हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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- १४९ ] प्राणियोंके लिये उचित धर्म ५९
और—जिसका मन संतुष्ट है उसको सब संपत्तियां हैं जैसे पैरमें जूता पहने
हुयेको सब पृथ्वी चर्ममयी दीखती है ॥ १४४ ॥
अपरं च,—
संतोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम् ।
कुतस्तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम् ? ॥ १४५ ॥
और दूसरे—संतोषरूपी अमृतसे अघाये हुए शांतचित्त वालोंको जो सुख है,
वह सुख इधर उधर फिरने वाले धनके लोभियोंको कहां रक्खा है ? ॥ १४५ ॥
किंच,—
तेनाधीतं श्रुतं तेन तेन सर्वमनुष्ठितम् ।
येनाशाः पृष्ठतः कृत्वा नैराश्यमवलम्बितम् ॥ १४६ ॥
और—जिसने आशाको पीछे कर निराशाका सहारा लिया है, उसीने पढ़ा,
उसीने सुना और उसीने सब कुछ कर लिया ॥ १४६ ॥
अपि च,—
असेवितेश्वरद्वारमदृष्टविरहव्यथाम् ।
अनुक्तक्लीबवचनं धन्यं कस्यापि जीवनम् ॥ १४७ ॥
औरभी—जिसने धनवान्के द्वारकी सेवा नहीं की ( याने श्रीमान्के पास
कभी द्रव्ययाचना नहीं की ), विरहके दुःखको नहीं देखा, और कभी दीन वचन
मुखसे नहीं कहे, ऐसे किसी भी मनुष्यका जीना धन्य है ॥ १४७ ॥
यतः,—
न योजनशतं दूरं वाह्यमानस्य तृष्णया ।
संतुष्टस्य करप्राप्तेऽप्यर्थे भवति नादरः ॥ १४८ ॥
क्योंकि—जिसको तृष्णाने घुमा रक्खा है उसे सौ योजनभी क्या दूर हैं ?
और संतोषीके हाथमें धन आ जाने पर भी आदर नहीं होता है ॥ १४८ ॥
तदत्रावस्थोचितकार्यपरिच्छेदः श्रेयान् ।
इसलिये यहां दशाके उचित कार्यका निश्चय करना कल्याणकारी है ॥
को धर्मो भूतदया किं सौख्यमरोगिता जगति जन्तोः ।
कः स्नेहः सद्भावः किं पाण्डित्यं परिच्छेदः ॥ १४९ ॥