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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 302 में से

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पृष्ठ 185

-१८ ] मन्त्रीका लक्षण, राजा आदिकोका अप्राप्य चाहना १६५
क्योंकि—स्वदेशी, कुलकी रीतिमें निपुण, धर्मशील अर्थात् उत्कोच (रिशबत)
आदिको नहीं लेने वाला, विचार करनेमें चतुर, द्यूत, पान आदि व्यसन तथा
व्यभिचारसे रहित ॥ १६ ॥
अधीतव्यवहारार्थं मौलं ख्यातं विपश्चितम् ।
अर्थस्योत्पादकं चैव विदध्यान्मन्त्रिणं नृपः' ॥ १७ ॥
युद्ध इत्यादि व्यवहारको जानने वाला, कुलीन, विख्यात पण्डित, धन उत्पन्न
करने वाला ऐसेको राजा मंत्री बनावे' ॥ १७ ॥
अत्रान्तरे शुकेनोक्तम्—'देव ! कर्पूरद्वीपादयो लघुद्वीपा जम्बु-
द्वीपान्तर्गता एव । तत्रापि देवपादानामेवाधिपत्यम्' । ततो
राज्ञाप्युक्तम्—'एवमेव ।
इस अवसरमें तोतेने कहा-'महाराज ! कर्पूरद्वीप आदि छोटे छोटे द्वीप
जम्बूद्वीपकेही भीतर हैं और वहाँभी महाराजकाही राज्य है ।' राजाभी फिर
बोला-'ऐसाही है;
यतः,—
राजा मत्तः शिशुश्चैव प्रमादी धनगर्वितः ।
अप्राप्यमपि वाञ्छन्ति किं पुनर्लभ्यतेऽपि यत्' ॥ १८ ॥
क्योंकि—राजा, विक्षिप्त, बालक, प्रमादी, धन का अहंकारी, ये दुर्लभ वस्तु-
कीभी इच्छा किया करते हैं, फिर जो मिल सकती है उसका तो कहनाही क्या
है ? ॥ १८ ॥
ततो मयोक्तम्—'यदि वचनमात्रेणैवाधिपत्यं सिद्ध्यति तदा
जम्बुद्वीपेऽप्यस्मत्प्रभोर्हिरण्यगर्भस्य स्वाम्यमस्ति ।' शुको ब्रूते—
'कथमत्र निर्णयः ?' । मयोक्तम्—'संग्राम एव ।' राज्ञा विहस्यो-
क्तम्—'स्वस्वामिनं गत्वा सजीकुरु ! तदा मयोक्तम्—'स्वदूतोऽपि
प्रस्थाप्यताम् ।' राजोवाच—'कः प्रयास्यति दौत्येन ? यत एवंभूतो
दूतः कार्यः,—
फिर मैंने कहा कि, जो केवल कहनेसेही राज्य सिद्ध हो जाता है तो
जम्बूद्वीपमेंभी हमारे स्वामी हिरण्यगर्भका राज्य है ।' तोता बोला—'इसमें कैसे
निर्णय हो ?' मैंने कहा—'संग्रामही है ।' राजाने हँस कर कहा-'अपने स्वामीको