ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
अ.-१, आ.-६, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२५
श्रोत्रग्राह्यात् शब्दादन्य एव अन्तरवभासमानः संविद्रूपावेशी शब्दनात्माभिलापोवागित्युनेनोक्तः-
वक्ति अर्थं स्वाध्यासेन सोऽयमित्यभिसम्बन्धेन, यदि वाग्वपुः-कस्मान्न विकल्पः ? आह-नह्यस्य
विकल्पलक्षणमस्ति, तथाहि-विविधा कल्पना विविधत्वेन च शङ्कितस्य कल्पोऽन्यव्यवच्छेदं
विकल्पः, विविधत्वं च वह्नाववह्निसंभावनासमारोपनिरासे सति भवत्, द्वयं वह्न्यवह्विरूपमा-
क्षिपति, तेन विकल्पेऽवश्यं तच्च निश्चेतव्यम्-अतश्च व्यपोहितव्यं भवति ॥ १ ॥
तथा च-
भिन्नयोरवभासो हि स्याद्घटाघटयोर्द्वयोः ।
प्रकाशस्येव नान्यस्य भेदनस्त्ववभासनम् ॥ २ ॥
घटे हि दृष्टे घटस्थान एवाघटोऽपि योग्यदेशाभिमतस्थानाक्रमणशीलो विज्ञानजनकः स्व-
कारणोपनीतः संभाव्यते पटादिस्वभावः, अतो घटाघटयोर्द्वयोरवभासस्य संभावनात् समारोपः
सावकाशोभवति, अघटस्य सत्यारोपे निषेधलक्षणोऽपोहनव्यापारः-इति तदनुप्राणिता विकल्प-
रूता घट इत्येतस्य निश्चियस्य, 'लिङ् संभावनायाम्' । यस्त्वयं प्रकाशो नाम तस्य स्थाने यः
संभाव्यते स तावदप्रकाशरूपो न भवति-तुल्यकक्ष्यस्य हि संभावनं भवति, न च यत्प्रकाशेन
कर्तव्यं तदप्रकाशस्य कदाचित् दृष्टं-संभावनारोपणादिबलादेव च अस्याप्रकाशरूपत्वं विघटेट,
करण में भासता हुआ, संविद्रूप में बैठा हुआ शब्दनास्वरूप अभिलाप वाणी शब्द से कहा गया है
अपने अध्यास से वही यह है-इस सम्बन्ध से यदि वचन = वाणी का स्वरूप है तो क्यों नहीं विकल्प
होगा ? उत्तर देते हैं-इसका विकल्परूप नहीं है, क्योंकि अनेकरूप से अनेक प्रकार की कल्पना
और शङ्का से युक्त कल्पना मान लेने पर दूसरे से व्यवच्छेद करना विकल्प कहलाता है, और
विविधता क्या वस्तु है ? उसे कहते हैं-अग्नि में यह अग्नि नहीं है, इस सन्देह को दूर कर देने
पर वह्नि-अवह्निरूप द्वित्व को आक्षेप करना और उस हेतु से विकल्प में द्वित्वरूप का निश्चय
करना होगा । इससे क्या जोड़ेंगे और क्या विभक्त करेंगे एवं क्या हटायेंगे और क्या शङ्का
करेंगे-यही कहना पड़ेगा । विकल्प में द्वित्व का समर्थन करता है ॥ १ ॥
जब घट और घट से भिन्न इन दो भिन्न पदार्थों का अवभास होता है। तब प्रकाश के
जैसा अन्य भेद करनेवाले पदार्थ का अवभासन नहीं होता है ॥ २ ॥
जबकि घट के दर्शन होने पर उसी की जगह घट से भिन्न योग्य देश के अभिमत स्थान
को आक्रमण करनेवाला विज्ञानजनक अपने कारण से प्राप्त किया गया पटादि स्वभावक आलोक
भी सम्भव रहता है, इसलिए घट और अघट दोनों के अवभास की सम्भावना घट में घटभिन्न के
आरोप की सम्भावना उपस्थित हो जाती है, घट से भिन्न का आरोप होने पर निषेधरूप अपोहन
व्यापार होता है इस प्रकार अपोहन व्यापार से अनुप्राणित होकर घट की विकल्परूपता का
निश्चय हो जाता है, 'स्यात्' इस वाक्य में जो 'लिङ्' लकार किया है वह सम्भावना अर्थ में है ।
किन्तु जिसको आप प्रकाश करते हैं उसके स्थान पर जिसकी सम्भावना की जाती है, वह
अप्रकाश नहीं हो सकता; क्योंकि समान स्वरूपवाले की ही सम्भावना होती है, प्रकाश जिस कार्य
को करता है वह अप्रकाश भी करे ऐसा कहीं देखा गया है ? सम्भावना के आरोपण के बल से
ही इस अप्रकाश का विघटन हो सकता है, इसलिए प्रकाश के तुल्य अप्रकाशरूप उसी के सदृश
१२६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-३
अतः प्रकाशनुल्यस्यान्यस्य। प्रकाशरूपस्य भेदिनस्तत्तुल्यकक्ष्यस्यापोहनात्मकभेदनव्यापारासहिष्णो-
रवभासनमेव नास्ति, तदभावे कस्यापोहनम् ? अवभाससंभवेऽपि प्रकाशरूपत्वमेव । न च प्रका-
शस्य स्वरूपदेशकालभेदो—येन द्वितीयः प्रकाश कस्मादपोद्यतेति, हीति—यस्मात् एवं, ततो
द्वयाभावादपोहासंभवे विकल्परूपत्वाभावात् चिन्मात्रे परामर्शात्मनि अहमिति प्रत्यवमर्श एव, न
तु विकल्पः ॥ २ ॥
ननु घटे परिनिष्ठितरूपे दृष्टे तद्दर्शनमुपजीवता विकल्पेन कथमघटस्य निषेधनं क्रियते, न
ह्यघटस्य केनचिन्नामापि गृहीतम्, अघटवासनापि घंटे दृष्टे कथंकारं प्रबुध्यताम् ? सत्यम्—एवं
शाक्यः पर्यनुयोज्यो, न सु वयम्, यतः —
तदतत्प्रतिभाभाजा मात्रैवातद्व्यपोहनात् ।
तन्निश्चयनमुक्तो हि विकल्पो घट इत्ययम् ॥ ३ ॥
इह प्रमाता नाम प्रमाणादतिरिक्तः प्रमासु स्वतन्त्रः संयोजनवियोजनाद्याधारवशात् कर्ता
दर्शितः, तस्य च प्रमातुरन्तः सर्वार्थावभासः, चिन्मात्रशरीरोऽपि तत्सामानाधिकरण्यवृत्तिरपि
दर्पणनगरन्यायेनास्ति—इत्यपि उक्तम् । एवं च तत्प्रतिभां घटाभासम्, अतत्प्रतिभां च अघटाभासं
प्रमाता भजते—सेवते तावत्, तद्विकल्पदशायां चित्स्वभावोऽसौ घटः चिद्देव विश्वशरीरः पूर्णः,
भेद करनेवाला अपोहनरूप भेदन व्यापार को नहीं सहनेवाले का अवभासन नहीं होता है, उसके
अभाव में किस का अपोहन होगा ? अवभास की सम्भावना होने पर भी प्रकाशरूपता ही रहती
है और प्रकाश के स्वरूप में कोई देश-काल का भेद नहीं रहता है जिससे दूसरा प्रकाश एक से
हटाया जा सके, ‘हि’ शब्द का अर्थ है कि जिससे ऐसा हो रहा है इसी कारण द्वित्व के अभाव
से अपोहन की असम्भावना में विकल्परूप के अभाव से चिन्मात्र परामर्श में ‘अहम्’ यही परामर्श
होता है, विकल्परूप से नहीं होता ॥ २ ॥
अब शङ्का करते हैं कि परिनिष्ठित, संकुचितरूप निर्विकल्प घट दशा के देखने पर उसके
उपजीवित विकल्प के दर्शन से घट से भिन्न की निषेधता किस प्रकार करते हैं किसी ने अघट का
नाम भी तो नहीं लिया है, घट से भिन्न की वासना के देखने पर कैसे प्रबुद्ध होगी ? ठीक है—इस
विषय में बौद्धलोगों से ही पूछना चाहिए; हमसे मत प्रश्न करो, क्योंकि—
उसकी प्रतिभा को नहीं प्राप्त करनेवाले, प्रमाता के द्वारा ही उससे भिन्न को ओझल
कर देने पर उससे निश्चय छूटा हुआ ‘घटोऽयम्’ ऐसा कहना ही विकल्प है ॥ ३ ॥
यहाँ पर प्रमाण से अतिरिक्त विषयों में जो स्वतन्त्र रहता है उसी को प्रमाता शब्द से
कहा जाता है जो कि संयोजन-वियोजनादि के आधारभूत होने से कर्ता भी कहा गया है और
उस प्रमाता के भीतर सम्पूर्ण अर्थ का अवभास होता रहता है, चेतन शरीरवाला होता हुआ भी
दर्पण में प्रतिबिम्बित होनेवाली नगरी के समान चेतन आत्मा में सभी पदार्थ प्रतिबिम्बित
रहते हैं—इस विषय में विचार हो गया है और ऐसी परिस्थिति में उसकी प्रतिभा घटाभास है
और जिसमें उसकी प्रतिभा नहीं है उस अघटाभास को प्रमाता प्राप्त करता है अर्थात् घटाभास
और घट से भिन्न पटादि के आभास को प्रमाता प्राप्त कर लेता है, आभास की अविकल्प दशा में
१. सदृश आदि की वासना ही कारण होती है ।
अ.-१, आ.-६, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२७
न च तेन केचिद्व्यवहाराः, तत् मायाव्यापारमुल्लासयन्पूर्णमपि खण्डयति भावं, तेनाघटस्यात्मनः
पटादेश्चापोहनं क्रियते निषेधनरूपं, तदेव व्यपोहनमाश्रित्य तस्य घटस्य निश्चयनमुच्यते ‘घट एव’
इति—एवार्थस्य संभाव्यमानापरवस्तुनिषेधरूपत्वात्, एष एव परितश्छेदात्तत्क्षणकल्पात् परिच्छेदः,
हीति—यत एवं, तस्मात् युक्तं ‘द्वयापेक्षी विकल्प’ इति पूर्वश्लोकोक्ते वस्तुद्वये श्लोकद्वयेन हेतू
क्रमेणोक्तौ, यस्मादेवं विकल्पः ततोऽहमिति शुद्धो विमर्शः न विकल्पः—इति श्लोकत्रयेण महा-
वाक्यार्थः । शाक्यैरपि प्रमातुरेवायं व्यापार उक्तः ‘एकप्रत्यवमर्शाख्य’ इत्यत्र ‘प्रपत्तेति स्वयमिति’
च वदद्भिः, स त्वेतैः कथं समर्थ्यः—इत्यास्तामेतत् ॥ ३ ॥
नन्वेवमहमित्यपि प्रत्यवमर्शोऽनहंरूपस्य घटादेः प्रतियोगिनोऽपोहनीयस्यापोहे विकल्परूपता
कथं न स्यात् ? इत्याशयेनाह—
चित्तत्त्वं मायया हित्वा भिन्न एवावभाति यः ।
देहे बुद्धावथ प्राणे कल्पिते नभसीव वा ॥ ४ ॥
प्रमातृत्वेनाहमिति विमर्शोऽन्यव्यपोहनात् ।
विकल्प एव स परप्रतियोग्यवभासजः ॥ ५ ॥
चित्स्वभाववाले चिदात्मा के जैसा विश्वशरीरूप होता हुआ भी पूर्ण रूप में रहता है और
उसके विकल्परूप होने के कारण कोई भी व्यवहार नहीं होते हैं इसी कारण मायाव्यापार को
उद्बुद्ध करते हुए विश्वशरीर भी प्रमाता पदार्थ को खण्डित कर देते हैं, अघट का जो स्वरूप
पटादि है उसका अपोहन अर्थात् निषेध कर देना, उसी निषेधरूप पट को आश्रय करके घट का
‘घट एव’ शब्द से निश्चयन कहा जाता है। यही अपट वस्तु का निषेधरूप होने से ‘एवं’ अर्थ
की सम्भाव्यमानता कही जाती है, चारों तरफ से हटा देने के कारण परिच्छेद कहा जाता है,
‘हि’ शब्द हेतु अर्थ में है, इसलिए पूर्व श्लोक से प्रत्यवमर्श विकल्परूप में कहा गया है ‘द्वयापेक्षी
विकल्पः’ दो वस्तुओं की अपेक्षा रखनेवाला विकल्प होता है। दो श्लोकों के क्रम से दो हेतु
कहे गये हैं, क्योंकि ऐसा विकल्प है इसलिए अहं यह विमर्श है, विकल्प नहीं है—तीन श्लोकों
से महावाक्यार्थ लक्षित होता है। बौद्धों द्वारा भी यही कहा गया है कि यह प्रमाता का ही
व्यवहार है ‘एकप्रत्यवमर्शाख्यः’ [ एक प्रत्यवमर्शाख्ये ज्ञाने एकत्र हि स्थितः । प्रपत्ता तदतद्धेतून्
भावान् विभजते स्वयम् ॥ आचार्य धर्म कीर्ति का कथन है कि “एक परामर्श संज्ञक ज्ञान में एक
जगह ही स्थित हुआ प्रमाता उस हेतु के और उससे भिन्न पदार्थ भावों को स्वयं विभक्त करता
है।” ] उसका ये लोग कैसे समर्थन करेंगे इसलिए इसे छोड़ दो, अप्रासङ्गिक है ॥ ३ ॥
अब शंका करते हैं कि अहं इस परामर्श में अनहंरूप घटादि प्रतियोगिरूप अपोहनीय है
इसके अपोहन में विकल्परूपता क्यों नहीं होगी ? इस अभिप्राय से कहते हैं—
माया-शक्ति के द्वारा चित्तत्त्व को छिपा करके जो भिन्न-भिन्न रूपों से देह, बुद्धि और
प्राण में आकाश के समान कल्पित होते हैं ॥ ४ ॥
ऐसा होने पर दूसरों को हटाने के कारण प्रमातारूप से अहं यह विमर्श अन्यप्रति रोगी
के अवभास से उत्पन्न हुआ विकल्प ही है ॥ ५ ॥
१२८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-४-५
अहंत्यवमर्शो द्विधा—शुद्धो मायोयश्च, तत्र शुद्धो यः संविन्मात्रे विश्वाभिन्ने विश्रवच्छा-
याच्छुरितस्वच्छात्मनि वा। अशुद्धस्तु वेद्यरूपे शरीरादौ। तत्र शुद्धेऽहं-प्रत्यवमर्शे प्रतियोगी न
कश्चिदपोहितव्यः संभवति—घटादेरपि प्रकाशसारत्वेनाप्रतियोगित्वेनानपोह्यत्वात्, इत्यपोह्यात्वा-
भावे कथं तत्र विकल्परूपता। अशुद्धस्तु वेद्यरूपे शरीरादौ अन्यस्माद् देहादेर्घटादेश्च व्यवच्छेदेन
भवन् विकल्प एव-इति वाक्यार्थः। अक्षरार्थस्तु—चित्तत्त्वं प्रकाशमात्ररूपं हित्वा सदप्यपहस्तनया
अप्रधानीकृत्य भिन्ने देहादावहमेव देहादिः नीलादौ प्रमेये प्रमाता—इत्यभिमानेन 'योऽहं स्थूल'
इत्यादिविमर्शः स विकल्प एव, न तु शुद्धं प्रत्यवमर्शमात्रम्। अत्र हेतुः —परो द्वितीयो देहादि-
र्घटादिश्च यः प्रतियोगी तुल्यकक्षयोऽन्योन्यपरिहाराच्च विरुद्धस्तस्य योऽवभासः – समारोपणलक्षणः,
तस्माद्यतोऽसौ तन्निषेधानुप्रणितोऽहमित्यवमर्शो जातः 'अहं स्थूलो, न कृशो, न घटादिः' इति
शुद्धप्रकाशरूपस्य अपहस्तनमेव देहादेर्भेद हेतुः, तदपहस्तने तु परमेश्वरस्य स्वात्मप्रच्छादनेच्छारू-
पाभेदाप्रकाशनं भ्रान्तिरूपं प्रति स्वातन्त्र्यरूपाम शक्तिर्हेतुः, चिद्रूपस्य चापहस्तनं देहादेरेव
अत्यक्तवेद्यभावस्य भिन्नस्यैव उपपत्तिशून्यतयैव प्रमोतृताभिमानः।
अहम् विमर्श दो प्रकार का है—एक तो शुद्ध है दूसरा मायीय है, इसमें शुद्ध विमर्श यह
है कि जिस ज्ञानरूप चिन्मात्र में अभिन्न एकरूप से सारा विश्व प्रतिफलित होता है अथवा
स्वच्छ सदाशिव चिदात्मा की दशा में झलकता रहता है। अशुद्ध मायीय विमर्श वेद्यरूप शरीरादि
में रहता है। जो शुद्ध अहम् विमर्श है उसमें तो कुछ हटाने योग्य नहीं रहता है और घटादि के
प्रतियोगी न होने से कोई अपोह्य का विषय भी नहीं रहता, जब अपोह्य ही नहीं रहेगा तो
विकल्परूपता कैसे बनेगी ? किन्तु अशुद्ध मायीय वेद्यरूप देहादि में तो परस्पर एक दूसरे से
भिन्न होने के कारण विकल्पता बनी ही रहती है। यह तो वाक्यार्थ हुआ अब अक्षरार्थ बतलाते
हैं—जो प्रकाश मात्ररूप चित्तत्त्व है उसे छोड़कर प्राणादि पुर्यष्टक में रखता हुआ अपने को
अप्रधान बनाकर अपने से भिन्न देह, बुद्धि और प्राणादि में, 'मैं' ही देहादि एवं नीलादि विषय का
प्रमाता हूँ इस प्रकार अभिमान करता हुआ, स्थूलरूप में मेरा ही रूप है, इस प्रकार का विमर्श
ही विकल्प कहलाता है, शुद्ध परामर्श में ऐसा नहीं होता है। क्यों नहीं है ? इसमें हेतु बताते
हैं—दूसरा देहादि एवं घटादि बराबर के प्रतियोगी आपस में एक-दूसरे का परिहार करने से
विरुद्ध है उसका जो अवभास समारोपरूप है, उससे जो भिन्न निषेध करनेवाला अहंविमर्श
उत्पन्न होता है। जिसका शुद्ध स्वरूप है कि मैं स्थूल हूँ, मैं कृश नहीं हूँ, मैं घटादि भी नहीं
हूँ इत्यादि, शुद्ध प्रकाशरूप का हटा देना ही देहादि के भेद में हेतु है, उससे हटा देने में
तो अपने स्वरूप को छिपाने की इच्छा होने से अभेद का प्रकाशन नहीं करने देने में भ्रान्ति-
वाले पदार्थों के विषय में तो भगवान् की अपनी स्वातन्त्र्यरूप माया-शक्ति ही मुख्य कारण है,
चिद्रूप को छिपाना एवं देहादि अत्यक्त वेद्यभाव के भिन्न को उपपत्ति की शून्यतारूप से प्रमातृता
का अभिमान करना है।
१. देहादि की वासना की अपेक्षा से प्राण श्रेष्ठ होता है, संकल्प-विकल्प करना अन्तःकरण का धर्म है,
जिसके अनुग्रह से चित्तत्व की प्राप्ति हो जाती है, उसका प्राण अधिष्ठेय बन जाता है, उसी प्रकार
संविततत्त्व अधिष्ठित प्राण के द्वारा बुद्धिरूप पुर्यष्टक के सहारे शरीर अधिष्ठित रहता है। इसलिए
चेतना स्वातन्त्र्य-शक्ति ही इसकी अधिष्ठातृ है, इस विषय में कहा भी है—
अ.-१, आ.-६, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२९
तथा च—देहाभिमानभूमिकायां स्थिताश्चार्वाकाः ‘चैतन्यविशिष्टः कायः पुरुषः' इति
कायमेव प्राधान्येनाहुः—स्त्रीबालमूर्खाणां तथाभिमानात् । ततोऽपि विवेकवन्तः पाकजोत्पत्ति-
परिणामादिबलादस्थिरं शरीरं मन्वानाः प्राणशक्तिसमधिष्ठानेन च विना विकारशतावशं
जैसा कि—चार्वाकादि नास्तिक लोग देहाभिमान भूमिका में रहते हैं। अलग-अलग
मदिरा सम्बन्धी द्रव्य जबतक एक दूसरे से नहीं मिलते हैं तबतक उसमें मद-शक्ति नहीं आती
है मिलते ही मदिरा में मद-शक्ति उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार अलग-अलग भूत चैतन्य
से रहित हैं वे जब आपस में एक दूसरे से मिल जाते हैं तब स्वाभाविक उसमें हलन-चलन
करने की शक्ति आ जाती है, इसलिए चैतन्य की कल्पना केवल भ्रान्ति ही है। 'चैतन्यविशिष्टः
कायः पुरुषः' यही चार्वाकों का सिद्धान्त है। शरीर को ही प्रधानता देते हैं। स्त्री, बालक और मूर्ख
लोगों का भी वैसा ही अभिमान होता है। कुछ वेदान्ती लोग शरीर का उत्पन्न होना, बढ़ना-घटना
एवं विनष्ट हो जानेवाले दोषों से शरीर का अस्थिर मानते हुए तथा प्राण-शक्ति के न रहने के
प्रकाशरूपो भगवान्प्राणाधिष्ठान उच्यते ।
प्राण एवाधरो धर्मो हंसश्चेति त्रिवाहनः ॥
भगवान् प्रकाशात्मा ही प्राण का अधिष्ठान है—ऐसा कहा जाता है। अधिष्ठान का अधिष्ठेय
प्राण ही आत्मा का धर्म है अर्थात् अधिष्ठान और अधिष्ठेय तथा इन दोनों का जो ज्ञान है वही
त्रिवाहन है।
अत एव गीता में भी भगवान् ने इसका उल्लेख किया है—
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥
जैसे वायु सूक्ष्म गन्ध के परमाणु-रेणुको गन्ध के स्थान से ग्रहण कर ले जाता है, उसी प्रकार
शरीर धारियों का स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर को पहले त्यागता है, उससे मन सहित इन्द्रियों को
ग्रहण करके दूसरे नये शरीर में ले जाता है।
संविद्रूप ईश्वर प्राण-पुर्यष्टक के अधिष्ठान द्वारा शरीर को धारण किये रखते हैं—यह बात
स्पन्दशास्त्र में भी श्री गुरुवर्यने कही है—
यतः करणवर्गोऽयं विमूढोऽमूढवत्स्वयम् ।
.......................................प्रवृत्तिस्थितिसंहृतीः ॥
लभते...............................................। इत्यत्र
संहान्तरेण चक्रेणेति............................।
जिसके सामर्थ्य बल से ही, अनन्त-शक्ति चक्र के साथ-साथ उस बाह्य जड इन्द्रियों को भी
चेतन की जैसी शक्ति सामर्थ्य प्राप्त हो जाती है जिससे स्वतन्त्र होकर सृष्टि, स्थिति और संहारादि
करने में प्रवृत्त होते हैं। इसलिए उस तत्त्व को जानने के लिए योगी को यत्न करना चाहिए। क्योंकि
उसकी यह अकृत्रिम स्वभाववाली स्वतन्त्रता रोम-रोम में भरी हुई है।
इसलिए देहाभाव के भस्मीभूत हो जानेपर, स्वप्न अवस्था को जैसा निद्रा में डुबे हुए मोह-
आवरण की स्थिति रहने पर भी चेतन में अधिष्ठित प्राण को अपनी गोद में रखनेवाले पुर्यष्टक की
वैसी स्थिति परलोक में भी रहती है। फिर दूसरे देह के अधिष्ठान से भोगों को भोगने में कोई
१७
१३० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-४-५
शरीरस्य पश्यन्तो बुभुक्षापिपासायोगयोग्यं प्राणमेवात्मानं केचन श्रुत्यन्तविदो मन्यन्ते । ततोऽपि
समधिकविवेकभाजः प्राणस्यापि अनित्यत्वादनुसंधानयोग्यतामपश्यन्तो ज्ञानसुखाद्याश्रयभूतां
बुद्धिमेव काणादप्रभृतय आत्मानमाहुः । अपरे तु तस्या अपि योगिदशायां वेद्यभावादपरत्वं
मन्यमानाः असंवेद्यपर्वरूपं यन्न किंचिद्रूपं सकलवेद्यराशिविनिर्मुक्तं शून्यत्वान्नाभस्तुल्यं न तु
महाभूताकाशस्वभावं प्रमातृतत्त्वं शून्यब्रह्मवादिनः सांख्यप्रभृतय आहुः । तस्मिन्नपि वेद्ये
शून्यान्तरं तत्रापि शून्यान्तरम्—इति यावद्द्वैदः तावत्कल्पना न त्रुट्यति, तदर्थमाह ‘कल्पिते’
इति । न चानवस्था परमार्थप्रकाशबलेन यतः सर्वस्य प्रकाशो न तु देहादिवशात्, तथात्वा-
कारण असंख्य प्रकार से शरीर का विनाश देखते हुए प्राण को ही बुभुक्षा-पिपासा से सम्बन्धि होने से
आत्मा मानते हैं । उससे भी अधिक विचार-विमर्श करनेवाले प्राण को भी अनित्य समझकर अनु-
सन्धान की योग्यता न देखते हुए ज्ञान-सुखादि के आश्रयभूत बुद्धि को ही काणादादि लोग आत्मा
समझते हैं । दूसरे सांख्य सिद्धान्ती उसको भी योगी दशा में वेद्यरूप न होने के कारण असंवेद्य
ग्रन्थिरूप जिसका कि कोई स्वरूप नहीं है; सम्पूर्ण वेद्यराशि से भिन्न होने के कारण महाभूत जो
आकाश है उसके बराबर नहीं, बल्कि शून्य ब्रह्म को प्रमाता मानते हैं । उस वेद्य में भी शून्यता
एवं उसमें दूसरी शून्यता, इस प्रकार कभी भी समाप्ति नहीं होती है, इसलिए कहा है कि ‘कल्पिते’
कल्पना करने पर इत्यादि । वहाँ अनवस्था भी नहीं होती है; क्योंकि परमार्थ प्रकाश के बल
से सभी का प्रकाश होता है वहाँ पर देहादि की कल्पना नहीं होती है, देहादि को प्रमाता मानना
दुस्तरता नहीं पड़ती और बहुत प्रकार से देखा भी जाता है कि योगिनी अपने ही शरीररूप गृह
में अवस्थित होकर स्वतन्त्ररूप से, प्राण को भेजना और वापस बुला लेनारूप क्रिया से दूसरे शरीर
में जाकर वस्तु का ज्ञान प्राप्त कर लेती है, और स्वतन्त्रीकरण में हमने युक्तियों को बता ही दिया
है । जिसका उल्लेख शिवसूत्र के माध्यम से हुआ है—
ब्रह्मपदे कमलशरीरस्तदुत्थप्राणिरूपेण सर्वत्र विचारी ।
ब्रह्मपद में जो कमल शरीर है उससे उठकर प्राणी सर्वत्र विचरण करता है सर्वथा देह और
प्राण की तो स्थिति भिन्न-भिन्न ही है । इस विषय में मुनि ने कहा है ।
सहवर्धितयोर्नास्ति सम्बन्धः प्राण काययोः । इति
एक साथ में संवर्धित होनेवाले देह और प्राण का कोई सम्बन्ध ही नहीं बैठता है ।
सम्बन्ध तो उसी का नाम है जो अत्यन्त अवियोग रखता हो । उसी प्रकार कक्ष्या स्तोत्र
कहता है—
भग्नो भ्रमोऽयं भवता विचित्रां स्वप्ने विदेहादिगतिं प्रदर्श्य ।
देहे गते भस्ममये परत्र कीदृक्........................ ॥ इति
विचित्र देहादि नश्वर वस्तुओं की गति-स्थिति है उसे आपने स्वप्न अवस्था में बताकर मेरे
भ्रम को दूर कर दिया, देह के भस्मीभूत हो जाने पर दूसरे में कैसा होगा ।
अ.-१, आ.-६, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १३१
भिमानमात्रं—देहादिः प्रमातेति, संकोचमात्ररूपं चित्तत्त्वं शून्यं भूतलं, यथा घटाभावः, संकोचः-
अपरवेद्यांशच्छायाच्छुरितं तु चित्तत्त्वमेव बुद्धिप्राणदेहादि इति । अमी एव भूमिकाविशेषा
उत्तरोत्तरमारोहतां योगिनां जाग्रदादितया पिण्डस्थादितया चागमेषु भण्यन्ते, अपहस्तनं च
व्याख्यास्यते 'कलोद्वलितमेतच्च चित्तत्त्वं कर्तृतामयम् । अचिद्रूपस्य शून्यादेर्मितं गुणतया
स्थितम् ।।' इति, तत्स्थितम्—अशुद्धः 'अहम्' इत्यवमर्शो विकल्प एव ।। ४-५ ।।
अभिमान मात्र है, संकोचमात्र चिदात्मरूप तो शून्य भूतल है। जैसे घट का अभाव भूतलरूप
होता है, दूसरे वेद्य अंश की छाया से मिलता हुआ चित्तत्त्व ही तो बुद्धि, प्राण, देहादि है। यही
भूमिका विशेष ऊपर-ऊपर चढनेवाले योगी लोगों के जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति अवस्था होने से पिण्ड
शरीर में रहने के कारण भी आगमों में कहा गया है, अब अभाव की व्याख्या करते हैं—'चेतन-
रूपी कला से उद्बुद्ध चित्तत्त्व कर्तृता से युक्त होकर अचिद्रूपशून्यादि के गुणरूप से परिमित
परिच्छिन्नभाव को प्राप्त करके रहता है।' इससे यह सिद्ध हुआ कि अशुद्ध अहंविमर्श विकल्प
ही रहता है ॥ ५ ॥
१. शनैःशनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥ क्रम-क्रम से
अभ्यासयोग करता हुआ उपरामता को प्राप्त करें तथा धैर्य युक्त बुद्धि द्वारा मन को स्वरूप आत्मा में
स्थिर करके परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ भी चिन्तन न करे। 'अभावं भावयेत्तावद्यावत्तन्मयतां
व्रजेत् ।' तब तक अभाव को ही देखे जब तक तन्मयता को न प्राप्त होवे और भी 'यद्यत्संवेद्यते किंचिन्न
च तद्रूपमिष्यते । जो-जो जानता है उसमें तो थोड़ा सा भी इसका स्वरूप नहीं है।
२. आगमशास्त्र में आचार्य अभिनवगुप्त ने जाग्रत्-स्वप्न और सुषुप्तादि अवस्थाओं के उल्लेख किये हैं।
इन चारों अवस्थाओं का पिण्ड, पद, रूप और रूपातीत शब्दों से योगीलोग व्यवहार करते हैं—
भूततत्त्वाभिधानानां योंऽशोऽधिष्ठेय उच्यते ।
पिण्डस्थ इति तं प्राहुः पदस्थमपरं विदुः ॥
मन्त्रास्तत्पतयः सैषारूपस्थमिति कीर्त्यते ।
रूपातीता पराशक्तिः स व्यापाराप्यनामया ॥
निष्प्रपञ्चो निराभासः शुद्धः स्वात्मन्यवस्थितः ।
सर्वातीतो शिवो ज्ञेयो यं विदित्वा विमुच्यते ॥ इति
पिण्डे मुक्ताः पदेः मुक्ता रूपे मुक्ताः षडानन । रूपातीते तु ये मुक्तास्ते मुक्ता नात्र संशयः ॥
इति तत्त्वसंग्रहे ।
पिण्डं कुण्डलिनी शक्तिः पदं हंसः प्रकीर्तितः । रूपं चिद्विन्दुरित्युक्तो रूपातीततः परः शिवः ॥
भूत तत्त्व के अभिधानों में जो अंश अधिष्ठेय कहा जाता है उसे कोई लोग पिण्ड कहते
हैं । अन्य को पद शब्द से समझते हैं । मन्त्र, मन्त्रेश्वर और मन्त्र महेश्वर को रूप शब्द से कहा जाता
है । जो परा-शक्ति है वह तो विमर्श व्यापार क्रिया का सम्पादन करती हुई भी अनामय संविद्रूप ही
रहती है इसलिए परा-शक्ति रूपातीता कही जाती है।
अपने आप में अवस्थित रहनेवाले जो शुद्ध, निराभास, निष्प्रपञ्च सब से अतीत शिवरूप ज्ञेय
है, उसे जानकर विमुक्त हो जाते हैं ।
१३२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-६
द्विविधोऽपि चायम् 'अहं-प्रत्ययो' द्विधा—अनुभवमात्ररूपश्चानुसंधानात्मा च, शिवात्मनि
'अहमिति' सदाशिवात्मनि 'अहमिदमिति' शुद्धो द्विधा। अशुद्धोऽपि 'अहं स्थूल' इति, योऽहं
स्थूलोऽभवं, सोऽहं कृशो, बालो, युवा, स्थविरः, स एव 'अहम्' इति च अशुद्धो द्विविधः। तत्र शुद्धे
विकल्परूपत्वमप्रतिष्ठमेव इत्युक्तम्, अशुद्धे तु अनुभवरूपे विकल्पत्वमुपपादितम्, अशुद्धेऽपि तु
अनुसंधानात्मकतया अभेदस्य प्रस्फुरणात् कश्चिदविकल्पकत्वं शङ्केत तस्य व्यामोहं
व्यपोहयितुमाह—
कादाचित्कावभासे या पूर्वाभासादियोजना।
संस्कारात्कल्पना प्रोक्ता सापि भिन्नावभासिनी ॥ ६ ॥
देह इत्यादि वर्तते, कादाचित्कः कदाचिद्भवोऽनियतदेशकालाकारोऽवभासो यस्य देहादेः
स्वलक्षणरूपस्य, तत्र या पूर्वाभासेन बालादि-शरीरावभासेन योजना 'योऽहं बालः' स एवाद्य
'युवा' इत्यनुसंधानम्, आदिग्रहणादुत्तरेण भाविना आभासेन सह योजना 'स्थविरो भवितास्मि'
शुद्ध और अशुद्धरूप से यह अहंप्रत्यय दो प्रकार का है—एक अनुभवमात्ररूप से है
दूसरा अनुसन्धानरूप से है, अनुभव स्वभाववाला तो शिवरूप में 'अहं' इस प्रकार से रहता है
और सदाशिवरूप [ अनुसन्धिरूप ] में 'अहमिदम्' मैं यह हूँ इस रूप से रहता है, इस प्रकार
'अहम्' और 'अहमिदम्' के भेद से दो प्रकार के शुद्ध अहंप्रत्यय हुए। 'अहं स्थूलः' मैं स्थूल हूँ,
इस अनुभव स्वभाववाले प्रत्यय में तो अशुद्ध रहता है, जो मैं स्थूल था, वही मैं कृश हो रहा हूँ,
मैं बालक हूँ, मैं युवक हूँ और मैं वृद्ध हूँ, वही मैं हूँ, ये ही दो प्रकार के अशुद्ध प्रत्यय होते हैं।
शुद्ध अहं में विकल्परूपता अप्रतिष्ठित रहती है, यह हम कह आये हैं, किन्तु अशुद्ध अनुभवरूपवाले
'अहं स्थूलः' इत्यादि में विकल्परूपत्व को हमने सिद्ध कर बता दिया है, अशुद्ध में भी अनुसन्धान
करने से अभेदभाव के जग जाने पर कोई अविकल्प की शङ्का कर सकता है, अतः उसके व्यामोह
को दूर करने के लिए कहते हैं—
जो अशुद्ध अहं की भावना में भी कभी अभेद अवभास हो जाने पर शुद्ध अहं की योजना
लगा देना संस्कार से वह कल्पना कही जाती है, उसमें भी भेद रहता ही है ॥ ६ ॥
[ देहादि अनुभव से युक्त ही अहं विमर्श विकल्पमात्र नहीं है, किन्तु अनुसन्धिवाला भी
विमर्श होता है, यह श्लोक में दिया गया 'अपि' शब्द द्योतित करता है ]
देह इत्यादि यह पूर्वसूत्र की अनुवृत्ति आती है, कभी-कभी होनेवाला अनियत देश-काल के
आकारवाला जो देहादि का अपना अनुभव है, उसमें जो पहले होनेवाला बालक आदि शरीर की
मिलावट जैसा 'योऽहं बालः' मैं कभी बालक था, वही मैं आज 'युवा' युवावस्था में स्थित हूँ,
ऐसा अनुसन्धान करता है और आदि शब्द से आगे होनेवाले आभास के साथ योजना कर लेना।
जैसा कि 'स्थविरो भविताऽस्मि' मैं वृद्ध होऊँगा, ये सभी योजनाएँ विकल्परूप हैं, शुद्ध अहं
हे षडानन ! जो लोग पिण्ड से, पद से और रूपातीत से मुक्त हैं, वे ही सचमुच मुक्त गिने
जाते हैं इसमें सन्देह करने की कोई बात नहीं। तत्त्व संग्रह में भी कहा गया है—पिण्ड को कुण्डलिनी-
शक्ति, पद को आत्मा और रूप को चेतन चिद्रूप-शक्ति कहा गया है तथा परम शिव रूपातीत है।
इति सा योजना सर्वा कल्पना-विकल्प एव, न तु शुद्धः प्रत्यवमर्शः । अत्र देहादेर्विशेषणं हेतुत्वा-
शयेन—यतो भिन्नावभासितत्वमेव देहादेस्तदानीमपि अविच्छिन्नं, यदि हि तस्य देहादेः सर्वतः
पूर्णत्वम्—अवच्छेदहीनत्वं पश्यन् अनुसंधानम्—'अहमिदम्' इति विदध्यात् तदियं सदाशिवभूः
केन विकल्पास्पदत्वेन भण्यते—द्यावता विच्छिन्ने एव सोऽनुसंधिः, भिन्ने हि कथमनुसंधानम् ?
इति चेदाह 'संस्कारात्'—प्राक्तनानुभवकृतवासनाप्रबोधजस्मृतिवशात् इति यावत्, प्राणे बलाबल-
वशादनुसंधिः, बुद्धौ ज्ञानसुखादितारतम्यात्, शून्ये वैतथ्यावैतथ्ययोगात्, अयमपि विकल्प एव, एवं
'स एवायं घट' इति घटाद्यनुसंधानेऽपि विकल्पत्वं मन्तव्यं, किन्तु एतासु अनुसंधानभूमिषु विद्या-
शक्तिराधिक्येन अचिरद्युतिवदुद्दीप्यते इति तासां परमपदपरिशीलनप्रथमकल्पाभ्युपायत्वमभ्युपागमन्
गुरवः ॥ ६ ॥
न च देहादीनां पूर्वपूर्वप्रमातृवेद्यता—येन प्रमातृप्रकाशे प्रमेयं न भाति तत्प्रकाशश्च न
पूर्वप्रकाशं विना, सोऽपि न प्रमात्रन्तरप्रकाशं विना—इत्यनवस्था स्यात्, अपि तु विशुद्ध-प्रकाश
एव विश्वस्य प्रकाश, इति निरूपयन् उक्तयुक्त्या सदैव सृष्ट्यादिशक्तिवियोगोऽपि भगवत उक्तो
भवति, इति दर्शयति—
प्रत्यवमर्शरूप नहीं हैं। इसमें देहादि का विशेषण हेतुरूप आशय से कहा है—क्योंकि भिन्नरूप
से अवभासित होनेवाले देहादि योजना के काल [ अनुसंधि ] में भी अविच्छिन्न पूर्णभाव से रहता
है, यदि उन देहादि में सर्वतः अर्थात् परिपूर्णरूपता से [ चिद्रूपविश्रान्तत्व ] अविच्छेद शून्यत्व
को देखते हुए 'अहमिदम्' का अनुसन्धान करना ही सदाशिव भूमि है, इसी कारण इसको विकल्प
का आधार कहा जाता है—विच्छिन्न में ही 'योऽहं बालः' ऐसा अनुसन्धान होता है, इस प्रकार
भिन्न में कैसे अनुसन्धान होगा ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि—'संस्कारात्' संस्कार से अनु-
सन्धान होता है पूर्वजन्म में किये हुए अनुभव के वासना-संस्कार बीज से उत्पन्न होनेवाली स्मृति के
कारण अनुसन्धान तब तक ही होता रहेगा, प्राण में तो क्षुधा-पिपासादि के आभास से अनुसन्धान
होता है और बुद्धि में ज्ञान सुखादि के तारतम्य से अनुसन्धान होगा, शून्य में मूर्च्छा-समाधि
आदि के आभास से अनुसन्धान होता है, यह सब भी विकल्प ही है, इस प्रकार 'स एवायं घटः'
घटादि के अनुसन्धान में भी विकल्परूपता माननी चाहिए ! किन्तु इन अनुसन्धान भूमिकाओं
में विद्या-शक्ति अधिकतया विद्युत् के समान कुछ देर के लिए चमक उठती है, इन सभी योजनाओं
को गुरुवर्यों ने परमपदरूपी भुवन पर चढ़ने के लिए प्रथम सोपान के रूप में माना है ॥ ६ ॥
बालपन, युवापन एवं वृद्धापन आदि में इन पूर्व-पूर्वं प्रमाताओं से देहादि का ज्ञान नहीं
होता है जिससे कि प्रमाता का प्रकाश न होने से प्रमेय विषय नहीं भासता है, देहादि प्रमाता का
प्रकाश पूर्व प्रमाता के प्रकाश बिना नहीं होता है, वह भी पूर्वतर-पूर्वतम् प्रकाश के बिना नहीं
होता है इसीलिए अनवस्था हो जायेगी, अपितु विशुद्ध प्रकाश ही देहादि प्रमाता का प्रकाश है,
यह निरूपण करते हुए कही हुई युक्ति के द्वारा सदैव व्यवहारदशा में भी भगवान् की सृष्टि आदि
शक्ति से वियोग रहता है यह कहा गया है, इस विषय में कहते हैं—
१३४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-७
तदेवं व्यवहारेऽपि प्रभुर्देहादिमाविशन् ।
भान्तमेवान्तरर्थौघमिच्छया भासयेद्बहिः ॥ ७ ॥
यत् पूर्वं दर्शितं 'देहे बुद्धौ' इत्यादि तत् एवम् उपपद्यते, कथम् ? यदि व्यवहारे मायापदे
देहप्राणादिमपि प्रभुरेव प्रकाशपरमार्थ इच्छया—मायाशक्तिरूपया, आविशन्—देहप्राणादि-
प्राधान्येन स्वरूपं प्रदर्शयन्, अन्तः—संविन्मात्रे, भान्तम्—अहमित्येवंरूपम् अर्थौघम् इच्छयैव
बहिः इदमिति भासयति तत एतदुपपद्यते, अन्यथा तु अनवस्था स्यात्, हेतौ लिङ्। अपि-शब्द
एव-शब्दश्च भिन्नक्रमौ, यत् एतावत् उक्तं, तदिति—तस्मात् हेतोः, एवं जातं वक्ष्यमाणरूपम्,
किं तत् ? यत् किल प्रभुः परस्परं व्यवहारकाले क्रेयविक्रेयप्रेक्षाव्याख्यादौ चैत्रमैत्रादिसंबन्धिनो
देहप्राणादीन् एकतया तावति आभासे आविशन् अन्तर्भान्तमेव अनुज्झित्तन्तः-प्रकाशमेव सन्तं
बहिः एकाभासतया भासयति ? इति संभाव्यते—इत्येतज्जातम्, [ इति संभावनायां लिङ् ], तेन
तेन प्रमात्रा सह ऐक्यं सृज्यते, अन्येन प्रमात्रा ऐक्यं संह्रियते, घटादिमात्ररूपे स्थितिः क्रियते,
इस प्रकार व्यवहार काल में भी ईश्वर देहादि अवस्थाओं में प्रवेश करते हुए अन्तःस्थित
अर्थसमूह को ही अपनी इच्छा से बाहर की ओर भासित करते हैं ॥ ७ ॥
जिसको पूर्व में दिखा दिया है 'देहे बुद्धौ' अर्थात् देह, बुद्धि और प्राण इत्यादि प्रमातृरूप
में अहं विमर्श किस युक्ति से सिद्ध होगा ?
यदि मायोय जगत् के व्यवहार करने में देह, प्राणादि को भी प्रभु ही प्रकाश परमार्थ की
इच्छा से अर्थात् जब माया-शक्ति से उसको प्रमाता के रूप में स्वीकार करता हुआ देह, प्राणादि
की प्रधानता से अपना स्वरूप दिखाता हुआ अन्तःकरण में अवस्थित संवित् मात्र में भासित
होता हुआ 'अहम्' इस परामर्शरूप में अर्थसमूह की इच्छा से बाहर 'इदम्' इस रूप से भासित
करता है। इसीसे यह सिद्ध होता है, नहीं तो, प्रमातृगत वेद्यता में आवेश न करने पर अनवस्था
दोष से ग्रस्त हो जायेगा। 'भासयेत्' इसमें हेतु के अर्थ में 'लिङ्' लकार है। 'अपि' शब्द और
'एव' शब्द का भिन्न क्रम है, इतना ही अपोहन का स्वरूप कह दिया, तदिति—इसलिए इस हेतु
से, 'एव' शब्द का स्वरूप आगे कहेंगे, वह क्या है ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि प्रभु परस्पर
क्रय-विक्रय, देखना-सुनना, व्याख्या करना आदि व्यवहारकाल में चैत्र-मैत्रादि सम्बन्धियों के
एकरूप से उतने ही आभास में प्रवेश कराता हुआ, भीतर भासित होनेवाले को न छोड़ता हुआ
बाहर में एकरूप से प्रकाशित होता है अर्थात् क्या बाहर एवं भीतर दोनों एकरूप होकर भासित
हुआ करता है ? यह संभव है ऐसा सिद्ध हुआ [ इसलिए संभावना में लिङ् लकार है ] उस-
उस प्रमाता के साथ में एकता का सर्जन करता है, दूसरे प्रमाता के साथ एकरूप में बाँध देता
है, एवं घटादिरूप में स्थिति कर देता है, परिपूर्ण स्वरूप को बद्ध कर देने से तिरोभाव रख
१. सृष्टि में परमेश्वर का यही परमार्थ है—परमेश्वर प्राण शरीरादि में कर्तृरूप से प्रवेश कर बाहरी
पदार्थों को पराधीनता को जड सी सम्पादन करते हुए सर्गादि सृष्टि करते हैं, जब देह प्राणादि उसमें
प्रविष्ट हो जाते हैं तब विश्वरूप से सदैव अपने अंगरूप अर्थराशि को प्रकाशित करते हैं, उसमें
कोई देशक्रम और कालक्रम भी नहीं है इसी से व्यवहार में 'मायापदे' ऐसा कहा गया है।
अ.-१, आ.-६, का.-७] विमर्शिनीटीकोपेता [१३५
पूर्णस्वरूपनिमोलनात् तिरोभाव आधीयते, तावति आभासे ऐक्यावभासनपूर्णत्ववितरणात् अनुग्रहः
क्रियते, तेन न केवलं महासृष्टिषु महास्थितिषु महाप्रलयेषु प्रकोपतिरोधानेषु दीक्षाज्ञानाद्यनु-
ग्रहेषु भगवतः कृत्यपञ्चकयोगः यावत् सततमेव व्यवहारेऽपि । यदुक्तम् - सदा सृष्टिविनोदाय सदा
स्थितिसुखासिने । सदा त्रिभुवनाहारतृप्ताय स्वामिने नमः ॥' इति । 'प्रतिक्षणमविश्रान्तस्त्रैलोक्यं
कल्पनाशतैः । कल्पयन्नपि कोऽप्येको निर्विकल्पो जयत्यजः ॥' इत्यादि च । तथा '.......प्राकाम्य-
मात्मनि यदा प्रकटीकरोषि । व्यक्तीः...........॥' इति च ॥ ७ ॥
देता है, उतने आभास में ऐक्य अवभासन को परिपूर्णता कर देने के कारण अनुग्रह करता है,
इसीसे केवल महासृष्टि में, महास्थिति में, महाप्रलय में, क्रोध के रोक देने में, दीक्षा ज्ञानादिरूप
अनुग्रह करने में भगवान् के कृत्य पञ्चक का योग नहीं होता है, ऐसी बात नहीं है अपितु सर्वदा
व्यवहार काल में भी होता है। जबकि आचार्य ने इस विषय में कहा है—सर्वदा विनोद के लिए
ही मात्र सृष्टि करनेवाले, सदा सुख-आनन्द के लिए ही स्थिति-पालन करनेवाले और सदैव
अपने स्वरूप में तीनों लोकों को लय करके परितृप्त हो जानेवाले ऐसे प्रत्यक्षरूप स्वामी को
नमस्कार हो । सैकड़ों कल्पनाओं से तीनों लोकों की प्रतिक्षण-प्रतिपल कल्पना करते हुए भी,
कोई एक अजन्मा निर्विकल्प की जय हो । तथा '...... प्राकाम्यमात्मनि यदा प्रकटीकरोषि ।'
व्यक्तीः.........। [ स्वामी के भीतर ही ये भाव-पदार्थ रहते हैं वह प्रत्यक्ष घटित होता है, सृष्टि
काल में और व्यवहार काल में उनकी इच्छा से ही अन्तर में अवस्थित पदार्थ-राशि बाहर में
भासित होती है-ऐसा कहा गया है ] ॥ ७ ॥
१. इस प्रकार स्वामी अपने में रहनेवाले अर्थ समूह का आभास करते हैं—ऐसा जो कहा गया है, उसीको
घटाते हैं, सृष्टि काल में और व्यवहार काल में अपनी इच्छा से ही अपने में रहे हुए पदार्थ वर्ग को
बाहर प्रकट करते हैं। जिसका विवेचन श्री सोमानन्दपाद ने किया है—
कुत्सिते कुत्सितस्य स्यात्कथमुन्मुखतेति चेत् ।
रूपप्रसाररसतो गर्हितत्वमयुक्तिमत् ॥
पञ्चप्रकारकृत्योक्तिश्शिवत्वान्निजकर्मणे ।
प्रवृत्तस्य निमित्तानामपरेषां क्व मार्गणम् ॥
चेतन वही है जो प्रसरणशील है रूप प्रसार का रसिक है। वह स्वयं विश्वरूप में अवभास-
मान है और विश्व भी विथ्या या गर्हित नहीं है; क्योंकि ऊपर से नीचे अगल-बगल चारों ओर से
ठसा-ठस शिवरूप ही भरा पड़ा है, सर्वत्र शिव की सत्ता होने के कारण इसके कुत्सित-गर्हित होने का
प्रश्न ही कहाँ उठता है। गर्हित तो उसी को कहते हैं जो भेद दृष्टि से शिवरूप में देखता है।
भगवान् परमेश्वर के सर्ग, स्थिति, प्रलय, अनुग्रह और तिरोधान ये पाँच प्रकार के कृत्य हैं अपने निज
तत्त्वादिरूप प्रसरणार्थ ही प्रसर होता है। उसमें दूसरे निमित्त कहाँ ढूँढोगे। किन्तु कोई तो कहते हैं
कि 'ईश्वरः स्वातन्त्र्यवास-सर्वकामः' ये तो अपने में पूर्ण हैं फिर इनको सृष्ट्यादि से क्या फल मिलने-
वाला है ? 'क्योंकि जो कोई भी कार्य में प्रवृत्त होता हुआ देखा जाता है वह कुछ न कुछ प्रयोजन को
लेकर ही प्रवृत्त होता हुआ देखा जाता है।' प्रयोजनमनुद्दिश्य मन्दोऽपि न प्रवर्तते । अर्थात् मतिमूढ भी
उद्देश्य को आगे रखकर ही कार्य में प्रवृत्त होता है। भगवान् में तो यह संभव नहीं होता। लोक
अनुग्रहार्थ ही प्रवृत्त होते हैं।
१३६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-८
इह अन्तरर्थावभासः स्थित एव, तत् किं तत्र कारणान्तरचिन्तया इति प्रकृतं प्रमेयम्,
तत्सिद्धये उपपत्तिः उक्ता, तेन विना इच्छारूपः प्रत्यवमर्शो न स्यात् इति, तत्प्रसङ्गात् प्रत्यवमर्श-
विकल्पादिस্বরূপम् उपपादितम्, इति शिष्याणां धियं समाधातुं प्रकृतं प्रमेयम् उपपादयन्
उपसंहरति—
एवं स्मृतौ विकल्पे वाप्यपोह्नपरायणे ।
ज्ञाने वाप्यन्तराभासः स्थित एवेति निश्चितम् ॥ ८ ॥
प्रकाशात्मा परमेश्वर एव यतो देहादिप्रमातृताभिमानदशायामपि वस्तुतः प्रमाता,
एवम् इति अतो हेतोः इदं सिद्धं भवति—स्मरणे अपोहनजीविते च विकल्पे अनुभवज्ञाने च
अन्तराभासः प्रकाशविश्रान्तः स्थित एव, नात्र संशयः कश्चित्, यदि हि देहादिरेव परमार्थप्रमाता
स्यात् तत् शरीरस्य प्राणस्य धियः शून्यस्य वा अन्तर्घटादि इति न किंचित् एतत्—घटादिपरि-
हारेण देहादेः स्थितत्वात् । परमार्थप्रकाशस्तु सर्वसहः इति तत्रान्तर्विश्वम्, इति अनायास-
सिद्धमेतत् ॥ ८ ॥
अपने स्वरूप में अर्थ का अवभास स्वसंवित् साक्षिरूप से रहता ही है, उसमें फिर दूसरे
बाह्यार्थ वासना इत्यादि कारणों को खोजना व्यर्थ है । इसलिए प्रस्तुत प्रमेयरूप साध्य की सिद्धि
के लिये युक्ति दे दी गई हैं, इसी कारण इच्छा के बिना प्रत्यवमर्श नहीं हो सकता है, भीतर
अर्थ का अवभास अवश्य ही रहता है, इसका समर्थन के प्रसङ्ग से प्रत्यवमर्श के विकल्पादि
स्वरूप को युक्ति द्वारा सिद्ध किया है; इस प्रकार शिष्यों की बुद्धि के समाधानार्थ भीतर अर्थों
के अवभासतत्त्व का निगम रीति से उपपादन करते हुए उपसंहार करते हैं—
इस तरह स्मृति और विकल्प में अथवा अपोहन प्रधान ज्ञान में या भीतर में भी पदार्थों
का अवभास अवस्थित ही होता है—यह तो निश्चित है ॥ ८ ॥
जबकि देह, बुद्धि, प्राणादि प्रमातृगत अभिमान अवस्था में भी वस्तुतः प्रकाशात्मा
परमेश्वर ही प्रमाता रहते हैं। इस हेतु से सिद्ध हो जाता है कि [ प्रकाशस्वरूप परमेश्वर ही सब
का जीवन है ] स्मरण और अपोहन प्रधान विकल्प में अनुभव ज्ञान में, अन्तर में पदार्थों का
अवभास प्रकाशरूप से ही रहता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं होता है, यदि देहादिरूप की सत्य-
प्रमाता होता तो शरीर, बुद्धि, प्राण, शून्यादि का अन्तःकरण में रहनेवाले घटादि पदार्थ किससे
मेल करेगा, क्योंकि घटादि को छोड़कर देहादिरूपों में ही विद्यमान रहता है । परमार्थ प्रकाशरूप
परमेश्वर तो सब कुछ रहनेवाले होते हैं इसलिए उनमें सारे विश्व की अन्तर्लीनता हो सकती
है, यह बात तो अनायास ही सिद्ध है ॥ ८ ॥
१. उन दोनों का भी स्वरूप वैसा ही होने के कारण । क्योंकि अन्तःस्थित रहनेवाले का ही सर्वथा
समर्थन करना होगा—उसके बिना बाहर में इच्छा-विमर्श नहीं हो सकता है और वह शुद्ध प्रकाश
प्रमाता में अन्तर्लीनभाव हुए बिना थोड़ा सा भी नहीं घटता है । यद्यपि स्मृति इत्यादि देहादि प्रमाता
के विषय हैं तथापि उन परमेश्वर-प्रकाश से ही प्रमातृरूपता होने के कारण उनमें ही तादात्म्यरूप से
अवस्थित भाव-पदार्थ रहते हैं ।
अ.-१, आ.-६, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ १३७
ननु अन्तराभासवर्गस्य बहिराभासनं यदि सर्वत्रास्ति कस्तर्हि स्मरणादौ आभासभेदः,
न च असौ न संवेद्यते—स्फुटास्फुटतादिप्रस्फुरणस्य अनपह्ववनीयत्वात् ? इत्याशङ्क्याह—
किन्तु नैसर्गिको ज्ञाने बहिराभासनात्मनि ।
पूर्वानुभवरूपस्तु स्थितः स स्मरणादिषु ॥ ९ ॥
अनुभवज्ञानस्य ‘इदं नीलम्’ इति अन्तराभासं बहिराभासयतः सोऽन्तर्भावाभासो
नैसर्गिको—निसृष्टेः स्वातन्त्र्यात् आयातो,न तु स्मरणादेरिव अन्यज्ञानकृतवासनादिबलात्, स्मरणे
उत्प्रेक्षणे प्रत्यक्षपृष्ठभाविनि अध्यवसाये च योऽन्तर्नीलाद्यवभासो बाह्यतया अवभासयितव्यः
नासौ स्वात्मकीयः अपि तु पूर्वानुभवसंस्कारजोऽसौ, तत्र संस्कारो नाम अनुभवस्य कालान्तरेऽपि
अब प्रश्न किया जाता है कि यदि अन्तर में अवभासमान पदार्थ-समूह का सर्वत्र बाहर
में आभास होता है, तो स्मरणादि में अन्तर के आभास का भेद कैसे होगा ? किन्तु यह [ भेद ]
नहीं जाना जा सकता है यह बात नहीं है, अवश्य जाना जाता है—स्फुटरूप से अथवा अस्फुटरूप
से इसका स्फुरण अवश्य कुछ न कुछ रहता है । इसको छिपा नहीं सकते हैं ? इस पर आशंका
कर कहते हैं—
बाहर की तरफ आभासमान होनेवाले ज्ञान में अन्तराभास स्वाभाविक रहता है । वह
स्मरणादि में पूर्व के अनुभवरूप से रहता है ॥ ९ ॥
‘इदं नीलम्’ यह नील है, वह निर्विकल्परूप अनुभवज्ञान का अन्तर में होनेवाला आभास
है जोकि बाहर में भासित करता है वह आभास स्वाभाविक होता है, अपने अवभास से स्वतन्त्र
होने के कारण आया हुआ रहता है; स्मरणादि के जैसा अन्य ज्ञान से किये गये वासनादि के
बल से नहीं होता है, स्मरण, उत्प्रेक्षा, प्रत्यक्ष के अनन्तर अध्यवसाय में होनेवाले जो भीतर
नीलादि का अवभास है वह बाह्यरूप से भासित होना चाहिए, वह अपना स्मरणकालीन नहीं
है अपितु अनुभवपूर्वक है उसके संस्कार से उत्पन्न हुआ होता है, उसमें संस्कार क्या चीज है ?
इसका समाधान करते हैं कि उसका आगे बने रहना यही संस्कार का स्वरूप है अर्थात्
कालान्तर में भी उसका बना रहना ही संस्कार कहा जाता है वह जो आता हुआ अनुभव है
१. यदि अन्तराभास पदार्थों का बाहर में आभासन ज्ञान, स्मृति और विकल्प में होता है तो कौन स्मरणादि
में अन्तराभास का सर्वसाधारण भाव होने के कारण भेद विभाजन करेगा ?
२. आभास भेद का स्फुरण ज्ञान में तो स्फुटरूप से रहता है और स्मृति आदि में अस्फुटरूप से रहता है ।
३. क्योंकि दूरत्व और समीपत्व को लेकर प्रत्यक्ष के संस्कार से उत्पन्न होनेवाली दोनों स्मृति में भी पूर्व का
अनुभूत ही अर्थ अन्तर में अवस्थित होकर संस्कार शब्द का वाच्य होता है इसीको क्षेत्रज्ञ अपनी इच्छा के
द्वारा पूर्व काल से अवच्छिन्न करता हुआ मनोयोगपूर्वक देखता है इसमें कुछ अपूर्व सर्जन नहीं करता है ।
४. पूर्व अनुभूत आभास का पृथक्-करण करना ही स्मृति का नया व्यापार नहीं है । किन्तु भिन्न किये हुए
को ही अन्धकार से वह आवृत्त करने के बराबर है उसमें तो संस्काररूप से अवस्थित उस काल में भी
रहता है । प्रतिबोधक अनुसन्धान दशामें आवरण के हट जाने से वही प्रकाशित होता है इसीका नाम
अप्रमुषित [ न छोड़ना रूप है ] अत एव अनुभूत विषय का असंप्रमोष होना ही स्मृति है यह कुछ भी
अपूर्व वस्तु की सृष्टि नहीं करती है अर्थात् इससे कोई अपूर्व पदार्थ का निर्माण नहीं होता है ।
१८
१३८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-१०
अनुवर्तमानता, अतोऽसावनुवर्तमानोऽनुभवो यतो नीलाद्याभाससंभिन्नः ततः तत्तादात्म्यापन्नं
स्मरणाद्यपि तथा निर्भासते, तत एव स्मरणकालासम्भावी आभासः तदनुभवपूर्वककालकलित एव,
इति स्वयं स्मरणादेर्निर्विषयत्वं गृहीतग्राहित्वं च उद्घोष्यते । एतदेव अस्फुटत्वम्, इति सिद्धोऽनु-
भवस्मरणादौ आभासभेदः, अन्तराभासवर्गस्य बहिराभासनम् अव्यवधानेन स्फुटता, व्यवधानेन
तु तात्कालिकत्वाभावात् अस्फुटता इति ॥ ९ ॥
ननु अनुभवज्ञानात् ऐन्द्रियकात् अन्यत् सर्वं ज्ञानं व्यवधानेन बहिराभासनरूपं प्राप्तम् ?
इत्याशङ्क्य प्रविभागमाह—
स नैसर्गिक एवास्ति विकल्पे स्वैरचारिणि ।
यथाभिमतसंस्थानाभासनाद्बुद्धिगोचरे ॥१०॥
यः प्रत्यक्षव्यापारम् अनुपजीवन् विक्षेपसारतया मनोराज्यसंकल्पादिविकल्पः स स्वैरं
कृत्वा—स्वप्रेरणेन परप्रेरणनैरपेक्ष्येण स्वातन्त्र्येण चरति उदेति व्ययते च, तत्र यो बहिरवभासो
नीलादेः अन्तराभासमग्रस्य स नैसर्गिक एव, तथाहि अपरिदृष्टपूर्वमपि श्वेतं दशनशतकलितकर-
जिस कारण नीलादि आभास से भिन्न है इसलिए उस नीलादि से तादात्म्यभाव को प्राप्त
स्मरणादि भी वैसा ही भासित होता है, इसी से स्मरणकाल में न होनेवाला स्मर्यमाण संस्कार
से उत्पन्न आभास उसके पूर्वकालीन अनुभव से ही मिला रहता है, इसीलिए स्मरणादि का
निर्विषयत्व और गृहीत-ग्राहित्व को ऊँचे स्वर से घोषित किया जाता है। इसीको अस्फुटत्व
अर्थात् मन्दपना कहा जाता है, इसीलिए अनुभव-स्मरणादि में आभास भेद सिद्ध होता है, अन्तर
के आभासवर्ग का बाहर में अव्यवधानरूप से स्फुटतापूर्वक भासना है, व्यवधान हो जाने पर
तो उसके काल में न रहने के कारण अस्फुटता प्रकट होतो है ॥ ९ ॥
अब शंका करते हैं कि इन्द्रिय से उत्पन्न अनुभवरूप ज्ञान से भिन्न सब ज्ञान व्यवधान के
कारण बाहर में अवभासरूप को प्राप्त करता है ? ऐसी आशंका कर स्मरण ज्ञान का और
अनुभव ज्ञान का विभाग बताते हैं [ यदि कहो कि अव्यवधान से स्फुटता और व्यवधान से
अस्फुटता तथा अनुभव से व्यतिरिक्त सब ज्ञान विकल्पादिरूप अस्फुटता के कारण हो आया
हुआ है ? यह कहना सत्य है, किन्तु यह बात ऐसी है कि ‘किन्तु नैसर्गिको ज्ञाने बहिराभास-
नात्मनि ।’ इससे ही सिद्ध है । पुनः उत्तरार्ध से बताते हैं ‘पूर्वानुभवरूपस्तु स्थितः स स्मरणादिषु ।’
पूर्वं का अनुभव ही तो स्मरणादि में स्थिर रहता है । ]
जो अन्तर का आभास है वह किसी दूसरे की अपेक्षा न रखनेवाला स्वभावसिद्ध स्वैरचारी
विकल्प में भी रहता है, जैसे बुद्धि से होनेवाले ज्ञान में अपने अभीष्ट ज्ञान का आभास
होता है ॥ १० ॥
जो मनोराज्य संकल्पादि विकल्प है वह प्रत्यक्ष व्यापार का आधार लेकर मन के विक्षेप
से दूसरे की प्रेरणा की आकांक्षा न रखता हुआ अपनी स्वतन्त्र प्रेरणा से चलाता है, उदित
होता है और समाप्त होता है, उसमें जो बाहर की ओर नीलादि का आभास हो रहा है, वह
अन्तर में होनेवाल स्वाभाविक ही आभास है, जैसा कि पूर्व में नहीं देखा हुआ भी असंख्य दाँतों-
अ०-१, आ०-६, का०-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १३९
युगलयुक्तं दन्तिनम् अन्तः प्रमातृभूमौ स्थितं बहिः अन्तःकरणभूमौ स्वच्छधीदर्पणात्मिकायां स
विकल्पः तात्कालिकमेव आभासयति ॥ १० ॥
अस्माच्च अन्तराभाससम्भवसमर्थनप्रसङ्गगतात् आभासभेदविचारात् शास्त्रे यत् प्रयोजनं
मुख्यतया अभिसंहितं स्वात्मनि ईश्वरप्रत्यभिज्ञानरूपं तदधिकरणसिद्धान्तनीत्या अनायाससिद्धम्,
इति दर्शयति—
अत एव यथाभीष्टसमुल्लेखावभासनात् ।
ज्ञानक्रिये स्फुटे एव सिद्धे सर्वस्य जीवतः ॥११॥
यत् इदं यथाभीष्टस्य बहिरसत्त्वात् अननुभूतस्यापि सम्यक् उल्लेखनम्, अवभासनं च
विकल्पस्य प्रसङ्गात् दर्शितम् अस्मादेव हेतोः इदमपि सिद्ध्यति—यः कश्चित् कीटो वा ब्रह्मा
वाला और दो सूँड से युक्त हाथी को देखता है, इस प्रकार प्रमाता के अन्तर में विद्यमान था
वही बाहर की ओर अन्तःकरण भूमि में आकर स्वच्छ बुद्धिरूपो दर्पण में प्रतिबिम्बित होकर
विकल्प के रूप में उसी काल पर्यन्त भासित होता है ॥ १० ॥
यह अन्तर के आभास का समर्थन है उसी के प्रसङ्ग से आभासभेद के विचार से शास्त्र
में जो मुख्यरूप से प्रयोजन कहा गया है वह अपनी आत्मा में ईश्वर प्रत्यभिज्ञारूप से अधिकरण
सिद्धान्त की नीति के द्वारा अनायास ही सिद्ध हो जाता है, इसे बताते हैं—
अन्तःस्थित आभास को ही बाहर की ओर निकालते हैं इसलिए सभी जीवों में ज्ञान और
क्रिया स्पष्ट सिद्ध हो जाती हैं ॥ ११ ॥
यह अपने अभीष्ट के लिए बाहर में न रहने पर भी नहीं अनुभव हुए का भी सम्यक्
उल्लेख करना और अवभासन विकल्प के प्रसंग से दिखाया गया है, इसी हेतु से यह भी सिद्ध
होता है कि जो कोई कीट-पतंग, प्राणी अथवा ब्रह्मादि देव जब तक जीवित रहते हैं उनमें
अवभासनरूप ज्ञान-शक्ति और उल्लेखनरूप क्रिया-शक्ति स्वाभाविक ही रहती हैं, इसीसे मनोराज्य,
१. ईश्वर की पहचान शक्ति के द्वारा आविष्कार करने पर ही होती है और वह शक्ति ज्ञानरूप एवं
क्रियारूप ही है । इस प्रकार ज्ञानरूप और क्रियारूप शक्ति से आविष्कार होने पर अपने स्वरूप की
प्रत्यभिज्ञा सिद्ध हो जाती है । जिस अर्थ के सिद्ध हो जाने पर उनके अनुयायी दूसरे अर्थों की भी
सिद्धि हो जाती है, इसीको अधिकरण सिद्धान्त कहते हैं। जैसे कि न्याय दर्शनमें बताया है—'दर्शन
स्पर्शनाभ्यामेकार्थ ग्रहणादिति ।' नेत्रेन्द्रिय से देखने एवं त्वगिन्द्रिय से स्पर्श करने से इन्द्रियों से भिन्न
एक आत्मरूप पदार्थ का ज्ञान न होने के कारण । जिस वस्तु को मैंने आँखों से देखा था, उसी वस्तु को
त्वगिन्द्रिय से स्पर्श भी करता हूँ । इस प्रकार जिसका नेत्रेन्द्रिय से ग्रहण होता है, उसी को—त्वगिन्द्रिय
से भी ग्रहण होता है और जिसका मैंने त्वचा से स्पर्श किया था उसी को देखता भी हूँ । एक ही
पदार्थ के रूप तथा स्पर्श गुणों को ग्रहण करने वाले दोनों ज्ञानों का एक ही उन इन्द्रियों से कर्ता है—
जो ऐसा प्रतिसंधान करता है उन दोनों इन्द्रिय जन्य ज्ञानों का अनुसन्धान करनेवाले अथवा शरीरादिकों
के समुदाय हैं, इन्द्रिय वर्ग नहीं है । इसलिए जो चक्षु से एवं त्वचा से एक ही पदार्थ को ग्रहण करता
है वह इन्द्रियों से व्यतिरिक्त आत्मा है । जिससे अनेक नेत्र, त्वचा आदि इन्द्रियों रूप कारणोंवाला एवं
रूपादि अनेक विषयों को देखनेवाला कोई संविद्रूप चेतन है ।
१४० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-१
वा जीवनक्रियाविष्टः तस्य अवभासनरूपा ज्ञानशक्तिः उल्लेखनरूपा च क्रियाशक्तिः नैसर्गिकी,
ततः तस्यां भूमौ व्यतिरिक्तेश्वरोपकल्पितपूर्वसिद्धसृष्ट्युपजीवनसम्भावनापि नास्ति, इति स्वमेव
ऐश्वर्यं स्फुटं प्रत्यभिज्ञेयं जानाति करोति च—इति ज्ञानक्रियास्वातन्त्र्यलक्षणम् एकवचनेन सर्वस्य
जीवजातस्य वस्तुत एकैश्वररूपतां सूचयति । इति शिवम् ॥ ११ ॥ आदितः ॥ ६३ ॥
इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां प्रथमे
ज्ञानाधिकारे ज्ञानशक्तिनिरूपणं नाम षष्ठमाह्निकम् ॥ ६ ॥
अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे एकाश्रयनिरूपणाख्यं
सप्तममाह्निकम्
अनन्तशक्तिरत्नानां यदेकाश्रयसंश्रयात् ।
विचित्रचन्द्रिकोल्लाससंसिद्धिस्तं स्तुमः शिवम् ॥
एवं स्मृत्यादिशक्तीनां वितत्य स्वरूपमियता दर्शितम्, यत्तु अत्र प्रमातुरपि स्वरूपम्
उन्मीलितम् तत्तासामेव शक्तित्वं समर्थयितुम् 'न हि स्वतन्त्रं शक्तिस्वरूपं भवितुमर्हति' इति,
अधुना तु तासां शक्तीनाम् एक आश्रयः, स च तच्छक्तिसंयोजनवियोजनादिस्वाच्छन्द्ययोगात्
महेश्वरः न तु जडस्वरूपवह्न्यादिवत् दाहकपाचकादिशक्त्याश्रयमात्रम्—इति यत् उभयम्
सङ्कल्पादि भूमि में अपने से भिन्न उपर्युक्त ईश्वर द्वारा कल्पित सृष्टि होने की संभावना भी
नहीं है, इससे सिद्ध होता है कि अपना ही ऐश्वर्य स्फुटरूप से पहचान करने योग्य है, इसी को
जानता है और करता भी है, यही ज्ञान क्रिया की स्वतन्त्रता है 'जीवतः' इसमें जो एकवचन
दिया है वह सारे जीव समुदाय की वस्तुतः एक ईश्वररूपता सूचित करता है ॥ ११ ॥
षष्ठ आह्निक समाप्त
जो अनन्त शक्तिरूपी रत्नों के एकमात्र आश्रय का स्थान होने के कारण, विचित्र-चित्ररूप
से चन्द्रिका के उल्लास की सिद्धि देते हैं, उस शिव का हम स्तवन करते हैं।
[ यह सारा का सारा संसार उस परमेश्वर ही शक्ति से अवस्थित है जैसे हिम से अलग
शीतलता नहीं रहती और अग्नि से अलग उष्णता नहीं होती, इसी न्याय से, शक्तिमान् से शक्ति
कहीं भिन्न उसे छोड़कर नहीं रहती है, धर्मी को धर्म से नहीं पुकारा जाता है। जैसा कि कहा
भी गया है शिव शक्ति को रखने के कारण ही शक्त कहा जाता है, इसलिए शिव शक्ति से अभिन्न
ही है 'शिवः शक्तस्तथा भावानिच्छया कर्तुमीहते।' शक्तयोऽस्य जगत् कृत्स्नम्' यह युक्ति है।
वस्तुतस्तु भगवान् शिवरूप ही यह सब है 'यदेकाश्रयेत्यादिना' इसलिए कहा गया है कि स्वतन्त्र-
शक्ति नहीं होती है और न तो उसका स्वरूप ही हो सकता है।]
इस प्रकार स्मृति आदि शक्तियों के स्वरूप को इतने ग्रन्थांश से विस्तारपूर्वक बता दिया
है किन्तु जिस शक्ति निरूपण में प्रमाता का स्वरूप उन्मीलित था, वह उन्हीं शक्तियों का ही
शक्तित्वरूप है, इसी के समर्थन के लिए कह रहे हैं—'शक्ति का स्वरूप भिन्न स्वतन्त्र नहीं होता
है।' इस समय तो उन शक्तियों के एक मात्र आश्रय शक्तिमान् को ही दिखाना है और वह
महेश्वर उन शक्तियों के संयोजन-वियोजन करने में स्वतन्त्र होने से जड स्वरूप वह्नि आदि के
अ.-१, आ.-७, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १४१
उपक्षिप्तम् ‘न चेत् अन्तःकृतानन्तविश्वरूप ॰॰॰।’ इत्यत्र सूत्रे, तत् वितत्य निर्णेतव्यम्। तत्र एक-
माश्रयं निर्णेतुम् ‘या चैषा प्रतिभा॰॰॰।’ इत्यादि ‘॰॰॰॰व्यवहारोऽनुभूयते ।।’ इत्यन्तं चतुर्दशभिः
श्लोकैः आह्निकं प्रस्तूयते। तत्र श्लोकेन एक आश्रयः स्वरूपत उपक्षिप्यते। ततोऽपि द्वयेन—
व्यवहारः सर्वः सति एकस्मिन् आश्रये युज्यते न असति, इति अन्वयव्यतिरेकात्मा युक्तिः उच्यते।
ततो व्यवहारस्वरूपं कार्यकारणभावतः, स्मरणतः, सत्यासत्यप्रविभागतश्च इति संक्षिप्य श्लोकेन
श्लोकाष्टकेन च प्रतिपाद्यते। ततः श्लोकेन सर्वोऽर्थो निगम्यते, इति—आह्निकार्थसंक्षेपः। अथ
श्लोकार्थो व्याख्यायते यदुक्तम्—‘सर्वस्य सिद्धे ज्ञानक्रिये जीवत’ इति तत् कथम् ? यावता
ज्ञानादिव्यतिरिक्तः कोऽसौ अन्यो ? यस्य ते स्याताम्, काणाददिशा हि दूषितः तदाश्रयः ‘ततो
भिन्नेषु धर्मेषु ॰॰॰।’ इत्यादिना ? तत् एतत् आशङ्क्य स्वदर्शनदिशा तमेकं स्वरूपत उपक्षिपति—
या चैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूपिता ।
अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः ॥ १ ॥
‘प्रतिभाति घट’ इति यद्यपि विषयोपश्लिष्टमेव प्रतिभानं भाति तथापि न तद्विषयस्य
स्वकं वपुः, अपि तु संवेदनमेव तत् तथा चकास्ति ‘मां प्रति भाति’ इति प्रमातृलग्नत्वात् । तथा
च वेदः —
समान दाहक, पाचक आदि शक्तिभाग का आश्रय नहीं है—अपितु शक्ति और शक्तिमान् इन
दोनों को कह दिया। ‘नहीं तो, अपने में अनन्त विश्व को कैसे रख पायेगा।’ इस बात का सूत्र
में विस्तारपूर्वक निर्णय करना है। वहाँ पर एक आश्रय का निर्णय करने के लिए—‘या चैषा
प्रतिभा ॰॰॰।’ इत्यादि से लेकर ‘॰॰॰॰॰व्यवहारोऽनुभूयते।’ तक चौदह श्लोकों से एक आश्रय
रहने पर ही समस्त व्यवहार हो सकता है, एवं न रहने पर नहीं हो सकता; यह अन्वय-व्यतिरेक-
भाव द्वारा युक्ति दिखायेंगे। उसके अनन्तर कार्य-कारणभाव से, स्मरण से सत्य और असत्य के
विभाग से, संक्षेपीकरण करके एक श्लोक से और आठ श्लोकों से भी प्रतिपादन करेंगे। तब
फिर एक श्लोक से समस्त अर्थों का शास्त्रीय पद्धति से व्यवस्थापन करेंगे, इतना ही इस आह्निक
का संक्षेप में अर्थ है। अब श्लोक के अर्थ का व्याख्यान करते हैं—जिसके विषय में कहा गया था
कि ‘सर्वस्य सिद्धे ज्ञानक्रिये जीवतः, अर्थात् ‘सब जीवों के लिए ज्ञान और क्रिया सिद्ध हैं’ यह कैसे
हो सकता है ? जबकि ज्ञानादि से भिन्न दूसरा कौन है ? जिसके वे होंगे, क्योंकि काणादादि के
सिद्धान्त से उसका आश्रय दूषित है ‘ततो भिन्नेषु धर्मेषु ॰॰॰॰।’ इत्यादि श्लोक से कहा है ?
इसकी आशङ्का करके अपने दर्शन की दृष्टि से उस के आश्रय के स्वरूप का उपदेश करते हैं—
उन-उन पदार्थों में क्रम से यह जो घटादि की प्रतिभा मिली हुई है। वह अनन्त अक्रमरूप
चिदात्मा महेश्वर ही प्रमाता हैं ॥ १ ॥
‘घटः प्रतिभाति’ अर्थात् घट का बोध होता है। यद्यपि यह विषय से मिला हुआ आभास
झलकता है, तो भी, वह विषय का अपना स्वरूप नहीं है, अपितु इसका ज्ञान ही वैसा भासित
होता है, ‘मां प्रति भाति’ मुझे यह भासता है—ऐसा प्रमाता भी कहता है। इस प्रकार प्रमाता
में मिला हुआ स्पष्ट मालूम होता है और उसी प्रकार वेद भी कहता है—
१४२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-१
'न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनु
भाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥' इति। शत्रा अविरतस्फुरणत्वं, कर्मप्रवचनीयेन
तदीयस्वातन्त्र्योपकल्पितनिर्माणक्रियाजनितो वेद्यवेदकभावरूपो लक्षणात्मा सम्बन्धो द्योतितः,
केवलं विषयोल्लेखनबलात् बहिः क्रमावभासः समर्थितः, स—सक्रमयौगपद्यादिविचित्ररूपो,
यः—पदार्थनां वक्ष्यमाणेश्वरस्वातन्त्र्यरूपदेशकालशक्त्युपकल्पितः, क्रमः—देशकालपरिपाटी,
तेन रूषिता—प्रतिबिम्बकल्पतया उपरक्ता या प्रतिभा उक्ता—'केवलं भिन्नसंवेद्य....' इत्यादिना।
एषा इति च—सर्वस्य स्वप्रकाशरूपा, परमार्थतश्च अन्तर्मुखत्वेन प्रकाशमात्रपरमार्थतया भेदा-
भावात् अक्रमा, सैव महेश्वरः, अविद्यमानोन्तः—परिच्छेदो देशतः कालतः स्वरूपतश्च यस्याः
चितः संविदः तदेव रूपं यस्य इति, अत एव बहिर्मुखप्रकाशात्मकविज्ञानस्वभावस्य प्रमाणवर्गस्य
योऽन्तः प्रत्याभासम् 'इदम् इदम्' इति अनन्तो विकल्पमयो विमर्शात्मा प्रमासमूहः, तत्र
संयोजनवियोजनविश्रमणाद्यनेकप्रकारस्वातन्त्र्यपरिपूर्णः शुद्धः 'अहंप्रत्यवमर्शमयः प्रमाता' स
भण्यते, अतश्च बहिर्घटप्रकाशः 'अयं घट' इति अन्तर्विकल्पः स्वीकृतपूर्वरूपः 'अहमिति' तदुभय-
उस प्रकाशरूप को न सूर्य प्रकाशित करता है और न तो चन्द्र एवं नक्षत्र गण, न तो
विद्युत ही प्रकाशित करती है—यह अग्नि कैसे कर सकेगी ? उस पूर्ण ब्रह्म के प्रकाश से यह
सारा का सारा संसार भासित होता है।
शतृ प्रत्यय से निरन्तर भासना सूचित होता है, जो कर्मप्रवचनीय 'भान्तं' द्वितीया
विभक्ति है, उसके स्वातन्त्र्य से, प्रकल्पित निर्माण क्रिया से उत्पन्न वेद्य-वेद्यकभावरूप सम्बन्ध
झलकता है और केवल विषय के उल्लेखन वशात् बाहर में क्रमपूर्वक आभास का समर्थन हुआ
है, वह सक्रम एकबार ही होना, विचित्ररूप पदार्थों के लिए कहे जानेवाले ईश्वर के देश-कालरूप
शक्ति से उपस्थापित है, देश-काल की परिपाटी ही क्रम कहलाती है, इसलिए मिली हुई प्रति-
बिम्बतुल्य प्रतिभा कही गयी है 'केवलं भिन्नसंवेद्य .....' इत्यादि पद से। इस प्रकार 'एषा'
शब्द से सब का अपना ही प्रकाशरूप है और परमार्थरूप से अन्तर्मुख होने के कारण यथार्थ
प्रकाश भाग से भेदभाव न रहने के कारण वह अक्रमरूप भी है, वही महेश्वर है, जिसका विनाश
कभी न होता हो अपरिच्छिन्न निरन्तर रहनेवाले देश-काल के स्वरूप से शून्य संविद्रूप ही
वस्तुतः स्वरूप माना गया है, इसलिए वह पदार्थ क्रम भी दो प्रकार का है, एक बाह्यरूप और
दूसरा आन्तररूप है, उसमें बाहरो प्रकाशात्मक विज्ञान स्वभाववाले प्रमाणवर्ग का प्रमाता में
प्रत्याभास 'इदम्-इदम्' इसरूप में अनन्त विकल्पमय प्रकाशरूप प्रमासमूह होता है। संयोजन-
वियोजन आदि में अक्रमरूप स्वतन्त्र प्रमाता क्रमिकरूप में बाहरी पदार्थ से युक्त रहता है, बाहर
में विमर्शात्मक विज्ञान स्वभाववाले प्रमाता में 'इदम्-इदम्' ऐसा प्रत्याभास प्रमाणवर्ग का होता
हैं, अन्तर्मुख में विकल्प युक्त विमर्शात्मा का प्रमासमूह क्रमपूर्वक ही होता है और उसमें वह
'अहंप्रत्यवमर्शमय प्रमाता' 'संयोजन-वियोजन के विश्रान्तिरूप आदि अनेक प्रकार के स्वातन्त्र्य
से पूर्ण शुद्धप्रमाता ही कहा जाता है और इसलिए बाहर में 'अयं घट:' इस प्रकार जो घट का
१. बाह्य और आभ्यन्तररूप से पदार्थ क्रम दो प्रकार के हैं। इदम्, इदम्, यह प्रमाणवर्ग बहिर्मुखी
प्रकाश है। प्रभा समूह विमर्शरूप अन्तर्मुखी है और क्रमिक है, संयोजन एवं वियोजन आदि में स्वतन्त्र
प्रमाता का अक्रम ही रहता है ओर बाह्य पदार्थवाला तो क्रमिक ही होता है।
अ.-१, आ.-७, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १४३
विश्रान्तिस्थानम्, इति—इयत् पूर्णं प्रकाशस्य स्वरूपम् ॥ १ ॥
अत्रैव उपपत्तिं प्रदर्शयितुमन्वयं तावदाह—
तत्तद्विभिन्नसंवित्तिमुखैरेकप्रमातरि ।
प्रतितिष्ठत्सु भावेषु ज्ञातेयमुपपद्यते ॥ २ ॥
'संवित्निष्ठा हि विषयव्यवस्थितयः' इति यत् उच्यते तत् न भिन्नरूपप्रमात्मकसंविन्मात्र-
विश्रान्त्या सिद्ध्यति, अपि तु तास्ता विभिन्नाः संविदो निश्चयरूपाः प्रमात्मानो याः तानि एव
मुखानि द्वाराणि उपाया मार्गाः तैः मुखैः नदीस्रोतः स्थानीयैः यदि अमी भाव नीलसुखादय
उह्यमाना एकस्मिन् 'अहमिति' प्रमातृरूपे महासंवित्समुद्रे प्रतितिष्ठन्ति—आभिमुख्येन विश्रान्तिं
भजन्ते, तत एषु परस्परं समन्वयरूपं यत् ज्ञातेयं तत् उपपत्त्या घटते, ज्ञातीनां भावः तच्छब्द-
प्रवृत्तिनिमित्तं परस्परं जानीयुः इति, कर्म च अन्योन्ययोगक्षेमोद्वहनात्मकं ज्ञातेयम्, तच्च
समन्वयाभिप्रायेण इह दर्शितम्—न जडानां स्वतः समन्वयः कदाचिदपि, इति प्रतिपादयितुम् ॥२॥
प्रकाश है—वह क्रमिक ही होता है एवं अन्तर में भी तो पहले स्वीकार किये हुए 'अहम्' का ही
क्रमिक बाहर में आभास होता है । बाह्यरूप और आन्तररूप ये दोनों ही प्रमाताओं की विश्रान्ति
का स्थान हैं इतना प्रकाश का पूर्णस्वरूप है ॥ १ ॥
'अत्रैव' अनन्त-शक्तिवाले स्वरूप में जो 'अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः' चिद्रूप
महेश्वर प्रमाता है उसी में उपपत्ति बताने के लिए सर्वप्रथम अन्वय कहते हैं—
एक ही प्रमाता में उन-उन विभिन्न प्रधान ज्ञानों से प्रतिष्ठित होनेवाले पदार्थ-भावों में
यही संवित् ज्ञात होती है ॥ २ ॥
'सारे के सारे विषयों की स्थिति संवित् में ही रहती है'—जो यह कहा जाता है वह
भिन्नरूप प्रमातावाले संविद्रूप मात्र में विश्रान्त होने से नहीं सिद्ध हो सकती, किन्तु उन-उन
विभिन्न संविद्रूप का जो निश्चय प्रमाणरूप है उन्हीं को उपाय बनाकर नदी के प्रवाह के समान ये
नील-सुखादिभाव यदि बहाये जायें और एक अहम् प्रमातारूप महासागर में बैठा दिये जायें और
उसीसे इन नील-सुखादि भावों में परस्पर समन्वयरूप ज्ञान उन-उन उपपत्तियों से घट सकता है,
अर्थात् ज्ञातियों के भाव उन-उन शब्द के निमित्त से परस्पर जाने जा सकेंगे और यहाँ पर कर्म
अन्योऽन्य क्षेमरूप निबाहना ज्ञातेय है उन्हीं दोनों को समन्वयरूप से बताया गया है। जड-
पदार्थों का स्वतः समन्वय कभी भी नहीं हो सकता, इस बात को दिखाने के लिए ही यह प्रयोग
किया जाता है ॥ २ ॥
अब शङ्का करते हैं कि सभी समन्वय कार्य-कारणभाव में विश्रान्त होकर समास भी हो
जाते हैं, जैसा कि बीज से अङ्कुर और अग्नि से धूमादि भिन्न-भिन्न कार्य-कारणभाव, इस पर
शङ्का करके, पूर्व अग्नि और बाद में होनेवाले जो धूमादि का सम्बन्ध है, इन सभी का एक साथ
अवभास किसी प्रकार भी देश-काल से भिन्न होनेवाले का एक में आभास नहीं होगा, एक बार
१. अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः ।
यह चिद्रूप प्रतिभा जो भिन्न-भिन्न पदार्थों में क्रमशः प्रकाशित हो रही है, वह अक्रम [ देश
कालादि से शून्य ] अनन्त प्रमाता महेश्वर है ।
१४४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-३-४
तथा च व्यतिरेकमुखेन एतदेवाह—
देशकालक्रमजुषामर्थानां स्वसमापिनाम् ।
सकृदाभाससाध्योऽसावन्यथा कः समन्वयः ॥ ३ ॥
अर्थानां जडानां, तज्ज्ञानानां तद्विकल्पानां तन्निश्चयानां च देशक्रमं कालक्रमं च अत्यजतां,
स्वसमापिनां—स्वरूपमात्रप्रतिष्ठानां, कः समन्वयः—न कश्चित् इत्यर्थः, यतो हि असौ समन्वयः
सकृदाभासेन देशकालाकारमिश्रीकरणात्मना योजनाभासेन साधयितुं शक्यः नान्यथा, न हि
पृथक्पृथक् परिक्षीणेषु स्रोतःसु तदुह्यमानाः तृणोलपादयाः समन्वयं कञ्चित् यान्ति इति । अनेकत्वेन
देशादिभेद इत्याशयेन सकृच्छब्दः तन्निषेधतात्पर्यण प्रयुक्तः ॥ ३ ॥
तत्र कोऽसौ समन्वयः ? इत्याशङ्क्य, बहुतरव्यापकं कार्यकारणभावं तावत् दर्शयति—
प्रत्यक्षानुपलम्भानां तत्तद्भिन्नांशपातिनाम् ।
कार्यकारणतासिद्धिर्हेतुतैकप्रमातृजा ॥ ४ ॥
इह अग्नौ प्रत्यक्षे धूमं न उपलभते, ततो धूमं प्रत्यक्षेण पश्यति, अग्निं तु यदि न उपलभते
धूममपि न उपलभते—इति प्रत्यक्षाभ्याम् अनुपलम्भैश्च इति पञ्चकात् 'कार्यकारणभावो
मिलकर भासित होने से एक ही प्रमातावाले हो जायेंगे—तब तो, इनका स्वरूप ही नहीं रहेगा
इसी कारण 'तथा च' अर्थात् व्यतिरेकरूप से व्याप्ति कहते हैं—
देश, काल और क्रम को रखनेवाले भाव-पदार्थ अपने [ देश-काल ] में मिलकर रहनेवाले,
एक प्रमाता में ही विश्रान्त होते हैं। यदि ऐसा न हो तो फिर समन्वय क्या कहलायेगा ? ॥ ३ ॥
नील-सुखादि जड-पदार्थों का, उनके ज्ञानों का, उनके विकल्पों का और उनके निश्चयों
का, देशक्रम और कालक्रम नहीं छोड़नेवाले अपने स्वरूप में रहनेवाले, उन पदार्थ-भावों का
क्या समन्वय हो सकेगा ? अर्थात् कुछ भी समन्वय नहीं बैठ सकता है। क्योंकि वह समन्वय
एक बार आभासित हो जाने से देश, काल और आकारों के आपस में मिल जाने पर योजना के
आभास से साध्य बन सकता है, अन्य प्रकार से नहीं हो सकता अर्थात् एक आभास में मिलाये
बिना नहीं हो सकता है जैसा कि अलग-अलग जल के प्रवाहों में बहते हुए तृण-उपलादि कोई
क्या आपस में समन्वित हो सकते हैं? जैसे वे आपस में समन्वित नहीं होते हैं—वैसे ही ये भी
नहीं होते हैं। इसलिए 'सकृत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है; क्योंकि अनेकत्व से देशादि का
भेद हो जाता है ॥ ३ ॥
नहीं तो, समन्वय हो नहीं सकता है 'अन्यथा कः समन्वयः !' कौन सा वह समन्वय है ?
इस पर आशङ्का कर बहुत प्रकार से व्याप्त कार्य-कारणभाव को ही सर्वप्रथम दिखाते हैं—
प्रत्यक्ष से नहीं उपलब्ध होनेवाले; उन-उन भिन्न-भिन्न अंशों में रहनेवाले; कार्य-कारणभाव
की सिद्धि के लिए एक ही प्रमाता से उत्पन्न हेतु साधक होगा ॥ ४ ॥
जिस समय अग्नि प्रत्यक्ष होती है, उस समय धूम का प्रत्यक्ष नहीं होता है। उसके बाद
धूम को प्रत्यक्ष प्रमाण से देखा जाता है, यदि अग्नि प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं होती तो फिर धूम का
भी प्रत्यक्ष नहीं होगा। इस प्रकार धूम और अग्नि इन दोनों के प्रत्यक्ष होने से और न होने से