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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 302 में से

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पृष्ठ 79
  • १४९ ] प्राणियोंके लिये उचित धर्म ५९
    और—जिसका मन संतुष्ट है उसको सब संपत्तियां हैं जैसे पैरमें जूता पहने
    हुयेको सब पृथ्वी चर्ममयी दीखती है ॥ १४४ ॥
    अपरं च,—
    संतोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम् ।
    कुतस्तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम् ? ॥ १४५ ॥
    और दूसरे—संतोषरूपी अमृतसे अघाये हुए शांतचित्त वालोंको जो सुख है,
    वह सुख इधर उधर फिरने वाले धनके लोभियोंको कहां रक्खा है ? ॥ १४५ ॥
    किंच,—
    तेनाधीतं श्रुतं तेन तेन सर्वमनुष्ठितम् ।
    येनाशाः पृष्ठतः कृत्वा नैराश्यमवलम्बितम् ॥ १४६ ॥
    और—जिसने आशाको पीछे कर निराशाका सहारा लिया है, उसीने पढ़ा,
    उसीने सुना और उसीने सब कुछ कर लिया ॥ १४६ ॥
    अपि च,—
    असेवितेश्वरद्वारमदृष्टविरहव्यथाम् ।
    अनुक्तक्लीबवचनं धन्यं कस्यापि जीवनम् ॥ १४७ ॥
    औरभी—जिसने धनवान्के द्वारकी सेवा नहीं की ( याने श्रीमान्के पास
    कभी द्रव्ययाचना नहीं की ), विरहके दुःखको नहीं देखा, और कभी दीन वचन
    मुखसे नहीं कहे, ऐसे किसी भी मनुष्यका जीना धन्य है ॥ १४७ ॥
    यतः,—
    न योजनशतं दूरं वाह्यमानस्य तृष्णया ।
    संतुष्टस्य करप्राप्तेऽप्यर्थे भवति नादरः ॥ १४८ ॥
    क्योंकि—जिसको तृष्णाने घुमा रक्खा है उसे सौ योजनभी क्या दूर हैं ?
    और संतोषीके हाथमें धन आ जाने पर भी आदर नहीं होता है ॥ १४८ ॥
    तदत्रावस्थोचितकार्यपरिच्छेदः श्रेयान् ।
    इसलिये यहां दशाके उचित कार्यका निश्चय करना कल्याणकारी है ॥
    को धर्मो भूतदया किं सौख्यमरोगिता जगति जन्तोः ।
    कः स्नेहः सद्भावः किं पाण्डित्यं परिच्छेदः ॥ १४९ ॥