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ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

अ.-२, आ.-२, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १८५
मानमपि उत्तरकालं प्रमाव्यापारानुवृत्तिरूपस्य स्थैर्यस्य उन्मूलनेन 'द्विचन्द्रो नास्ति' इत्येवंरूपेण
असत्यम्, इह पुनः 'चलति चैत्रः' इत्येवंभूतो विमर्शः अनुवर्तमानो न केनचित् उन्मूल्यमानः
संवेद्यते, द्विचन्द्रादि च यद्यपि ह्लादोद्वेगयोः उपयुज्यते, तथापि द्विचन्द्राभिमानी न तावतीं तत्र
अर्थक्रियाम् अभिमन्यते अपि तु यादृशी एकेन शशिना कर्तव्या-तिमिरापसारणादिरूपा,
तादृश्येव अपरेण, इति न तद्दिगुणाम् अर्थक्रियाम् तत्र अध्यवस्यति, तस्यां च असौ न उपयुज्यते,
व्रज्यायां तु यामेव ग्रामप्राप्तिम् अध्यवस्यति तस्याम् अविकलायाम् उपयोगोऽस्या, इति-
स्थैर्यात् उपयोगच्च एकानेकरूपक्रियातत्त्वावलम्बना बुद्धिः सत्यैव, एवं संबन्धादिषु कालपर्यन्तेषु
वाच्यम् उत्तरकारिकासु स्फुटीभविष्यति ॥ १ ॥
ननु एकत्वम् अनेकत्वं च परस्परं विरुद्धे, कथम् एकत्र वस्तुनि स्यातां, ततश्चायं बाधक-
प्रमाणकृतः स्थैर्योन्मूलनप्रकारः ? इत्याशङ्कयाह-
तत्रैकमान्तरं तत्त्वं तदेवेन्द्रियवेद्यताम् ।
संप्राप्यानेकतां याति देशकालस्वभावतः ॥ २ ॥
इह तावत् चैत्रे चलति दृष्टे न जातुचित् न चलति अयम् इति बुद्धिः जायते-न रजतम्
इतिवत्, द्विचन्द्रेऽपि नायं द्विचन्द्रः तिमिरवशात्, अहम् उपप्लुतनायनः परम् एवं वेद्मि इति भवति
ही पारमार्थिक कही जाती है किन्तु द्विचन्द्रादि तो वैसा भानमान होता हुआ भी उत्तरकाल में
यथार्थ प्रमाज्ञान के हो जाने पर उन्मूलित हो जाता है, जिससे 'द्विचन्द्रो नास्ति' ऐसा बोध होने
लग जाता है इसी कारण असत्य माना जाता है, क्रिया में तो 'चलति चैत्रः' अर्थात् चैत्र जाता
है, ऐसा जो विमर्श होता है उसका उन्मूलन कोई कभी भी नहीं करता हुआ जाना जाता है ।
यद्यपि द्विचन्द्रादि आनन्द एवं उसके अभाव उद्वेग का उपयोगी होता है, तो भी 'द्विचन्द्रादि' का
अभिमान करनेवाला मानता है कि यह 'द्विचन्द्रः' है, उतनी अर्थक्रिया का उसमें अभिमान नहीं
रहता; जितना एक चन्द्रमा से अन्धकार दूर करना रखता है, वैसी दूसरे चन्द्रमा से नहीं होती,
दुगुनी अर्थक्रिया 'प्रकाश' देने में उसे विश्वास नहीं होता; क्योंकि वह इसके लिए उपयोगी नहीं
है, इसीलिए उसमें असत्य बुद्धि उत्पन्न होती है, किन्तु चैत्र विषयक गमन में तो ग्राम की प्राप्ति
में अर्थक्रिया प्रत्यक्ष फल के रूप में दिखायी देती है, उपयोग भी तो अर्थक्रिया का सत्य अविकल
है, इसलिए स्थैर्य और उपयोगी होने के कारण एक और अनेकरूप क्रियातत्त्व का आलम्बन
करनेवाली बुद्धि सत्य ही होती है, इस प्रकार सम्बन्धादि से लेकर काल पर्यन्त कहना चाहिए
यह बात हम आगे कारिकाओं में स्पष्ट करेंगे ॥ १ ॥
अब प्रश्न करते हैं कि एकत्व और अनेकत्व इन दोनों का स्वभाव परस्पर विरुद्ध सा ही
लगता है; एक ही वस्तु में दोनों कैसे रह पायेंगे ? इसलिए स्थिरता के खण्डन करने का प्रकार
बाधक मूलक है ? इस पर आशङ्का कर कहते हैं-
उसमें एक ही आन्तरिक तत्त्व इन्द्रियों के द्वारा वेद्य होकर देश और काल के स्वभाव भेद
से अनेकरूपता को प्राप्त कर लेते हैं ॥ २ ॥
चैत्र चलता है-इस प्रकार देखने पर नहीं कह सकते हो कि यह नहीं चलता है; ऐसी
बुद्धि नहीं उत्पन्न होती, जैसी शुक्तिका को देखने पर यह रजत नहीं है, दो चन्द्रमा को भी देख
२४

उन्मूलनाबुद्धिः, यत्तु उक्तम्—एकमेव कथम् अनेकं भवति इति, तत्र उच्यते—इह कारणमेव
कथम् अकारणं भवति, अथ उच्यते—विषयभेदात् तथा, इति तद्विषयभेदे एतत् न विरुध्यते,
इति केन अयं विनीर्णो वरः ? संवेदनेन इति चेत् ‘चलति’ इत्यादौ संवेदनमेव अस्माभिः प्रमाणी-
कृतं किमिति न सह्यते, विषयभेदोऽपि च अत्र वक्तुं न शक्यते, तथाहि—आभासान्तरेण असंभेदने
तदेकाभासमात्रम्, अत एव अन्यापेक्षावियोगात् अन्तरङ्गत्वात् आन्तरम् अनुवर्तमानं तथाभूता-
भासमात्रग्रहणोचितान्तःकरणवेद्यतया च आन्तरं तथा स्वरूपापरिच्युतेः तत्त्वम् आभासान्तर-
योगेन तननसहिष्णुत्वाच्च तत्त्वम् ‘एकम्’ इति प्रतीयते, तदेव देशाभासेन इह अमुत्र इति,
कालाभासेन अधुना तदानीमिति, स्वभावाभासेन कृशः स्थूल इत्यादिना, मिश्रतया अनेकमिति
बाह्येन्द्रियवेद्यतायां प्रतीयते, तथा ‘स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य…………… १’ इति उक्तनीत्या विश्वमेव
आन्तरं सत् एकम्, तदेव सान्तर्विपरिवर्तिनः उभयेन्द्रियवेद्यत्वम्, इति वक्ष्यमाणकार्यकारणभाव-
तत्त्वदृष्ट्या इन्द्रियवेद्यतायामनेकम्—देशाद्याभासमिश्रणात् इति, एकत्वम्—आभासान्तरामिश्र-

कर यह ‘द्विचन्द्रः’ नहीं हैं, ऐसा बोध अपने को हो जाता है; नेत्र दोष से दूषित होने के कारण
मैं चकाचौंध हो गया हूँ, इसलिए ऐसा समझता हूँ अतः यह दो चन्द्रमा नहीं हैं—ऐसी बुद्धि हो
जाती है, किन्तु यह जो कहा गया है कि एक ही अनेक कैसे हो जाता है, वहाँ पर यह कहना है
कि कारण [ बीजादि ] कैसे अकारण [ अङ्कुरादि ] बन जाते हैं, इसके समाधान में उत्तर देते हैं
कि विषय भेद से वैसा हो जाता है, [ कारण-अकारण ] विषय के भेद हो जाने पर कोई विरोध
नहीं होता, यदि यह कहो कि विषय भेद से ऐसा हो जाता है तो मैं भी कहूँगा कि यह भी तो
विषय भेद से हो जाता है, इसको किसने वरदान दिया है कि यह इसके लिए नहीं होगा ? यदि
कहो कि संवेदनरूप ज्ञान से ऐसा होता है तब तो हम लोगों ने भी ‘चलति’ इत्यादि ज्ञान को जो
प्रमाणित किया है इसको क्यों नहीं मान लेते हो ? इसमें विषय भेद भी नहीं हैं, ऐसा नहीं कह
सकते, देखिये—दूसरे आभास से न ज्ञान होने पर एक ही आभास मात्र रहता है, इसीलिए किसी
अन्य की अपेक्षा न रहने के कारण अन्तरंग हो जाने से वह अपने भीतर स्थिर रहा करता है ।
उसी प्रकार आभास ग्रहण में समर्थ अन्तःकरण से वेद्य होकर उसका अपने स्वरूप से च्युत न होना
ही आन्तरतत्त्व कहलाता है; उसको तत्त्व इसलिए कहते हैं कि दूसरे आभास के सम्बन्ध से अपने
विस्तार को सह सकता है जिससे ‘एकम्’ एक प्रतीत होता है, उसी को देश आभास से यहाँ और
वहाँ कहा जाता है, काल आभास से ‘अधुना’ अब और ‘तदानीन्तन’ तब कहा जाता है, स्वभाव
के आभास से कृश एवं स्थूल इत्यादिरूपों से कहा जाता है, मिले-जुले अनेकरूपों में बाह्येन्द्रियों के
ज्ञान से प्रतीत होते हैं, वैसा कहा भी है ‘स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य’ अर्थात् अपनमें रहनेवाले स्वामी
का……। इस कही हुई नीति से यह सारा का सारा विश्व ही आन्तरतत्त्व में एक सद्रूप होकर
रहता है, उसी अन्तर्वर्ती परिवर्तन के साथ दोनों इन्द्रियों से वेद्य होकर आगे कहनेवाले कार्य-
कारणभाव यथार्थ दृष्टि से इन्द्रियों के द्वारा वेद्य होने पर अनेकता को प्राप्त हो जाते हैं—देशादि
आभास के मिल जाने से, ‘एकत्व’—दूसरे आभास के मिल जाने पर केवल अन्तःकरण से वेद्य

१. बाह्य-इन्द्रियों से वेद्य होने के कारण सभी प्रमाणों का आसाधारण रूप बाहर में रहने पर अकेला आ
जाता है ।

अ.-२, आ.-२, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १८७
ताया अन्तःकरणैकवेद्यत्वे चिन्मात्रतायाम्, अनेकत्वं पुनर्—आभासान्तरमिश्रतायाम् उभयकरण-
वेद्यत्वे चिदतिरिक्ताभासने च, इति—स्फुटो विषयभेदः, तस्यैव च तथात्वम् इति परामर्शबला-
देव कारणाकारणवत् उपादानसहकारिवत् । अथ व्यपदेशमात्रम् एतत् 'कारणम् अकारणं च'
इत्यादि, तदिहापि एकमनेकमिति व्यवहारमात्रम्, नीलं पीतम् अविकल्पकं सविकल्पकम् इत्यपि
सर्वं मायापदे व्यवहारमात्रम् इति सर्वं समानम्, तस्मात् एकत्वानेकत्वविरोधो न बाधकः, तदेतत्
एवकारेण उक्तम् । तत्र इति—तेषु क्रियादिषु यत् आन्तरं तत्त्वं तदेव इन्द्रियवेदनीयतां प्राप्य
देशादिभेदात् अनेकतां याति इति संबन्धः, तत्र इति सत्यत्वे स्थिते तयोर्वा एकत्वानेकत्वयोः मध्ये
'एकत्वमेवम् अनेकत्वमेवम्' इति योजना ॥ २ ॥
ननु एवं विषयभेदे अभ्युपगम्यमाने यदा एकं प्रतिभातं भवति तदा न अनेकम्, अनेक-
प्रतिभासे च न एकं प्रतिभातम्, इति कथम् एकानेकरूपं वस्तु स्यात्, तथाहि बाह्येन इन्द्रियेण
होकर चेतन अवस्था में एकता को संपादन कर लेता है। दूसरे आभास के साथ में संयुक्त हो जाने
पर दोनों इन्द्रियों से वेद्य होकर चेतन से भिन्न भासता हुआ स्फुट रूपों में व्यक्त हो जाता है और
इसका स्फुट हो जाना ही विषय भेद माना जाता है। उस विषय भेद का ही एकत्व एवं अनेकत्व
है। इस प्रकार परामर्श के बल से कारण-अकारण के जैसा एवं उपादान सहकारी कारण के जैसा
मात्र कथन में ही भेद रहता है इसके अतिरिक्त कुछ भी भेदभाव नहीं रहता। [जैसा कि सहकारी
सामग्री के अभाव में उपादान का अनुपादनत्व रहता है] पहले कारण और अकारण इत्यादि
कहना। यहां पर भी एक और अनेक का ऐसा व्यवहार ही मात्र होता है, नील-पीत एवं अविकल्प
सविकल्प जितने भी हैं वे सभी मायीय जगत् में व्यवहार मात्र होते हैं—यह सब समान है, इसलिए
एकत्व और अनेकत्व का विरोध बाधक नहीं होता, उसे 'एवकार' शब्द से कहा गया है। उन
क्रियादिओं में जो आन्तरतत्त्व है वह तो एक ही है, वही इन्द्रिय से वेद्य होकर देश-कालादि के
भेद द्वारा अनेक रूपों में विभक्त हो जाता है, यही सम्बन्ध भी है, इसलिए उनकी सत्यता प्रमाणित
हो जाने पर उन एकत्व एवं अनेकत्व के बीच में एकत्व ऐसा होता है तथा अनेकत्व ऐसा होता
है, यह जोड़ देना चाहिए ॥ २ ॥
अब शंका उठती है कि [ विषयभेद से एकत्व और अनेकत्व में कोई भी विरोध नहीं आने
पाता है यह 'ननु' कहकर आक्षेप किया है ] विषयभेद के स्वीकार करने पर जब एक का प्रतिभान
होता है तब अनेक का प्रतिभान नहीं होता और अनेक का प्रतिभान होता है, तब फिर एक का
१. सब ही नील-मधुर-कर्कश इत्यादि पदार्थों की यथार्थतः चिन्मयता होने के कारण, प्रत्येक में उस-उस
धर्मों का योग होने से विश्वरूपता और विश्वशरीरता सिद्ध होती है—इसलिए ईश्वर एवं आत्मा में दोनों
की उभयरूपता का कहना ठीक हो है, एकत्व करना ठीक नहीं है; क्योंकि वह तो द्वित्वादि प्रतियोगी
की अपेक्षा सदा रखता है—अप्रतियोगी में कैसे रहेगा ? इसी को दिखाते हुए कहते हैं 'विश्वमेवान्तरं
सत्' इत्यादि से। जब फिर उस नीलादि-पदार्थों में अभेद की अन्तःकरण वेद्यतया सभी प्रमाताओं की
असाधारणत्व भावपूर्वक मात्र व्यवस्था देखी जाती है। भीतर एकत्वरूप से आभास रहता है और
बाहर में अनेकत्वरूप से हो जाता है इसी बात को 'एकमिति' इस प्रतीक से कहा गया है। उसमें भी
विभाग दिखाते हैं। अन्तःकरण के साथ परिवर्तन होनेवाली उभय इन्द्रियां वेद्य रहती है, अन्तःकरण
की वेद्यता में एकत्व एव बाह्य-इन्द्रियों की वेद्यता में अनेकत्व रहता है।

१८८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-३
चैत्रो विचित्रदेशक्रः परम् अनुभूयते, न तु अनेकाभाससंमिश्रीकारे बाह्येन्द्रियस्य अविकल्पकस्य
व्यापारः—संनिहितविषयबलोत्पत्तेः अविचारकत्वात् इत्याहुः, विकल्पेनापि मानसेन तथाभूतं
वस्तु नैव स्पृश्यते इति कया धिया वस्तु एकानेकरूपं गृह्येत ? इति परव्यामोहनिवर्हणाय आह—
तद्द्वयालम्बना एता मनोऽनुव्यवसायि सत् ।
करोति मातृव्यापारमयीः कर्मादिकल्पनाः ॥ ३ ॥
इह ‘ज्ञानमालाया अन्तःसूत्रकल्पः स्वसंवेदनात्मकः प्रमाता जीवितभूतः’ इति उपपादितं
प्राक्, स च ‘स्वतन्त्र’ इत्यपि निर्णीतम्, स तु विशुद्धस्वभावः शिवात्मा, मायापदे तु संकुचित-
स्वभावः पशुः, तदस्य मनःसमुल्लासावसरे विकल्पभूमिकायां स्फुट उल्लासः, ऐन्द्रियके निर्वि-
कल्पके सदाशिवेश्वरदशाभ्युदयात्, अविकल्पकबोधाबहिर्भूतविमर्शव्यापारस्य पश्चाद्भाविनं
व्यवसायं निश्चयात्मकं विकल्पकम् अनुव्यवसायशब्दवाच्यं विदधदन्तःकरणम् एतान् क्रिया-
सम्बन्धादिविकल्पान् सम्पादयति, ते च विकल्पाः तद्द्वयम् एकत्वानेकत्वरूपम् अवलम्बन्ते, न हि
विकल्पेषु प्रतिभासमानम् अवस्तु तत्—इति हि उक्तम् ‘प्रकाशतैव वस्तुत्वम्’ इति, न च
विकल्पस्य प्रकाशरूपतां मुक्त्वा आरोपणाध्यवसायाभिमानादिनामधेयं व्यापारान्तरं युक्तम्,
नहीं होता, इस प्रकार वस्तु एक—अनेकरूप कैसे होगी ? देखिये—बाह्य-इन्द्रिय [ चाक्षुष अनुभव ]
से चैत्र एक देश को छोड़कर दूसरे देश में चला गया—ऐसी प्रतीति होती है, किन्तु अनेक आभासों
को मिला देने पर बाह्येन्द्रिय जन्य अविकल्पक व्यापार नहीं हो सकता; क्योंकि संनिहित विषय
के बलोत्पत्ति का ज्ञान नहीं होता है, यह कह सकते हैं, मानस विकल्प से भी एक एवं अनेकरूप
वस्तु का बोध नहीं हो सकता तब फिर किस बुद्धि [ अनुभव ] से एक-अनेकरूप वस्तु को ग्रहण
करेंगे ? यह दूसरों के ऊपर मोह के आवरण को हटाने के लिए कहते हैं—
इसलिए अनुव्यवसाय करनेवाला स्थिर मन इन एकत्व और अनेकत्व का आधार लेकर
प्रमाता के व्यापारमय कर्मादि की कल्पना करता है ॥ ३ ॥
यहाँ पर ‘ज्ञानमाला का आभ्यन्तरीय स्वसंवेदनरूप प्रमाता ही जीवन है, इसका हमने
ज्ञानाधिकार के द्वितीय आह्निक में विवेचन कर दिया है और वह ‘स्वतन्त्र’ है इसका भी निर्णय
कर दिया है, वह तो विशुद्ध स्वभाववाला शिवात्मा है, किन्तु मायायी जगत् में तो संकुचित-
परिच्छिन्न स्वभाववाला पशु हो जाता है, इसलिए इसका मन के समुल्लास अवसरकाल में, जो
विकल्प भूमिका है उसमें स्फुटरूप से उल्लास होता है; क्योंकि इन्द्रियजन्य निर्विकल्प दशा में
सदाशिव और ईश्वर दशा का उदय होता है, अविकल्प बोध से बाहर में नहीं होनेवाला जो
विमर्श का व्यापार है उसके बाद में होनेवाला निश्चयात्मक व्यवसायरूप विकल्प को अनुव्यवसाय
शब्द का वाच्य होता है, उसी को करनेवाला अन्तःकरण क्रिया सम्बन्धादि विकल्पों को सम्पादन
करता है, और वे सब के सब विकल्प उन एकत्व और अनेकत्वरूप द्वित्व का ही अवलम्बन करते
हैं, इसलिए विकल्पों में प्रतिभासित होनेवाली अवस्तु नहीं हो सकती; यही हमने कहा है कि
‘प्रकाशतैव वस्तुत्वम्’ आभास को ही वस्तु कहा जाता है और विकल्प के प्रकाशरूप को छोड़कर
आरोप करना, अध्यवसाय करना और अभिमानादि नामक दूसरा व्यापार युक्त नहीं बैठता है,

अ.-२, आ.-२, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १८९

ततोऽबाह्यं बाह्यम् आरोपयन्ति इत्यादि वचोवस्तुशून्यम्, तच्च एतत् उक्तम् 'भ्रान्तित्वे चाव-
सायस्य…………' इत्यत्र। अथ ब्रूयात्—परो यत् इन्द्रियज्ञानेन प्रकाशनीयं स्वलक्षणं तत् कथं
विकल्पः स्पृशेदिति, भवेदेवं—यदि विकल्पो नाम स्वतन्त्रो भवेत्, यावता प्रमातुरसौ व्यापारः
प्रमाता च पूर्वानुभवान्तःस्वसंवेदनरूपः तदस्य च अयमेव पूर्वानुभवसंस्कारो—यत् विकल्पन-
व्यापारकालेऽपि पूर्वानुभवात्मत्वम् अनुज्झन्नेव आस्ते, ततः पूर्वानुभवतादात्म्यापन्नप्रमातृत्त्व-
व्यापारोऽपि विकल्पस्तद्विषय एव, अत एवमुक्तम् आचार्येण—'पूर्वानुभवसंस्कारः प्रमातुरयमेव
सः। यदपोहनकालेऽपि स पूर्वानुभवः स्थितः ॥' इति, तस्मात् प्रमातुः यो व्यापार एकत्वानेकत्व-
संयोजनात्मा स एव प्रकृतो यत्र तादृशीः क्रियादिकल्पना एकानेकवस्तुविषया 'एता' इति
ग्रहणकवाक्यसूचिता मन एव करोति इति स्थितम्, यद्यपि अविकल्पेऽपि सामान्याद्यवभासो
घटमात्रावभासादौ, तथापि न तदा सामान्यादि स्फुटं—समानोपरञ्जकत्वे सम्बन्धिद्वयोद्भूवे
क्रमिकक्षणसन्तानात्यागे अवयवकदम्बकस्वीकारे अवध्यवधिमत्परिग्रहादौ सामान्यसम्बन्धक्रिया-
द्रव्यादिगादिपदार्थस्य परमार्थतः स्फुरणात्, इति, 'मानसविकल्पग्राह्या एकानेकरूपाः सामान्यादय'
इति स्थितम्। एवं च संवृतिः विकल्पबुद्धिः, तद्वशात् उच्यतां संवृतिसत्यत्वं सत्यत्वस्यैव तु प्रकारः
तत्, इति द्विचन्द्रादिवत् न असत्यता ॥ ३ ॥
इसलिए अबाह्यरूप आन्तर तत्त्व को बाह्यरूप में देखते हैं इत्यादि कहना ही वस्तु शून्य हो जाता
है, इसी कारण यह कह दिया है 'भ्रान्तित्वे चावचायस्य ˙।' इस कारिका में अब भी कोई दूसरा
यदि कहे कि जो इन्द्रिय ज्ञान से प्रकाशित होनेवाला निर्विकल्पक ज्ञान है वह कैसे विकल्प को
स्पर्श करेगा, ऐसा तब होता जबकि विकल्प का कोई अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रहता—किन्तु ऐसी
तो कोई बात दिखती नहीं, जब तक प्रमाता का वह व्यापार और प्रमाता दोनों पूर्व स्वसंवेदन-
रूप होते और उसका यह पूर्व के अनुभव संस्कार जो कि विकल्प व्यापार काल में भी पूर्वानुभव-
रूप को नहीं छोड़ता हुआ रहता है, इससे यह सिद्ध होता है कि जब तक पूर्वानुभव अपने
स्वरूप को प्रकाश करता रहता है तब तक ही पूर्वानुभव के साथ तादात्म्य को प्राप्त होकर,
प्रमाता और उसका व्यापार भी विकल्प पूर्व के अनुभव का ही विषय होता है, इसलिए आचार्य
ने कहा कि—'पूर्व के अनुभव का संस्कार प्रमाता का ही विषय है। विकल्प दशा में भी पूर्व का
अनुभव स्थिर रहता है।' इसलिए प्रमाता का जो व्यापार एकत्व और अनेकत्व का संयोजनरूप है
वही प्रकृत प्रसङ्ग में आ रहा है जिसमें ऐसी एक एवं अनेक वस्तु विषयक क्रियादि की कल्पना है,
उसे 'एता' इस शब्द से सूचित किया गया है, जब कि वह मन ही करता है यह बात स्थिर हुई,
यद्यपि अविकल्प दशा में भी केवल घटादि के अवभास में सामान्यादि का अवभास होता है, तो
भी सामान्यादि का उसमें स्फुटाभास नहीं होता; दो सम्बन्धियों से उत्पन्न होनेवाले समानतः
उपरञ्जकता में क्रमिक क्षण-सन्तान छोड़ देने पर एवं अवयव समूह के स्वीकार करने पर अवधि
और अवधिमान् के ग्रहण करने में सामान्य सम्बन्ध, क्रिया, द्रव्य, दिशा, कालादि पदार्थों का
परमार्थतः स्फुरण होने से मानस विकल्प से गृहीत होनेवाले एकरूप और अनेकरूप सामान्यादि
होते हैं यही सिद्ध होता है। इस प्रकार संवृति विकल्पबुद्धि, उसी कारण से संवृति है और
सत्यत्व का प्रकार भी सत्य होता है, उसमें द्विचन्द्रादि की जैसी असत्यता नहीं रहती, अपितु
सत्य रहता हुआ सत्यरूप में भासित भी होता है ॥ ३ ॥

१९० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-४
तत्र च अयं संविदवतरणक्रमो—यत् क्रियाशक्तेरेव अयं सर्वो विस्तारः, तत्रापि सम्बन्ध
एव मूलभूतः तथाहि—समानानां यत् एकं भाति तत् सामान्यम्, देवदत्तस्य यत् वैतत्यं सा क्रिया,
अवयवानां यदैक्यं वैतत्यं च देशतः सोऽवयवी, इमम् अवधिं कृत्वा अयम् इत्थम् ततोऽ य अयं
पुरस्तात् इत्यादिर्र्दिक्, अस्यायं क्रियाप्रतानः सहभावेन आस्ते विनाभावेन वा इति वर्तमानादिः
कालः, यावत् हि प्रातिपदिकार्थस्य पृष्ठपाति वपुः भाति तदतिरिक्तं सर्वं सम्बन्ध एव इति
कारकाणामपि सम्बन्धरूपतैव, केवलं क्वचित् असौ सम्बन्धो व्यपदेशान्तरग्रंन्थि सहते, यथा
सास्नादिमतां सम्बन्धो 'गाव' इति एकव्यपदेशसहिष्णुः तत्र सामान्यादिव्यवहारः, व्यपदेशान्तर-
ग्रन्थिभङ्गे तु सम्बन्धवाचोयुक्तिरेव, अत एव मुष्टिप्रस्थपलादिप्रमाणपरिमाणोन्मानरूपं तत्र
अन्तर्गतं वा अणुमहदादि संख्यापृथक्त्वादि च यत् तत् सर्वं सम्बन्धस्यैव विजृम्भितम्, येऽपि
सामान्यादि वस्त्वन्तरम् अमंसत तेऽपि तत्र समवायम् अभ्युपजग्मुः जीवितत्वेन, समवायश्च
सम्बन्धात्मा तदनुग्राह्यो वा केषाञ्चित्, यत आहुः 'तां शक्तिं समवायाख्यामनुगृह्णाति सम्बन्धः।'
इति, यदपि च कारकं तदपि क्रियामुखप्रेक्षि, सापि कालं प्राणेश्वरम् आश्रयति, सोऽपि क्रिया-
द्वारेण सर्वभावान्, सापि सम्बन्धम् उद्धुरयति इति सम्बन्धाधौनैव इयं चित्रा लोकयात्रा, तदाह
इस प्रकार [ क्रियादि संवृतिसत्य में द्विचन्द्रादि के समान असत्यता का निराकरण कर
देने पर ] कहते हैं कि वहाँ पर संवित् ज्ञान का जो क्रम है, वह सब क्रिया-शक्ति का ही विस्तार
है, उसमें भी एक-अनेकरूप सम्बन्ध हो मूलभूत कारण माना जाता है, देखिये — समान पदार्थों में
जो एकरूपता दिखती है वही सामान्य कहलाता है, देवदत्त का विस्तार दिखायी पड़ता है वही
तो क्रिया है अवयव पदार्थों में जो एकता का विस्तार दिखायी देता है वही देशभाव से अवयवी
माना जाता है, इसी को सीमित मान करके यह ऐसा है, इसके पूर्व में यह है, इत्यादि भावों को
लेकर दिशाएँ बन जाती हैं। इसी के साथ क्रिया के विस्तार से वर्तमानादि काल का भाव होता
है, जब तक प्रातिपदिकार्थ पोषक-शरीर का भाव होता है तब तक ही उसकी स्थिति रहती है,
उससे अतिरिक्त सब सम्बन्ध ही रहता है इसीलिए कारकों की भी सम्बन्धरूपता मानी जाती है ।
वह सम्बन्ध केवल कहीं पर ही दूसरे नाप से अभिहित होता है। जैसे सास्नादि के सम्बन्ध से
'गौ' यह नाप कहा जाता है और उसमें सामान्यादि का भी व्यवहार होता है, दूसरा कोई प्रकार
नहीं होता है और यही कहने का व्यवहार जगत् का नियम है, इसलिए एक मुट्ठी, प्रसर, पलादि
परिमाणों से और उसके अन्तर्गत अणु, महान्, संख्या-पृथक्त्वादि जो कुछ छोटा या बड़ा है वह
सब सम्बन्ध को ही लेकर होता है और सारा का सारा विस्तार सम्बन्ध का ही है, [ अधिक
परिमाण, कम-परिमाण, पूरा-परिमाण। लम्बाई चौड़ाई ये सब बाह्य संख्या ही कही जाती हैं ]
जो लोग सामान्यादि [ द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, सम्बन्ध और विशेष ] पदार्थों को दूसरी वस्तु
के रूप में मानते हैं। वे भी उसमें समवाय को ही जीवनरूप से माने हुए हैं और समवाय भी तो
एक प्रकार से सम्बन्धरूप ही है अथवा किसी के मन में समवाय के द्वारा ही उत्पन्न होता है;
क्योंकि उन लोगों का कथन भी है—
सम्बन्ध ही समवाय नामक शक्ति पर अनुग्रह करता है और जो कारक है वह भी तो
क्रिया की उन्मुखता रखता है, क्रिया भी अपने प्राणेश्वर काल का आश्रय लेती है, वह काल भी
क्रिया के द्वारा समस्त पदार्थ राशि को देखता है, इस प्रकार क्रिया सम्बंध को जगाता है,

अ.-२, आ.-२, का.-४ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ १९१
आचार्य एव—'भेदाभेदात्मसम्बन्धसहसर्वार्थसाधिता। लोकयात्राकृतिर्यस्य स्वेच्छया....' ॥ इति,
अतः सम्बन्धमेव प्रथमं निरूपयितुम् आह—
स्वात्मनिष्ठा विविक्तभा भावा एकप्रमातरि ।
अन्योन्यान्वयरूपैक्ययुजः सम्बन्धधीपदम् ॥ ४ ॥
राजा पुरुषश्च बहिस्तटस्थौ स्वात्मैकपरिसमाप्तौ प्रमातृभूमौ यद्वैक्यं गच्छतः, न च ऐक्य-
मात्रं—तयोः भेदविगलनापत्तेः, अपि तु परस्पररूपश्लेषात्मकं युगपदेव निमज्जदुन्मज्जद्भेदाभेद-
कोटिद्वयदोलारोहणलक्षणम् अन्वयरूपं, तदा तावेव सम्बन्धधिय आलम्बनं भवतो 'राज्ञः पुरुष'
इति, तथा हि—राजा यदा पूर्वं धिया गृहीतोऽपि न स्वात्मविश्रान्त्यौ तुष्यति तदा रूपान्तरेण
पुंसा श्लेषं भजन् कृतार्थोभवति पुरुषोऽप्येवं, स च एष रूपश्लेष एकएव उभयोः चिदात्मनि तथा
इसलिए यह सारा का सारा लोक व्यवहार सम्बन्ध के अधीन ही रहता है, उसके विषय में
आचार्यपाद ने कहा है कि—भेद और अभेद के साथ समस्त अर्थों का साधन हो जाता है। अपनी
इच्छा से लोक यात्रा का आकार-प्रकार बनता है। इसलिए सर्वप्रथम सम्बन्ध का ही निरूपण
करते हुए कहते हैं—
एक ही प्रमाता में भिन्न-भिन्न रूपों से भासनेवाले भाव-पदार्थ यदि उसमें भासित होते हैं,
तो परस्पर अन्वयरूप से एकत्व को प्राप्त होकर सम्बन्धरूप का वाच्य बन जाते हैं ॥ ४ ॥
राजा और पुरुष ये दोनों परस्पर भिन्न-भिन्न हैं। वे अपने आप में तटस्थरूप से रहते हैं
तथा प्रमातृभूमि में संमिलित होकर एकत्व की प्राप्ति कर लेते हैं और वे स्वयं तो एक नहीं
हो पाते; क्योंकि तब तो भेद ही विनष्ट हो जायेगा, अपितु प्रमाता की बुद्धि में परस्पर मिल करके
एक ही बार डूबते हुए एवं ऊपर की ओर उठते हुए भेद-अभेद कोटिरूपी झूले पर चढ़े हुए के
समान हो जाते हैं, तब सम्बन्ध बुद्धि का आलम्बन होता है और यह राजा है तथा यह पुरुष है,
देखिये—जब राजा पूर्व बुद्धि से गृहीत होता हुआ भी वह अपने में विश्रान्ति का अनुभव नहीं
करता तब दूसरे रूप से पुरुष के साथ संपर्क कर कृतार्थ हो जाता है उसी प्रकार पुरुष भी कृतार्थ
१. 'राज्ञः पुरुषः' इस वाक्य का यह आशय है—कि मन से भी चाक्षुष प्रत्यक्ष का परामर्श होता है,
इसलिए राजा एवं पुरुष का एक पिण्डीभाव से ऐक्य नहीं बैठता है और न तो बाहर के जैसा तटस्थ
रूप से ही भेद होता हुआ दिखाई देता है, अपितु यही वह सम्बन्ध प्रतीति कहलाती है जो यह भेद
प्रथा सम्बन्धियों में दिख पड़ती है, वह भी बाह्य एवं आन्तररूप से ठीक ही बैठती है। इसमें कोई
विरोध नहीं है और विमर्श बल से अन्वय प्रमाता के साथ नहीं बैठती है, इसलिए 'राज्ञः पुरुषः' ऐसा
कहा जाता है।
२. वस्तुतः प्रमाताओं की एकता को ही एकता कहा जाता है विशेषण और विशेष्य के कारण ही कभी
'राज्ञः पुरुषः' राजा का पुरुष है और कभी 'पुरुषस्य राजः' यह पुरुष का राजा है—ऐसा होता है
नील एवं कमल, धव और खदिर इस से भिन्न इत्यादि, वैचित्र्यभाव से रहनेवाले के भेद को न छोड़ने-
वाले विशेषण का ही विशेष में अन्तः प्रवेश से तद्रूप होकर एक भावपूर्वक परिणत होना और तरह-
तरह के विरुद्धधर्मी के अध्यास दोष को छोड़ देना, फिर भी प्रमेयरूप से निर्मित होकर भासित होता
रहता है।

१९२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-५
अवस्थानरूपः पूर्वप्रतिलब्धसंवित्प्रतिष्ठे तत एव अधिकसंविन्मज्जनात् अनाभासमानपृथग्भवन-
लक्षणस्वातन्र्त्ये विश्राम्यति, इति तत्रैव निर्भासिते समास्कन्दितपुरुषपरमार्थोऽपि, एवं बहिरनेकता,
अन्तस्तु परस्पररूपश्लेषेणैक्यम्, इति सम्बन्धस्य रूपम् ॥ ४ ॥
जातिद्रव्यावभासानां बहिरप्येकरूपताम् ।
व्यक्त्येकदेशभेदं चाप्यालम्वन्ते विकल्पनाः ॥ ५ ॥
जात्यवभासस्य—अवभासमानरूपायाः जातेः ग्राहिकायाः कल्पनाः, ता न केवलं सम्बन्ध-
वत् अन्तर् एकरूपतां बहिश्च अनेकरूपताम् आलम्बन्ते, यावत् बहिरपि व्यक्तिभेदलक्षणम् अनैक्यं
बहिरेव च तदनुस्यूततारूपाम् एकताम् आलम्बनत्वं नयन्ति, 'गाव' इति हि प्रतिभासे पृथक् च
ता बहिर् व्यक्तयो भान्ति, येन च बहुवचनम्, अनुयायि च आसां भाति वपुः यत एकप्रातिपदि-
कार्थपरामर्शानुगमः, उभयं च तद्बहिरेव 'इमा' इति अङ्गुल्या निर्देशात्, केवलं बाह्यत्वमपि
स्थिते परमार्थप्रकाशान्तर्भावि, इति न तत्र भेदाभेदौ दूषणं—चित्रसंवेदन इव, अनेन द्रव्येऽपि
रक्तरक्तादिविरोधः कृतप्रतिविधानः, आन्तरं तु ऐक्यं सम्बन्धद्वारेण तद्वदेव सर्वत्र, एवम् अवभास-
मानस्य घट इति अवयविद्रव्य ग्राहिका याः कल्पनाः ता न केवलं सम्बन्धवत् अन्तर्बहोरूपतया
हो जाता है और यही दोनों का एकरूप में श्लेष होना कहा जाता है जो कि चिदात्मा में दोनों
की स्थिति हो जाती है पूर्व से प्राप्त प्रतिष्ठित ज्ञान में अच्छी तरह डूब जाने के कारण, भिन्नरूप
में न आभासित होने से परम स्वातन्त्र्य में विश्रान्त हो जाता है और उसी में पुरुष के साथ
निर्भासित होकर एकरूप में रहता है एवं बाहर में तो अनेकरूपों में भासता है, आन्तर की तो
परस्पर सम्बन्धरूपता होने से ऐक्य अवस्था में रहता है, यही सम्बन्ध का स्वरूप है ॥ ४ ॥
जाति और द्रव्य के अवभासों की बाहर में भी एकरूपता रहती है और व्यक्ति के एक
देश भेद से तरह-तरह के विकल्प भेद भी रहते हैं ॥ ५ ॥
जाति का अवभास वस्तु है और अवभासमान होते हुए जाति की ग्रहण करने को
कल्पना होती है, वे कल्पनाएँ केवल सम्बन्ध के जैसे भीतर एकरूपता से और बाहर में
अनेकरूपता से आलम्बन करती हैं, किन्तु बाहर में भी व्यक्ति के भेदरूप होकर ऐक्यरूप
में नहीं रहती और बाहर में भी उससे अनुस्यूत होकर एकता का आलम्बन ले आती हैं
गावः अर्थात् ये गायें हैं इस प्रकार भिन्नरूप से भासित होने पर बाहर में व्यक्तियों के रूपों में
भासती हैं और जिससे बहुवचन का प्रयोग हुआ है और इन्हीं के पीछे इनका एक शरीर भी
भासता है जो कि प्रातिपदिकार्थ का परामर्श करनेवाला होता है और ये दोनों बाहर की ही
वस्तुएँ हैं जिनको अङ्गुलिनिर्देश कर कहा जाता है कि यह ऐसा ही है, बाह्यत्व भी मात्र परमार्थ
प्रकाश के अन्तर्भूत बना रहता है, इस प्रकार उसमें भेद-अभेद का बना रहना चित्र ज्ञान के
समान दोष युक्त नहीं होता, इसी प्रकार द्रव्य में भी रक्त-अरक्तादि का विरोध ठीक बैठ जाता है,
किन्तु भीतर की एकता तो सम्बन्ध के द्वारा उसी प्रकार सर्वत्र बनी हो रहती है, इस प्रकार
अवभासमान घट भी अवयवी द्रव्य है उसमें ग्राहिका बुद्धि की कल्पनाएँ होती हैं, वे केवल
सम्बन्ध के समान नहीं होती, आन्तर और बाह्यरूप से एक एवं अनेक विषय वाली हैं; क्योंकि

अ.-२, आ.-२, का.-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९३
एकानेकविषया यावत् बहिरप्येकं निःसन्धिबन्धरूपत्वेन भिन्नं च अवयवलक्षणैकदेशद्वारेण
स्वीकुर्वते, घट इति हि निःसन्धिबन्धनैकघनात्मा विततरूपश्च भाति इति ॥ ५ ॥
क्रियाविमर्शविषयः कारकाणां समन्वयः ।
अवध्यवधिमद्भावान्वयालम्बा दिगादिधीः ॥ ६ ॥
कारकाणां कर्त्रादिशक्त्याधाराणां द्रव्याणां च योऽन्योन्यं समन्वयो दृश्यते, यथा मातृ-
मेयमानानां मिथः, सोऽन्तर्लीनप्रमात्मकक्रियाविशेषपरामर्शकनिमित्तकः, नहि प्रमापरामर्शम्
अन्तर्वर्तिनं विहाय वस्तुनः साक्षात् अन्वयोऽत्र संवेद्यते, अनन्यत्र भावरूपतानिमित्तता अत्र
विषयार्थः, कारकणक्तीनामपि यः स्वाश्रयैः संबन्धः सोऽपि क्रियापरामर्शनिमित्तकः, द्रव्याणां च
शक्तीनां च क्रियया साकं साक्षात् संबन्धः, इति इयं क्रियैव भगवती एतावद्विजृम्भितं संबन्धम्
आविर्भावयति अस्मादिदं पूर्वं परं दूरे इत्येवं बहिर्भिन्नतया परामृश्यमानयोः भावयोरन्तर्
अभेदपूर्वकं भेदावमर्शमध्यम् अभेदविश्रान्तं च यत् रूपम् आमृश्यते तत् दिग् इत्युच्यते, अत्र हि
तयोः मुखाद्यवयवविशेषपरामर्शदरः तत्संमुखत्वपराङ्मुखत्वादि निश्चयः संयोगसंयुक्तसंयोगाल्प-
तादिपरिग्रहश्च उपयोगी, कालपरामर्शस्य पूर्वपरादिरूपत्वे जन्मस्थित्यल्पतादिविमर्शाश्चिर-
क्षिप्रदिरूपत्वे च, पक्ष्यति पचति अपाक्षीत् इत्यादौ तु संभावितस्य स्फुटस्य स्फुटभूतपूर्वस्य
बाहर में भी ऐक्यरूप से और भिन्न-भिन्न अवयवों के रूपों में एक देश द्वार से जब स्वीकार
करेंगे तब घटरूपी बुद्धि होगी। वही ऐक्यरूप और विस्तृत एकत्व की दृढता से भासती है ॥ ५ ॥
जो क्रिया के विमर्श का विषय है वही कारकों का समन्वय है । अवधि और अवधिमान्
के भाव का अवलम्बन करनेवाली दिशादि की बुद्धि होती है ॥ ६ ॥
कारकों का और कर्तादि शक्ति के आधारभूत द्रव्यों का परस्पर समन्वय देखा जाता है,
जैसे प्रमाता, प्रमेय, प्रमाणों का परस्पर समन्वय होता है, वह भीतर में रहनेवाले प्रमाणरूप क्रिया-
विशेषण का एक परामर्श निमित्तक है, प्रमापरामर्श जो अन्तर्वर्ती है उसे छोड़कर साक्षात् वस्तु
का अन्वय इसमें नहीं ज्ञात होता है अर्थात् अन्तर्वर्ती वस्तु का ही साक्षात् अन्वय होता है, यहाँ
पर भावरूपता एवं अनिमित्तता ही क्रियाविमर्श विषयार्थ माना जाता है, कारक शक्तियों का
भी जो अपने आश्रयों से सम्बन्ध है, वह भी क्रिया परामर्श के निमित्त से होता है और द्रव्यों के
तथा शक्तियों का क्रिया के साथ साक्षात् सम्बन्ध होता है, इस प्रकार यह भगवती क्रिया का
ही सारा का सारा विस्तार है । वह आविर्भूत करती है कि—इससे यह पूर्व है तथा पश्चिम है
एवं दूर-समीपवर्त्ती है । बाहर में भिन्नरूप से परामर्श होनेवाले दो भाव-पदार्थों का भीतर
अभेदपूर्वक भेद अवमर्श के बीच में और अभेद विश्रान्तरूप का जो आमर्शन करता है उसे दिशा
कहा जाता है; क्योंकि इसमें इन दोनों भाव-पदार्थों के मुखादि अवयवविशेष परामर्श का आदर
तथा उसके सन्मुखत्व या पराङ्मुखत्वादि का निश्चय और संयोग संयुक्त के संयोग की अल्पता
का परिग्रहज्ञान उपयोगी होता है । कालपरामर्श का भी पूर्वोत्तरादिरूप से उत्पत्ति और स्थिति
की अल्पता का विचार चिरकाल और शीघ्रकाल के रूप में होता है, पकायेगा, पकाता है और
पका दिया इत्यादि में तो संभावित स्पष्टता का और उस स्पष्टता से पहले होनेवाले अपना
२५

१९४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-७
आत्मीयसंवेदनस्पन्दितप्राणादित्वादिक्रियान्तरस्य फलविशेषस्य च ओदनादेः परामर्श उपयुज्यते,
एवं संख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागप्रभृतिषु संबन्धरूपतैव वाच्या, सर्वथा अयं संक्षेपः, यत्र
पदार्थाभासस्य आत्मविश्रान्त्या सन्तोषमपुष्यतः आभासान्तरपरामर्शविश्रान्तिसाकाङ्क्षतया
स्वरूपनिष्ठा तत्र संबन्धरूपतैव क्रियाशक्तिविजृम्भामयी, तत्रापि भावान्तरापेक्षया संबन्धान्तरमपि
अस्तु, यथा संख्यादौ समवायं मन्यन्ते, न च अनवस्था भवन्ती अपि दोषाय, पूर्वापरकल्पसृष्ट्य-
नवस्थेव, नहि उत्तरसंबन्धसृष्ट्या विना पूर्वसंबन्धावभासे हानिः काचित् येन मूले क्षतिः
शंक्येत ॥ ६ ॥
एवं सकललोकयात्रानुप्राणितकल्पानल्पसंबन्धबन्धुरीभावभावं क्रियाशक्तिविजृम्भात्मकम्
अभिधाय, तस्य स्थैर्योपयोगो पूर्वसूचितो निरूपयितुमाह—
एवमेवार्थसिद्धिः स्यान्मातुरर्थक्रियार्थिनः ।
भेदाभेदवतार्थेन तेन न भ्रान्तिरीदृशी ॥ ७ ॥
इह भावानां न सत्तासंबन्धः, सत्त्वम्—अव्यापकत्वात् अनवस्थावैयर्थ्यादिदोषात्,
आत्मीय संवेदन ज्ञान, स्पन्दन, प्राण इत्यादि से भिन्न-भिन्न क्रियाओं के फलविशेष ओदनादि हैं,
उन सब का परामर्श उपयुक्त ही होता है । इस प्रकार संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग,
विभागादि गुणों में सम्बन्ध रूपता ही कहनी चाहिए, यही संक्षेप में इसका सार है। यहाँ पर
पदार्थ आभास की अपने स्वरूप में विश्रान्ति हो जाने से भली भाँति सन्तोष का अनुभव न
मिलने के कारण दूसरे आभास के परामर्श को जो विश्रान्ति है उसकी आकांक्षा से अपने स्वरूप
में रहता ही उसमें सम्बन्ध रूपता मानी जाती है और वही क्रिया-शक्ति का विलास भी है, उसमें
भी दूसरे आभास की अपेक्षा से दूसरा सम्बन्ध भी भले ही प्रतीत हो, जैसे संख्यादि में समवाय
सम्बन्ध मानते हैं, इस प्रकार अनवस्था का दोष आ भी जाय तो भी कोई दोष नहीं माना
जाता, जैसे पूर्वोत्तरकल्प की सृष्टि में अनवस्था आ जाती है, उत्तर सम्बन्ध की सृष्टि के बिना पूर्व
सम्बन्ध के अवभास में कोई हानि नहीं होती, जिससे कि मूल में क्षति की शंका खड़ी हो ॥ ६ ॥
इस समस्त लोक व्यवहार से अनुप्राणित प्रायः अनन्तर सम्बन्ध का मिश्रणरूप क्रिया-
शक्ति के विचार को कह कर, उसकी स्थिरता एवं उपयोगिता को भी हम पहले कह चुके हैं ।
पुनः उसका निरूपण करने के लिए कहते हैं—
पदार्थक्रिया के अर्थी प्रमाता की ऐसी अर्थसिद्धि होती है । इसी कारण भेद और अभेदवाले
अर्थ के साथ ऐसी भ्रान्ति नहीं खड़ी होती ॥ ७ ॥
यहाँ पर पदार्थ-भावों की सत्ता का सम्बन्ध नहीं बैठता है; क्योंकि अव्यापक होने से तथा
अनवस्था और व्यर्थता इत्यादि दोषों से सत्ता भी नहीं होती और उससे कोई कार्यत्व की सिद्धि
भी नहीं दिखती; क्योंकि उसमें उसका मिश्रण नहीं देखते [ अव्याप्यवृत्ति का नाम सम्बन्ध है
और पदार्थों का सत्ता सम्बन्ध है । वह व्यापक नहीं होता, इसीलिए सत्ता के सम्बन्ध से पूर्व
पदार्थ रहते हुए भी न रहने के ही बराबर होते हैं ? यदि वे नहीं होते हैं तो न रहने के कारण
शशशृङ्ग के सदृश ही है और उसका न रहना ही अव्यापक-भाव कहलाता है, यदि वे रहते हैं
ऐसा मानते हो, तब तो अनवस्थादि दोषों से ग्रस्त हो जायेंगे ]

अ.-२, आ.-२, का.-७] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९५
न अर्थक्रिया—वस्त्वन्तरत्वात्, न तत्कारित्वं—सर्वदा तदावेशादर्शनात्, उक्तं हि—'अर्थ-
क्रियापि सहजा नार्थानाम्·····॥' इति, तत्कारित्वस्य च प्रत्यक्षानुपलम्भात्मकान्वयव्यतिरेकगम्यस्य
अप्रत्यक्षत्वे सतोऽपि अप्रत्यक्षत्वप्राप्तेः न अर्थक्रियाकरणयोग्यत्वम्—तस्य सत्यासत्यके निश्चयकाले
दुरवधानत्वात्, सर्वस्य च अस्य अप्रकाशमानत्वे नरशृङ्गप्रायत्वम्, अर्थक्रियाकारितान्तरपर्येषणे
च अनवस्था, इति प्रकाशमानतैव अनुन्मूल्यमानतयोचित-विमर्शपरिस्यन्दा भावस्य सत्त्वम्,
सा च भेदाभेदवपुषां सम्बन्धादीनामस्ति, इति—निराशङ्कमेव सत्यत्वमेव तेषाम्, अथापि यदि
परोऽनुबन्धीयात्—इह लोकः प्राचुर्येण अर्थक्रियार्थी तत्कारिणि सत्यत्वं व्यवहरति तत् किं
सम्बन्धादीनाम् अस्ति इति, तदस्य हृदयम् आश्वास्यते, यदि न कुप्यसि तत् सर्वत्रैव व्यवहारे
यत्रापि स्फुटा सम्बन्धादिधीः न उदेति एवमेव तत्रापि, इति सम्बन्धादिरूपतया भेदाभेदवान्
योऽर्थः तेनैव अर्थक्रिया, न तु स्वात्ममात्रविश्रान्तेन काचिदपि कदाचिदपि अर्थक्रिया,
तथाहि—सुखेन स्मर्यमाणेन अभिलाषः, इत्यादिक्रमेण सर्वो व्यवहारः सुखाभासश्च योऽनुभूतः स एव
अभिलष्यते न तु अन्योऽननुभूतः, स एव च यदि प्राप्यते तदभिलषितं प्राप्तम् इति तुष्यते यदि च
तत् तदेव र्तार्ह किम् अभिलष्यते—प्राप्तत्वात्, अथ अतदेव, तथापि कथम् अर्थ्यते—अज्ञातत्वात्,
तस्मात् एतत् एवं भवति—यदि तदेव च अतदेव च तदपि च अतदपि च इति, एवं सुखसाधनेषु
इसलिए कहा भी गया है—'अर्थक्रिया भी पदार्थों के साथ नहीं उत्पन्न होती है' और
इसी कारण उसका कार्यत्व प्रत्यक्षरूप से उपलब्ध नहीं होता है किन्तु अन्वय-व्यतिरेक से ज्ञात
होनेवाले पदार्थ के प्रत्यक्ष न होने पर रहते हुए भी उसका अभाव हो जाता है और वह अर्थ-
क्रिया करने के योग्य नहीं रहता; सत्यता और असत्यता के निश्चयकाल में ध्यान न देने के
कारण इन सबों का अप्रकाश हो रहता है। मनुष्य के शृङ्ग के समान और दूसरी अर्थक्रिया के
अन्वेषण में अनवस्था हो जाती है, इसलिए प्रकाशमान रहना एवं उन्मूलित न हो जाना तथा
समुचित विमर्श होते रहना ही पदार्थ को सत्ता मानो जाती है और वह प्रकाशमानता भेद एवं
अभेद शरीरवाले सम्बन्धादिकों की होती है, इस प्रकार उनकी सत्यता निश्चितरूप से हो रहती
है अर्थात् बिना शङ्का की ही सत्यता उनमें रहतो है, फिर भी यदि कोई दूसरा आग्रह करे और
दोष दिखाये—यहाँ पर अधिकतया लोग पदार्थक्रिया के ही अर्थी होते हैं और उस क्रिया के
कर्त्ता में सत्यता का व्यवहार करते हैं तब क्या वह अर्थक्रियाकारित्व सम्बन्धादिकों में रहता
है ? इसलिए दूसरों के हृदय में विश्वास होता है, यदि क्रोध नहीं करते हो तो सब जगह व्यवहार
में जहाँ पर भी सम्बन्ध बुद्धि स्फुटरूप से रहती है वहाँ पर भेद एवं अभेदमय सम्बन्ध के बिना
कोई भी अर्थक्रिया व्यवहारभूमि में नहीं हो सकती, इस प्रकार सम्बन्धादिरूप से भेद और
अभेदवाले जो पदार्थ हैं उसी से अर्थक्रिया होती है अपने में ही रहनेवाले पदार्थ की तो कोई
भो—कभी भी अर्थक्रिया नहीं होती । देखो—सुखपूर्वक स्मरण करने से अभिलाषा होती है
इत्यादि क्रम से समस्त व्यवहार और सुखाभास जो अनुभव में आता है उसी की अभिलाषा की
जाती है किसी अन्य की नहीं, चाहे वह अनुभूत भी क्यों न हो ? और वह यदि मिल जाता है
तब अभिलषित प्राप्त हुआ ऐसा समझ करके सन्तुष्ट हो जाता है, यदि वह वही है, तब फिर क्या
अभिलाषा होगी ? क्योंकि वह तो रहता ही है, यदि वह नहीं है, तो उसकी चाह क्यों करेंगे ?
क्योंकि वह तो अज्ञात है, इसलिए यह ऐसा होता है—यदि वही है और वह नहीं है और वही

१९६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२
वाच्यम् तदुक्तम् आचार्येण 'इष्टार्थितायामिष्टं वा विमृश्येतेष्टकारि वा । न चाप्यदृष्टमिष्टं
द्यौरपोष्टा दृष्टभोगभूः ॥ दृष्टं च सह दृष्टचैव विनष्टमिति कार्थता । द्रष्ट्रैकेन विमृष्टं तत्.........॥'
इत्यादि, एवं च आभासात्मनि अस्मिन् असंवैद्यमपि आभासान्तरं सामान्यसम्बन्धरूपतया
अनुप्रविष्टम्, अन्यथा न कथंचिद्व्यवहारः इति सकलदेशकालदशापुरुषोपयोगी यदि एषः व्यवहारो
न सत्यः तर्हि न अन्यस्य सत्यत्वं विद्मः —इति न अत्र भ्रान्तिः इति भ्रमितव्यम् । इति शिवम्
॥ ७ ॥ आदितः ॥ १०४ ॥
इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवपादविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीमदाचार्याभिनवगुप्त-
पादकृतविमर्शिन्याख्यटीकोपेतायां क्रियाधिकारे भेदाभेदविमर्शनं
नाम द्वितीयमाह्निकम् ॥ २ ॥
अथ द्वितीये क्रियाधिकारे मानतत्फलमेयनिरूपणाख्यं
तृतीयमाह्निकम्
प्रमाणानि प्रमावेशे स्वबलाक्रमणक्रमात् ।
यस्य वक्रावलोकीनि प्रमेये तं स्तुमः शिवम् ॥ १ ॥
है और नहीं भी है इत्यादि भाव बनते हैं, ऐसा सुख के साधनों में भी करना होगा। इसलिए
आचार्य ने इसका प्रतिपादन भी किया है—
अभीष्ट पदार्थ को चाह में इष्ट का विचार करें अथवा इष्टकारी जो सुख साधन है उसका
विचार करें और इसमें अदृष्टरूप जो स्वर्गादि है उसकी इच्छा नहीं होती है, दृष्ट तो दृष्टमात्र
से ओझल हो जाता है इसी कारण उसकी चाह क्यों होगी ? इसलिए एक द्रष्टा से ही वह विमृष्ट
हुआ करता है..। इत्यादि कहा है ।
इस प्रकार आभासरूप इस भाव-समूह में सूक्ष्मता के कारण ठीक-ठीक उसका ज्ञान न होने
से दूसरा आभास भी सामान्य सम्बन्धरूप से उसमें प्रविष्ट रहता है, अन्यथा किसी प्रकार भी
व्यवहार नहीं हो पायेगा । इस प्रकार सकल देश, काल, दशा पुरुष के उपयोगी यह व्यवहार सत्य
नहीं है तो फिर अन्य को सत्यता को हम नहीं जानते हैं—इस प्रकार इसमें कोई भ्रान्ति नहीं
उठती है और न भ्रम में पड़ना ही चाहिए ॥ ७ ॥
द्वितीय आह्निक समाप्त
जिस शिव के मुखावलोकन करके सभी प्रमाण प्रमा की प्राप्ति के लिए प्रमेय में अपने बल
के आक्रमण क्रम से प्रवृत्त होते हैं, उस शिव को हम स्तुति करते हैं ॥ १ ॥
१. उस महेश्वर का यह स्वरूप स्वतः ही सिद्ध है। 'आदि सिद्धः कर्ता ज्ञाता चैक एव महेश्वरः । ऐसा जो
महेश्वर के विषय में बताया गया है कि एक महेश्वर ही कर्ता और ज्ञाता है ।
प्रमाणसिद्धं यत्किञ्चित्सत्सत्यमिति कथ्यते ।
प्रमाणाविषयं यत्तु तत्खपुष्पेण संमतम् ॥
जो कुछ प्रमाण के द्वारा सिद्ध होता है वह सत्य कहलाता है और जो प्रमाणभूत नहीं है अर्थात् प्रमाण
का अविषय है वह तो आकाश कुसुम के समान है। इत्यादि युक्ति की संभावना करके अन्य लोग कहते

अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९७
एवं क्रियाशक्तिविस्फारनिरूपणप्रसङ्गेन सम्बन्धपुरःसरं सामान्यादीनां तत्त्वम् उपपादि-
तम्, अधुना तु सम्बन्धतत्त्वमेव एकघनतया व्युत्पादनीयम् । तच्च द्विविधमेव परमार्थतो—
ज्ञाप्यज्ञापकता कार्यकारणता च, तत्र पूर्वस्यां मानमेयभावादिचिन्तास्पदभूतायां सर्वम् उक्तचरं
इस प्रकार क्रियाशक्ति का ही यह सारा का सारा विस्तार-स्फुरित होता है; क्रिया-शक्ति के
निरूपणके प्रसंग से सामान्यादिकों के सम्बन्ध उपक्रम का पारमार्थिक तत्त्व दिखा दिया गया, अब
तो सम्बन्ध तत्त्व को ही मुख्यरूप से प्रतिपादन करना है । परमार्थतः सम्बन्ध दो प्रकार के हैं ।
एक तो ज्ञाप्य-ज्ञापकभाव है दूसरा कार्य-कारणभाव वाला है, [ ज्ञाप्य-ज्ञापक सम्बन्ध तो जड
और चेतन इन दोनों में रहता है एवं कार्य-कारणरूप सम्बन्ध मात्र जड में ही रहता है । ] प्रमाण,
हैं कि किस प्रमाण से उस महेश्वर का प्रमाणित होना सिद्ध होता है, प्रस्तुत प्रकरण में ईश्वरता की
सिद्धि के लिए कोई भी प्रमाण उपयुक्त नहीं दिखायी पड़ता है और न तो प्राप्त ही हो रहा है। इस
आशय को लेकर कहते हैं कि—
प्रमाणान्यपि वस्तूनां जीवितं यानि तन्वते ।
तेषामपि परो जीवः स एव परमेश्वरः ॥
उन वस्तुओं का प्रमाण ही जीवन है कि जिसका शास्त्रकार लोग विस्तार करते हैं प्रमाणों से भी
बढ कर जीव होता है और वही परमेश्वर है। इस प्रकार आगम की युक्ति से आह्निक के अर्थ का आशय
आक्षेप किया जाता है; प्रत्यक्षादि प्रमाणों की प्रमा जीवित होकर उसमें रह कर अपने बल के आक्रमण
के अधीन रहती है जिसका मुख परिकर वर्ग अधिकार समर्पणार्थ, जैसे राजा के मुख की ओर देखते रहते
हैं उसी प्रकार प्रमेय विषयमें भी प्रत्यक्षादि प्रमाण को देखते हैं, उस शिव की हम स्तुति करते हैं ।
१. इत्थं च अत्र मुख्यया वृत्त्या प्रस्तुतेश्वरसत्तासिद्धतारूपतया प्रमाणार्थत्वासंभवेऽपि ।
अर्थवत्त्वं न चेज्जातं मुख्यैर्यस्य प्रयोजनैः ।
तस्यानुषङ्गिकैश्वाशा कुशकाशावलम्बनम् ॥
इस प्रकार मुख्य वृत्ति से प्रस्तुत प्रकरण में ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि में प्रमाण का अर्थित्व भाव न
रहने पर भी मुख्य प्रयोजन से यदि अर्थतत्त्व जिसका न होता हो तो भी उसका आनुषङ्गिकों में आशा
रखना कुश के सहारे सागर पार करने के समान है ।
नैयायिकों द्वारा दी गई उक्ति से प्रमा का यथार्थ लक्षण करना अयुक्त ही सिद्ध होगा, फिर
भी यदि कोई कैसा प्रमाण या उसका फल अनुपपत्ति या अनुप्रयोग से महेश्वरता की सिद्धि के विषय में
बतलायेगा, उसके विषय में प्रमाण और उसके फल के कथन काल में ही प्रमाणादि की सम्बन्धरूपता
घोषित करने के लिए क्रिया-शक्ति ऐसा अवतरण देकर कहते है—
अर्थवत्त्वं न चेज्जातं मुख्यैर्यस्य प्रयोजनैः ।
तस्यापि कथनं युक्तमानुषङ्गिकसिद्धये ॥
मुख्य प्रयोजन से यदि अर्थतत्त्व होता हो, तो भी उसका कथन आनुषङ्गिक की सिद्धि के लिए
युक्त ही है ।
२. ज्ञाप्य-ज्ञापकभाव सम्बन्ध जड और चेतन में रहता है एवं कार्य-कारणभाव सम्बन्ध मात्र जड में ही
रहता है ।

१९८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२
वक्ष्यमाणं च आयत्तं—प्रमाणाधीना वस्तुसिद्धिः इति तत्र तत्र प्रसिद्धेः, एवं च प्रकृतसमर्थनीय-
वस्तूपयोगितया स्वयं च सम्बन्धस्वरूपतया अवश्यविचार्य्या मानादिस्थितिं निरूपयितुम् 'इद-
मेतादृक् ................' इत्यावि, '............ईशादिव्यवहारः प्रवर्त्यते ॥' इत्यन्तं श्लोकसप्तदशकेन
आह्निकान्तरमारभ्यते । तत्र श्लोकद्वयेन प्रमाणतत्फलस्वरूपं ततः प्रमेयस्य स्वरूपं निरूपयितुं
प्रत्याभासं प्रमाणस्य व्यापारो न तु स्वलक्षणात्मकवस्त्वेकनिष्ठतानियमेन—इति दर्शयितुं प्रत्यव-
मर्शबलेन आभासव्यवस्था, इति दशभिः श्लोकैः उच्यते, तत्प्रसंगात् मिथ्याज्ञानस्वरूपं श्लोकेन,
प्रमेयस्वरूपसिद्धिश्च प्रकृतमपि ईश्वरवादम् अवलम्ब्य घटते—इति श्लोकेन उपदर्श्यते, स च एष
सर्वः प्रमाणतत्फलप्रमेयादिप्रविभागः सति प्रमातरि प्रदर्शितरूपे ततो न तस्य प्रमेयंता येन अत्रापि
प्रमाणव्यापारसम्भवः केवलं व्यवहारमात्रसिद्धिफलं प्रमाणम् अत्र, इति श्लोकत्रयेण—इति
तात्पर्यार्थः । यदुक्तम् 'क्रियासम्बन्धादिबुद्धयो न भ्रान्तिस्वभावाः' इति, तदेव निर्णेतुं प्रमाण-
तत्फलस्वरूपं तावत् प्रसिद्धमनुवदति—
प्रमेयभाव आदि का विचार-विमर्श करते समय पूर्व में ही सब कुछ दिखा दिया है एवं आगे भी
इस पर विचार प्रकट किया जायेगा । तथा प्रमाण के अधीन ही वस्तु की सिद्धि होती है, यह तो
सर्वत्र प्रसिद्ध ही है ।
प्रकृत विषय में समर्थन करने कारण तथा उस समर्थनीय वस्तु के उपयोगी होने से, प्रत्यक्षादि
प्रमाणों की स्थिति अवश्य विचारणीय है। इसका निरूपण करने के लिए कहते हैं-'इदमेतादृक्...।'
इत्यादि से लेकर'...'ईशादिव्यवहारः प्रवर्त्यते ।।' यहाँ तक, सत्रह श्लोकों से दूसरा आह्निक प्रारम्भ
किया जाता है। दो श्लोकों से प्रमाण और उसके प्रमाणरूप फल का स्वरूप, इसके बाद प्रमेय के
स्वरूप का निरूपण करने के लिए प्रत्याभास प्रमाण का व्यापार नहीं होता, किन्तु स्वरूपात्मक वस्तु
पदार्थ की विश्रान्ति होने से ही है, प्रत्यवमर्श [विमर्श] के बल से आभास व्यवस्था होती है—ऐसा
दश श्लोकों से दिखाया जायेगा—उसके प्रसंग को लेकर मिथ्या-ज्ञान के स्वरूप को एक श्लोक से
से बतायेंगे और प्रमेय के स्वरूप की सिद्धि प्रकृत एक ईश्वरवाद का अवलम्बन करके ही घटित
होती है, यह एक श्लोक से दिखाया जायेगा और वही यह सब प्रदर्शित प्रमाता के रहने पर ही
प्रमाण, प्रमा और प्रमेयादि है, इसलिए प्रमाता की प्रमेयता नहीं होती है जिससे कि भगवान् में भी
प्रमाण का व्यापार सम्भव हो सके; भगवान् में तो केवल व्यवहार की सिद्धिके लिए प्रमाण होता है
तीन श्लोकों से तात्पर्यार्थ दिखायेंगे । 'क्रियासम्बन्धादिबुद्धयो न भ्रान्तिस्वभावाः' अर्थात् क्रिया
सम्बन्ध आदि की बुद्धियाँ भ्रान्ति स्वभाववाली नहीं होती हैं उसे दिखाने के वास्ते प्रमाण और
उसका जो प्रमाणरूप फल है उसे कहते हैं [ प्रसिद्ध वस्तु को फिर से संस्काररूप से कहने का नाम
अनुवाद कहलाता है । ]
१. जाति, व्यक्ति, लिङ्ग, संख्यादि में उपयोगी होने के कारण परम्परा से ईश्वर प्रत्यभिज्ञा में भी
इसका उपयोग सिद्ध होता है, आनुषङ्गिक जाति आदि पदार्थ के व्यवस्थापन करने में और ईश्वर के
व्यवहार साधन में भी इसका उपयोग होता है—इसलिए इसमें लक्षण के निर्माण की उपेक्षा नहीं की
जाती है ।

अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १९९
इदमेतादृगित्थं यद्वशाद्व्यवतिष्ठते ।
वस्तु प्रमाणं तत्सोऽपि स्वाभासोऽभिनवोदयः ॥ १ ॥
सोऽन्तस्तथाविमर्शात्मा देशकालाद्यभेदिनि ।
एकाभिधानविषये मितिर्वस्तुन्यबाधिता ॥ २ ॥
यस्य वशात्—सामर्थ्यात्, वस्तु 'नीलसुखादिकं' व्यवतिष्ठते—नियतां प्रकाशमर्यादां न
अतिवर्तते 'इदमिति' स्वरूपेण 'एतादृक्' इति च विशेषणभूतनित्यानित्यत्वादिधर्मान्तरयोगेन,
तल्लोके 'प्रमाणम्' इति स्थितम्, तच्च विवेचकेन विचार्यम्—इह वस्तुनः स्वरूपं स्वात्मवशेनैव
न तावत् व्यवतिष्ठते—जडत्वात्, मम नीलं प्रकाशते चैत्रस्य वेति च तदा कथमवभासः तस्मात्
अन्यवशेन व्यवतिष्ठते, अन्योऽपि चेत् जडः तत् अन्धेन अन्धस्य हस्तादानं, तस्मात् अन्योऽसौ
संविदात्मा, सोऽपि यदि शुद्धो निर्विशेषो न तर्हि नीलस्यैव व्यवस्थाहेतुः भवेत्—पीतादावपि
तस्य तथात्वात्, तदसौ नीलोपरक्तो नीलोन्मुखो नीलप्रकाशस्वभाव इत्याभासः सन् नीलस्य
व्यवस्थापकः, तत्प्रकाशस्वभावतैव हि तद्व्यवस्थापकता, स च नीलस्य प्रकाशो यदि अव्यतिरिक्तस्य,
तत् पीतस्यापि स्यात्—प्रकाशात्मकचित्त्वतत्तादात्म्याविशेषात्, तेन व्यतिरिक्तीकृतस्य नीलस्य
स प्रकाशः नीलं च इत्थम् ततो व्यतिरेकाभासयोग्यं यदि सोऽपि आभासो महतः प्रकाशात् व्यति-
यह ऐसा इत्यादि जिसके कारण व्यवस्थित किया जाता है । वही पदार्थ प्रमाणभूत है और
वह भी अपने आप भासित होता है तथा उसका नवीन उदय होता है ॥ १ ॥
वह अन्तर में उसी प्रकार विमर्शरूप से प्रकाशित रहता है, देश-कालादि से अभेद होने
पर एकतत्त्व के कथन से विषय में वस्तु का अबाधित ज्ञान होता है ॥ २ ॥
जिसके सामर्थ्य से, 'नील सुखादि' वस्तु व्यवस्थित रहती है। व्यवस्थित रहने का अर्थ
यह है कि निश्चित प्रकाश मर्यादा को नहीं छोड़ना, 'इदमिति' इस रूप से और 'एतादृक्' ऐसा
विशेषणभूत नित्य-अनित्यादि दूसरे धर्म के योग से, इस प्रकार का लोक में प्रमाण माना जाता
है, यही सत्य है और इस विषय में प्रबुद्ध पुरुषो का विचार-विमर्श करना चाहिए। जब तक वे
विचार करते हैं तब तक यही सिद्ध होता है कि वस्तु का स्वरूप अपने स्वरूप में प्रकाशित नहीं
रहता; क्योंकि वस्तु का स्वरूप जड होता है, मुझे नील का प्रकाश होता है व चैत्र का प्रकाश
होता हो तो भी वह दूसरे के द्वारा ही प्रकाशित होता है, जिससे वह प्रकाशित होता है उसे
चेतन ही मानना चाहिए, यदि वह दूसरा भी जड है तो एक अन्धा दूसरे अन्धे को हाथ पकड़
कर ले जाता है यही कहना होगा, इसलिए इसे संविद्रूप ही मानो, वह भी शुद्ध नहीं है; क्योंकि
शुद्ध निर्विशेष वेदान्तियों का ब्रह्म माना जायेगा, जिससे नील की व्यवस्था का कारण नहीं बनता;
क्योंकि पीतादि का भी उसी प्रकार प्रकाश वह करता है, यदि वह शुद्ध रहता तो, नील में ही
रह जाता और पीत का नहीं प्रकाश कर सकता, किन्तु करता रहता है। इसलिए वह यहाँ
१. नील-पदार्थ बाह्य वस्तु है और सुख आन्तरिक वस्तु है ।
२. वस्तु के स्वरूप और विशेषण में व्यवस्था करनेवाले का नाम प्रमाण है ।

२०० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२
रिच्येत—महाप्रकाशाव्यतिरेके तस्य ततो नीलादेः व्यतिरेकाभावप्रसंगात्, महाप्रकाशाच्च न
व्यतिरेकं किंचिदपि सहते, इति नूनं महाप्रकाशेन संकोच आत्मनि निर्भासनीयः, संविदो वस्तूनां
च अन्योन्यसंकोचनप्राणो नञर्थरूपोऽसौ शून्य इत्युच्यते, संकोचावभास एव च मायीयप्रमातुः
उत्थानम्, अत एकया सृष्टिशक्त्या प्रमातृप्रमाणप्रमेयोल्लासः परमार्थतः, तेन—शून्यधीप्राण-
देहाद्युपाध्याश्रयस्वीकारात्मकसंकोचपरिग्रहसंकुचितात् मायाप्रमातुः अनन्तकालान्तर्मुखसंवेदन-
रूपात् स प्रमाणाभिमत आभासो यावत् प्रमेयोन्मुखतास्वभावः तावत् प्रमेयस्य देशकालाकाराभास-
संभेदवत्त्वात् सोऽपि तथैव क्षणे क्षणे अन्यान्याभासरूपः स्रष्टव्यः, तदुक्तम् ‘अभिनवोदयः’ इति—
अभिनवः — क्षणवासपरम्लान्यापि न कलङ्कितः, तेन ‘नवनवोदय’ इत्युक्तं भवति, सोऽपि³ यदि
तथाभूतो मायाप्रमातृलग्नो न भवेत् ततो मम नीलाक्भासो यस्य तस्यैव पीताभासो मम इति न
स्यात्, अस्ति च इदं स्वसंवेदनं—यत् सर्वत्र अबाध्यमानम्, इत्येवं स्वत्वेन आभासमानो य
आभासो—नवनवप्रमेयोन्मुख्यात् नवनवोदयः स प्रमाणं यतः प्रमां विधत्ते, कासौ प्रमा ? फल-
प्रकाश है—ऐसा मानना पड़ेगा, उसके स्वरूप में सङ्कोच नहीं करना होगा, यदि वह महा प्रकाश
से भिन्न होता तो नीलादि से भी भिन्न हो जाता किन्तु वह कभी भी महा प्रकाश से भिन्न रूप में
नहीं आता है, इसीलिए उसे अपने में, अवश्य महा प्रकाश से सङ्कुचित करना पड़ेगा संवित्
और वस्तुओं में परस्पर सङ्कुचित होने के कारण न अर्थ स्वरूप शून्य ही कहा जाता है, इसीलिए
मायीय प्रमाता से सङ्कोच का अवभास होना ही उत्थान है, अतः एक ही सृष्टि-शक्ति के द्वारा
प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय का उल्लास परमार्थतः होता है, इसीलिए शून्यप्रमाता, बुद्धिप्रमाता,
प्राणप्रमाता और देहादिप्रमाता की उपाधि के आश्रय को स्वीकार कर, परिग्रह से सङ्कुचित होने
से मायाप्रमाता का अनन्तकाल तक अन्तर्मुख संवेदन होने से, जब तक वह प्रमेय उन्मुख स्वभाव
देश, काल और आकार से उपरक होने के कारण वह भी क्षण-क्षण में दूसरा-दूसरा आभासरूप
हुआ करता है, इसीसे ‘अभिनवोदयः’ नया-नया हुआ करता है ऐसा कहा जाता है; किसी एक
क्षण में आबद्ध नहीं रहता, इसी से वह क्षणमात्र भी मलिनता से युक्त नहीं रहता, अत एव
‘नवनवोदय’ ऐसा इसे कहा गया है।
यदि वह भी मायीय प्रमाता में संलग्न नहीं होता तो नीलाभास जैसा मुझे हुआ वैसा मुझे
ही पीताभास हुआ, यह नहीं कह सकता, किन्तु ऐसा स्वसंवेदन होता है और सर्वत्र अबाध्यरूप
से रहता भी है, इसप्रकार अपने रूप से आभासमान माया प्रमाता में नील-पीतादिरूप से नये-नये
१. आभास के महाप्रकाश से नीलादि पदार्थ में व्यतिरेक अभाव प्रसंग आ जायेगा।
२. क्योंकि ज्ञान ही सब काल में अनुभव-करनेवाला प्रमा हो जाता है, यद्यपि माया-शक्ति से व्याकुल कर देने
के कारण उसका प्रमा मात्र प्रतिभास होता है, उसका प्रतिभास सांसारिक जीवों के लिए अभेदपूर्वक
सिद्ध नहीं कर सकता तथापि सम्बन्धरूप से सिद्ध ही है; क्योंकि ऐसा मुझे भासित होता है, इस विमर्श
से एवं इसमें तो स्वसंवेदन ज्ञान ही प्रमाण माना जाता है।
३. यद्यपि प्रतिभास ज्ञान स्वभाववाला होता है तथापि उसीका माया-शक्ति वशात् मायीय प्रमाता के प्रति-
भासमान विषय वस्तु विच्छेदरूप होकर पृथग्रूप में व्यवहृत नहीं होती है, वैसे ही भिन्न-भिन्न वस्तुओं में
होनेवाले उन-उन प्रमाताओं से चित्तत्त्व में व्यापकत्व इत्यादि विशेषणों का व्यवहार होता है, वस्तु
स्वयं अपने स्वरूप से नहीं भासित होती है—इसलिए इसे प्रमाणरूप नहीं माना जाता है।

अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २०१
स्वभावा इति चेत्, आह—स एव बोधरूप आभासो मितिः प्रमाणफलम् इति सम्बन्धः ।
ननु एवं पर्यायत्वं स्यात् भवेत् न तु फलस्वरूपम्, आह—बाह्योन्मुखतया प्रकाशरूपतया
तत्र तत् प्रमाणं, या तु तस्यैव अन्तर्मुखात्मा विमर्शरूपता प्राक् उपपादिता तत्स्वभावेन केवलं
विषयदशासंकुचितेन स एव बोधः फलं, यथा हि 'यः शूरोऽहं स एव विजयी' इति एकनिष्ठे शूर-
त्वविजयत्वे विवेकवता हेतुफलभावेन व्यवस्थाप्येते, यतो हि 'अहं शूरः ततो विजयी' इत्येवं,
यतो नीलप्रकाशः ततो 'नीलमिदम्' इति परामर्श इति एकरूपत्वेऽपि हेतुफलभावः, यथोक्तं
'तद्वशात्तद्व्यवस्थानात्........'४ इति । किं च इह व्यापाररूपमेव फलं, व्यापारश्च व्याप्रीयमाणात्
व्यापार्यमाणात् वा अनन्याकार एव सिद्धः, इति—अभेदः प्रमाणफलयोः, विमर्शबलेन च यतः
प्रमेयों के उन्मुख होते रहने के कारण नये-नये वे प्रमाण हैं, जिस से कि प्रमा होती है। वह कैसी
प्रमा है ? यदि फल स्वभाववाली प्रमा मानी जाय, तो इस पर कहते हैं कि वही बोधरूप आभास
ही प्रमा है—जो कि प्रमाण का फल मानी जाती है।
अब इस प्रकार प्रश्न करते हैं कि प्रमा और फलस्वभाव इन दोनों को पर्यायत्व
( अनर्थान्तरत्व ) माना जाये, वह फलस्वरूप नहीं बन सकता; क्योंकि दूसरा अनर्थ हो जायेगा,
इसका उत्तर देते हैं—बाह्यरूप से उन्मुख होने के कारण प्रकाशरूप होने से वह वहाँ पर उस
आभास में प्रमाण माना जाता है; जिसे हम कह चुके हैं, वही अन्तर्मुख होकर विमर्शरूप होने
से वही बोध प्रमा और फल कहा जाता है, जैसे 'जो मैं शूरवीर था—वही मैं विजयी हूँ, इस
प्रकार एक में ही शूरत्व और विजयत्व को विवेकी पुरुष हेतु एवं फल इन दोनों में रखते हैं;
क्योंकि मैं शूरवीर था तभी मैं विजयी हुआ, जब कि नील प्रकाश यह है इसीसे 'नीलमिदम्' यह
नील है ऐसा प्रकाशित होना है तब तो फिर नील ही है, एक ही आधार में हेतु और फल
( प्रमाण एवं प्रमा ) ये दोनों रह गये, जैसे कहा जाता है कि [ तद्वशात्तद्व्यवस्थानात्...... ]
प्रकाश विमर्श के द्वारा ही ..... इस प्रकार यहाँ पर व्यापाररूप ही फल है और व्यापार कर्ता
तथा करण से भिन्न नहीं सिद्ध होता, वह अभेद प्रमाण और फल का ही मानना चाहिए, विमर्श
१. माया प्रमाता का अनन्तकाल पर्यन्त अन्तर्मुख संवेदन-ज्ञानरूप से आभास है वह प्रमेय की ओर उन्मुख
स्वभाववाला रहता है इसी से देश, काल और आकार में आभासों का भेद हो जाने के कारण भिन्न-भिन्न
रूपों में नया-नया सा अभ्युदय होता है, वही अन्तर्मुख स्वभाव कहलाता है इसलिए प्रमेय की उन्मुखता से
रहित होने के कारण देश, काल एवं आकार के भेद का अभाव से बोधरूप नया अभ्युदय नहीं होता है ?
२. समान अर्थक है ।
३. जैसे दुग्ध और जल आपस में मिल जाने पर किस भाग में दुग्ध है और किस अंश में जल है । वैसे ही
सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर भी हेतु और फल में भेद का ज्ञान नहीं हो पाता है ।
४. वाचक से अवच्छिन्न वाच्य का प्रतिभास ऐसी बुद्धियों में होता है, वही यह शब्दविशिष्ट अर्थ के
प्रतिभास से शब्द जीव कहलाता है, शब्द के अनुसंधान से रहित कुछ भी ज्ञान नहीं देखा
जाता—अनुल्लिखित शब्दवाले ज्ञानों में भी सामान्यतः शब्द का कुछ न कुछ उल्लेख रहता ही हैं;
क्योंकि उल्लेख के बिना प्रकाशात्मक प्रवृत्ति का उदय नहीं होता । इस विषय में भर्तृहरि ने कहा है कि
न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन गृह्यते ॥
२६

२०२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२
प्रमाणं विमर्शश्च शब्दजीवितः शब्दैश्च आभासान्तरैः देशकालादिरूपैरनामृष्टे एकत्रैव आभासमात्रे
प्रवर्तते—घट इति लोहित इति, ततो देशकालाभासयोः स्वलक्षणत्वार्पणप्रवणयोः अनामिश्रणात्
सामान्यीयमाने आभासे प्रमाणं प्रवर्तते, 'अयम्' इत्यपि हि अवभास आभासान्तरानामित्रे पुरोव-
स्थितावभासमात्रे, इति उक्तं श्रीमदाचार्यपादैरेव—'नियतेऽप्ययमित्येव परामर्शः पुरःस्थिते ।
सर्वभावगतेदन्तासामान्येनैव जायते ।।' इति, तत एव आभासमात्रं वस्तु, स्वलक्षणं तु तदाभास-
के बल से प्रमाण और विमर्श शब्द प्रमाणित होता है और शब्द भी भिन्न-भिन्न आभासों से देश-
कालादि के द्वारा अनवभासित होकर एक आभास में ही केवल स्थिर रहता है—जैसे घट में
लालिमा का आभास, इसलिए अपने स्वरूप को देनेवाले देश-काल के आभास का मिश्रण न होने
से सामान्य आभास ही प्रमाण माना जाता है। 'अयम्' यह आभास दूसरे आभास से न मिला
हुआ विद्यमान हो आभास है, जिसको कि आचार्यपाद ने कहा है—
निश्चित सामने स्थित पदार्थ में जो परामर्श है वह सब भावों में रहनेवाले सामान्य
इदन्ता भास से उत्पन्न होता है।
सामान्यरूप से प्रमाण की स्थिति होने से ही आभासमात्र वस्तु का धर्म होता है, स्वलक्षण
सभी लौकिक ज्ञान शब्द के बिना बोध के विषय नहीं हो सकते हैं। सब ज्ञान शब्द से अनुगत
होकर ही गृहीत होते हैं। अतः विमर्श ही फल है उसके सामर्थ्य से ज्ञान का उपाय प्रमाण माना जाता है।
१. जैसे पुरुष है अथवा घट है इस निरतिशय ज्ञान उत्पादन में मात्र उतनी ही विषय की प्रत्यक्षता रहती है,
उसमें ज्ञान का प्रकाश नहीं होता है, ज्ञान का ग्रहण न होने पर भी ज्ञान में तो केवल विषय ही प्रति-
भासित होता है, वैसे ही दिशा, काल इत्यादि विशिष्ट अतिशय ज्ञान के उत्पादन में भी जानना चाहिए।
पूर्वापरचिरक्षिप्रक्रमाद्यवगमेष्वपि ।
दिक्कालादि विशिष्टोऽर्थः स्फुरत्यतिशयात्मकः ॥
प्रत्यक्षं किं स कालादिः प्रतीतिं पृच्छ किं मया ।
गृह्यते तद्विशिष्टोऽर्थः स च नोत्यद्भुतं महत् ॥
एतेन समवायेऽपि प्रत्यक्षत्वं प्रकाशितम् ।
इहेति तन्तुसंबद्धपटप्रत्ययदर्शनात् ॥
पूर्वोत्तर, शीघ्र एवं चिरकाल इत्यादि क्रम का ज्ञान होने पर भी अतिशयात्मक दिशा-कालादि
से युक्त अर्थ स्फुरित होता है। क्या वह कालादि प्रत्यक्ष होते हैं; क्या हम लोग ग्रहण करते हैं? नहीं
ग्रहण होते हैं ? यही बड़ी विचित्रता है। इससे समवाय में भी प्रत्यक्षत्व प्रकाशित हो जाता है; क्योंकि
'तन्तुषु पटः' इसमें तन्तु से सम्बन्ध रखनेवाले पर का ज्ञान देखा जाता है।
२. केवल विशेष संनिवेश रूप ही घट शब्द का वाच्य होता है, 'एष' ऐसा कहने पर तो देश का आभास
होने लगता है, 'इदानीं' इससे काल का अवभास दिखाई देने लगता है, 'मृन्मय' इस कथन में विशिष्ट
स्वभाव झलकता है, इस प्रकार भिन्न-भिन्न वाचकों से उपलक्षित होता हुआ उस-उसमें भिन्न-भिन्न अभि-
संधान से युक्त होकर भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार वालों की परस्पर निरपेक्ष भिन्न-भिन्न वृत्तियाँ होती हैं।
३. आभास मात्र वस्तु है—ऐसा सिद्धान्ती का कहना है, अब स्वलक्षण किसको कहोगे ? इसका समाधान
करते हैं—आभास सामानाधिकरण्य रूप से पाँच प्रकार के होते हैं। जैसे जाति, गुण, क्रिया, नाम और
द्रव्य भेद से और वे कल्पनाएँ कहीं अभेद रहने पर भी भेद से युक्त नहीं होती हैं और कहीं अभेद

अ.-२, आ.-३, का.-१-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७३
सामानाधिकरण्याभासरूपम् आभासान्तरम् एकम् अन्यदेव, तत्रे च पृथगेव च प्रमाणं, तत्परं
तो उन आभासों का सामानाधिकरण्यरूप आभास हो होता है । दूसरा आभास तो दूसरा ही कहा
जायेगा और वहाँ पर प्रमाण भी भिन्न ही माना जायेगा, मिले हुए आभासों में गृहीत को ग्रहण
में भी भेद से कल्पना कही जाती है, इनमें सामानाधिकरण्य दिखाते हैं, जैसे-
जाति जातिमतोर्भेदो न कश्चित्परमार्थतः ।
भेदारोपणरूपा च जायते भेदकल्पना ॥
वस्तुतः जाति और जातिवान् में कोई भेद नहीं होता है, इन दोनों में जो भेद की प्रतीति हो
रही है, वह तो कल्पना मात्र ही है अविद्यमान भेद का आरोप किया गया है।
गौ और गोत्व में कोई भेद नहीं हैं, इसलिए अभेद कल्पना होती है-
एतया सदृशन्याया मन्तव्या गुणकल्पना ।
तत्राप्यभिन्नयोर्भेदः कल्प्यते गुणतद्वतोः ॥
इस प्रकार गुण और गुणी में भी कोई भेद नहीं है, गुण और गुणी के विषय में भी भेद की
कल्पना मात्र रहती है, परमार्थतः गुण और गुणी अभिन्न ही है।
भेदारोपणरूपैव गुणकर्मवत्कल्पना ।
तत्स्वरूपातिरिक्ता हि न क्रिया नाम काचन ॥
यही बात क्रिया और क्रियावान् के विषय में भी घटती है। जैसे गुण और गुणी में
अविद्यमान् भेद का आरोप मात्र है, वैसे क्रिया और क्रियावान् के स्वरूप से अतिरिक्त क्रिया नाम की
कोई वस्तु ही नहीं है।
इन अभिन्न वस्तुओं में भेद का भ्रम मात्र होता है। जैसे कहीं-कहीं पर भिन्न-भिन्न वस्तुओं
में अभेद का भ्रम होता है। कहाँ पर ? इसके समाधान में उत्तर देते हैं कि नाम और नामी [ संज्ञा
एवं संज्ञी ] में, ये दोनों कभी एक साथ नहीं रह सकते हैं, तथापि इनकी एकत्वरूप से प्रतीति देखने में
आती है। कहाँ ? देखिए-
एवं दण्ड्यमित्यादिर्मन्तव्या द्रव्यकल्पना । सामानाधिकरण्येन भेदितोग्रहणात्तयोः ॥
दण्डी अयम्, देवदत्त अयम्, अर्थात् यह दण्डी है एवं यह देवदत्त है इत्यादि स्थलों में नाम
एवं नामी का अभेद दिखायी देता है तभी तो दोनों का सामानाधिकरण्य स्पष्ट दीख पड़ रहा है।
देवदत्त तो नाम शब्द मात्र है 'अयम्' यह नामी-पिण्ड है, फिर दोनों में अभेद कैसे ? तथापि
दिखायी दे रहा है।
१. उसमें भी प्रमाण भिन्न ही रहता है-ऐसा कहना युक्ति युक्त नहीं बैठता है-इन दोनों के व्यवहार की
प्रतीति कौन छिपा सकता है ? इस विषय में कहते हैं-
जातिर्जातिमतो भिन्ना गुणी गुणगणात्पृथक् ।
तथैव तत्प्रतीतेश्चाभासत्वं बाधवर्जितम् ॥
जाति जातिमान् से भिन्न होती है, एवं गुणी गुण समूह से भिन्न होता है; क्योंकि भिन्न रूप
से प्रतीति देखी जाती है इसलिए यह प्रतीति मात्र भ्रममूलक है, भ्रम का तो कभी न कभी बाध हो
जाता है, किन्तु इसका बाधक भी नहीं होता।
द्रव्य और नाम की भिन्नता ही दिखायी देती है; यह देवदत्त है इसलिए देवदत्त का अर्थ नहीं

२०४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१-२
मिश्रकारेषु तेषु आभासेषु गृहीतग्राहि न प्रमाणम्, इति अग्रे भविष्यति, अध्यवसायस्य अस्मदुक्त-
नयेन शब्दप्राणितस्य प्रत्याभासविश्रान्तौ तदपेक्षमपि प्रामाण्यं वदता प्रत्याभासनिष्ठमेव प्रामाण्यमु-
पेत्यम्, इत्यास्ताम्—किमवान्तरेण ।
ननु यदि विमर्शः प्रमाणव्यापारः स र्तार्ह द्विचन्द्रेऽपि अस्ति ? मैवम्—स हि संस्कार-
योगात् आत्मानमभिमतप्रसिद्धार्थक्रियाप्राप्तिपर्यन्तमनुवर्तयन् अनुन्मूलितवृत्तिः स्थिरः सन् तथा
भवति, मध्ये पुनरुन्मूलनं चेत् सहते न र्तार्ह असौ तथा विमर्शः, नायं विमर्शः पूर्वमपि—एकेन
अन्तर्मुखेन वपुषा पूर्वमेव तस्य निर्मूलनात्, स्वसंवित् अत्र च साक्षिणी, तदैव 'न इदं रजतम्'
इति वृत्तपूर्वस्यैव विमर्शस्य अविमर्शीकरणं संवेद्यते । उक्तं च एतत् बाधविचारे, वक्ष्यते च
'रजतैकविमर्श'.............' इत्यत्र, एवं स्थिते द्विचन्द्रेऽपि यावत् परकूतूहलसंपादनसमर्थक्रियासंमतम्
करनेवाला आभास प्रमाण नहीं माना जाता, ऐसा आगे कहेंगे । निश्चित प्रमाण को हमारी कही
हुई नीति के द्वारा शब्द से प्राणित प्रत्याभास को विश्रान्ति होने पर उसकी अपेक्षा करके
प्रामाण्य करना प्रत्याभास में ही प्रमाणता मानना है, इसीलिए अन्य आभास की आवश्यकता
नहीं देखी जाती ।
अब 'ननु' कहकर प्रश्न करते हैं कि यदि विमर्श को ही प्रमाण का व्यापार मानते हो, तो
जहाँ पर दो चन्द्र का भान होता है वहाँ पर भी विमर्श को प्रमाण का व्यापार मानना होगा ?
इसके उत्तर में कहते हैं कि ऐसा मानना कोई युक्ति युक्त नहीं दिखता; क्योंकि वह संस्कार
के सम्बन्ध से अपने को प्रसिद्ध अर्थ की क्रिया प्राप्ति तक स्थिर रखता हुआ उसी में स्थिर रह कर
वैसा रहता है, बीच-बीच में उन्मूलित होता जाता है तब वह वैसा विमर्श नहीं होता, यह विमर्श
पूर्व में भी नहीं था; क्योंकि इस रूप में वह पहले ही उन्मूलित हो चुका था और इस में अपना
ज्ञान ही साक्षी है, इसी को 'न इदं रजतम्' ऐसा जो पूर्व में रजत का भान हुआ था उसी को
अविमर्शीकरण कहा जाता है । इस प्रकार आचार्य ने बाध विचार में यह बात कही है और कहेंगे
भी—रजतैकविमर्श'.......। इस प्रकार दो चन्द्र के विमर्श में भी दूसरे के कुतूहलार्थ अपूर्व
है, अर्थज्ञान में शब्द अर्थ से युक्त नहीं भासित होता है, शब्द का विवर्तरूप से अर्थ नहीं स्फुरित होता
है । तथा यह दण्डी है इत्यादि में अभेद की कल्पना मूर्खों ने ही की है, दण्ड शब्द से देवदत्त का बोध
नहीं होता है अपितु दण्डी कहने पर ही होता है और उसमें तो प्रकृति एवं प्रत्यय अलग से ही दिखायी
पड़ते हैं कि दण्ड इसके पास में रहता है । जैसी वस्तु रहती है वैसा ही आरोप होता है, वैसे क्रिया
को भी समझना चाहिए ।
क्रियाहि तद्वतो भिन्ना भेदेनैव प्रगृह्यते ।
चलतीत्यादि बोधेषु तत्स्वरूपावभासनात् ॥
क्रियावान् से क्रिया भिन्न होकर भेदपूर्वक ही ग्रहण होती है । चलता है, खाता है इत्यादि,
क्रियाओं के ज्ञानों में क्रिया के स्वरूप का मात्र आभास देखा जाता है ।
१. निर्विकल्प में तो आभास का भेद भले रहे, किन्तु सविकल्प में कैसे रहेगा ? इसके उत्तर में कहते हैं कि
'अध्यवसायस्य'—'निर्विकल्पानुसारेण सविकल्पक संभवात् । ग्राह्यं तदानुगुण्येन सविकल्पस्य मन्महे ।
निर्वकल्पके अनुसार ही सविकल्प की उत्पत्ति होती है इसलिए जो निर्विकल्प का विषय है वही सविकल्प
का भी विषय होना चाहिए ।