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सर्वकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 548 में से

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पृष्ठ 319

खण्ड ३ ] ऐतरेयोपनिषद् ३१७

ही हो सकता है, दूसरे शरीरमें नहीं। अतः मनुष्यको अपने जीवनके अमूल्य
समयका सदुपयोग करना चाहिये, उसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिये। इस अध्यायमें
मानो परमात्माकी महिमाका और मनुष्य-शरीरके महत्त्वका दिग्दर्शन करानेके
लिये ही सृष्टि-रचनाका वर्णन किया गया है॥ १३॥

तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते
परोक्षेण। परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ १४ ॥

तस्मात्=इसीलिये; इदन्द्रः नाम=वह 'इदन्द्र' नामवाला है; ह=वास्तवमें;
इदन्द्रः नाम वै=वह 'इदन्द्र' नामवाला ही है; (परंतु) इदन्द्रम्=इदन्द्र; सन्तम्=होते
हुए ही; तम्=उस परमात्माको; परोक्षेण=परोक्षभावसे (गुप्त नामसे); इन्द्रः=‘इन्द्र’;
इति=यों; आचक्षते=पुकारते हैं; हि=क्योंकि; देवाः=देवतालोग; परोक्षप्रियाः
इव
=मानो परोक्षभावसे कही हुई बातको पसंद करनेवाले होते हैं; हि देवाः
परोक्षप्रियाः इव
=देवतालोग मानो परोक्षभावसे कही हुई बातोंको ही पसंद
करनेवाले होते हैं॥ १४॥

व्याख्या— परब्रह्म परमात्माको उस मनुष्य-शरीरमें उत्पन्न हुए पुरुषने
पूर्वोक्त प्रकारसे प्रत्यक्ष कर लिया, इसी कारण परमात्माका नाम 'इदन्द्र' है।
अर्थात् ‘इदम् द्रः=इसको मैंने देख लिया' इस व्युत्पत्तिके अनुसार उसका 'इदन्द्र'
नाम है। इस प्रकार यद्यपि उस परमात्माका नाम 'इदन्द्र' ही है, फिर भी लोग
इसे परोक्षभावसे 'इन्द्र' कहकर पुकारते हैं; क्योंकि देवता लोग मानो छिपाकर
ही कुछ कहना पसंद करते हैं। 'परोक्षप्रिया इव हि देवाः' इस अन्तिम वाक्यको
दुबारा कहकर इस खण्डकी समाप्ति सूचित की गयी है॥ १४॥

॥ तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ३ ॥

॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥