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ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

अ.-२, आ.-१, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १७१
पणम् । ततः श्लोकद्वयेन सक्रमत्वाक्रमत्वयोर्विषयविभागः, विषयविभागे च सति वस्तुतः एकत्रैव
तयोः विश्रान्तिः, इति श्लोकेन निरूप्यते, इति—तात्पर्यम् आह्निकस्य ।
श्लोकार्थस्तु निरूप्यते—तत्र पूर्वोक्ते ज्ञानशक्तिसमर्थनोपयोगिनि प्रमेये सिद्धे प्रमेयान्तरमपि
अयत्नतः सिद्धम्, इति अधिकरणसिद्धान्तदिशा दर्शयति—
अत एव यदप्युक्तं क्रिया नैकस्य सक्रमा ।
एकेत्यादि प्रतिक्षिप्तं तदेकस्य समर्थनात् ॥ १ ॥
यत् तावत् उक्तं—ज्ञानान्येव अनुभवविकल्परूपादिभिन्नानि न तेषाम् आश्रयोऽस्ति
कश्चित्, संस्काराच्च स्मृतिः सिद्धा, ज्ञानं च जडं चेत् न अर्थस्य प्रकाशः, अजडं चेत् देशकाल-
सङ्कोचवैकल्यात् आत्मतत्त्वात् अभिन्नमिति, तत् तावत् प्रतिक्षिप्तं—भिन्नानामनुभवादीनामनु-
पपत्तेः वितत्य दर्शितत्वात् । न च संस्कारमात्रात् स्मृतिः—इत्येतदप्युक्तम्, अजडमेव च
बाद दो श्लोकों से सक्रमत्व और अक्रमत्व के विषय का विभाग किया जायेगा और विषय का
विभाग हो जाने पर परमार्थतः एक जगह ही दोनों की विश्रान्ति हो जाती है—यह एक श्लोक
से निरूपण किया जायेगा । इस आह्निक का इतना ही तात्पर्य है । किन्तु अब श्लोक के अर्थ
का निरूपण किया जाता है—पूर्वं में कही हुई ज्ञान-शक्ति का समर्थन एवं उसमें उपयोगी प्रमेय
तत्त्व के सिद्ध हो जाने पर दूसरा प्रमेय भी तो बिना यत्न से ही सिद्ध हो जाता है, इस अधिकरण
सिद्धान्त के अनुसार अर्थात् एक के सिद्ध हो जाने पर दूसरा स्वयं सिद्ध हो जाता है । जैसा कि
परमाणु का नित्यत्व, इसी बात को दिखाते हैं—
इसलिए जो भी कहा गया है, इस विषय में कि एक की क्रिया क्रमवाली नहीं होती,
एक के सिद्ध हो जाने पर दूसरे का स्वयं सिद्ध हो जाना इत्यादि दिखाने से ॥ १ ॥
जब कि पहले कहा गया है कि अनुभव-विकल्परूप से संतानरूप ज्ञान भिन्न-भिन्न हैं उनका
कोई आश्रय नहीं है । संस्कार से स्मृति की सिद्धि होती है और यदि ज्ञान को जडरूप मानोगे तो
अर्थ का प्रकाश नहीं होगा, यदि अजडरूप कहते हो तो उसमें देश-काल का सङ्कोच न होने से वह
आत्मतत्त्व से अभिन्न हो जाता है । पहले वह पूर्वपक्ष में आ गया है इसलिए भिन्न-भिन्न अनुभवों
की उपपत्ति नहीं बैठती है, इसको विस्तारपूर्वक दिखा दिया है । इस प्रकार संस्कार मात्र से
१. प्रमेय का विचार करने पर तो ज्ञान-शक्ति का समर्थन उस पति प्रमाता में अयत्न सिद्ध हो जाता है ।
२. एक प्रमाता में सिद्ध हो जाना ।
३. जिस एक प्रमाता की पुष्टि हो जाने से ज्ञान-शक्ति का समर्थन हो जाता है और उसी से क्रिया-शक्ति की
भी पुष्टि हो जाती है ।
४. अधिकरण सिद्धान्त उसी का नाम है जो एक अर्थ के सिद्ध हो जाने पर उसके अनुयायी दूसरे अर्थ की
भी सिद्धि हो जाती है । जैसे परमाणु की सिद्धि हो जाने पर उसका नित्यत्व स्वतः सिद्ध हो जाता है ।
५. अनुभव विकल्परूप से सन्तानवृत्ति ज्ञानों को ही प्रकाशित करती है ।
६. संस्कार से ही स्मृति की सिद्धि होती है । इससे अतिरिक्त स्मृति में कोई हेतु नहीं है । यहाँ पर ‘चकार’
शब्द का ‘एव’ अर्थ है ।

१७२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-१, का.-१
असंङ्कुचितरूपं ज्ञानं-तत्सवातन्त्र्यावभासितज्ञेयोपरागवशात् तु अस्य सङ्कोचावभास इत्यपि
दर्शितं यतः, न केवलम् अतो हेतुकलापात् ज्ञानशक्तिचोद्यानि निवारितानि, यावत् क्रियाशक्ति-
विषयाण्यपि दूषणानि, अत एव हेतुजातात् अपसारितानि, इति अपिशब्दार्थः । एका क्रिया
क्रमिका कथम् आश्रयस्य एकस्वभावत्वे सति घटते ? इति यदुक्तं, तथा ‘तत्र तत्र स्थिते........’
इति, ‘द्विष्ठस्योनेकरूपत्वात् ........’ इति च यदुक्तं तदपि प्रतिक्षिप्तमेव, यत इयति पूर्वपक्षे इयदेव
जीवितम्-एकमनेकस्वभावं कथं स्यात् इति । तत्र च उक्तं चित्स्वभावस्य दर्पणस्येव एकतानप-
बाधनेन आभासभेदसम्भवे क इव विरोध इति, तस्मात् प्रत्यभिज्ञानबलात् एकोऽपि असौ
पदार्थात्मा स्वभावभेदान् विरुद्धान् यावत् अङ्गीकुरुते तावत् ते विरोधादेव क्रमरूपतया निर्भास-
मानाः तमेकं क्रियाश्रयं सम्पादयन्ति इति, ततश्च सम्बन्धादीनामपि उपपत्तिरिति ॥ १ ॥
ननु च क्रमिकत्वमेव क्रियायाः स्वरूपं, क्रमश्च कालकलनाहीने चिन्मये भगवति नास्ति;
इति कथम् अस्य सा भवेत् ? इत्याशङ्कयाह—
ही स्मृति नहीं हो जाती है, इसे भी हम कह आये हैं; इसीलिए ज्ञान अजड एवं असंङ्कुचितरूप
है उसकी स्वतन्त्रता अवभासित होनेवाले ज्ञेय के संमिश्रित हो जाने के कारण इसके संकोच का
अवभास मालूम होता है; क्योंकि यह भी दिखा दिया है, इसलिए न केवल हेतु समुदाय के द्वारा
ज्ञान-शक्ति से प्रकाशित होनेवाले पदार्थों का निवारण कर दिया है, किन्तु क्रिया-शक्ति के विषयों
में भी दोष दिया है, इसलिए हेतु समूह से हटा दिया गया, ‘अपि’ शब्द का यह भी अर्थ होता
है । एक क्रिया क्रमवाली कैसे हो सकती है ? आश्रय की एक स्वभावता रहने पर घटती है ।
इस विषय में कहा गया है, ‘तत्र तत्र स्थिते·····।’ इत्यादि बाते कही हुई हैं; क्योंकि
दो वस्तुओं में जो रहेगा वह अनेकरूपों में रहेगा । इसका भो खण्डन हो चुका है, पूर्वपक्ष का
इतना ही जीवन है—जो एक है वह अनेक स्वभाववाला कैसे होगा ? इस प्रकार वहाँ पर हमने
इसका उत्तर दे दिया है कि चेतन का स्वभाव दर्पण के तुल्य है । इसलिए एकता को बाधित न
करते हुए आभासों का भेद होना सिद्ध ही है, इसमें कोई विरोध भो नहीं मालूम होता, इसीलिए
प्रत्यभिज्ञान के बल से यह एक ही पदार्थांरूप स्वभावभेद जितने भी विरुद्ध-विरुद्ध स्वीकार करोगे
उतने ही विरोध से क्रमरूप द्वारा निर्भासित होते हुए उस एक क्रिया के आश्रय को सम्पादन
करेंगे, आश्रय एकत्व के समर्थन से सम्बन्धादि की उपपत्ति बैठा लेनी चाहिए ॥ १ ॥
अब शंका करते हैं कि क्रमिकत्व ही क्रिया का स्वरूप है, और काल की गति से शून्य
भगवान् चिन्मय है उसमें तो क्रम नहीं रहता, इसलिए क्रिया का होना उसमें कैसे घट सकता
है ? अर्थात् अक्रमवाले में क्रमरूप क्रिया कैसे संभव होगी ? ऐसी शंका कर उत्तर देते हैं—
१. सम्बन्ध तो दो वस्तुओं में रहता है एक में कैसे रहेगा ? इसका आशय यह है कि एक का स्वभाव एक
ही होता है, दो नहीं हो सकते और व्यापाररूप क्रिया तो समवायी के बल से अविभक्त रूप में दिखायी
देती है, लोग उसे पदार्थ का स्वभाव कहते हैं तथा क्रिया भेदवादियों की भी यही सम्मति है, यहाँ पर
आभाससार वस्तुवाद में भेद प्रतीति से जो एक सम्बन्ध्ररूप एक सम्बन्धित्व को लेकर क्रिया का बोध
होता है, वह तो एकता से युक्त रहता है, यदि वह पदार्थ प्रतीति को छोड़कर सैकड़ों शपथ खाने पर
भी भेद से कैसे व्यवस्थापित हो सकता है ।

अ.-२, आ.-१, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १७३
सक्रमत्वं च लौकिक्याः क्रियायाः कालशक्तितः ।
घटते न तु शाश्वत्याः प्रभव्याः स्यात्प्रभोरिव ॥ २ ॥
उत्क्षिपति अपक्षिपति हस्तम् इति ये पूर्वोत्तरे क्षणाः ते क्रमवन्तः, तत्र येषां त एव ‘क्रिया
काणादानाभिव’ तेषां सा सक्रमा प्रत्यक्षेणैव भाति । ये तु मन्यन्ते तथाभूतपरिदृश्यमानभेद-
सम्पादिका या असौ काचित् अतीन्द्रिया हस्तगता शक्तिर्व्यापारोद्बोधरूपा नित्यानुमेया तस्याः
केवलं पूर्वापरीभूतत्वम् अनुमीयते, इति लौकिक्याः क्रियायाः सक्रमत्वं कालशक्तेः आभास-
विच्छेदनप्रदर्शनसामर्थ्यरूपात् पारमेश्वरात् शक्तिविशेषात् घटते उपपद्यते, या तु प्रभोः सम्बन्धिनी
तदव्यतिरिक्ता क्रियाशक्तिः शाश्वती कालेन अस्पृष्टा तस्याः सक्रमत्वम् अस्ति, इति—सँम्भाव-
नापि नास्ति, यथा प्रभोः सक्रमत्वमसम्भाव्यं तथा तस्या अपि। उक्तं हि—
‘हस्तस्य सक्रमत्वे, तद्गतापि क्रिया तथा स्यात्’ इति ॥ २ ॥
ननु कालो विशेषणभावम् उपगच्छन् भावं स्वेन रूपेण अवच्छिनत्ति, तत्र कोऽसौ कालो
काल-शक्ति के द्वारा लौकिक क्रिया में ही सक्रमत्व घटता है। सदा-सर्वदा होनेवाली प्रभु
की क्रिया में क्रम नहीं होता। जैसा कि प्रभु में क्रम का अभाव रहता है ॥ २ ॥
हाथ उठाता है एवं गिराता है इस प्रकार पूर्वोत्तर [ आगे-पीछे ] होनेवाले क्षणों में ही
क्रमरूपता होती हैं, जिस काणाद प्रभृति के मत में तो वे क्षण ही क्रिया हैं और वह सक्रमवाली
क्रिया प्रत्यक्षरूप से ही दिखायी पड़ती हैं। किन्तु कुछ लोग पूर्वोत्तर क्षणरूप संयोग-विभाग से
होनेवाली क्रिया को मानते हैं वह तो कोई अतीन्द्रिय ही क्रिया है जो कि हाथ में व्यापार लाती
है और वह कार्यरूप अनुमान से ही जानी जाती है उसका केवल पूर्वोत्तररूपत्व ही अनुमित किया
जाता है। इस प्रकार लौकिक क्रिया का सक्रमत्व काल-शक्ति के आभास विच्छेदन के सामर्थ्य
का प्रदर्शन ही परमेश्वर की शक्ति विशेष से मात्र कर सकती है। किन्तु प्रभु से सम्बन्ध रखनेवाली
अभिन्नरूप शाश्वत क्रिया-शक्ति को काल स्पर्श भी नहीं करता, उसका सक्रमत्व होता है, ऐसी
संभावना भी नहीं करनी चाहिए। जैसे प्रभु में सक्रमत्व का होना संभव नहीं होता, वैसे उसकी
क्रिया में भी नहीं होता; क्योंकि इस विषय में कहा गया भी है—
जब हाथ क्रमवाला है तो हस्तगत क्रिया भो सक्रमरूप ही होगी; प्रभु तो काल से
अनवच्छिन्न स्वरूपवाले होने से उसकी क्रिया भी काल से अनवच्छिन्नरूप ही होतो है; क्योंकि वह
प्रभु की जैसी शाश्वत् होती है ॥ २ ॥
अब शंका करते हैं कि काल विशेषणरूप होता हुआ पदार्थों में अपने रूप से भेद करता
१. क्रिया को प्रत्यक्ष प्रमाण से ग्राह्य काणाद आदि लोग मानते हैं।
२. सयोग और विभाग करने में निमित्तभूत पूर्वोत्तरक्षणरूप हस्तगत भेद का सम्पादन करनेवाली
‘उत्क्षिपति’ क्रिया कहलाती है।
३. नीलादि-पदार्थों में भेद दिखलानेवाली काल-शक्ति है जिस शक्ति विशेष के द्वारा आभास भेद दिखायी
देता हो वही शक्ति-विशेष काल कहलाता है।
४. जो क्रिया प्रभु-परमात्मा में रहनेवाली है, वह क्रिया तो काल से अनवच्छिन्न होती है।

१७४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-१, का.-३
नाम ? इत्याशङ्क्याह—
कालः सूर्यादिसञ्चारस्तत्तत्पुष्पादिजन्म वा ।
शीतोष्णे वाथ तल्लक्ष्यः क्रम एव स तत्त्वतः ॥ ३ ॥
ये इयत्तया परिनिष्ठिता आभासाः सिद्धा, तद्यथा चन्द्रसूर्यादीनां सहकारमल्लिका
कुटजादीनां शीतोष्णादेः परभृतमदविलासादेः त एव ‘कालः’ यतोऽपरिनिष्ठितं गमनपठनादि
तैरियतया परिनिष्ठीयते परिवर्तकैरिव कनकं, स एव च सूर्यादीनां स्वभावविशेषस्तत्त्वतः परमार्थतः
क्रमो, न अन्यः कश्चित् क्रमो नाम, क्रम एव च कालो, न अन्योऽसौ कश्चित्, इति एवकारो
भिन्नाभिन्नक्रमो योज्यः, यौगपद्यमपि आभासयोः अपराभासापेक्षया क्रम एव, चिरक्षिप्ररादिधीरपि
विततान्यत्ववशात् आभासभेदे क्रमरूप एव, परत्वापरत्वबुद्धिरपि स्फुटत्वादिनि तत्रैव, इति तेन
तेन प्रतिमानवर्तकतुल्येन सूर्यसञ्चारादिना सह मीयमानो हेमस्थानीयो देवदत्ताभासस्य वैचित्र्य-
भेद इत्थम् उच्यते—‘दिवसं गच्छति’ इति ॥ ३ ॥
है, ऐसी स्थिति में काल किसको कहा जाय ? इस शंका का उत्तर देते हैं—
सूर्यादि ग्रहों की गति ही काल है अथवा उन-उन पुष्प-लतादि की उत्पत्ति ही काल है।
सूर्यादि ग्रहों के द्वारा शीत-ऊष्ण होता है, वस्तुतः वही क्रम कहलाता है ॥ ३ ॥
ये ही मात्र परिमित सिद्ध आभास हैं सूर्यादि ग्रहों का आम्र, जूही, कुटजादि पुष्पों की
उत्पत्ति और शीत, ऊष्णादि का होना तथा कोकिलों के मद-विलासादि का जो ज्ञान होता है वही
तो काल है; क्योंकि अपरिमित का ज्ञान गमन-पठनादि के द्वारा ही सीमित ज्ञान होता है। जैसा
कि स्वर्णकार स्वर्ण का परिमित भिन्न-भिन्न नाम एवं रूपवाले आभूषण गहने बना देता है और
वही परमार्थतः सूर्यादि के स्वभाव की विशेषता है। उसी का नाम क्रम है, उससे भिन्न कोई क्रम
नहीं है, क्रम ही काल है, दूसरा यह कोई नहीं है। इस प्रकार भिन्न-अभिन्न क्रम लगा लेना
चाहिए, अर्थात् काल ही क्रम है एवं क्रम ही काल है। इसीको भेद एवं अभेद भी कहा जाता है,
आभासों का एकी साथ होना दूसरे आभासों की अपेक्षा से वही क्रम है। विलम्ब से होना और
शीघ्रता से होना यह बुद्धि भी विस्तारवाली दूसरी बुद्धि की अपेक्षा से वही आभास भेद हो जाने
पर क्रमरूप हो जाती है, छोटेपन और बड़ेपन की बुद्धि भी स्पष्टरूप से उसी में भासती है, इसलिए
उस-उस नाप में आनेवाले सूर्य संचारादि का साथ में अनुमान किया हुआ हेम स्थानीय देवदत्त के
आभास का विचित्ररूप से भेद हो जाता है। जैसे ‘दिवसं गच्छति’ इस प्रकार से कहा जाता है ॥३॥
१. आदि शब्द से अन्य ग्रहों को ग्रहण करना होगा । जैसे—मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि इत्यादि ।
२. वैशेषिकों का आत्मा से भिन्न काल द्रव्यरूप है। सांख्यों का कारण स्वभाववाला है। वैयाकरणों का
काल नित्य ‘शब्दादि’ रूप में रहता हुआ अनाश्रित प्रवृत्ति स्वभाववाला है। बौद्धों का काल क्षणों की
धारावाला होने के कारण परमार्थरूप है वस्तुतः वह कभी भी क्रमरूपता का अतिक्रमण नहीं करता,
क्रम ही बाहर में कालरूप से व्यक्त होता है।
३. क्रम ही विशिष्ट है, परत्व एवं अपरत्वरूप नूतन स्थिति को दिखानेवाला, पुरातन क्रम सतत होनेवाले परत्व
और अपरत्व के द्वारा बड़ी देरतक व्यवहार होते रहना, नहीं तो, बहुत शीघ्र व्यवहार के स्वरूप से, क्रम
स्थिति को दूसरे पदार्थ के आभास से, अनेकरूप में परिच्छेद के द्वारा मूर्तिकृत दूरत्व एवं अदूरत्व से
होनेवाले परत्व और अपरत्व इन दोनों का संकीर्ण होकर पदार्थों में अवस्थित रहना ही काल कहलाता है।

अ.-२, आ.-१, का.-४ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १७५
ननु एवं कालो नाम भावस्वभावभूत एव अस्तु, का असौ कालशक्तिः ? इत्याशङ्क्याह—
क्रमो भेदाश्रयो भेदोऽप्याभाससदसत्त्वतः ।
आभाससदसत्त्वे तु चित्राभासकृतः प्रभोः ॥ ४ ॥
इह स्वभावभेदमात्रं यदि क्रमात्मा कालः, तदङ्गुलीचतुष्टयं भिन्नस्वभावम् इति भिन्नकालं
भवेत्, तस्मात् अरुणाभासस्य सद्भावः स्फुटप्रभापुञ्जस्य च असद्भावः—इत्येवंभूतो यो भेद
आभाससद्भावासद्भावाभ्यामनुप्राणितः तत्कृतः क्रमः कालात्मा, तौ च आभासानां भावाभावौ
न बाह्यहेतुकृतौ, इति—विस्तार्य उपपादितम्, इति य एव संवित्स्वभाव आत्मा स्वप्नसंकल्पादौ
अच्छा तो, काल पदार्थों का स्वभावरूप भले ही हो, यह काल-शक्ति क्या चीज है ? ऐसी
आशङ्का कर उत्तर में कहते हैं—
भेद के आश्रय से क्रम रहता है और भेद भी आभास के सत् एवं असत् भाव से होता है ।
किन्तु आभास की सत्ता एवं असत्ता में प्रभु का विचित्राभास ही कारण है ॥ ४ ॥
यदि क्रमरूप काल को शक्ति का स्वभाव भेद मात्र ही माना जाय, तब तो चारों अङ्गुलियां
भिन्न-भिन्न स्वभाववाली होने से भिन्न कालवाली ही हो जायेगी, इसलिए अरुणाभास का होना
और स्फुटप्रभा-पुञ्ज का अभाव होना—इस प्रकार इन दोनों सत्त्व एवं असत्त्व भावों से अनुप्राणित
कालरूप ही क्रम हो जाता है । ये दोनों आभासों में भाव एवं अभावरूप से रहते हैं, वे बाह्य-
नीलादि हेतु के द्वारा नहीं होते, यह मैंने बाह्यार्थवाद निरास में विस्तारपूर्वक दिखा दिया है ।
इससे यह सिद्ध होता है कि जो संवित् स्वभाववाले परमात्मा हैं वही स्वप्न-संकल्पादि में,
आभास की विचित्रता के निर्माण में पूर्ण समर्थ हैं; संवित् स्वभाववाले से ही ये दोनों सत्त्व और
१. यदि स्वभाव भेद ही केवल काल का स्वरूप है, तो सभी अंगुलियों में भी काल का भेद मानना पड़ेगा ।
इसलिए आभास एवं अनाभास के द्वारा जो भेद प्रतीत होता है वह तो कालरूप का ही वैसा भेद
क्रम है, इसमें भेद की कोई कारणता नहीं रहती, आभास के सद्भाव और असद्भाव से विचित्र भेद
भासते हैं, वे दोनों स्वप्न-संकल्पादि में क्रम के उत्थापन सामर्थ्य से ही होते हैं । जबकि आपके द्वारा
कहा गया है—एकस्यैव तु सा शक्तिर्यदेव भासते········ ।'
एक चिद्रूप की ही तो वह शक्ति है जिससे यह सारा का सारा बाह्य-विषय भासित होता है ।
इस प्रकार प्रसङ्ग में भी कहा है—
तमस्य लोकयन्त्रस्य सूत्रधारं प्रचक्षते ।
प्रतिबन्धाभ्यनुज्ञाभ्यां तेन विश्वं विभज्यते ॥
यदि न प्रतिबध्नीयात्प्रतिबन्धाच्च नोत्सृजेत् ।
अवस्था व्यतिकीर्येरन्पौर्वापर्यविनाकृताः ॥
इस संसाररूपी यन्त्र का भगवान् चिदात्मा देव ही सूत्रधार कहा जाता है । इसलिए प्रतिबन्ध
और अभ्यनुज्ञा [ सृष्टि-प्रलय आदि ] के द्वारा विश्व विभक्त हो जाता है यदि प्रतिबन्ध न करे एव
प्रतिबन्ध करके अर्थात् उसे न छोड़ दे तो व्यवस्था विशीर्ण नष्ट-भ्रष्ट हो जायेगी, पूर्वोत्तर क्रम के बिना
व्यवस्था व्यवस्थित नहीं हो सकती है; क्योंकि भगवान् ही विचित्ररूप से पदार्थों को आभासित करते हैं ।

१७६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-१, का.-५
आभासवैचित्र्यनिर्माणे प्रभुः प्रविष्णुः इति स्वसंविदितस्त एव तौ भवतः, स हि आत्मनि
नीलादीन् आभासान् आभासयन् चित्रतया अपरिमेयया भासयति, तथाहि-लोहिताभासं घटा-
भासम् उन्नताभासं दृढाभासं च सामानाधिकरण्येन घटाभासं पटाभासं च पृथक्त्वाभासेन
अन्योन्यत्र आभासाभावेन, स्वात्मनि तु एकरसेन आभासेन, इयति च न क्रमस्य उदयः, यदा तु
शरदाभासं हेमन्ताभासेन च सर्वथैव शून्यम् आभासयति हेमन्ताभासं च शरदाभासेन तदा
कालात्मा क्रम उत्तिष्ठति, इति सेयम् इत्थंभूताभासवैचित्र्यप्रथनशक्तिः भगवतः 'कालशक्तिः'
इत्युच्यते ॥ ४ ॥
चित्राभासकृत्त्वमेव स्फुटयति-
मूर्तिवैचित्र्यतो देशक्रममाभासयत्यसौ ।
क्रियावैचित्र्यनिर्भासात्कालक्रममपीश्वरः ॥ ५ ॥
पदार्थस्य स्वं रूपं मूर्तिः, तस्या यत् वैचित्र्यं विभेदः तद्यथा गृहमिति अन्यत् स्वरूपं,
असत्त्व होते हैं; क्योंकि वे ही अपने में नीलादि-आभास पदार्थों को आभासित करते हुए विचित्र-
चित्ररूप से, अपरिमेय-असंख्य प्रकार से आभासित करते हैं तथा जगत् को भी आभासित करते-
रहते हैं। जैसे लोहिताभास, घटाभास, उन्नताभास और दृढाभास इन सबों के साथ घटाभास
और पटाभास अलग-अलग आभासों से तथा परस्पर आभासों के अभावों से, अपने स्वरूप में तो
एकरस के आभास से आभासित होते हैं, और इतने तक क्रम का कोई उदय नहीं होता, किन्तु
जब शरदाभास को हेमन्ताभास से शून्य प्रकाशित करते हैं और हेमन्ताभास को शरदाभास से
शून्य प्रकाशित करते हैं तभी कालरूप क्रम उपस्थित होता है, इस प्रकार चित्र-विचित्ररूप से
आभासों को फैलानेवाली जो प्रभु की शक्ति है, वही 'काल-शक्ति' कही जाती है ॥ ४ ॥
इस प्रकार विचित्राभास के स्वरूप को स्पष्ट करते हैं-
महेश्वर मूर्ति की विचित्रता से देशक्रम को आभासित करते हैं तथा क्रिया की विचित्रता
के आभास से कालक्रम को भो आभासित करते हैं ॥ ५ ॥
पदार्थ का अपना स्वरूप ही मूर्ति है [ 'स्वरूपमात्रमन्योन्यभेदेनावभासमानमर्थानां मूर्तिः'
अर्थात् मूर्ति उसी का नाम है जो परस्पर भिन्न-भिन्नरूपों से अवभासन होनेवाले पदार्थों का
स्वरूपमात्र हो ] उसको विचित्ररूप से भिन्नता दिखायी पड़ती है । जैसे गृह भिन्न स्वरूपवाला है,
१. संवेद्यरूप मूर्त्त पदार्थों का जो वैचित्र्यभाव है । जैसे गृह, प्राङ्गण, बाजार, मन्दिर उद्यान, अरण्य
इत्यादि भेद, इन्हीं भेदों से विचित्रतापूर्वक प्रकाश करते हुए परमेश्वर देशक्रम अर्थात् दूरत्व-समीपत्व और
विस्तृत-संकुचितरूप से अवभासित करते हैं, किन्तु एक की प्रत्यभिज्ञा के सामर्थ्य से जो स्वरूप का
अभिन्न हस्तादि भेद है जिसका आगे चल कर प्रतिपादन करेंगे 'विमर्शक्येनातिरोहितता भिन्नद्रव्यात्मनः ।'
उसका भिन्न-भिन्न देशत्व, भिन्न-भिन्न धर्मत्व है । इससे स्वरूप की एकता का ज्ञान हो जाता है, गच्छति
चैत्रः पच्यते फलमिति' इस प्रकार क्रिया वैचित्र्यभाव को निर्भासित करने के कारण ईश्वर विरोध
और अविरोध को अपनी स्वतन्त्रता से निर्भासित करते हुए कालरूप क्रम एक में विरुद्ध होने के कारण
अनुचित होता हुआ भी भासित करते हैं । यही सूत्र का आशय है ।

अ.-२, आ.-१, का.-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १७७
प्राङ्गणमिति अन्यत्, विपणिरिति अन्यत्, देवकुलमिति अपरम्, उद्यानमिति अन्यत्, अरण्यमिति
तदितरत्, तस्मात् वैचित्र्यात् आभास्यमानात् देशरूपो दूरादूरविततत्वाविततत्वादिः क्रमो
भगवता अवभास्यते, तदा तु गाढप्रत्यभिज्ञाप्रकाशबलात् तदेव इदं हस्तस्वरूपम् इति प्रतिपत्तौ
मूर्तेर्न भेदः, अथ च अन्यान्यरूपत्वं भाति तदा एकस्मिन् स्वरूपे यदन्यत् अन्यत् रूपं तद्विरोध-
वशात् असहभवत्क्रिया इति उच्यते, तस्या यत् वैचित्र्यं परिमितापरिमितरूपतात्मकं तदेकानु-
सन्धानेन फलसिद्ध्यादिनिबन्धनवशात् यथारुचि चर्चित्रेन निर्भासयन् कालरूपं क्रममेव भासयति,
न चैतत् वाच्यम्—एकस्वरूपस्य कथम् अन्यत् अन्यद्रूपमिति ? यतो—न असौ कश्चित् भावो य
एवं विकल्प्यते, संविदेव हि तथा भाति, तथाभासनमेव च अस्या ऐश्वर्यम्, नहि भासने विरोधः
कश्चित् प्रभवति, स हि सुखदुःखादेर्भासनकृत एव, तथा भासनाभाव एव हि विरोधतत्त्वम्, एतत्
अपिशब्देन ईश्वरशब्देन च दर्शितम् ॥ ५ ॥
ननु एवम् आभासविषयाभ्यामेव देशकालक्रमाभ्यां भवितव्यम्, अनाभासश्च प्रमाता, स
प्राङ्गण दूसरा स्वरूप है, बाजार उससे भिन्न है, देवस्थान का दूसरा ही स्वरूप है, उद्यान यह
दूसरा स्वरूप है, जंगल यह उससे भिन्न ही है, इसलिए इन विचित्र-चित्र रूपों में आभासित
होनेवाले आभासों से देशरूप दूर-समीप, विस्तृत-संकुचित इत्यादि क्रम को भगवान् आभासित
करते हैं, जब तो गाढ प्रत्यभिज्ञा प्रकाश के बल से वही यह हाथ का स्वरूप है—ऐसी प्रतिपत्ति
हो जाने पर मूर्ति का भेद नहीं भासता अर्थात् स्वरूप से अभिन्नता भासने लगती है और
भिन्न-भिन्नरूपता भासती है तब तो एक ही स्वरूप में भिन्न-भिन्न रूप दिखायी पड़ता है। वह
उसके विरोध के कारण उसके साथ न होनेवाली क्रिया कही जाती है, उस क्रिया की जो विचित्रता
है वह तो परिमित होना तथा अपरिमित होना है, ठीक उसके एकत्व का अनुसन्धान करने पर
[ जैसा कि चैत्र जाता है, फल पकता है । ] फल सिद्धि के कारण यथारुचि समझ-बूझकर भासित
करते हुए कालरूप क्रम को ही भासित करते हैं, यह मत कहो—एक ही स्वरूप का भिन्न-भिन्नरूप
कैसे हो सकता है ? क्योंकि वह कोई पदार्थ नहीं है जो ऐसा भिन्न-भिन्न विकल्पित हो जाय,
संविद्रूप ज्ञान ही [ ‘आभासान्योऽन्यत्वेन’ अर्थात् अन्योन्यरूप से आभास ] वैसा भासता है इसी
प्रकार भासना ही इसका परम ऐश्वर्य माना जाता है। उसके ऐसा भासित होने में कोई विरोध भी
नहीं होता, वह तो सुख-दुःखादि के आभास से ही बना हुआ है; क्योंकि उसी प्रकार भासित न
होना ही तो उसका विरोध है, यह ‘अपि’ शब्द से एवं ईश्वर शब्द से द्योतित होता है ॥ ५ ॥
अब शंका करते हैं कि आभास का विषय तो देश और काल का क्रम ही होता है और
वह किसी से न भासित होनेवाला प्रमाता है, वह किसी का आभास नहीं है; क्योंकि उससे ही सब
१. अनेक वस्तु में देशक्रम तो गृह और प्राङ्गण के जैसा होता है और कालक्रम आम्र-मञ्जरी के समान;
एक वस्तु में न तो देशक्रम ही रहता है और न कालक्रम ही रहता है; क्योंकि उसमें दूरत्वादि का
भेद नहीं होता और विस्तार भी नहीं होता । अंशो के एकरूप हो रहने के कारण परिपाकरूप से आम्र
एवं फल के समान हो जाता है । वेद्यांश में ही कालक्रम की स्थिति रहती है संविद्रूप ज्ञान में नहीं रहती,
ज्ञान में वेद्यांश काल कहा जाता है । ज्ञान के अंश में नहीं होता और न तो विमर्श अंश में ही रहता है ।
२. ईश्वर ही कालक्रम को अवभासित करता है । वह स्वयं अपने से नहीं अपितु कालक्रम से भासता है ।
२३

१७८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-१, का.-६
हि न कस्यचित् आभासते—तस्य सर्वम् आभाति यतः, ततश्च तौ प्रमातरि कथं दृश्येते च
‘अभवम् अहं भवामि भवितास्मि, इति, ‘गृहे तिष्ठामि अरण्ये देवगृहे’ इति च, किं च स्वयं
देशकालक्रमशून्यस्य किं दूरं किम् अन्तिकं किं वर्तमानं किम् अतीतं किं भावि, इति—प्रमात्राश्रयो
भावेष्वपि क्रमो न युक्तः१, न चे प्रमातृनिरपेक्षेष्वपि तेषु स्वात्मनि दूरत्वादि भूतत्वादि वा ?
तदेतत् समर्थयितुम् आह—
सर्वत्राभासभेदोऽपि भवेत्कालक्रमाकरः ।
विच्छिन्नाभासः शून्यादेर्मातृभातस्य नो सङ्केत् ॥ ६ ॥
आभासित होते हैं, इसलिए देशक्रम और कालक्रम प्रमाता में कैसे हो सकते हैं ? किन्तु देखा तो
जाता है कि मैं अभी हूँ, पहले था और आगे भी होऊँगा, यह सब आभास प्रमाता में दिख रहा
है इसीका नाम कालक्रम है, गृह में स्थित हूँ; अरण्य में रहता हूँ; देवस्थान में रहता हूँ; यह
सब देशक्रम माना जाता है, भगवान् तो स्वयं देश और काल के क्रम से शून्य है, इसलिए उसके
लिए क्या दूरत्व है एवं क्या समीपत्व है, क्या वर्तमान है, क्या अतीत हुआ और क्या भविष्य
ही होगा ? प्रमाता का आश्रय क्रम भाव-पदार्थों में भी नहीं होना चाहिए और प्रमाता से निरपेक्ष
भी उन पदार्थों में अपने आप दूरत्वादि अथवा वर्तमानादि रहें, यह कहो, तो ऐसा होना कैसे
संभव होगा ? इस बात का समर्थन करने के लिए कहते हैं—
सर्वत्र आभासों का भेद तो कालक्रम से होता है। जो विच्छिन्नाभास है, वह स्वयं भासित
शून्यादि प्रमाता के बिना नहीं हो सकता है ॥ ६ ॥
१. देश-काल का क्रम पदार्थों में ही रहे, प्रमाता में नहीं; क्योंकि यह प्रमाता तो निराभास है, उसीसे सब
कुछ आभासित होता है किन्तु वह प्रमाता किसी से भी नहीं भासित होता है और न किसी को
आभासित करता है, इन दोनों को अनाभास का हेतु बताया है इसलिए ये दोनों सतत प्रकाश स्वभाव-
वाले कैसे हो सकते हैं ? कोई कारण इसमें नहीं मिलता है, अतः इनका अभाव ही है यही कहना
युक्तियुक्त है, किन्तु दोनों प्रतीत तो होते हैं, मैं था, मैं वर्तमान अवस्था में हूँ और आगे भी होऊँगा,
इस प्रकार गृह, ग्राम, और अरण्यादि में रहता हूँ एवं भवन पर से मंच पर रह रहा हूँ, और प्रमाता
में हूँ एवं उसके अभाव में रहता हूँ, अपने से, भूतादिकों से, दूरत्वादि से भी हमारा योग नहीं रहता है,
इस प्रकार अनुभव की आलोचना के द्वारा दिन की अपेक्षा से ही दोनों पदार्थों में निरूपित किये जाते
हैं । ये दोनों ग्राह्य में कैसे रहेंगे, इस प्रकार कहाँ ये दोनों बद्ध या प्रविष्ट होंगे ऐसा जो मुग्ध होगा,
वह दोनों सूत्रों से प्रतीत होता है ।
२. जो एक बार यह भासित होता है बारम्बार नहीं होता, इस ब्रह्मवेत्ता की युक्ति से निरन्तर अनवच्छिन्न
प्रकाश स्वभाववाले परमार्थ प्रमाता सिद्ध हो जाता है । उसमें कभी-भी आभास का भाव एवं अभाव
नहीं होता, इसलिए काल का भी स्पर्श नहीं होता है, वह पदार्थों में भी नहीं रहता है, अपितु पदार्थ
इसमें रहते हैं ।

अ.-२, आ.-१, का.-६-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १७९
देशक्रमोऽपि भावेषु भाति मातुर्मितात्मनः ।
स्वात्मैव स्वात्मना पूर्णा भावा भान्त्यमितस्य तु ॥ ७ ॥
सर्वेषु वस्तुषु एकानेकरूपेषु यः कालात्मा क्रमः तस्य य आकरः-उत्पत्तिनिबन्धनम्, इति
व्याख्यात आभासस्य भावाभावकृतो भेदः स शून्यप्राणबुद्धिदेहादेः भवति, इति संभाव्यते, यतः
स शून्यादिः विच्छिन्नभाः, नहि तस्य भासनं स्वरूपं—नीलादिवत् जडत्वात्, अपि तु संवित्स्फुरण-
मस्य भासनं, तत् यदा अस्य नास्ति, यथा सुप्ते देहस्य संसारयात्रा पतितत्वे शून्यस्य प्राणादेः तदा
अस्य भासनं विच्छिद्यते, इति—आभाससद्भावासद्भावकृतः कालक्रमोऽस्ति 'अतीतोऽहं बालदेहा-
भासरूपो भवामि युवदेहाभासरूप' इति, स च यतः प्रमाता अहंभावसमावेशनात् अपरिपूर्णात्
अत एव उद्रिक्तकालक्रमत्वात् भावेष्वपि कालक्रमम् आभासयति, 'योऽहं बालोऽभवं तत्सहभावी
घटाभासोऽपि अभवत्' इति, न तु यः सकृत् विभात इति अनया वाचोयुक्त्या अविच्छिन्नभासनः
पदार्थ-भावों में देशक्रम भी परिमित प्रमाता के द्वारा ही भासित होता है। जैसे आत्मा
अपने आप में ही परिपूर्ण है, इसी प्रकार परमेश्वररूप अपरिमित आत्मा से पदार्थवर्ग भी तो
परिपूर्ण है ॥ ७ ॥
जो एक या अनेक रूपवाली सभी वस्तुओं में कालरूप क्रम रहता है वह उसकी उत्पत्ति
में कारण है, उसकी तो व्याख्या कर दी है। आभास का भाव और अभाव के द्वारा भेद प्रतीत
होता है वह शून्य, प्राण, बुद्धि और देहादि प्रमातृत्ता को लेकर ही होता है, ऐसी संभावना भी
हैं; क्योंकि वे शून्यादि प्रमाता भिन्न-भिन्न रूपों में हैं, उनका स्वयं भासित होना स्वरूप नहीं है—
नीलादि-पदार्थों के समान; क्योंकि वह तो जडरूप है, वस्तुतः इसका संविद्रूप से स्फुरित होना
ही भासन है, इसलिए इसका ज्ञान नहीं होता है। जैसे सुप्तदशा में देह की संसारयात्रा छूट जाने
पर [ मूर्च्छादि में ] शून्य प्राणादि का भासन होना सर्वथा बंद हो जाता है, इसलिए प्रमाता
का भाव और अभाव के द्वारा किया हुआ कालक्रम होता है। जैसा कि मैं अतीतकाल में
बाल्यावस्था के रूप में भासित होता रहा, सम्प्रति युवावस्था के रूप में भासित हो रहा हूँ;
क्योंकि प्रमाता में अहंभाव का समावेश रहता है एवं अपरिपूर्ण दशा हो जाती है इसीलिए
कालक्रम के उच्छिन्न हो जाने से पदार्थ-भावों में भी कालक्रम आभासित रहता है। जब मैं
बालक था, तब मेरे साथ में होनेवाला घटाभास भी हो रहा था, जब कि वह सर्वदा भासित
१. जब एक ही स्वरूप में ऐक्य के अनुसंधान से एकता का बोध होने लगता है तब तो मूर्त्ति में भी अभेद
की प्रतिक्षण भिन्न-भिन्नरूपता आ जाती है और वह सब कालकृत ही होती है देखो—कार्यात्मक सभी
वस्तुओं में छः प्रकार से पदार्थों के विकार उत्पन्न होते हैं, यह सब क्रमपूर्वक ही होता है। जैसे घट-
पटादि पदार्थों का उत्पन्न होना, यह जन्म क्रिया का अवभास है, बदलना [ परिणाम ] होना, अभिवृद्धि
होना, क्षीणता को प्राप्त होना एवं नाश होना; यही सत्ता क्रियाओं का प्रकाश है और उन्हीं में
एक-एक का जन्म-परिणाम इत्यादि भिन्न-भिन्न अवभास है। उसी प्रकार आगे होनेवाले फल इत्यादि में
हरापन-पीतपन का होना भी तो परिणाम क्रिया का आभास है। यही एकता एवं अनेकता कालरूप में
रहती है।

१८० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-१, का.-८
प्रमाता संविद्रूपः तस्य स्वात्मनि कालक्रमः, नापि तदपेक्षया वेद्ये भावजाते, तद्धि तत्र अभेदेन
भाति इति । एवं देशक्रमोऽपि मितात्मनः परिच्छिन्नस्वरूपस्य शून्यादेः देहान्तस्य स्वात्मनि भाति
‘इह तिष्ठामि’ इति स्वापेक्षया च, भावेष्वपि यत् मम-संयोगपारिमित्येन वर्तते तदन्तिकम् इतरत्
दूरम् इति, अमितस्य स्वरूपेयत्ता, शून्यस्य तु संवित्तत्त्वस्य भावाः स्वात्मना अहम्भावेन यतो
भान्ति ततः पूर्णा—अपरिच्छिन्नस्वरूपेयत्ताकाः, यतः स्वात्मा तस्य तथाभूत एव इति समुच्चयो-
पमा, तदुक्तं ‘अपूर्वापरं हि इदं मूर्तितः क्रियातश्च सर्वं सर्वतः पूर्णम्’ इति क्रियाप्रसङ्गात् इह
कालक्रमः प्राकरणिको दृष्टान्तत्वेन एतत्प्रसङ्गात् देशक्रमो निरूपितः, दृष्टान्तश्च पूर्वं वाच्य, इति
वैचित्र्यनिरूपणावसरे देशक्रमस्य आदौ अभिधानं न्याय्यम्, उपसंहारे तु प्राकरणिकस्य कालक्रम-
स्यैव आदौ निर्देशः, पश्चात्तु प्रासङ्गिकस्य देशक्रमस्य इति ॥ ६-७ ॥
ननु एवं सत्ये प्रमातरि भगवति नास्त्येव क्रिया, इति आयातं—कालक्रमाभावात्, क्रमा-
श्रयेण च तस्या अवस्थानात् ? इत्याशङ्क्याह—
होनेवाला आभास नहीं था, इस वाचिक-युक्ति से अविच्छिन्न आभासवाला प्रमाता ज्ञानरूप है
उसके अपने स्वरूप में कालक्रम रहता है और न तो उसकी अपेक्षा से वेद्य भाव-समूह में जाता
है, उसमें तो वह अभेदभाव से भासता है । [ ‘अथ द्वितीयश्लोकव्याख्या एवमिति देशक्रम-
स्यापि एषैव सरणिरित्यर्थः’ ] अब द्वितीय श्लोक की व्याख्या की जाती है—इस प्रकार देशक्रम
का भी यही मार्ग है । इसी प्रकार से देशक्रम भी सङ्कुचित-परिच्छिन्नरूप शून्यादि से लेकर देह
पर्यन्त अपने में भासता है ‘इह तिष्ठामि’ अर्थात् यहाँ पर बैठा हूँ और यह अपनी स्वयं की अपेक्षा
से होता है, पदार्थों में भी जो मेरे संयोग से मिला रहता है वह उससे निकटवर्ती कहलाता है
और इससे भिन्न रहता है, वह दूर कहलाता है, इतना ही अपरिच्छिन्नता का स्वरूप माना जाता
है, शून्य संवित्तत्त्व में तो सम्पूर्ण पदार्थ अहम्भाव से भासते हैं इसी से ये सभी पूर्ण हैं और
अपरिच्छिन्न स्वभाववाले हैं; क्योंकि उसका अपना स्वरूप वैसा ही है । ‘अपरिच्छिन्नस्वरूपेयत्ताकाः
एव’ अर्थात् अपरिच्छिन्न स्वरूपवाले ही हैं, इस प्रकार यह समुच्चय उपमा अलङ्कार है, इस
विषय में कहा भी गया है—‘मूर्ति में तो दूरत्व-समीपत्वादि एवं पूर्वोत्तर-रूपत्व रहता है और
क्रिया में भूत-भविष्यदि काल रहता है । किन्तु यह तो सब से परिपूर्ण है इसमें न तो दूर-समीपत्व,
पूर्वोत्तरत्व है और न तो भूत-भविष्यदि ही हैं । इन सबों से रहित है । इसलिए यह चारों ओर
से पूर्ण है । इस प्रकार क्रिया के प्रसंग को लेकर कालक्रम प्रकरण के अनुसार दृष्टान्त द्वारा
निरूपण किया गया है । इसी कालक्रम के प्रसंग से देशक्रम का भी निरूपण हो गया और
दृष्टान्त को पहले देना चाहिए, मूर्ति की विचित्रता के निरूपण काल में ही सर्वप्रथम देशक्रम का
अभिधान करना समुचित माना जाता है, उपसंहार काल में तो ‘सर्वत्राभासभेदोऽपि’ प्राकरणिक
इस कालक्रम को लेकर प्रारम्भ में ही निर्देश कर दिया है, किन्तु पश्चात् तो प्रसंग से आनेवाले
देशक्रम का ही निरूपण हुआ है ॥ ६-७ ॥
अब शङ्का करते हैं कि इस प्रकार परमार्थ प्रकाशरूप भगवान् में क्रिया ही नहीं रहती
है, यह तो स्वयं प्राप्त है—कालक्रम का अभाव होने से और क्रम का आश्रय लेकर ही क्रिया
रहती है । इस आशङ्का का उत्तर देते हैं—

अ.-२, आ.-१, का.-८ ] विमर्शिनीटीकोपेटा [ १८१
किं तु निर्माणशक्तिः साप्येवं विदुष ईशितुः ।
तथा विज्ञातृविज्ञेयभेदो यदवभास्यते ॥ ८ ॥
इह तत्त्वतः परमेश्वरस्य अप्रतिहतस्वातन्त्र्यरूपाविच्छिन्नस्वात्मविमर्शनयी अनन्योन्मु-
खतारूपा इच्छैव क्रिया, इति उपसंहरिष्यते अधिकारान्ते । एवम् इच्छैव हेतुता कर्तृता क्रिया
इति, चैत्रमैत्रादेरपि पचामि इति यैव अन्तेरिच्छा सैव क्रिया, तया च अधिश्रयणादिबहुतरस्पन्दन-
सम्बन्धेऽपि पचामि इति नास्य विच्छिद्यते, यत्तु पचामि इति इच्छारूपं तदेव तथा स्पन्दनात्म-
तया भाति, तत्र तु न कश्चित् क्रमः तत्त्वतः । एवम् ईश्वरस्यापि 'ईशे भासे स्फुरामि घूर्णे
प्रत्यवमृशामि' इत्येवंरूपं यत् इच्छात्मकं विमर्शनम् 'अहम्' इत्येतावन्मात्रतत्त्वं न तत्र कश्चित्
क्रमः, एतदेव च उच्यते—प्रमातृप्रमेयवैचित्र्यक्रम उल्लसतु अमुना वाक्येन, तदत्रापि न कश्चित्
क्रमः, यदा तु इच्छारूपं 'पचामि' इति स्पन्दनात्मतां कायपर्यन्तां गतं क्रमारूषितम् आभाति तदा
भगवदिच्छा प्रमातृप्रमेयभेदपर्यवसिता तत्क्रमोपश्लिष्टा भाति—दर्पणतलमिव विततप्रवहन्नदी-
प्रवाहक्रमसमाश्लिष्टम्, अत्र च केवलं दर्पणस्य तथा इच्छा नास्ति, परमेश्वरस्य तु सा अस्ति—
विद्वान् ईश्वर की वह निर्माण-शक्ति है । जिससे विज्ञाता और विज्ञेय का भेद अवभासित
होता है ॥ ८ ॥
वस्तुतः परमेश्वर की अबाध्य-गति परम स्वातन्त्र्यरूप, अविच्छिन्न स्वात्मविमर्श करने-
वाली, किसी अन्य की ओर उन्मुखता न रखनेवाली इच्छा-शक्ति ही क्रिया कही जाती है, इसका
हम अधिकार के अन्त में उपसंहार करेंगे । इस प्रकार इच्छा-शक्ति ही हेतुत्व एवं कर्तृत्वरूप से
क्रिया होती है, जैसे—चैत्र-मैत्रादि में मैं पकाता हूँ, ऐसा जो भीतरीभाव है वही इच्छा-शक्ति ही
क्रिया कहलाती है, चूल्हे पर बटलोई को रखना और आग लगाना इत्यादि सम्बन्ध में सभी
जगह पकानारूप क्रिया ही बनी रहती है उसका कभी-भी विच्छेद नहीं होता, उसकी जो इच्छा
थी, वही तो इन पकाने आदि रूपों में स्पन्दात्मकरूप से भासती है, परमार्थतः उसमें कोई क्रम
नहीं रहता । ऐसा ही ईश्वर का भी क्रम है 'मैं समर्थ हूँ, मैं भासित हो रहा हूँ, मैं स्फुरित हो
रहा हूँ, मैं घूम रहा हूँ, मैं अपने को समझ-बूझ रहा हूँ, यह सब जो भी विमर्श है उसे 'अहम्'
कहा जाता है। इन सब में कहीं पर भी क्रम से उपहित नहीं होते हुए दिखते, इसी बात को बतलाते
हुए कहते हैं—प्रमाता एवं प्रमेय का विचित्र्यभावपूर्वक क्रम इस वाक्य के द्वारा उल्लसित होवें,
इसलिए यहाँ पर भी कोई क्रम नहीं दिखता, किन्तु जब इच्छारूप 'पचामि' ऐसा कहकर स्पन्दन-
रूपता को लेकर शरीर पर्यन्त परिणित होता हुआ क्रमरूप से युक्त भासता है तभी भगवान् की
इच्छा-शक्ति प्रमाता एवं प्रमेय के भेद तक जानेवाली उस क्रम से मिली हुई भासती है—जैसे
दर्पण तल में बृहद्रूप से बहता हुआ नदी का प्रवाह क्रम हो, [ तेनोपरागात् सक्रमं यथा
स्फटिकादौ जवाकुसुमः । उसके साथ संपर्क होने से क्रमवाला दिखायी पड़ता है जैसे स्फटिकादि
मणियों में जवापुष्प का प्रतिबिम्ब पड़ा हुआ ।]
१. केवल इतना ही देश-काल का क्रम नहीं है जिससे कि देश-काल के क्रम न रहने के कारण क्रिया का
अभाव हो जाय, किन्तु वही उसे अवभासन करनेवाली क्रिया-शक्ति है, इस प्रकार श्लोक में उद्धृत
'किन्तु' शब्द से द्योतित होता है ।

१८२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-१, का.-८
इति उभयथा अस्य क्रियाशक्तिः 'क्रमरूपक्रियानिर्माणसामर्थ्यं क्रमरूपक्रियोपरागरूपयोगश्च' इति ।
एवं देशक्रमेऽपि वाच्यम्, तत्र तु अस्य चिच्छक्तिः उच्यते अन्यैः, इह तु क्रियाशक्तिरेव सा
स्वीकृता, इति—पिण्डार्थः ।
अक्षरार्थस्तु—तथा इति स्वरूपभेदेन देशक्रमकारिणा क्रियाभेदेन च कालक्रमसम्पादकेन
उपलक्षितो यो विज्ञातुः शून्यादेः प्रमातुः भेदोऽन्योन्यं ज्ञेयाच्च, एवं घटादेः परस्परं ज्ञातुश्च स
भगवता अवभास्यते, यत् तदवभासनं सा ईशितुरपि निर्माणशक्तिः क्रियाशक्तिः न तु केवलं
शून्यादेरेव क्रिया, यतश्च तन्निर्मितं ज्ञातृज्ञेयक्रियावैचित्र्यभेदम् असौ विद्वान् वेत्ति अनवरतम्
तत्रैव हि तत् स्फुरति ततोऽपि तस्य सा क्रियाशक्तिः अतो भासनविच्छेदाभावात् क्रमाभावे
स्थूलदृष्ट्या यद्यपि अस्य भवेत् क्रियानुपपत्तिशङ्का, किं तु एवमस्य क्रियाशक्तिरुपपन्ना—इति
संगतिः । इति शिवम् ॥ ८ ॥ आदितः ९७
इति श्रीमदाचार्योत्पलदेवपादविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञायां श्रीमदाचार्याभि-
नवगुप्तपादकृतविमर्शिन्याख्यटीकोपेतायां क्रियाधिकारे
क्रियाशक्तिनिरूपणं नाम प्रथममाह्निकम् ॥ १ ॥
इसमें भेद इतना ही है कि दर्पण की वैसी कोई इच्छा विशेष नहीं रहती, किन्तु परमेश्वर
में तो वैसा करने की इच्छा-विशेष होती है—इस प्रकार दोनों रूपों में इसकी क्रिया-शक्ति रहती
है। इसी विषय को लेकर कहते हैं कि क्रमरूप क्रिया के निर्माण का सामर्थ्य बल और क्रमरूप
क्रिया के उपराग का सम्बन्ध उसमें रहता है। एवं देशक्रम में भी लगा लेना चाहिए, कुछ लोग
तो उसमें परमेश्वर की चेतन-शक्ति रहती है—ऐसा मानते हैं, किन्तु हम लोगों ने तो क्रिया-शक्ति
को ही माना है, इतना ही इसका संक्षेप में अर्थ है।
अब अक्षर सम्बन्धी अर्थों की व्याख्या करते हैं—'तथा इति' स्वरूप का भेद हो जाने से
देशक्रम हो जाता है और क्रिया का भेद हो जाने से कालक्रम के सम्पादक से युक्त विज्ञाता,
शून्यादि, प्रमाता के भेद और ज्ञेय से भी परस्पर भेद हो जाता है। इस प्रकार घटादि 'ज्ञेय'
का परस्पर भेद ज्ञाता से और वह भगवान् के द्वारा ही भासित होता है। वह अवभासन ही
ईश्वर की निर्माण-शक्ति क्रिया शक्ति बन जाती है। केवल शून्यादि प्रमाताओं की ही क्रिया
नहीं होती, अपितु उसमें ज्ञाता एवं ज्ञेय की क्रिया भेद का विचित्र निर्माण भी होता है। विद्वान्
व्यक्ति ही इस विषय को अच्छी तरह जानता है उसी में ही निरन्तर स्फुरित होता रहता है
इसलिए भी उसकी वह क्रिया-शक्ति है। अतः इस अवभासन का अभाव न होने से क्रमाभाव रहता
है, यद्यपि स्थूल-दृष्टि से तो इसमें क्रिया-शक्ति की अनुपपत्ति की शंका हो सकती है; किन्तु इसमें
क्रिया-शक्ति का योग बना ही रहता है। यही संगति बैठती है ॥ ८ ॥
प्रथम आह्निक समाप्त
१.. इसलिए यही सिद्ध होता है कि सर्वत्र यह क्रिया-शक्ति ही स्वयं अक्रमरूप होकर उपराग के कारण
क्रमरूपता को प्राप्त करती है। इसका शुद्ध क्रमरूप होना व्यापक नहीं माना जाता है, जिससे कि
व्यापक की अनुपलब्धि से भगवान् में क्रिया का निषेध हो ।

अथ द्वितीये क्रियाधिकारे भेदाभेदविमर्शानाख्यं
द्वितीयमाह्निकम्
विरोधमविरोधं च स्वेच्छयैवोपपादयन्।
भेदाभेदौ च यो मन्त्रतत्त्ववित् तं स्तुमः शिवम् ॥ १ ॥
यदुक्तम्—अप्रतिहतसामर्थ्यात् भगवतो निर्माणशक्तिः इति, तदेव बाह्यवाददर्शनान्रुपपद्य-
मानक्रियासंबन्धसामान्यादिपदार्थराशिसमर्थनमुखेन निर्वाहयितुं 'क्रियासंबन्धसामान्य............'
इत्यादि '...................तेन न भ्रान्तिरीदृशी।' इत्यन्तं श्लोकसप्तकेन आह्निकं प्रस्तूयते। तत्र
प्रथमश्लोकेन सूत्रकल्पेन 'एकानेकरूपस्य क्रियादेः बाह्यवादे विरुद्धधर्माध्यासदोषेणानुपपद्य-
मानस्याप्यवश्यसमर्थनीयं वपुः' इति दृश्यंते। द्वितीयेन 'तत्र उपपत्तिः' सूच्यते। तृतीयेन
'निर्विकल्पकसंवेदनसंवेद्यत्वेऽपि विकल्पकाले एव स्फुटमेषां रूपम्' इत्युच्यते। चतुर्थपञ्चमाभ्याम्
'एकानेकस्वरूपताया विषयविभागः' चिन्रत्यते। षष्ठेन 'ग्रहणकसूत्रसूचितसंबन्धस्वीकृतानां क्रिया-
कारकभावादीनां स्वरूपम्' उच्यते। सप्तमेन 'अर्थक्रियोपयोग' इति संक्षेपः। ननु एवं तया
निर्माणशक्त्या अवभासनारूपया यत् निर्मीयते तस्यावभासनैव निर्माणं, न अन्यत्, सा च
जो विरोध और अविरोध को तथा भेद और अभेद को अपनी इच्छामात्र से ही संपादन
करते हैं; उस मन्त्र तत्त्ववेत्ता शिव की हम स्तुति करते हैं ॥ १ ॥
जिसके विषय में कहा गया है कि अप्रतिहत सामर्थ्यवाले भगवान् की निर्माण-शक्ति अर्थात्
जिसका अप्रतिहत स्वातन्त्र्य रहता है ऐसी वह निर्माण-शक्ति है। जो कि जगत् का निर्माण करती
रहती है, इसी को न्यायादि दर्शनों के सिद्धान्तों में नहीं घटनेवाली निर्माण-शक्ति कहा जाता है
और क्रिया सम्बन्ध का सामान्यादि पदार्थ-समूह के पहले समर्थन करते हुए निर्वाह करने के लिए
क्रियासम्बन्धसामान्य .....' । इत्यादि से लेकर '.....तेन न भ्रान्तिरीदृशी।' इन सात श्लोकों
से इस आह्निक का प्रस्ताव करते हैं। प्रथम श्लोक से सूत्ररूप में हो 'एकानेकरूपस्य क्रियादेः-
बाह्यवादे विरुद्धधर्माध्यासदोषेणानुपपद्यमानस्याप्यवश्यसमर्थनीयं वपुः' अर्थात् एक एवं अनेक-
रूप क्रियादि का बाह्यवाद में विरुद्धधर्म के अध्यास का दोष दिखा करके नहीं घटनेवाले पदार्थों
का भी अवश्य समर्थन करनेवाला विषय दिखायेंगे। द्वितीय श्लोक से 'तत्र उपपत्तिः' उसमें
[ समर्थन की ] उपपत्ति दिखायेंगे। तृतीय श्लोक से 'निर्विकल्पकसंवेदनसंवेद्यत्वेऽपि विकल्पकाले
एव स्फुटमेषां रूपम्' अर्थात् निर्विकल्पक ज्ञान संवेद्य वस्तु के भी विकल्पकाल में भी पदार्थों
का स्फुटरूप रहता है [ निर्विकल्पक अनुभव के वेद्यकाल में यह पदार्थ वर्ग जिस स्थिति
में रहता है उसी प्रकार विकल्पकाल में भी स्फुटरूप से रहता है ] यह दिखायेंगे। चतुर्थ एवं
पञ्चम श्लोक से एकत्व और अनेकत्व का विषय विभाग करते हुए उन पर विचार प्रकट करेंगे।
षष्ठ श्लोक द्वारा 'ग्रहणकसूत्रसूचितसंबन्धस्वीकृतानां क्रियाकारकाभावादीनां स्वरूपम्' अर्थात्
'ग्रहणक सूत्र से सूचित सम्बन्धों का जो क्रियाकारकादि भाव है उनका स्वरूप' कहेंगे। सप्तम
श्लोक से 'अर्थक्रियोपयोगः' अर्थात् अर्थ क्रिया का उपयोग इस प्रकार संक्षेप में कह दिया। अत्र
शङ्का उठती है कि इस प्रकार उस निर्माण-शक्ति से, जो कि निरन्तर अवभासित होती रहती है,

१८४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-१
द्विचन्द्रादेरपि अस्ति, नीलादेरपि, नीलादिनिष्ठस्य कर्मसामान्यसंबन्धादेरपि ततश्च 'असत्यं सत्यं
संवृतिसत्यमिति' य एवंप्रायेषु व्यवहारः स कथं संगच्छेत—निर्मेयत्वाविशेषात् ? इत्याशङ्क्य—
‘क्रियादीनामसत्यत्वं तावत् नोपपन्नम्’ इति वदन्—द्विचन्द्रादीनां तु इत्थमपि असत्यत्वम्,
इति सूचयन् आह—
क्रियासम्बन्धसामान्यद्रव्यदिक्कालबुद्धयः ।
सत्याः स्थैर्योपयोगाभ्यामेकानेकाश्रया मताः ॥ १ ॥
चित्तत्त्वात् अन्यत्र या क्रियाबुद्धिः कर्तृकर्मकरणादिषु 'चैत्रो व्रजति' 'तण्डुला विक्लिद्यन्ते'
‘एधा ज्वलन्ति’ इति, तस्या एकानेकरूपश्चैत्राद्यर्थ आश्रय आलम्बनम्, तथाहि—तत्तद्देशकाला-
कारभिन्नः तत्र चैत्रदेहोऽनेकस्वभावोऽपि 'स एवायम्' इति एकरूपताम् अपरित्यजन्नेव निर्भासते,
स एव च एकानेकरूपोऽर्थः क्रिया तथैव प्रतिभासनाच्च पारमार्थिकी, द्विचन्द्रादि तु तथा भास-
जिसका भासना ही एक प्रकार निर्माण माना जाता है, अवभासन से अतिरिक्त नहीं, और वह
तो द्विचन्द्रादि में भी भासन-शक्ति रहती है, एवं नील-सुखादि में भी होती है, नीलादि-पदार्थों
में रहनेवाले कर्म [ क्रिया ] सामान्य [ जाति ] के सम्बन्ध में भी रहती है और इससे सिद्ध होता
है कि 'असत्य, सत्य और संवृत्तिसत्य ये जो तीन प्रकार के व्यवहार देखे जाते हैं वे कैसे संभव
हो सकते हैं; क्योंकि सब जगह निर्माण तो एक सा ही दिखायी पड़ता है ? अर्थात् सर्वत्र द्विचन्द्रादि
में भी तो अवभासन एक सा ही होता हुआ दिखायी देता है ] ऐसी आशङ्का कर ‘क्रियादि
का जो सत्यत्व है वह उपपन्न नहीं होता’, यह कहते हुए—किन्तु द्विचन्द्रादि में तो सब तरह
असत्यत्व सिद्ध होता है, यह सूचना देते हुए कहते हैं—
स्थिरता एवं उपयोग के द्वारा, क्रिया और उसका द्रव्यों के साथ सम्बन्ध तथा जाति, द्रव्य,
दिशा, कालादि का ज्ञान, ये सभी प्रायः सत्य ही है; एक या अनेक दोनों के आश्रय से माने हुए हैं ॥१॥
चेतन में क्रिया नहीं रहती, अन्यत्र कर्ता, कर्म, करणादि में तो क्रिया बुद्धि रहती है 'चैत्रो
व्रजति' चैत्र जाता है, 'तण्डुला विक्लिद्यन्ते' चावल पक रह हैं, 'एधा ज्वलन्ति' लकड़ियाँ
जलती हैं इत्यादि, उसका एक या अनेकरूप से चैत्रादि के अर्थ का विषयत्व होता है । देखिये—
वहाँ पर उन-उन देश, काल एवं आकारों से भिन्न चैत्र का देह अनेक रूपों में रहता हुआ
‘स एवायम्’ वही यह चैत्र है, इस प्रकार एकरूपता को न छोड़ता हुआ ही निर्भासित होता
रहता है और एक से अनेक रूपों में भासित होना ही क्रिया है, उसी प्रकार वह भासित होने से
१. निर्माण-शक्ति का अवभास क्रम तो देखा जाता है और नीलादि-पदार्थों में भी रहनेवाले कर्म-सामान्यादि
का व्यवहार कैसे रहेगा ? दो चन्द्रमा में तो असत्यरूप से रहते हैं, नीलादि-पदार्थों में सत्यरूप से रहती
हैं और क्रियादि में संवृत्ति सत्यरूप से रहती हैं, जैसे रूपादि पदार्थ भिन्न-भिन्न रहते हुए भी ज्ञान को
उत्पन्न करते हैं और बहुत से परमाणु समूह नियम से अर्थक्रिया संपादित करते हैं तथा भिन्न-भिन्न
क्षणों का समुदाय ओदनरूप फल को निष्पत्ति कर देता है, उसी प्रकार संवृत्ति सत्य भी है, जैसे अपने
धर्म से अर्थ का अवच्छेदन कर दूसरे स्वरूप में परिणत कर देती है जिस कारण धर्म से आवृत हो जाता
है, इस प्रकार संवृत्तिसत्य भ्रान्ति से भिन्न है, संवृत्तिसत्य ही कुछ नहीं होता—क्योंकि सामान्यादि का
सत्यत्व उसमें रहता है, द्विचन्द्रादि तो असत्य ही होता है ।

अ.-२, आ.-२, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १८५
मानमपि उत्तरकालं प्रमाव्यापारानुवृत्तिरूपस्य स्थैर्यस्य उन्मूलनेन 'द्विचन्द्रो नास्ति' इत्येवंरूपेण
असत्यम्, इह पुनः 'चलति चैत्रः' इत्येवंभूतो विमर्शः अनुवर्तमानो न केनचित् उन्मूल्यमानः
संवेद्यते, द्विचन्द्रादि च यद्यपि ह्लादोद्वेगयोः उपयुज्यते, तथापि द्विचन्द्राभिमानी न तावतीं तत्र
अर्थक्रियाम् अभिमन्यते अपि तु यादृशी एकेन शशिना कर्तव्या-तिमिरापसारणादिरूपा,
तादृश्येव अपरेण, इति न तद्दिगुणाम् अर्थक्रियाम् तत्र अध्यवस्यति, तस्यां च असौ न उपयुज्यते,
व्रज्यायां तु यामेव ग्रामप्राप्तिम् अध्यवस्यति तस्याम् अविकलायाम् उपयोगोऽस्या, इति-
स्थैर्यात् उपयोगच्च एकानेकरूपक्रियातत्त्वावलम्बना बुद्धिः सत्यैव, एवं संबन्धादिषु कालपर्यन्तेषु
वाच्यम् उत्तरकारिकासु स्फुटीभविष्यति ॥ १ ॥
ननु एकत्वम् अनेकत्वं च परस्परं विरुद्धे, कथम् एकत्र वस्तुनि स्यातां, ततश्चायं बाधक-
प्रमाणकृतः स्थैर्योन्मूलनप्रकारः ? इत्याशङ्कयाह-
तत्रैकमान्तरं तत्त्वं तदेवेन्द्रियवेद्यताम् ।
संप्राप्यानेकतां याति देशकालस्वभावतः ॥ २ ॥
इह तावत् चैत्रे चलति दृष्टे न जातुचित् न चलति अयम् इति बुद्धिः जायते-न रजतम्
इतिवत्, द्विचन्द्रेऽपि नायं द्विचन्द्रः तिमिरवशात्, अहम् उपप्लुतनायनः परम् एवं वेद्मि इति भवति
ही पारमार्थिक कही जाती है किन्तु द्विचन्द्रादि तो वैसा भानमान होता हुआ भी उत्तरकाल में
यथार्थ प्रमाज्ञान के हो जाने पर उन्मूलित हो जाता है, जिससे 'द्विचन्द्रो नास्ति' ऐसा बोध होने
लग जाता है इसी कारण असत्य माना जाता है, क्रिया में तो 'चलति चैत्रः' अर्थात् चैत्र जाता
है, ऐसा जो विमर्श होता है उसका उन्मूलन कोई कभी भी नहीं करता हुआ जाना जाता है ।
यद्यपि द्विचन्द्रादि आनन्द एवं उसके अभाव उद्वेग का उपयोगी होता है, तो भी 'द्विचन्द्रादि' का
अभिमान करनेवाला मानता है कि यह 'द्विचन्द्रः' है, उतनी अर्थक्रिया का उसमें अभिमान नहीं
रहता; जितना एक चन्द्रमा से अन्धकार दूर करना रखता है, वैसी दूसरे चन्द्रमा से नहीं होती,
दुगुनी अर्थक्रिया 'प्रकाश' देने में उसे विश्वास नहीं होता; क्योंकि वह इसके लिए उपयोगी नहीं
है, इसीलिए उसमें असत्य बुद्धि उत्पन्न होती है, किन्तु चैत्र विषयक गमन में तो ग्राम की प्राप्ति
में अर्थक्रिया प्रत्यक्ष फल के रूप में दिखायी देती है, उपयोग भी तो अर्थक्रिया का सत्य अविकल
है, इसलिए स्थैर्य और उपयोगी होने के कारण एक और अनेकरूप क्रियातत्त्व का आलम्बन
करनेवाली बुद्धि सत्य ही होती है, इस प्रकार सम्बन्धादि से लेकर काल पर्यन्त कहना चाहिए
यह बात हम आगे कारिकाओं में स्पष्ट करेंगे ॥ १ ॥
अब प्रश्न करते हैं कि एकत्व और अनेकत्व इन दोनों का स्वभाव परस्पर विरुद्ध सा ही
लगता है; एक ही वस्तु में दोनों कैसे रह पायेंगे ? इसलिए स्थिरता के खण्डन करने का प्रकार
बाधक मूलक है ? इस पर आशङ्का कर कहते हैं-
उसमें एक ही आन्तरिक तत्त्व इन्द्रियों के द्वारा वेद्य होकर देश और काल के स्वभाव भेद
से अनेकरूपता को प्राप्त कर लेते हैं ॥ २ ॥
चैत्र चलता है-इस प्रकार देखने पर नहीं कह सकते हो कि यह नहीं चलता है; ऐसी
बुद्धि नहीं उत्पन्न होती, जैसी शुक्तिका को देखने पर यह रजत नहीं है, दो चन्द्रमा को भी देख
२४

उन्मूलनाबुद्धिः, यत्तु उक्तम्—एकमेव कथम् अनेकं भवति इति, तत्र उच्यते—इह कारणमेव
कथम् अकारणं भवति, अथ उच्यते—विषयभेदात् तथा, इति तद्विषयभेदे एतत् न विरुध्यते,
इति केन अयं विनीर्णो वरः ? संवेदनेन इति चेत् ‘चलति’ इत्यादौ संवेदनमेव अस्माभिः प्रमाणी-
कृतं किमिति न सह्यते, विषयभेदोऽपि च अत्र वक्तुं न शक्यते, तथाहि—आभासान्तरेण असंभेदने
तदेकाभासमात्रम्, अत एव अन्यापेक्षावियोगात् अन्तरङ्गत्वात् आन्तरम् अनुवर्तमानं तथाभूता-
भासमात्रग्रहणोचितान्तःकरणवेद्यतया च आन्तरं तथा स्वरूपापरिच्युतेः तत्त्वम् आभासान्तर-
योगेन तननसहिष्णुत्वाच्च तत्त्वम् ‘एकम्’ इति प्रतीयते, तदेव देशाभासेन इह अमुत्र इति,
कालाभासेन अधुना तदानीमिति, स्वभावाभासेन कृशः स्थूल इत्यादिना, मिश्रतया अनेकमिति
बाह्येन्द्रियवेद्यतायां प्रतीयते, तथा ‘स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य…………… १’ इति उक्तनीत्या विश्वमेव
आन्तरं सत् एकम्, तदेव सान्तर्विपरिवर्तिनः उभयेन्द्रियवेद्यत्वम्, इति वक्ष्यमाणकार्यकारणभाव-
तत्त्वदृष्ट्या इन्द्रियवेद्यतायामनेकम्—देशाद्याभासमिश्रणात् इति, एकत्वम्—आभासान्तरामिश्र-

कर यह ‘द्विचन्द्रः’ नहीं हैं, ऐसा बोध अपने को हो जाता है; नेत्र दोष से दूषित होने के कारण
मैं चकाचौंध हो गया हूँ, इसलिए ऐसा समझता हूँ अतः यह दो चन्द्रमा नहीं हैं—ऐसी बुद्धि हो
जाती है, किन्तु यह जो कहा गया है कि एक ही अनेक कैसे हो जाता है, वहाँ पर यह कहना है
कि कारण [ बीजादि ] कैसे अकारण [ अङ्कुरादि ] बन जाते हैं, इसके समाधान में उत्तर देते हैं
कि विषय भेद से वैसा हो जाता है, [ कारण-अकारण ] विषय के भेद हो जाने पर कोई विरोध
नहीं होता, यदि यह कहो कि विषय भेद से ऐसा हो जाता है तो मैं भी कहूँगा कि यह भी तो
विषय भेद से हो जाता है, इसको किसने वरदान दिया है कि यह इसके लिए नहीं होगा ? यदि
कहो कि संवेदनरूप ज्ञान से ऐसा होता है तब तो हम लोगों ने भी ‘चलति’ इत्यादि ज्ञान को जो
प्रमाणित किया है इसको क्यों नहीं मान लेते हो ? इसमें विषय भेद भी नहीं हैं, ऐसा नहीं कह
सकते, देखिये—दूसरे आभास से न ज्ञान होने पर एक ही आभास मात्र रहता है, इसीलिए किसी
अन्य की अपेक्षा न रहने के कारण अन्तरंग हो जाने से वह अपने भीतर स्थिर रहा करता है ।
उसी प्रकार आभास ग्रहण में समर्थ अन्तःकरण से वेद्य होकर उसका अपने स्वरूप से च्युत न होना
ही आन्तरतत्त्व कहलाता है; उसको तत्त्व इसलिए कहते हैं कि दूसरे आभास के सम्बन्ध से अपने
विस्तार को सह सकता है जिससे ‘एकम्’ एक प्रतीत होता है, उसी को देश आभास से यहाँ और
वहाँ कहा जाता है, काल आभास से ‘अधुना’ अब और ‘तदानीन्तन’ तब कहा जाता है, स्वभाव
के आभास से कृश एवं स्थूल इत्यादिरूपों से कहा जाता है, मिले-जुले अनेकरूपों में बाह्येन्द्रियों के
ज्ञान से प्रतीत होते हैं, वैसा कहा भी है ‘स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य’ अर्थात् अपनमें रहनेवाले स्वामी
का……। इस कही हुई नीति से यह सारा का सारा विश्व ही आन्तरतत्त्व में एक सद्रूप होकर
रहता है, उसी अन्तर्वर्ती परिवर्तन के साथ दोनों इन्द्रियों से वेद्य होकर आगे कहनेवाले कार्य-
कारणभाव यथार्थ दृष्टि से इन्द्रियों के द्वारा वेद्य होने पर अनेकता को प्राप्त हो जाते हैं—देशादि
आभास के मिल जाने से, ‘एकत्व’—दूसरे आभास के मिल जाने पर केवल अन्तःकरण से वेद्य

१. बाह्य-इन्द्रियों से वेद्य होने के कारण सभी प्रमाणों का आसाधारण रूप बाहर में रहने पर अकेला आ
जाता है ।

अ.-२, आ.-२, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १८७
ताया अन्तःकरणैकवेद्यत्वे चिन्मात्रतायाम्, अनेकत्वं पुनर्—आभासान्तरमिश्रतायाम् उभयकरण-
वेद्यत्वे चिदतिरिक्ताभासने च, इति—स्फुटो विषयभेदः, तस्यैव च तथात्वम् इति परामर्शबला-
देव कारणाकारणवत् उपादानसहकारिवत् । अथ व्यपदेशमात्रम् एतत् 'कारणम् अकारणं च'
इत्यादि, तदिहापि एकमनेकमिति व्यवहारमात्रम्, नीलं पीतम् अविकल्पकं सविकल्पकम् इत्यपि
सर्वं मायापदे व्यवहारमात्रम् इति सर्वं समानम्, तस्मात् एकत्वानेकत्वविरोधो न बाधकः, तदेतत्
एवकारेण उक्तम् । तत्र इति—तेषु क्रियादिषु यत् आन्तरं तत्त्वं तदेव इन्द्रियवेदनीयतां प्राप्य
देशादिभेदात् अनेकतां याति इति संबन्धः, तत्र इति सत्यत्वे स्थिते तयोर्वा एकत्वानेकत्वयोः मध्ये
'एकत्वमेवम् अनेकत्वमेवम्' इति योजना ॥ २ ॥
ननु एवं विषयभेदे अभ्युपगम्यमाने यदा एकं प्रतिभातं भवति तदा न अनेकम्, अनेक-
प्रतिभासे च न एकं प्रतिभातम्, इति कथम् एकानेकरूपं वस्तु स्यात्, तथाहि बाह्येन इन्द्रियेण
होकर चेतन अवस्था में एकता को संपादन कर लेता है। दूसरे आभास के साथ में संयुक्त हो जाने
पर दोनों इन्द्रियों से वेद्य होकर चेतन से भिन्न भासता हुआ स्फुट रूपों में व्यक्त हो जाता है और
इसका स्फुट हो जाना ही विषय भेद माना जाता है। उस विषय भेद का ही एकत्व एवं अनेकत्व
है। इस प्रकार परामर्श के बल से कारण-अकारण के जैसा एवं उपादान सहकारी कारण के जैसा
मात्र कथन में ही भेद रहता है इसके अतिरिक्त कुछ भी भेदभाव नहीं रहता। [जैसा कि सहकारी
सामग्री के अभाव में उपादान का अनुपादनत्व रहता है] पहले कारण और अकारण इत्यादि
कहना। यहां पर भी एक और अनेक का ऐसा व्यवहार ही मात्र होता है, नील-पीत एवं अविकल्प
सविकल्प जितने भी हैं वे सभी मायीय जगत् में व्यवहार मात्र होते हैं—यह सब समान है, इसलिए
एकत्व और अनेकत्व का विरोध बाधक नहीं होता, उसे 'एवकार' शब्द से कहा गया है। उन
क्रियादिओं में जो आन्तरतत्त्व है वह तो एक ही है, वही इन्द्रिय से वेद्य होकर देश-कालादि के
भेद द्वारा अनेक रूपों में विभक्त हो जाता है, यही सम्बन्ध भी है, इसलिए उनकी सत्यता प्रमाणित
हो जाने पर उन एकत्व एवं अनेकत्व के बीच में एकत्व ऐसा होता है तथा अनेकत्व ऐसा होता
है, यह जोड़ देना चाहिए ॥ २ ॥
अब शंका उठती है कि [ विषयभेद से एकत्व और अनेकत्व में कोई भी विरोध नहीं आने
पाता है यह 'ननु' कहकर आक्षेप किया है ] विषयभेद के स्वीकार करने पर जब एक का प्रतिभान
होता है तब अनेक का प्रतिभान नहीं होता और अनेक का प्रतिभान होता है, तब फिर एक का
१. सब ही नील-मधुर-कर्कश इत्यादि पदार्थों की यथार्थतः चिन्मयता होने के कारण, प्रत्येक में उस-उस
धर्मों का योग होने से विश्वरूपता और विश्वशरीरता सिद्ध होती है—इसलिए ईश्वर एवं आत्मा में दोनों
की उभयरूपता का कहना ठीक हो है, एकत्व करना ठीक नहीं है; क्योंकि वह तो द्वित्वादि प्रतियोगी
की अपेक्षा सदा रखता है—अप्रतियोगी में कैसे रहेगा ? इसी को दिखाते हुए कहते हैं 'विश्वमेवान्तरं
सत्' इत्यादि से। जब फिर उस नीलादि-पदार्थों में अभेद की अन्तःकरण वेद्यतया सभी प्रमाताओं की
असाधारणत्व भावपूर्वक मात्र व्यवस्था देखी जाती है। भीतर एकत्वरूप से आभास रहता है और
बाहर में अनेकत्वरूप से हो जाता है इसी बात को 'एकमिति' इस प्रतीक से कहा गया है। उसमें भी
विभाग दिखाते हैं। अन्तःकरण के साथ परिवर्तन होनेवाली उभय इन्द्रियां वेद्य रहती है, अन्तःकरण
की वेद्यता में एकत्व एव बाह्य-इन्द्रियों की वेद्यता में अनेकत्व रहता है।

१८८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-३
चैत्रो विचित्रदेशक्रः परम् अनुभूयते, न तु अनेकाभाससंमिश्रीकारे बाह्येन्द्रियस्य अविकल्पकस्य
व्यापारः—संनिहितविषयबलोत्पत्तेः अविचारकत्वात् इत्याहुः, विकल्पेनापि मानसेन तथाभूतं
वस्तु नैव स्पृश्यते इति कया धिया वस्तु एकानेकरूपं गृह्येत ? इति परव्यामोहनिवर्हणाय आह—
तद्द्वयालम्बना एता मनोऽनुव्यवसायि सत् ।
करोति मातृव्यापारमयीः कर्मादिकल्पनाः ॥ ३ ॥
इह ‘ज्ञानमालाया अन्तःसूत्रकल्पः स्वसंवेदनात्मकः प्रमाता जीवितभूतः’ इति उपपादितं
प्राक्, स च ‘स्वतन्त्र’ इत्यपि निर्णीतम्, स तु विशुद्धस्वभावः शिवात्मा, मायापदे तु संकुचित-
स्वभावः पशुः, तदस्य मनःसमुल्लासावसरे विकल्पभूमिकायां स्फुट उल्लासः, ऐन्द्रियके निर्वि-
कल्पके सदाशिवेश्वरदशाभ्युदयात्, अविकल्पकबोधाबहिर्भूतविमर्शव्यापारस्य पश्चाद्भाविनं
व्यवसायं निश्चयात्मकं विकल्पकम् अनुव्यवसायशब्दवाच्यं विदधदन्तःकरणम् एतान् क्रिया-
सम्बन्धादिविकल्पान् सम्पादयति, ते च विकल्पाः तद्द्वयम् एकत्वानेकत्वरूपम् अवलम्बन्ते, न हि
विकल्पेषु प्रतिभासमानम् अवस्तु तत्—इति हि उक्तम् ‘प्रकाशतैव वस्तुत्वम्’ इति, न च
विकल्पस्य प्रकाशरूपतां मुक्त्वा आरोपणाध्यवसायाभिमानादिनामधेयं व्यापारान्तरं युक्तम्,
नहीं होता, इस प्रकार वस्तु एक—अनेकरूप कैसे होगी ? देखिये—बाह्य-इन्द्रिय [ चाक्षुष अनुभव ]
से चैत्र एक देश को छोड़कर दूसरे देश में चला गया—ऐसी प्रतीति होती है, किन्तु अनेक आभासों
को मिला देने पर बाह्येन्द्रिय जन्य अविकल्पक व्यापार नहीं हो सकता; क्योंकि संनिहित विषय
के बलोत्पत्ति का ज्ञान नहीं होता है, यह कह सकते हैं, मानस विकल्प से भी एक एवं अनेकरूप
वस्तु का बोध नहीं हो सकता तब फिर किस बुद्धि [ अनुभव ] से एक-अनेकरूप वस्तु को ग्रहण
करेंगे ? यह दूसरों के ऊपर मोह के आवरण को हटाने के लिए कहते हैं—
इसलिए अनुव्यवसाय करनेवाला स्थिर मन इन एकत्व और अनेकत्व का आधार लेकर
प्रमाता के व्यापारमय कर्मादि की कल्पना करता है ॥ ३ ॥
यहाँ पर ‘ज्ञानमाला का आभ्यन्तरीय स्वसंवेदनरूप प्रमाता ही जीवन है, इसका हमने
ज्ञानाधिकार के द्वितीय आह्निक में विवेचन कर दिया है और वह ‘स्वतन्त्र’ है इसका भी निर्णय
कर दिया है, वह तो विशुद्ध स्वभाववाला शिवात्मा है, किन्तु मायायी जगत् में तो संकुचित-
परिच्छिन्न स्वभाववाला पशु हो जाता है, इसलिए इसका मन के समुल्लास अवसरकाल में, जो
विकल्प भूमिका है उसमें स्फुटरूप से उल्लास होता है; क्योंकि इन्द्रियजन्य निर्विकल्प दशा में
सदाशिव और ईश्वर दशा का उदय होता है, अविकल्प बोध से बाहर में नहीं होनेवाला जो
विमर्श का व्यापार है उसके बाद में होनेवाला निश्चयात्मक व्यवसायरूप विकल्प को अनुव्यवसाय
शब्द का वाच्य होता है, उसी को करनेवाला अन्तःकरण क्रिया सम्बन्धादि विकल्पों को सम्पादन
करता है, और वे सब के सब विकल्प उन एकत्व और अनेकत्वरूप द्वित्व का ही अवलम्बन करते
हैं, इसलिए विकल्पों में प्रतिभासित होनेवाली अवस्तु नहीं हो सकती; यही हमने कहा है कि
‘प्रकाशतैव वस्तुत्वम्’ आभास को ही वस्तु कहा जाता है और विकल्प के प्रकाशरूप को छोड़कर
आरोप करना, अध्यवसाय करना और अभिमानादि नामक दूसरा व्यापार युक्त नहीं बैठता है,

अ.-२, आ.-२, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १८९

ततोऽबाह्यं बाह्यम् आरोपयन्ति इत्यादि वचोवस्तुशून्यम्, तच्च एतत् उक्तम् 'भ्रान्तित्वे चाव-
सायस्य…………' इत्यत्र। अथ ब्रूयात्—परो यत् इन्द्रियज्ञानेन प्रकाशनीयं स्वलक्षणं तत् कथं
विकल्पः स्पृशेदिति, भवेदेवं—यदि विकल्पो नाम स्वतन्त्रो भवेत्, यावता प्रमातुरसौ व्यापारः
प्रमाता च पूर्वानुभवान्तःस्वसंवेदनरूपः तदस्य च अयमेव पूर्वानुभवसंस्कारो—यत् विकल्पन-
व्यापारकालेऽपि पूर्वानुभवात्मत्वम् अनुज्झन्नेव आस्ते, ततः पूर्वानुभवतादात्म्यापन्नप्रमातृत्त्व-
व्यापारोऽपि विकल्पस्तद्विषय एव, अत एवमुक्तम् आचार्येण—'पूर्वानुभवसंस्कारः प्रमातुरयमेव
सः। यदपोहनकालेऽपि स पूर्वानुभवः स्थितः ॥' इति, तस्मात् प्रमातुः यो व्यापार एकत्वानेकत्व-
संयोजनात्मा स एव प्रकृतो यत्र तादृशीः क्रियादिकल्पना एकानेकवस्तुविषया 'एता' इति
ग्रहणकवाक्यसूचिता मन एव करोति इति स्थितम्, यद्यपि अविकल्पेऽपि सामान्याद्यवभासो
घटमात्रावभासादौ, तथापि न तदा सामान्यादि स्फुटं—समानोपरञ्जकत्वे सम्बन्धिद्वयोद्भूवे
क्रमिकक्षणसन्तानात्यागे अवयवकदम्बकस्वीकारे अवध्यवधिमत्परिग्रहादौ सामान्यसम्बन्धक्रिया-
द्रव्यादिगादिपदार्थस्य परमार्थतः स्फुरणात्, इति, 'मानसविकल्पग्राह्या एकानेकरूपाः सामान्यादय'
इति स्थितम्। एवं च संवृतिः विकल्पबुद्धिः, तद्वशात् उच्यतां संवृतिसत्यत्वं सत्यत्वस्यैव तु प्रकारः
तत्, इति द्विचन्द्रादिवत् न असत्यता ॥ ३ ॥
इसलिए अबाह्यरूप आन्तर तत्त्व को बाह्यरूप में देखते हैं इत्यादि कहना ही वस्तु शून्य हो जाता
है, इसी कारण यह कह दिया है 'भ्रान्तित्वे चावचायस्य ˙।' इस कारिका में अब भी कोई दूसरा
यदि कहे कि जो इन्द्रिय ज्ञान से प्रकाशित होनेवाला निर्विकल्पक ज्ञान है वह कैसे विकल्प को
स्पर्श करेगा, ऐसा तब होता जबकि विकल्प का कोई अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रहता—किन्तु ऐसी
तो कोई बात दिखती नहीं, जब तक प्रमाता का वह व्यापार और प्रमाता दोनों पूर्व स्वसंवेदन-
रूप होते और उसका यह पूर्व के अनुभव संस्कार जो कि विकल्प व्यापार काल में भी पूर्वानुभव-
रूप को नहीं छोड़ता हुआ रहता है, इससे यह सिद्ध होता है कि जब तक पूर्वानुभव अपने
स्वरूप को प्रकाश करता रहता है तब तक ही पूर्वानुभव के साथ तादात्म्य को प्राप्त होकर,
प्रमाता और उसका व्यापार भी विकल्प पूर्व के अनुभव का ही विषय होता है, इसलिए आचार्य
ने कहा कि—'पूर्व के अनुभव का संस्कार प्रमाता का ही विषय है। विकल्प दशा में भी पूर्व का
अनुभव स्थिर रहता है।' इसलिए प्रमाता का जो व्यापार एकत्व और अनेकत्व का संयोजनरूप है
वही प्रकृत प्रसङ्ग में आ रहा है जिसमें ऐसी एक एवं अनेक वस्तु विषयक क्रियादि की कल्पना है,
उसे 'एता' इस शब्द से सूचित किया गया है, जब कि वह मन ही करता है यह बात स्थिर हुई,
यद्यपि अविकल्प दशा में भी केवल घटादि के अवभास में सामान्यादि का अवभास होता है, तो
भी सामान्यादि का उसमें स्फुटाभास नहीं होता; दो सम्बन्धियों से उत्पन्न होनेवाले समानतः
उपरञ्जकता में क्रमिक क्षण-सन्तान छोड़ देने पर एवं अवयव समूह के स्वीकार करने पर अवधि
और अवधिमान् के ग्रहण करने में सामान्य सम्बन्ध, क्रिया, द्रव्य, दिशा, कालादि पदार्थों का
परमार्थतः स्फुरण होने से मानस विकल्प से गृहीत होनेवाले एकरूप और अनेकरूप सामान्यादि
होते हैं यही सिद्ध होता है। इस प्रकार संवृति विकल्पबुद्धि, उसी कारण से संवृति है और
सत्यत्व का प्रकार भी सत्य होता है, उसमें द्विचन्द्रादि की जैसी असत्यता नहीं रहती, अपितु
सत्य रहता हुआ सत्यरूप में भासित भी होता है ॥ ३ ॥

१९० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-२, का.-४
तत्र च अयं संविदवतरणक्रमो—यत् क्रियाशक्तेरेव अयं सर्वो विस्तारः, तत्रापि सम्बन्ध
एव मूलभूतः तथाहि—समानानां यत् एकं भाति तत् सामान्यम्, देवदत्तस्य यत् वैतत्यं सा क्रिया,
अवयवानां यदैक्यं वैतत्यं च देशतः सोऽवयवी, इमम् अवधिं कृत्वा अयम् इत्थम् ततोऽ य अयं
पुरस्तात् इत्यादिर्र्दिक्, अस्यायं क्रियाप्रतानः सहभावेन आस्ते विनाभावेन वा इति वर्तमानादिः
कालः, यावत् हि प्रातिपदिकार्थस्य पृष्ठपाति वपुः भाति तदतिरिक्तं सर्वं सम्बन्ध एव इति
कारकाणामपि सम्बन्धरूपतैव, केवलं क्वचित् असौ सम्बन्धो व्यपदेशान्तरग्रंन्थि सहते, यथा
सास्नादिमतां सम्बन्धो 'गाव' इति एकव्यपदेशसहिष्णुः तत्र सामान्यादिव्यवहारः, व्यपदेशान्तर-
ग्रन्थिभङ्गे तु सम्बन्धवाचोयुक्तिरेव, अत एव मुष्टिप्रस्थपलादिप्रमाणपरिमाणोन्मानरूपं तत्र
अन्तर्गतं वा अणुमहदादि संख्यापृथक्त्वादि च यत् तत् सर्वं सम्बन्धस्यैव विजृम्भितम्, येऽपि
सामान्यादि वस्त्वन्तरम् अमंसत तेऽपि तत्र समवायम् अभ्युपजग्मुः जीवितत्वेन, समवायश्च
सम्बन्धात्मा तदनुग्राह्यो वा केषाञ्चित्, यत आहुः 'तां शक्तिं समवायाख्यामनुगृह्णाति सम्बन्धः।'
इति, यदपि च कारकं तदपि क्रियामुखप्रेक्षि, सापि कालं प्राणेश्वरम् आश्रयति, सोऽपि क्रिया-
द्वारेण सर्वभावान्, सापि सम्बन्धम् उद्धुरयति इति सम्बन्धाधौनैव इयं चित्रा लोकयात्रा, तदाह
इस प्रकार [ क्रियादि संवृतिसत्य में द्विचन्द्रादि के समान असत्यता का निराकरण कर
देने पर ] कहते हैं कि वहाँ पर संवित् ज्ञान का जो क्रम है, वह सब क्रिया-शक्ति का ही विस्तार
है, उसमें भी एक-अनेकरूप सम्बन्ध हो मूलभूत कारण माना जाता है, देखिये — समान पदार्थों में
जो एकरूपता दिखती है वही सामान्य कहलाता है, देवदत्त का विस्तार दिखायी पड़ता है वही
तो क्रिया है अवयव पदार्थों में जो एकता का विस्तार दिखायी देता है वही देशभाव से अवयवी
माना जाता है, इसी को सीमित मान करके यह ऐसा है, इसके पूर्व में यह है, इत्यादि भावों को
लेकर दिशाएँ बन जाती हैं। इसी के साथ क्रिया के विस्तार से वर्तमानादि काल का भाव होता
है, जब तक प्रातिपदिकार्थ पोषक-शरीर का भाव होता है तब तक ही उसकी स्थिति रहती है,
उससे अतिरिक्त सब सम्बन्ध ही रहता है इसीलिए कारकों की भी सम्बन्धरूपता मानी जाती है ।
वह सम्बन्ध केवल कहीं पर ही दूसरे नाप से अभिहित होता है। जैसे सास्नादि के सम्बन्ध से
'गौ' यह नाप कहा जाता है और उसमें सामान्यादि का भी व्यवहार होता है, दूसरा कोई प्रकार
नहीं होता है और यही कहने का व्यवहार जगत् का नियम है, इसलिए एक मुट्ठी, प्रसर, पलादि
परिमाणों से और उसके अन्तर्गत अणु, महान्, संख्या-पृथक्त्वादि जो कुछ छोटा या बड़ा है वह
सब सम्बन्ध को ही लेकर होता है और सारा का सारा विस्तार सम्बन्ध का ही है, [ अधिक
परिमाण, कम-परिमाण, पूरा-परिमाण। लम्बाई चौड़ाई ये सब बाह्य संख्या ही कही जाती हैं ]
जो लोग सामान्यादि [ द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, सम्बन्ध और विशेष ] पदार्थों को दूसरी वस्तु
के रूप में मानते हैं। वे भी उसमें समवाय को ही जीवनरूप से माने हुए हैं और समवाय भी तो
एक प्रकार से सम्बन्धरूप ही है अथवा किसी के मन में समवाय के द्वारा ही उत्पन्न होता है;
क्योंकि उन लोगों का कथन भी है—
सम्बन्ध ही समवाय नामक शक्ति पर अनुग्रह करता है और जो कारक है वह भी तो
क्रिया की उन्मुखता रखता है, क्रिया भी अपने प्राणेश्वर काल का आश्रय लेती है, वह काल भी
क्रिया के द्वारा समस्त पदार्थ राशि को देखता है, इस प्रकार क्रिया सम्बंध को जगाता है,