हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 192, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें१७२ हितोपदेशः [ विग्रहः ३१-
एतत्सर्वं श्रुत्वा स रथकारोऽवदत्—'धन्योऽहं यस्येदृशी प्रिय-
वादिनी स्वामिवत्सला भार्या' इति मनसि निधाय तां खद्वां
स्त्रीपुरुषसहितां मूर्ध्नि कृत्वा सानन्दं ननर्त । अतोऽहं ब्र-
वीमि—“प्रत्यक्षेऽपि कृते दोषे” इत्यादि ॥ ततोऽहं तेन राज्ञा
यथाव्यवहारं संपूज्य प्रस्थापितः । शुकोऽपि मम पश्चादागच्छ-
न्नास्ते । एतत्सर्वं परिज्ञाय यथाकर्तव्यमनुसंधीयताम् ।' चक्र-
वाको विहस्याह—'देव ! बकेन तावद्देशान्तरमपि गत्वा यथा-
शक्ति राजकार्यमनुष्ठितम् । किंतु देव ! स्वभाव एष मूर्खाणाम् ।
यह सब सुन कर वह बढ़ई बोला-'मैं धन्य हूँ जिसकी ऐसी मिष्टभाषिणी
स्वामीको प्यार करने वाली स्त्री है। यह मनमें ठान, उन स्त्रीपुरुषसहित खाटको
सिर पर रख कर वह आनन्दसे नाचने लगा। इसलिये मैं कहता हूँ-“प्रत्यक्ष दोष
किये जाने परभी" इत्यादि । फिर उस राजाने वहाँकी रीतिके अनुसार तिलक
कर मुझे बिदा किया। तोताभी मेरे पीछे पीछे आ रहा है । यह सब बात
जान कर जो करना है सो करिये । चकवेने हँस कर कहा-'महाराज ! बगुलेने
प्रदेश जा कर भी शक्तिके अनुसार राजकार्य किया, परन्तु महाराज ! मूर्खोंका
यही स्वभाव है ।
यतः,—
शतं दद्यान्न विवदेदिति विज्ञस्य संमतम् ।
विना हेतुमपि द्वन्द्वमेतन्मूर्खस्य लक्षणम्' ॥ ३१ ॥
क्योंकि—अपना सैकड़ोंका दान (हानि) करे परन्तु विवाद न करे यह
बुद्धिमानोंका मत है, और विना कारणभी कलह कर बैठना यह मूर्खका लक्षण
है' ॥ ३१ ॥
राजाह—'किमतीतोपालम्भनेन ? प्रस्तुतमनुसंधीयताम् ।'
चक्रवाको ब्रूते—'देव ! विजने ब्रवीमि ।
राजा बोला-'जो हो गया उसके उलहनेसे क्या (लाभ) है ? अब जो
करना है उसे करो ।' चकवा बोला-'महाराज ! एकांतमें कहूँगा ।
यतः,—
वर्णाकारप्रतिध्वानैर्नेत्रवक्त्रविकारतः ।
अप्यूहन्ति मनो धीरास्तस्माद्रहसि मन्त्रयेत्' ॥ ३२ ॥