नील ज्ञान हो जायेगा इसी प्रकार किसी को
धूम से अग्नि का ज्ञान हुआ तो क्या सभी को हो जायेगा, वैसे तो वहाँ पर 'तुम प्रातःकालीन
खजाना भी प्राप्त कर सकते हो, ऐसा जो कोई सिद्ध पुरुष कहे तो क्या वह सब के लिए प्रमाण
होगा ? किसी को प्रमाण ज्ञान होता है किसी को नहीं भी होता है, यह संसार का व्यवहार है,
विजातीय परलोक पर विश्वास करके ज्योतिष्टोमादि यज्ञ का अनुष्ठान करेंगे; शूद्रादि को विश्वास
न होने से नहीं करते हैं इसीलिए प्रमाण में कोई पक्षपात और अपक्षपात का दोष नहीं लगता;
कोई भी आगम-नियत अधिकारी, देश-काल सहकारी कारण से नियमित होकर ही विधि या
निषेधरूप परामर्श करता है। इसीलिए आचार्य ने कहा है कि अनिन्दित प्रसिद्धि ही सत्य होती
है, उसमें प्रतिपादित विषय का ही निःशंक होकर ग्रहण करना चाहिए।


सब कोई इनके विषय में यथार्थतापूर्वक जानते हैं। यदि कोई बड़ा भारी 'तर्क' देकर उन्हें असत्य
अथवा असिद्ध करें तो यह तीनों कालों में भी नहीं होने वाला है; क्योंकि पुण्य एवं पाप के विषय
में प्रत्येक व्यक्ति को "शास्त्रादि" की प्रमाणता की भी अहर्निश आवश्यकता पड़ती है। अखण्ड
अनवच्छिन्नरूप में बहनेवाली शास्त्रीय धारा को हेतुवाद से बाधित नहीं किया जा सकता है।
१. 'सम्यक्ज्ञायते अनेन' जिससे भली-भांति ज्ञान किया जाता है उसे इन्द्रिय-आलोक कहते हैं जिस प्रत्यक्ष
का वही रूप है। प्रत्यक्ष के निमित्त होने से इन्द्रियाँ, आलोक इत्यादि भी प्रत्यक्ष शब्द से कहे जाते हैं।
२. आगम शास्त्रों की युक्तियों की लोक व्यवहार में अबाध्यरूप से प्रसिद्धि देखी जाती है, यद्यपि
स्मृति शास्त्र से विरुद्ध दिखाई देने पर भी विशिष्ट देश-काल में अवस्थित होकर प्रमाण रहती है।
'कामसागमनिःश्रेयेण निर्मितमपि लोकाचारविरुद्धं चरणं प्रतिपद्यन्ते तत्र हि तावति देश काले
वा सा निरोद्धुमिष्टाऽपि कस्यचिदनिरोध्या।'
२७

सत्या वागैश्वरी मता। तथेति यत्र हि यदा यत्तद्ग्राह्यमशङ्कितैः ॥' इति श्लोके 'यत्र यदा'
इत्युक्तम्, तेन—प्रत्यक्षागमौ बाधकौ अनुमानस्य, इति तत्रभवद्भर्तृहरि-न्यायभाष्यकृत्प्रभृतयः,
तस्मात् प्रमाणलक्षणे ज्ञाते सर्वं प्रमाणस्वरूपं ज्ञातं भवति किं विशेषलक्षणैः, यस्तु अविसंवादकत्वं
तस्य लक्षणम् आह तेनापि 'प्रापकत्वं प्रवर्तकत्वं प्रवृत्तियोग्यशक्यप्राप्तिकवस्तुप्रदर्शकत्वं' प्रमाण-
लक्षणं ब्रुवता न किंचित् प्रमाणाभिमतबोधविश्रान्तं स्वरूपम्, तत् चेत् अनेन लक्षणेन निर्वाह्यते तत्
निर्व्यूढं भवति, अन्यथा मुखभङ्गमूर्धकम्पाङ्गुलिमोटनादिमात्रतत्त्वं तत्, इति अलं विस्तरेण ॥१-२॥
ननु च 'एकाभिधानविषये मितिः' इति यत् उक्तं, तत्र—एकमभिधानं बाह्ये स्वलक्षण एव
प्रवर्तते यदि, तत्कथम् उक्तं—प्रत्याभासं प्रमाणम्, आभासमिश्रीकरणाभासस्तु स्वलक्षणम् ?
इत्याशङ्कां शमयन् प्रमाणस्य यत् प्रमेयं तत् परमार्थतो निरूपयितुम् आह—
यथारुचि यथार्थित्वं यथाव्युत्पत्ति भिद्यते ।
आभासोऽप्यर्थ एकस्मिन्ननुसन्धानसाधिते ॥ ३ ॥
इसीलिए श्लोक में 'यत्र यदा' ऐसा कहा गया है, इससे सिद्ध होता है कि प्रत्यक्ष और
आगम अनुमान के बाधक होते हैं, इसको भर्तृहरि एवं न्यायभाष्यकर्ता आदि सभी लोगों ने माना
है; प्रमाण के लक्षण को जान लेने पर प्रमाण के सभी स्वरूप ज्ञात हो जाते हैं, विशेष लक्षण करने
का कोई आवश्यकता नहीं; जो लोग यह कहते हैं कि व्यर्थ न होना यही प्रमाण का लक्षण होता
है, उसकी भी प्राप्ति करना ही प्रवर्तकता मानना पड़ेगा, प्रवृत्ति प्राप्ति योग्य शक्य वस्तु को दिखा
देना ही प्रमाण का लक्षण है—ऐसा कहनेवाले भी तो प्रमाण का कोई अभिमत निष्कर्ष नहीं
बताते हैं। इससे सिद्ध होता है कि जो इस लक्षण से प्राप्त होता है वही उत्तम लक्षण माना जाता
है, नहीं तो मुख घुमा देना, मस्तक हिला देना और अंगुली के द्वारा चुटकी बजा करके बात
को उड़ा देना इत्यादि दूसरी चीज है, इस पर अधिक कहना व्यर्थ है ॥ १-२ ॥
अब इस पर शङ्का करते हैं कि 'एकाभिधानविषये मितिः' इस प्रकार अविसंवादि विज्ञान
को प्रमाण सौगतादि मानते हैं, इस वाक्य में एक अभिधान बाह्य स्वलक्षण में प्रवृत्त होता है,
यदि ऐसा ही तात्पर्य है—तो प्रत्याभास ही प्रमाण सिद्ध होगा वह कैसे कहा गया है ? आभास
का मिश्रीकरण तो प्रत्याभास होगा ? इस शङ्का को दबाते हुए प्रमाण का जो प्रमेय है उसके
ठीक-ठीक निरूपणार्थ अब कहा जा रहा है—
आभास भी एक ही अर्थ में अनुसन्धान से विचार करने पर रुचि, अर्थिता एवं व्युत्पत्ति
के अनुसार भिन्न-भिन्न हो जाते हैं ॥ ३ ॥
यद्यपि आगमशास्त्र का निर्माण मोक्ष के लिए ही हुआ है तथापि लोकाचार के विरुद्ध आचरण
करनेवाले के लिए निषेध का भी प्रतिपादन किया गया है। देश-काल की परिस्थिति को लेकर इस का
निरोध करना चाहे तो भी निरोध नहीं किया जा सकता है। इस का उल्लेख किया गया है।
श्री भर्तृहरि ने वाक्यदीय में उल्लेख किया है—
प्रसिद्ध आगमो लोके युक्तिमान्नेतरः । विद्यायामप्यविद्यायां प्रमाणमविगानतः ॥
लोक में प्रसिद्ध आगम युक्तिवाला ह् अथवा न भी हो; विद्या और अविद्या में भी अनिन्दित
होकर ही प्रमाण रहता है।

अ.-२, आ.-३, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २११
यद्यपि घट इति बहिः परिदृष्ट एकोऽर्थः तथापि तावानेव असौ न, अपि तु पृथक् निर्भज्य-
मानतामपि सहते, तथाहि—स्वतन्त्रं वा विवेचनम् अर्थित्वानुसारेण वा पूर्वप्रसिद्धद्युपजीवनेन
वा, तत्र त्रिधापि विवेचने क्रियमाणे पृथगेव भान्ति आभासाः, ननु एवं चेत् कथम् एकं स्वल-
क्षणम् ? उच्यते—तेषां पृथक् भासमानानामपि आभासानां यो विमर्शः अनुप्राणितभूतः स
कदाचित् प्रत्याभासमेव विश्राम्यति, तदा परापरसामान्यव्यवहारः, कदाचित् पुनः गुणप्रधानता-
पादनेन 'अत्र इदम् इत्थम्' इति व्यामिश्रणाप्राणो विमर्शः तदा तदेकं स्वलक्षणं अपिः भिन्नक्रमः,
अनुसन्धानेन मिश्रताविमर्शेन साधितो य एकोऽर्थः स्वलक्षणात्मा तत्र एकस्मिन्नपि सति रुचि—
स्वातन्त्र्यम्, अर्थित्वम्—अर्थक्रियाभिलाषपरवशतां, व्युत्पत्ति—वृद्धव्यवहारशरणतां च अनति-
क्रम्य विद्यत एव आभासः ॥ ३ ॥
क्व यथा ? इति निदर्शयितुम् आह—
दीर्घवृत्तोर्ध्वपुरुषधूमचन्दनतादिभिः ।
यथाभासा विभिद्यन्ते देशकालाविभेदिनः ॥ ४ ॥
तथैव सद्घटद्रव्यकाञ्चनोज्ज्वलतादयः ।
आभासभेदा भिन्नार्थकारिणस्ते पदं ध्वनेः ॥ ५ ॥
यद्यपि घट बाहर में एक ही अर्थ के रूप से दिखायी पड़ता है फिर भी उतना ही घट का
यह रूप है—ऐसा स्वीकार नहीं करना होगा, किन्तु पृथक् विभाग को भी वह सह सकता है,
देखिये—अर्थिता के अनुसार स्वतन्त्र विचार करने पर पूर्व प्रसिद्धि को लेकर तीन प्रकार के
विवेक पृथक्-पृथग्रूप से आभासित होते हैं। इस प्रकार एक ही स्वलक्षण कैसे हो सकेगा ? इसका
उत्तर देते हैं कि ये अलग-अलग भासित होनेवाले आभासों के जो विमर्श प्राणभूत हैं वे प्रत्याभास
में ही विश्रान्त हो जाते हैं, तब परत्व एवं अपरत्व सत्ता का व्यवहार सामान्यतया होता है, कभी
गौण प्रधान भेद से 'अत्र इदं इत्थम्' यहाँ पर यह ऐसा है; यह मिला हुआ विमर्श एक स्वालक्षण्य-
रूप में हो जाता है, 'अपि' शब्द भिन्न क्रम के अर्थ में दिया गया है, जिससे सिद्ध होता है कि
अनुसन्धान के द्वारा मिश्रित विमर्श से सिद्ध किया गया एक पदार्थ भी रुचि की स्वतन्त्रता से,
अर्थिता से और व्युत्पत्ति से, भिन्न-भिन्न आभासों से युक्त हो जाता है और वृद्धजनों के उपदेश से
प्राप्त ईश्वर संकेतरूप व्युत्पत्ति के बिना भी व्यवहार का होना असम्भव है ॥ ३ ॥
यह कहाँ पर ? उसे बताया जाता है—
अत्यन्त लम्बा चौड़ा व्यक्ति धूम, चन्दनादि के द्वारा देश एवं काल के भेद से भिन्न-
भिन्न रूपों में भासित होता है। उसी प्रकार विद्यमान घट भी स्वर्ण के घटियाँ-बढ़िया के भेद से
तथा उच्चारण के भेद से भिन्न-भिन्न पदार्थ रूपों में भासित होता है ॥ ४-५ ॥
पहले एक चेतन पुरुष में ही देखिये; फैले हुए देश में व्याप्त होना इसी दीर्घता को परामर्श
करता है जो कि वृक्षादि में भी है, जिसमें जोड़ (अदृश्य सन्धि का स्थान) मालूम न हो, ऐसी

२१२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-४-५

इह तावत् एकस्मिन्नपि चेतनतया प्रसिद्धे पुरुषस्वलक्षणे विततदेशव्यापितां दीर्घतामेव
कदाचित् विमृशति, या—तरूणामपि अस्ति, निःसन्धिबन्धरूपतां वा वृत्ततां, या—शिलानामपि
संभविनी, ऊर्ध्वदिगाक्रमणरूपां वा ऊर्ध्वतां, या—स्थाणोरपि सम्बन्धिनी गमनागमनादि-
स्वतन्त्रभावयोग्यतारूपं वा पुरुषत्वं, यत्—अन्यपुरुषसाधारणं, तथाहि—स्वतन्त्रया वा इच्छया
रुचिरूपया एवं कुर्यात्, यथोक्तं—‘या तु व्याक्षेपसारत्वाच्चेतसः स्वरसोद्गता ।’ इति विततदेश-
व्यापिन एव वा अर्थान् तिरोधिलक्षणाम् अर्थक्रियाम् अर्थयमानो विभजेत्, एवं व्यवहारे वृद्धैः
कीदृक् दीर्घं नाम गीयते इति व्युत्पित्समानो व्युत्पादयितुमिच्छुः वा विभागं कुर्यात्, इत्येवं—
तत्र आभासानां भेदः, एकस्वलक्षणं तु—एकस्मिन् देशाभासे कालाभासे च विश्रान्तेः, देशकाला-
भासावेव हि सामान्यरूपताप्रयोजकव्यापित्वनित्यत्वखण्डनाविधानसविधवृत्ती विशेषरूपतां
वितरतः, एवं पुरुषत्ववत् अन्येऽपि ब्राह्मणाद्याभासा अपि निरूप्याः, एवम् अत्र तावत् प्रसिद्धतर
आभासभेदो—जडाजडसाधारणबहुतरधर्मास्पदत्वात्, अनेन निदर्शनेन धूमेऽपि धूमत्वचन्दनत्व-
श्रीखण्डचन्दनोत्थितत्वादयः प्रसिद्धा आभासभेदा विभजनीयाः, अनेन तु प्रसिद्धेन दृष्टान्तेन
अप्रसिद्धभागोऽपि यो घटः तत्रापि आभासभागभेदो भवति, तथाहि—किञ्चिदपि अत्र नास्ति इति
हृद्भङ्गमिव आपद्यमानो घटं पश्यन् ‘अस्ति इदम्’ इति सत्ताभासमेव पश्यति, अपरान् आभासान्
नाम्नापि तु न आद्रियते, तथा उदकाहरणार्थी घटाभासम्, स्वतन्त्रनयनानयनयोग्यत्वस्वर्थी
द्रव्याभासम्, मूल्याद्यर्थी काञ्चनाभासम्, हृद्यतार्थी औज्ज्वल्याभासम्, आदिग्रहणात् दृढतर-

गोलाई को भी परामर्श करेगा तो ऐसी गोलाई शिलाओं में भी रहती है और ऊपर की ओर
फैलाव रहता है; ले जाना और ले आनारूप आवागमन स्थाणु में भी तो पायेगा और रहती ही
है । एवं दूसरे पुरुषों भी है, इसीलिए स्वतन्त्रता से अपनी-अपनी रुचि के अनुसार जैसा चाहे वैसा
परामर्श कर सकता है, जिसके विषय में कहा गया है—
चित्त की व्याकुला के कारण अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार अनेक परामर्श होते हैं ।
फैले हुए देश में व्याप्त पदार्थों को छिपाना रूप अर्थक्रिया को चाहता हुआ यदि व्यवहार करे तो
वृद्धजनों ने दीर्घ का लक्षण तब कैसा किया है यह माना जाय; इसकी व्युत्पत्ति करनेवाले की
इच्छा का यदि विभाग करें तो आभासों का भेद निश्चित ही होगा । इसमें संशय नहीं है, एक ही
देशाभास और एक ही कालाभास में विश्रान्ति होने से, देश और काल ही सामान्यरूप से
प्रयोजक व्यापिता और नित्यता का वितरण करेंगे, इस प्रकार से पुरुषत्व के परामर्श में भी
ब्राह्मण और क्षत्रियादि का परामर्श हो सकता है, जड और अजड इत्यादि साधारणतया बहुत
प्रकार के धर्मों का विमर्श हो सकता है, इसी दृष्टान्त से धूम में धूमत्व एवं चन्दनत्वादि भेद भी
निकल सकते हैं, इस प्रसिद्ध दृष्टान्त से घटादि परामर्श को भी समझ लेना चाहिए, देखिये—कुछ
भी यहाँ पर नहीं है—ऐसा कहनेवाला घट देख लेता है तो ‘अस्ति इदम्’ ऐसी वस्तु की सत्ता का
ही परामर्श करता है और अन्य तो आभासों के नाम से भी ग्रहण नहीं करते, जल ले आनेवाला
उसको घडे का परामर्श करेगा; स्वतन्त्र द्रव्यरूप से लेनेवाला उसे द्रव्य ही समझेगा; मूल्यार्थी
उसे स्वर्ण घट मानेगा; और स्वच्छता को चाहनेवाला उसकी शुभ्रता का परामर्श करेगा, इस
प्रकार अनेक तरह से दृढता का आभास हुआ करता है, एवं रुचि और व्युत्पत्ति में भी जोड देना