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सर्वकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 343 में से

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पृष्ठ 24

ॐ नमः सच्चिदानन्दाय
अथ
ईश्वरप्रत्यभिज्ञा
महामाहेश्वराचार्यवर्यश्रीमदुत्पलदेवाचार्यविरचिता
श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यवर्यविरचित-
विमर्शिनी-
व्याख्यासंवलिता
अथ प्रथमः ज्ञानाधिकारः
अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे उपोद्घाताख्यं
प्रथममाह्निकम्
निराशंसात्पूर्णादहमिति पुरा भासयति यद्-
द्विशाखामाशास्ते तदनु च विभङ्क्तुं निजकलाम् ।
स्वरूपादुन्मेषप्रसरणनिमेषस्थिति Call/जुषस्-
तदद्वैतं वन्दे परमशिवशक्त्यात्मनिखिलम् ॥ १ ॥
सर्वदर्शनाचार्य-श्रीकृष्णानन्दसागर-विरचिता हिन्दी-व्याख्या
शिवरञ्जनी
सृष्टि के पूर्व 'अहम्' परमशिव परिपूर्णरूप होने के कारण किसी भी प्रकार की आकांक्षा से
रहित होकर भासता रहा है; और उसके बाद में अपनी स्वातन्त्र्यशक्ति को विभक्त करने के लिए
दो शाखाओं [ 'अहमिदम्' सदाशिव-ईश्वर ] को जो अव्यक्तरूप में रही उसे व्यक्त करने की इच्छा
की। अपने चिन्मय स्वरूप से उन्मेष-फैलाव और निमेष-स्थिति से युक्त; उस परमशिवशक्तिरूप
अखिल अद्वैत की हमलोग वन्दना करते हैं ॥ १ ॥
१. शुद्ध चिन्मय स्वभाव वाले परमशिव ही परिपूर्ण अपने स्वरूप में रहे; इसीलिए किसी भी तरह की
इच्छा न रखते हुए अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति की महिमा से एवं परमानन्द चमत्कार के तारतम्य से बाहर
की ओर उल्लसित होने की इच्छा की; जो कि सृष्टि के आदि में 'अहम्' इस परामर्शरूप से विस्फुरित