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सर्वकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 548 में से

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पृष्ठ 222

२२० ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ६

परमात्माको पा लेते हैं, जो परम शान्त—सब प्रकारके विकारोंसे रहित हैं, जहाँ
न बुढ़ापा है, न मृत्यु है, न भय है, जो अजर, अमर, निर्भय एवं सर्वश्रेष्ठ परम
पुरुषोत्तम हैं॥ ७॥

॥ पञ्चम प्रश्न समाप्त ॥ ५ ॥


षष्ठ प्रश्न

अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ—भगवन्हिरण्यनाभः कौसल्यो
राजपुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नमपृच्छत। षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ।
तमहं कुमारमब्रुवं नाहमिमं वेद यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति
समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति तस्मान्नार्हाम्यनृतं
वक्तुम्। स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज। तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष
इति॥ १॥

अथ=फिर; ह एनम्=इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद) से; भारद्वाजः=
भरद्वाजपुत्र; सुकेशा=सुकेशाने; पप्रच्छ=पूछा—; भगवन्=भगवन्!; कौसल्यः=
कोसलदेशीय; राजपुत्रः=राजकुमार; हिरण्यनाभः=हिरण्यनाभने; माम् उपेत्य=मेरे
पास आकर; एतम् प्रश्नम्=यह प्रश्न; अपृच्छत=पूछा; भारद्वाज=हे भारद्वाज! (क्या
तुम); षोडशकलम्=सोलह कलाओंवाले; पुरुषम्=पुरुषको; वेत्थ=जानते हो; तम्
कुमारम्
=(तब) उस राजकुमारसे; अहम्=मैंने; अब्रुवम्=कहा; अहम्=मैं; इमम्=इसे;
न वेद=नहीं जानता; यदि=यदि; अहम्=मैं; इमम् अवेदिषम्=इसे जानता होता (तो);
ते=तुझे; कथम् न अवक्ष्यम् इति=क्यों नहीं बताता; एषः वै=वह मनुष्य अवश्य;
समूलः=मूलके सहित; परिशुष्यति=सर्वथा सूख जाता है (नष्ट हो जाता है);
यः=जो; अनृतम्=झूठ; अभिवदति=बोलता है; तस्मात्=इसलिये (मैं); अनृतम्=
झूठ; वक्तुम्=बोलनेमें; न अर्हामि=समर्थ नहीं हूँ; सः=वह राजकुमार (मेरा उत्तर
सुनकर); तूष्णीम्=चुपचाप; रथम्=रथपर; आरुह्य=सवार होकर; प्रवव्राज=चला