हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १७३-
और दूसरे-शास्त्रकी विधि, उद्योग (पराक्रम) से डरे हुए मनुष्यको कुछ गुण
(फायदा) नहीं करती है, जैसे इस संसार में हाथ पर धरा हुआभी दीपक
अन्धेको वस्तु नहीं दिखाता है ॥ १७२ ॥
तदत्र सखे ! दशाविशेषे शान्तिः करणीया । एतदप्यतिकष्टं
त्वया न मन्तव्यम् ।
इसलिये हे मित्र ! इस शेष दशामें शान्ति करनी चाहिये । और इसेभी
अधिक क्लेश तुमको नहीं मानना चाहिये ।
यतः,—
राजा कुलवधूर्विप्रा मन्त्रिणश्च पयोधराः ।
स्थानभ्रष्टा न शोभन्ते दन्ताः केशा नखा नराः ॥ १७३ ॥
क्योंकि—राजा, कुलकी वधू, ब्राह्मण, मंत्री, स्तन, दंत, केश, नख और
मनुष्य ये अपने स्थानसे अलग हुए शोभा नहीं देते हैं ॥ १७३ ॥
इति विज्ञाय मतिमान्स्वस्थानं न परित्यजेत् । कापुरुषवचनमेतत् ।
यह जान कर बुद्धिमान्को अपना स्थान नहीं छोड़ना चाहिये । यह कायर
पुरुषका वचन है ।
यतः,—
स्थानमुत्सृज्य गच्छन्ति सिंहाः सत्पुरुषा गजाः ।
तत्रैव निधनं यान्ति काकाः कापुरुषा मृगाः ॥ १७४ ॥
क्योंकि—सिंह, सज्जन पुरुष, और हाथी, ये स्थानको छोड़ कर जाते हैं, और
काक, कायर पुरुष और मृग, ये वहांही नाश होते हैं ॥ १७४ ॥
को वीरस्य मनस्विनः स्वविषयः, को वा विदेशस्तथा
यं देशं श्रयते तमेव कुरुते बाहुप्रतापार्जितम् ।
यद्दंष्ट्रानखलाङ्गलप्रहरणः सिंहो वनं गाहते
तस्मिन्नेव हतद्विपेन्द्ररुधिरैस्तृष्णां छिनत्त्यात्मनः ॥ १७५ ॥
वीर और उद्योगी पुरुषोंको देश और विदेश क्या है ? अर्थात् जैसा देश
वैसाही विदेश। वे तो जिस देशमें रहते हैं उसीको अपने बाहुके प्रतापसे
जीत लेते हैं, जैसे सिंह जिस वनमें दांत, नख, पूंछसे प्रहार करता हुआ
फिरता है उसी वनमें (अपने बलसे) मारे हुए हाथियोंके रुधिरसे अपनी
प्यास बुझाता है ॥ १७५ ॥