हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें-१३९ ] अनुचित कार्यकी निन्दा ५७
किं च,—
वरं मौनं कार्यं न च वचनमुक्तं यदनृतं
वरं क्लैब्यं पुंसां न च परकलत्राभिगमनम् ।
वरं प्राणत्यागो न च पिशुनवाक्येष्वभिरुचि-
र्वरं भिक्षाशित्वं न च परधनास्वादनसुखम् ॥ १३७ ॥
और चुप रहना अच्छा, पर मिथ्या (झूठा) वचन कहना अच्छा नहीं;
मनुष्योंकी नपुंसकता अच्छी, पर पराई स्त्रीके साथ गमन अच्छा नहीं; मर जाना
अच्छा, किन्तु धूर्तकी बातोंमें रुचि करना अच्छा नहीं; और भीख मांगना
अच्छा, पर पराया धनसे सुस्वादु भोजनका सुख अच्छा नहीं ॥ १३७ ॥
वरं शून्या शाला न च खलु वरो दुष्टवृषभो
वरं वेश्या पत्नी न पुनरविनीता कुलवधूः ।
वरं वासोऽरण्ये न पुनरविवेकाधिपपुरे
वरं प्राणत्यागो न पुनरथमानामुपगमः ॥ १३८ ॥
सूनी गौशाला अच्छी, पर मरखना बैल अच्छा नहीं; वेश्या स्त्री अच्छी, परंतु
कुलकी बहू व्यभिचारिणी अच्छी नहीं; वनमें रहना अच्छा, पर अविवेकी
राजाके नगरमें रहना अच्छा नहीं; और प्राणोंको छोड़ देना अच्छा, पर
दुर्जनोंका संग अच्छा नहीं ॥ १३८ ॥
अपि च,—
सेवेव मानमखिलं ज्योत्स्नेव तमो जरैव लावण्यम् ।
हरिहरकथेव दुरितं गुणशतमप्यर्थिता हरति ॥ १३९ ॥
और भी—जैसे सेवा सब मानको, चांदनी अंधकारको, बुढ़ापा खूबसूरतीको
और विष्णु तथा महादेवकी कथा पापोंको हरती है वैसेही याचना सैकड़ों
गुणोंको हर लेती है ॥ १३९ ॥
इति विमृश्य 'तत्किमहं परपिण्डेनात्मानं पोषयामि ? कष्टं भोः,
तदपि द्वितीयं मृत्युद्वारम् ।
यह विचार कर कि मैं किस प्रकार पराये भोजनसे अपनेको पालूं ? अहो,
बड़े कष्टकी बात है वहभी दूसरा मृत्युका द्वार है ।