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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 211

-९७ ] चित्रवर्णकी सेनाका डेरा लगा लेना १९१
किंतु,-
अन्यदुच्छृङ्खलं सत्त्वमन्यच्छास्त्रनियन्त्रितम् ।
सामानाधिकरण्यं हि तेजस्तिमिरयोः कुतः ? ॥ ९७ ॥
परन्तु, एक मनुष्य तो निरंकुश याने स्वतंत्र, और दूसरा नियन्त्रित याने नीति
पर चलने वाला इन दोनोंमें बड़ा अन्तर है, जैसे निश्चय करके चाँदनी और
अँधेरेका एक जगह पर होना कहाँ संभव है ? अर्थात् नहीं हो सकता है,
इसलिये नीतिविरुद्ध नहीं चलना चाहिये ॥ ९७ ॥
तत उत्थाय राजा मौहूर्तिकावेदितलग्ने प्रस्थितः ।
तब राजा उठ कर ज्योतिषीके बतलाये लग्नमें लड़ाईके लिये बिदा हुआ ।
अथ प्रहितप्रणिधिर्हिरण्यगर्भमागत्योवाच-'देव ! समागतप्रायो
राजा चित्रवर्णः । संप्रति मलयपर्वताधित्यकायां समावासितकट-
कोऽनुवर्तते । दुर्गशोधनं प्रतिक्षणमनुसंधातव्यम्, यतोऽसौ
गृध्रो महामन्त्री । किंच केनचित्सह तस्य विश्वासकथाप्रसङ्गेनैव
तदिङ्गितमवगतं मया यदनेन कोऽप्यस्मद्दुर्गे प्रागेव नियुक्तः ।'
चक्रो ब्रूते- 'देव ! काक एवासौ संभवति ।' राजाह - 'न कदा-
चिदेतत् । यद्येवं तदा कथं तेन शुकस्याभिभवोद्योगः कृतः ? अपरं
च । शुकस्यागमनात्तस्य विग्रहोत्साहः । स चिरादत्रास्ते ।' मन्त्री
ब्रूते- 'तथाप्यागन्तुः शङ्कनीयः ।' राजाह- 'आगन्तुका हि
कदाचिदुपकारका दृश्यन्ते ।
फिर भेजे हुए दूतने हिरण्यगर्भसे आ कर कहा- 'महाराज ! राजा चित्रवर्ण
आ पहुँचा है । अब मलय पर्वतकी ऊँची भूमि पर डेरा डाल कर अपनी सेनाको
बसा कर ठहरा हुआ है । गढकी देखभाल क्षणक्षणमें करनी चाहिये, क्योंकि
यह गिद्ध महामंत्री है । और किसीके साथ उसकी विश्वासकी बातचीतसेही
उसकी चेष्टा मैंने जान ली कि हमारे गढ़में इसने किसी न किसीको पहलेसेही
लगा रक्खा होगा।' चकवा बोला-'महाराज ! वह कौवाही होना संभव दीख
पड़ता है।' राजा बोला-'यह बात कभी शक्य नहीं है। जो ऐसा होता तो कैसे
उसने तोतेके अनादर करनेका उद्योग किया है ? और दूसरे तोतेके आनेसे
उसको लड़ाईका उत्साह हुआ है। वह यहाँ बहुत दिनोंसे रहता है।' मंत्री