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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 302 में से

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पृष्ठ 144

१२४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १११-
हुए रंगबिरंगे पलंग पर बठी हुई और सब आभूषणोंसे भूषित दूसरी लक्ष्मीके
समान बीनको बजाती हुई कोई कन्या दिखाई दिया करती है । फिर मैं नावके
व्यापारीको लाकर और नाव पर चढ़ कर वहां गया । पीछे वहां जा कर पलंग
पर आधी डूबी हुई जैसी कही वैसीही मैंने देखी । फिर उसके सुन्दरताके गुणोंसे
लुभाया गया, मैं भी उसके पीछे झट कूद पड़ा । इसके अनन्तर कनकपुरमें
पहुंच कर सुवर्णके भवनमें वैसेही पलंग पर बैठी हुई और विद्याधरियोंसे सेवा की
गईको मैंने देखी, उसनेभी मुझे दूरसे देख कर और सहेलीको भेज कर आदरसे
“मुझे बुलानेका” संदेसा कहला भेजा । और जब मैंने सखीसे “उसके विषयमें”
पूछा, तब उसने सब अच्छे प्रकारसे कह सुनाया कि यह कंदर्पकेलि नामक
अप्सराओंके चक्रवर्ती राजाकी रत्नमंजरी नाम बेटी यह प्रतिज्ञा कर बैठी है कि
“जो कोई कनकपुरको अपने नेत्रसे देखेगा वह मेरे पिताको विना जाने भी मुझे
ब्याह लेगा’ । यह मनका संकल्प है । इसलिये आप इसके साथ गंधर्वविवाह कर
लीजिये ।' फिर वहां गंधर्वविवाह होनेके बाद उसके साथ रमण करता हुआ मैं
वहां रहने लगा । फिर एक दिन उसने मुझसे एकांतमें कहा-‘हे स्वामी ! अपनी
इच्छापूर्वक यह सब पदार्थ भोगो । परंतु इस चित्रलिखित सुवर्णरेखा नाम
अप्सराको कभी छूना नहीं । फिर एक दिन कुतूहलसे मैंने स्वर्णरेखाको अपने
हाथसे छू लिया और उस चित्रमें लिखी हुई (सुवर्णरेखा) ने अपने चरणकमलसे
मुझे ऐसा ठुकराया कि मैं अपने राज्यमें आ पड़ा ! पीछे मैं दुःखसे दुःखी
संन्यासी हुआ पृथ्वी पर घूमता घूमता इस नगरीमें आ पहुंचा हूं और यहां
दिनके डूबने पर एक ग्वालाके घरमें सोते सोते देखा कि सन्ध्याके समय ग्वाला
मित्रोंका सत्कार करके अपने घर आया और अपनी स्त्रीको एक कुट्टनीके साथ
कुछ गुह्य भाषण करते हुए देख लिया । फिर उस ग्वालिनको मारपीट कर और
खंभेमें बांध कर सो रहा । पीछे आधी रातको इसी नाईकी बहू कुट्टनी फिर
उस घोसिनके पास आ कर कहने लगी-‘तेरे विरहकी अग्निसे जला हुआ
कामदेवके बाणोंसे घायल वह मरासू-सा हो रहा है ।
तथा चोक्तम्,—
रजनीचरनाथेन खण्डिते तिमिरे निशि ।
यूनां मनांसि विव्याध दृष्ट्वा दृष्ट्वा मनोभवः ॥ १११ ॥