हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 137, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-९२] आय-व्यय जाननेवाले प्रधानकी प्रशंसा ११७
तत्' । संजीवको ब्रूते—'कथमेतावन्मांसं ताभ्यां खादितम् ?'
राजाह—'खादितं व्ययितमवधीरितां च । प्रत्यहमेष क्रमः ।
संजीवको ब्रूते—'कथं श्रीमद्देवपादानामगोचरेणैवं क्रियते ?' ।
राजाह—'मदीयागोचरेणैव क्रियते ।' अथ संजीवको ब्रूते—'नैत-
दुचितम् ।
इसके अनन्तर एक दिन उस सिंहका भाई स्तब्धकर्ण नामक सिंह आया ।
उसका आदर-सत्कार करके और अच्छी तरह बैठा कर पिंगलक उसके भोजनके
लिये पशु मारने चला । इतनेमें संजीवक बोला कि—'महाराज ! आज मारे हुए
मृगोंका मांस कहां है ?' राजाने कहा-'दमनक करटक जाने ।' संजीवकने कहा-
'तो जान लीजिये कि है या नहीं' सिंहने सोच कर कहा-'अब वह नहीं
है।' संजीवक बोला-'इतना सारा मांस उन दोनोंने कैसे खा लिया ?' राजा बोला-
'खाया, बांटा और फेंक फांक दिया। नित्य यही डौल रहता है।' तब संजीवकने
कहा-'महाराजके पीठ पीछे इस प्रकार क्यों करते हैं ?' राजा बोला-'मेरे पीठ
पीछे ऐसाही किया करते हैं ।' फिर संजीवकने कहा-'यह बात उचित नहीं है ।
तथा चोक्तम्,—
नानिवेद्य प्रकुर्वीत भर्तुः किंचिदपि स्वयम् ।
कार्यमापत्प्रतीकारादन्यत्र जगतीपते ! ॥ ९० ॥
जैसा कहा है—हे राजा ! स्वामिके बिना बताये आपत्तिके उपायको छोड़
और कुछ काम अपने आप नहीं करना चाहिये ॥ ९० ॥
अन्यच्च,—
कमण्डलूपमोऽमात्यस्तनुत्यागो बहुग्रहः ।
नृपते ! किंक्षणो मूर्खो दरिद्रः किंवराटकः ॥ ९१ ॥
और हे राजा ! मंत्री कमंडलुके समान है, क्योंकि थोड़ा खर्च करता है
और बहुत संग्रह करता है, और मूर्ख समयको अनमोल नहीं समझता है,
अर्थात् इस थोड़ेसे समयमें क्या होगा ? और दरिद्री कौड़ीको अनमोल नहीं
जानता है ॥ ९१ ॥
स ह्यमात्यः सदा श्रेयान् काकिनीं यः प्रवर्धयेत् ।
कोशः कोशवतः प्राणाः प्राणाः प्राणा न भूपतेः ॥ ९२ ॥