हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 115, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-३४ ] अनधिकृत चेष्टाका उपाख्यान ९५
गर्दभो ब्रूते—‘शृणु रे बर्बर !
याचते कार्यकाले यः स किंभृत्यः स किंसुहृत् ।’
गधा बोला—‘सुन रे मूर्ख ! जो कामके समय पर माँगे वह निन्दित सेवक
और निन्दित मित्र है.’
कुकुरो ब्रूते—
‘भृत्यान्संभाषयेद्यस्तु कार्यकाले स किंप्रभुः ॥ ३२ ॥
कुत्ता बोला-‘जो काम अटकने पर सेवकोंसे ( केवल अपने स्वार्थके खातर )
मीठी मीठी बातें करे वह तो निन्दित स्वामी है ॥ ३२ ॥
यतः,—
आश्रितानां भृतौ स्वामिसेवायां धर्मसेवने ।
पुत्रस्योत्पादने चैव न सन्ति प्रतिहस्तकाः’ ॥ ३३ ॥
क्योंकि आश्रितोंके पालन-पोषणमें, स्वामीकी सेवामें, धर्मकी सेवा (आचरण)
करनेमें, और पुत्रके उत्पन्न करनेमें, प्रतिनिधि (एवजी) नहीं होते हैं अर्थात् ये
काम अपने आपही करनेके हैं, दूसरेसे करानेके योग्य नहीं हैं’ ॥ ३३ ॥
ततो गर्दभः सकोपमाह—‘अरे दुष्टमते ! पापीयांस्त्वं यद्विपत्तौ
स्वामिकार्यं उपेक्षां करोषि । भवतु तावत्, यथा स्वामी जाग-
रिष्यति तन्मया कर्तव्यम् ।
फिर गधा झुंझला कर बोला-‘अरे दुष्टबुद्धि ! तू बड़ा पापी है, कि विपत्तिमें
स्वामीके कामकी अवहेलना करता है । ठीक, जिस किसी भी प्रकार से स्वामी
जग जावे ऐसा मैं तो अवश्य करूँगा ॥
यतः,—
पृष्ठतः सेवयेदर्कं जठरेण हुताशनम् ।
स्वामिनं सर्वभावेन परलोकममायया’ ॥ ३४ ॥
क्योंकि—पीठके बल धूप खाय, पेटके बल अग्निसे तापे, स्वामीकी सब
प्रकारसे (वफादारीसे) और परलोककी बिना कपटसे सेवा करनी चाहिये ॥३४॥
इत्युक्त्वातीव चीत्कारशब्दं कृतवान् । ततः स रजकस्तेन ची-
त्कारेण प्रबुद्धो निद्राभङ्गकोपादुत्थाय गर्दभं लगुडेन ताडया-
मास । तेनासौ पञ्चत्वमगमत् । अतोऽहं ब्रवीमि—"पराधि-