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सर्वकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 487

अध्याय ४ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४८५

सम्पूर्ण जगत्के अधिपति और समस्त प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे छिपे हुए हैं। उन्हींमें वेदके रहस्यको समझनेवाले महर्षिगण और समस्त देवतालोग भी ध्यानके द्वारा संलग्न रहते हैं। सब उन्हींका स्मरण और चिन्तन करके उन्हींमें जुड़े रहते हैं। इस प्रकार उन परमदेव परमेश्वरको जानकर मनुष्य यमराजके समस्त पाशोंको अर्थात् जन्म-मृत्युके कारणभूत समस्त बन्धनोंको काट डालता है। फिर वह कभी प्रकृतिके बन्धनमें नहीं आता, सदाके लिये सर्वथा मुक्त हो जाता है ॥ १५ ॥

घृतात् परं मण्डभिवातिसूक्ष्मं
ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गृह्णम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं
ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १६ ॥

शिवम्=कल्याणस्वरूप; एकम् देवम्=एक (अद्वितीय) परमदेवको; घृतात् परम्=मक्खनके ऊपर रहनेवाले; मण्डम् इव=सारभागकी भाँति; अतिसूक्ष्मम्=अत्यन्त सूक्ष्म; (और) सर्वभूतेषु=समस्त प्राणियोंमें; गृह्णम्=छिपा हुआ; ज्ञात्वा=जानकर; (तथा) विश्वस्य परिवेष्टितारम्=समस्त जगत्को सब ओरसे घेरकर स्थित हुआ; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) सर्वपाशैः=समस्त बन्धनोंसे, मुच्यते=छूट जाता है ॥ १६ ॥

व्याख्या—जो मक्खनके ऊपर रहनेवाले सारभागकी भाँति सबके सार एवं अत्यन्त सूक्ष्म हैं, उन कल्याणस्वरूप एकमात्र परमदेव परमेश्वरको समस्त प्राणियोंमें छिपा हुआ तथा समस्त जगत्को सब ओरसे घेरकर उसे व्याप्त करनेवाला जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सदाके लिये सर्वथा छूट जाता है ॥ १६ ॥

एष देवो विश्वकर्मा महात्मा
सदा जनानां हृदये संनिविष्टः ।
हृदा मनीषा मनसाभिकल्पो
य एतद् विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १७ ॥

एषः=यह; विश्वकर्मा=जगत्कर्ता; महात्मा=महात्मा; देवः=परमदेव परमेश्वर;