हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४० हितोपदेशः [ मित्रलाभः ७८-
आशावतां श्रद्दधतां च लोके
किमर्थिनां वञ्चयितव्यमस्ति ? ॥ ७८ ॥
क्यों कि-अच्छे प्रकारसे बोलने वालोंको, मीठे २ वचनों तथा मिथ्या कपटसे
वशमें किये हुओंको, आशा रखने वालोंको, भरोसा रखने वालोंको, और धनके
याचकोंको, ठगना क्या बड़ी बात है ? ॥ ७८ ॥
उपकारिणि विश्रब्धे शुद्धमतौ यः समाचरति पापम् ।
तं जनमसत्यसंधं भगवति वसुधे ! कथं वहसि ? ॥ ७९ ॥
और-हे पृथ्बी ! जो मनुष्य उपकारी, विश्वासी तथा भोले भाले मनुष्यके
साथ छल ( ठगाई ) करता है उस ठग पुरुषको हे भगवति पृथ्बी ! तू कैसे
धारण करती है ? ॥ ७९ ॥
दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत् ।
उष्णो दहति चाङ्गारः शीतः कृष्णायते करम् ॥ ८० ॥
दुष्टके साथ मित्रता और प्रीति नहीं करनी चाहिये । क्योंकि गरम अंगार।
हाथको जलाता है और ठंडा हाथको काला कर देता है ॥ ८० ॥
अथवा स्थितिरियं दुर्जनानाम् ,—
अथवा दुर्जनोंका यही आचरण है,—
प्राक् पादयोः पतति खादति पृष्ठमांसं
कर्णे कलं किमपि रौति शनैर्विचित्रम् ।
छिद्रं निरूप्य सहसा प्रविशत्यशङ्कः
सर्वं खलस्य चरितं मशकः करोति ॥ ८१ ॥
मच्छर, दुष्टके समान सब चरित्र करता है, अर्थात् जैसे दुष्ट पहले पैरों पर
गिरता है वैसेही यहभी गिरता है । जैसे दुष्ट पीठ पीछे बुराई करता है वैसेही
यह भी पीठमें काटता है । जैसे दुष्ट कानके पास मीठी २ बात करता है वैसेही
यह भी कानके पास मधुर विचित्र शब्द करता है । और जैसे दुष्ट आपत्तिको
देख कर निडर हो बुराई करता है वैसेही मच्छर भी छिद्र अर्थात् रोमके छेदमें
प्रवेश कर काटता है ॥ ८१ ॥
दुर्जनः प्रियवादी च नैतद्विश्वासकारणम् ।
मधु तिष्ठति जिह्वाग्रे हृदि हालाहलं विषम्' ॥ ८२ ॥