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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

-७९ ] युद्धमें धनकी अत्यावश्यकता १८७
ऊँची नीची भूमिमें, कीचड़ खाँदेमें, तथा पर्वत पर हाथियों पर जाय, और
एक-सी भूमिमें घोड़ों पर, और पानीमें नावोंके द्वारा, और सब देशोंमें पैदल
सेनाको साथ ले कर जाना चाहिये ॥ ७३ ॥
हस्तिनां गमनं प्रोक्तं प्रशस्तं जलदागमे ।
तदन्यत्र तुरंगाणां पत्तीनां सर्वदैव हि ॥ ७४ ॥
और बरसातमें हाथियोंका जाना, और ऋतुमें अर्थात् गरमी और जाड़ेमें
घोड़ोंको और पैदलोंका जाना हमेशा श्रेष्ठ कहा है ॥ ७४ ॥
शैलेषु दुर्गमार्गेषु विधेयं नृप ! रक्षणम् ।
स्वयोधै रक्षितस्यापि शयनं योगनिद्रया ॥ ७५ ॥
हे राजा ! पर्वतोंमें तथा कठिन कठिन मार्गोंमें अपनी रक्षा अर्थात् सावधान-
ता रखनी चाहिये, और अपने योद्धाओंसे रक्षा किये हुए भी राजाको कपटकी
नींदसे सोना चाहिये, अर्थात् क्षणक्षणमें अपनी रक्षाकी चिन्ता करनी
चाहिये ॥ ७५ ॥
नाशयेत्कर्षयेच्छत्रून् दुर्गकण्टकमर्दनैः ।
परदेशप्रवेशे च कुर्यादाटविकान्पुरः ॥ ७६ ॥
गढ़को ढाल कर, डेरेको तोड़ कर शत्रु का नाश करे अथवा पकड़ बाँधे
और शत्रुके देशमें प्रवेश करनेसे पहले बनके रहने वाले भीलोंको मार्ग शोधन
करनेके लिये आगे भेजना चाहिये ॥ ७६ ॥
यत्र राजा तत्र कोशो विना कोशान्न राजता ।
स्वभृत्येभ्यस्ततो दद्यात् को हि दातुर्न युध्यते ? ॥ ७७ ॥
जहाँ राजा हो वहाँ धनका कोश रहना चाहिये, क्योंकि बिना कोशके राजत्व
नहीं है और अपने शूरवीर योद्धाओंको धन देना चाहिये, फिर देने
वालेके लिये कौन नहीं लड़ता है ? ॥ ७७ ॥
यतः,—
न नरस्य नरो दासो दासस्त्वर्थस्य भूपते ! ।
गौरवं लाघवं वाऽपि धनाधननिबन्धनम् ॥ ७८ ॥
क्योंकि-हे राजा ! मनुष्य मनुष्यका दास नहीं है किन्तु धनका दास है,
और बड़ाई तथा छोटाई भी धन और निर्धनताके संबंधसे होती है ॥ ७८ ॥
अभेदेन च युध्येत रक्षेच्चैव परस्परम् ।
फल्गु सैन्यं च यत्किंचन्मध्ये व्यूहस्य कारयेत् ॥ ७९ ॥