हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 205, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-६७ ] युद्धके लिये समय, साधन और राजाका उत्साह १८५
यतः,—
मित्रामात्यसुहृद्वर्गा यदा स्युर्दृढभक्तयः ।
शत्रूणां विपरीताश्च कर्तव्यो विग्रहस्तदा ॥ ६५ ॥
क्योंकि— मित्र, मंत्री और आपसके लोग जब दृढ़ शुभचिन्तक हों और
शत्रुओंके विपरीत हों तब लड़ाई करनी चाहिये ॥ ६५ ॥
अन्यच्च,—
भूमिर्मित्रं हिरण्यं च विग्रहस्य फलं त्रयम् ।
यदैतन्निश्चितं भावि कर्तव्यो विग्रहस्तदा' ॥ ६६ ॥
और दूसरे-राज्य, मित्र, और सुवर्ण यह तीन लड़ाईके बीज हैं, जब यह
तीनों निश्चय हो जाय तब लड़ाई करनी चाहिये' ॥ ६६ ॥
राजाह—‘मद्वलं तावदवलोकयतु मन्त्री । तदैतेषामुपयोगो
ज्ञायताम् । एवमाहूयतां मौहूर्तिकः । निर्णीय च शुभलग्नं ददातु ।'
मन्त्री ब्रूते—'तथा हि सहसा यात्राकरणमनुचितम् ।
राजा बोला-‘मंत्री, पहिले मेरी सेनाको देखें । फिर इनकी कार्यमें योग्यता
जानें । और एक ज्योतिषीजीकोभी बुलावा भेजो । अच्छा लग्न निश्चय कर दें ।
मंत्री बोला-‘तोभी अचानक ( विना सोचे ) यात्रा करना उचित नहीं है ।
यतः,—
विशन्ति सहसा मूढा येऽविचार्य द्विषद्द्बलम् ।
खङ्गधारापरिष्वङ्गं लभन्ते ते सुनिश्चितम्' ॥ ६७ ॥
क्योंकि— जो मूर्ख एकाएकी शत्रुके बलको विना विचारे लड़ाई ठान लेते हैं
वे अवश्य ही खड्गकी धारसे घावको पाते हैं, अर्थात् मरते हैं' ॥ ६७ ॥
राजाह—‘मन्त्रिन् ! ममोत्साहभङ्गः सर्वथा मा कृथाः । विजि-
गीषुर्यथा परभूमिमाक्रामति तथा कथय ।' गृध्रो ब्रूते—‘तत्कथ-
यामि । किंतु तदनुष्ठितमेव फलप्रदम् ।
राजा बोला-‘हे मंत्री ! तुम मेरे उत्साहका भंग सब प्रकारसे मत करो ।
जिस प्रकार जयकी चाहने वाला शत्रुके राज्यको चढ़ कर घेर लेता है सो कह ।'
गिद्ध बोला-‘वह कहता हूँ । परन्तु उस प्रकारसे करनाही लाभदायक है;