हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 171, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-१७६] धूर्त मनुष्यकी निंदा १५१
अन्यच्च,―
दुर्बृत्तः क्रियते धूर्तैः श्रीमानात्मविवृद्धये ।
किं नाम खलसंसर्गः कुरुते नाश्रयाशवत् ?' ॥ १७५ ॥
और दूसरे-धूर्त मनुष्य अपनी बढ़तीके लिये धनवान्को दुराचारी कर देते
हैं, इसलिये दुष्टोंका सहवास अग्निके समान क्या क्या नहीं करता है ? याने
वह सब अनर्थोंकी जड़ है' ॥ १७५ ॥
ततो दमनकः पिङ्गलकसमीपं गत्वा 'देव ! समागतोऽसौ पापा-
शयः । ततः सज्जीभूय स्थीयताम्' इत्युक्त्वा पूर्वोक्ताकारं कार-
यामास । संजीवकॊऽप्यागत्य तथाविधं विकृताकारं सिंहं दृष्ट्वा
स्वानुरूपं विक्रमं चकार । ततस्तयोर्युद्धे संजीवकः सिंहेन
व्यापादितः ।
तब दमनकने पिंगलकके पास जा कर—'महाराज ! वह पापी आ पहुँचा
है, इसलिये सम्हाल कर बैठ जाइये'—यह कह कर पहले जताए हुए आकारको
करा दिया. संजीवकने भी आ कर वैसेही बदली हुई चेष्टा वाले सिंहको देख कर
अपने योग्य पराक्रम किया । फिर उन दोनोंकी लड़ाईमें संजीवकको सिंहने
मार डाला ।
अथ संजीवकं सेवकं पिङ्गलको व्यापाद्य विश्रान्तः सशोक इव
तिष्ठति । ब्रूते च—'किं मया दारुणं कर्म कृतम् ?
पीछे सिंह, संजीवक सेवकको मार कर थका हुआ और शोकका-सा मारा बैठ
गया । और बोला—'कैसा मैंने दुष्ट कर्म किया है ?
यतः,―
परैः संभुज्यते राज्यं स्वयं पापस्य भाजनम् ।
धर्मातिक्रमतो राजा सिंहो हस्तिवधादिव ॥ १७६ ॥
क्योंकि—राजा, हाथीके मारनेसे सिंहके समान धर्मका उल्लंघन करनेसे आप
केवल पापका भागी बनता है और राज्यका सुख तो दूसरेही भोगते
हैं ॥ १७६ ॥