हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १८०-
सोनेकी माला पहन कर भी स्वभावसे प्रकाशमान, संपूर्ण गुणोंको प्रकट करने
वाली सिंहकी कांतिको कैसे पा सकता है ? ॥ १७९ ॥
धनवानिति हि मदो मे किं गतविभवो विषादमुपयामि ? ।
करनिहतकन्दुकसमाः पातोत्पाता मनुष्याणाम् ॥ १८० ॥
'मैं धनवान् हूं' इस प्रकार मुझे घमण्ड क्यों हैं ? और निर्धन हो कर क्यों
दुःख भोगता हूं ? निश्चयही मनुष्योंका ऊंचा नीचा होना तो हाथसे उछाली हुई
गेंदके समान है ॥ ॥ १८० ॥
अपरं च,—
अभ्रच्छाया खलप्रीतिर्नवसस्यानि योषितः ।
किंचित्कालोपभोग्यानि यौवनानि धनानि च ॥ १८१ ॥
और दूसरे—बादलीकी छाया, नीचकी प्रीति, नया अन्न, स्त्रियां, यौवन
तथा धन ये थोड़े दिनके भोगनेके लिये होते हैं ॥ १८१ ॥
वृत्त्यर्थं नातिचेष्टेत सा हि धात्रैव निर्मिता ।
गर्भादुत्पतिते जन्तौ मातुः प्रस्रवतः स्तनौ ॥ १८२ ॥
आजीविकाके लिये बहुत उद्योग नहीं करना चाहिये, वह तो विधाताने
निश्चय कर दिया है, क्योंकि प्राणीके गर्भसे निकलतेही माताके स्तनोंसे दूध
निकलने लगता है ॥ १८२ ॥
अपि च सखे !,—
येन शुक्लीकृता हंसाः शुकाश्च हरितीकृताः ।
मयूराश्चित्रिता येन स ते वृत्तिं विधास्यति ॥ १८३ ॥
और भी हे मित्र ! जिसने हंसोंको सफेद, तोतोंको हरा और मोरोंको विचित्र
बनाया है वही तेरी आजीविकाको देगा ॥ १८३ ॥
अपरं च,—सतां रहस्यं शृणु; मित्र !
और दूसरे-हे मित्र ! सज्जनोंका गुप्त मंत्र सुन;
जनयन्त्यर्जने दुःखं तापयन्ति विपत्तिषु ।
मोहयन्ति च संपत्तौ कथमर्थाः सुखावहाः ? ॥ १८४ ॥
जो कमानेमें दुःख और आपत्तियोंमें संताप करते हैं, और अधिक बढ़नेसे
मदांध ( या कृतघ्न ) कर देते हैं ऐसे धन कैसे सुखदायक हो सकते हैं ? ॥१८४॥