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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 63

-९२ ] कौवेकी प्रीति-याचना ४३
उक्तं चैतत्,―
शत्रुना न हि संदध्यात् सुश्लिष्टेनापि संधिना ।
सुतप्तमपि पानीयं शमयत्येव पावकम् ॥ ८८ ॥
और यह कहा है कि वैरी चाहे जितना मीठा बन कर मेल करे परन्तु उसके
साथ मेल न करना चाहिये, क्योंकि पानी चाहे जितनाभी गरम हो आगको
बुझाही देता है ॥ ८८ ॥
दुर्जनः परिहर्त्तव्यो विद्ययालंकृतोऽपि सन् ।
मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकरः ? ॥ ८९ ॥
दुर्जन विद्यावान्भी हो परन्तु उसे छोड़ देना चाहिये, क्योंकि रत्नसे
शोभायमान सर्प क्या भयंकर नहीं होता है ? ॥ ८९ ॥
यदशक्यं न तच्छक्यं यच्छक्यं शक्यमेव तत् ।
नोदके शकटं याति न च नौर्गच्छति स्थले ॥ ९० ॥
जो बात नहीं हो सकती है वह कदापि नहीं हो सकती है, और जो हो
सकती है वह हो ही सकती है; जैसे पानी पर गाड़ी नहीं चलती और जमीन
पर नाव नहीं चल सकती है ॥ ९० ॥
अपरं च,―
महताप्यर्थसारेण यो विश्वसिति शत्रुपु ।
भार्यासु च विरक्तासु तदन्तं तस्य जीवनम्' ॥ ९१ ॥
और दूसरे-जो मनुष्य अधिक प्रयोजनसे शत्रुओं और व्यभिचारिणी स्त्रियों
पर विश्वास करता है उसके जीनेका अंत आपहुँचा है ( मृत्यु संनिध है)' ॥९१॥
लघुपतनको ब्रूते—'श्रुतं मया सर्वम् । तथापि मम चैतावान्संक-
ल्पः-'त्वया सह सौहृद्यमवश्यं करणीयम्' इति । नो चेदनाहा-
रेणात्मानं व्यापादयिष्यामि ।
लघुपतनक कौवा बोला-'मैंने सब सुन लिया, तोभी मेरा इतना संकल्प
है कि तेरे संग मित्रता अवश्य करनी चाहिये. नहीं तो भूखा मर अपघात
करूंगा.
तथा हि,―
मृद्धटवत् सुखभेद्यो दुःसंधानश्च दुर्जनो भवति ।
सुजनस्तु कनकघटवद्दुर्भेद्यश्चाशु संधेयः ॥ ९२ ॥