हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें१०४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ६३-
क्योंकि—पण्डित लोग नीतिशास्त्रमें कही हुई बुराईके होनेसे उत्पन्न हुई
विपत्तिको, और उपायसे उत्पन्न हुई सिद्धिको नेत्रोंके सामने साक्षात् झलकती
हुईसी देखते हैं ॥ ६२ ॥
करटको ब्रूते—'तथाप्यप्राप्ते प्रस्तावे न वक्तुमर्हसि ।
करटक बोला—'तो भी बिना अवसरके नहीं कह सकते हो;
यतः,—
अप्राप्तकालवचनं बृहस्पतिरपि ब्रुवन् ।
प्राप्नुयाद्बुद्ध्यवज्ञानमपमानं च शाश्वतम्' ॥ ६३ ॥
क्योंकि—बिना अवसरकी बातको कहते हुए बृहस्पतिजीभी बुद्धिकी निन्दा
और अनादरको सर्वदा पा सकते हैं ॥ ६३ ॥
दमनको ब्रूते—'मित्र ! मा भैषीः । नाहमप्राप्तावसरं वचनं
वदिष्यामि ।
दमनक बोला—'मित्र ! डरो मत; मैं बिना अवसरकी बात नहीं कहूंगा;
यतः,—
आपद्युन्मार्गगमने कार्यकालात्ययेषु च ।
अपृष्टेनापि वक्तव्यं भृत्येन हितमिच्छता ॥ ६४ ॥
क्योंकि—आपत्तिमें, कुमार्ग पर चलनेमें और कार्यका समय टले जानेमें,
हित चाहने वाले सेवकको बिना पूछेभी कहना चाहिये ॥ ६४ ॥
यदि च प्राप्तावसरेणापि मया मन्त्रो न वक्तव्यस्तदा मन्त्रित्वमेव
ममानुपपन्नम् ।
और जो अवसर पा कर भी मैं परामर्श (राय) नहीं कहूंगा तो मुझे मंत्रीप-
नामी अयोग्य है ।
यतः,—
कल्पयति येन वृत्तिं येन च लोके प्रशस्यते सद्भिः ।
स गुणस्तेन च गुणिना रक्ष्यः संवर्धनीयश्च ॥ ६५ ॥
क्योंकि—मनुष्य जिस गुणसे आजीविका पाता है और जिस गुणके कारण
इस दुनियामें सज्जन उसकी बड़ाई करते हैं, गुणीको ऐसे गुणकी रक्षा करना
और बड़े यत्नसे बढ़ाना चाहिये ॥ ६५ ॥