हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें-२०२] हाथीको मारनेकी धूर्त गीदड़की युक्ति ७५
जिससे पति संतुष्ट न हो वह भार्या नहीं कही जाती है, क्योंकि स्त्रियोंके
पति संतुष्ट होनेसे सब देवताएँ संतुष्ट होती हैं ॥ २०१ ॥
ततो यद्यदादिशति मे प्राणेश्वरस्तदेवाहमविचारितं करोमि ।'
दूत्योक्तम्-'सत्यतममेतत् ।' लावण्यवत्युवाच-'ध्रुवं सत्यमेतत् ॥'
ततो दृतिकया गत्वा तत्तत्सर्वं तुङ्गबलस्याग्रे निवेदितम् । तच्छ्रुत्वा
तुङ्गबलोऽब्रवीत्—'विषमेपुणा व्रणितहृदयस्तां विना कथमहं
जीविष्यामि ?' । कुट्टन्याह—'स्वामिनानीय समर्पयितव्या' इति ।
स प्राह—'कथमेतच्छक्यम् ?' । कुट्टन्याह—'उपायः क्रियताम् ।
इसलिये जो जो मेरा पति मुझे आज्ञा देता है उसे बिना विचारे करती हूं.
दूती बोली-'यह बात बहुत सच्ची है ॥' लावण्यवतीने कहा-'वास्तवमें सच्ची है ॥'
फिर दूतीने जा कर यह सब समाचार तुंगबलके आगे रखे ॥ वह सुन कर
तुंगबलने कहा-'तीक्ष्ण बाणसे टुकड़े टुकड़े हुए हृदय वाला मैं उसके बिना कैसे
जीऊंगा ? दूतीने कहा-'उसका पति लाकर सौंप देगा.' उसने कहा-'यह कैसे
हो सकता है ?' कुटनी बोली-'उपाय कीजिये;
तथा चोक्तम्,—
उपायेन हि यच्छक्यं न तच्छक्यं पराक्रमैः ।
शृगालेन हतो हस्ती गच्छता पङ्कवर्त्मना' ॥ २०२ ॥
जैसा कहा भी है—जो बात उपायसे हो सकती है वह पराक्रमसे नहीं
हो सकती है, जैसे कीचड़के मार्गसे जाते हुए हाथीको सियारने मार
डाला' ॥ २०२ ॥
राजपुत्रः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । सा कथयति—
राजपुत्र पूछने लगा-'यह कथा कैसी है ?' वह कहने लगी—
कथा ८
[ धूर्त गीदड़ और कर्पूरतिलक हाथीकी कहानी ८ ]
अस्ति ब्रह्मारण्ये कर्पूरतिलको नाम हस्ती । तमवलोक्य
सर्वे शृगालाश्चिन्तयन्ति स्म—'यद्ययं केनाप्युपायेन म्रियते
तदाऽस्माकमेतद्देहेन मासचतुष्टयस्य भोजनं भविष्यति ।' तत्रैकेन
वृद्धशृगालेन प्रतिज्ञातम्—'मया बुद्धिप्रभावादस्य मरणं साध-