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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 134

११४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ८७-
अथ संजीवकः साशङ्कमाह—'सेनापते ! किं मया कर्तव्यम् ?
तदभिधीयताम् ।' करटको ब्रूते—'वृषभ ! अत्र कानने तिष्ठसि ।
अस्मद्देवपादारविन्दं प्रणम ।' संजीवको ब्रूते—'तदभयवाचं मे
यच्छ, गच्छामि ।' करटको ब्रूते—'शृणु रे बलीवर्द ! अलमनया
शङ्कया ।
फिर संजीवक शंकासे बोला—'हे सेनापति ! मुझे क्या करना चाहिये ? सो
कहिये ।' करटक ने कहा—'हे बैल ! इस बनमें ठहरते हो, सो हमारे महाराजके
चरणकमलोंको प्रणाम करो'। संजीवक बोला—'मुझे अभय वचन दो; मैं चलूं ।'
यह सुन करटक बोला—'सुन रे बैल ! ऐसी दुबिधा मत कर;
यतः,—
प्रतिवाचमदत्त केशवः
शपमानाय न चेदिभूभुजे ।
अनुहुंकुरुते घनध्वनिं
न हि गोमायुरुतानि केसरी ॥ ८७ ॥
श्रीकृष्णने गाली देते हुए चंदेरीके राजा शिशुपालको दुहराके उत्तर नहीं दिया,
क्योंकि सिंह मेघकी गर्जनाको सुन कर हुंकार कर गर्जता है, न कि सियारके
चिल्लानेको सुनके ॥ ८७ ॥
अन्यच्च,—
तृणानि नोन्मूलयति प्रभञ्जनो
मृदूनि नीचैः प्रणतानि सर्वतः ।
समुच्छ्रितानेव तरून्प्रबाधते
महान् महत्येव करोति विक्रमम्' ॥ ८८ ॥
और भी देख-आंधी चारों ओरसे झुके हुए तथा कोमल और छोटे छोटे
पौदोंको नहीं उखाड़ती है, पर बड़े बड़े जुग्गादी पेड़ोंको जड़से गिरा देती है,
क्योंकि बड़ा बड़ेही पर विक्रम करता ( दिखाता ) है' ॥ ८८ ॥
ततस्तौ संजीवकं कियद्दूरे संस्थाप्य पिङ्गलकसमीपं गतौ ।
फिर वे दोनों संजीवकको थोड़ी दूर पर ठहरा कर पिंगलकके पास गये ॥