हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८२ हितोपदेशः [ मित्रलाभः २१५-
पास जा कर मरेके समान अपना शरीर दिखावें और काक उस पर बैठके चोंचसे
कुछ कुछ खोदें, यह व्याध कछुए को अवश्य वहां छोड़ कर मृगमांसके लोभसे
शीघ्र जायगा । फिर मैं मन्थरके बंधन काट डालूंगा । और जब व्याध
तुम्हारे पास आवे तब भाग जाना ।' जब चित्रांग और लघुपतनकने शीघ्र जा
कर वैसाही किया तो वह व्याध पानी पी कर एक पेड़के नीचे बैठा मृगको उस
प्रकार देख पाया । फिर छुरी लेकर आनंदित होता हुआ मृगके पास जाने लगा
इतनेहीमें हिरण्यकने आ कर कछुएका बंधन काट डाला । तब वह कछुआ शीघ्र
सरोवरमें घुस गया । वह मृग उस व्याधको पास आता हुआ देख उठ कर भाग
गया । जब व्याध लौट कर पेड़के नीचे आया, तब कछुएको न देख कर
सोचने लगा—'मेरे समान बिना विचार करने वालेके लिये यही उचित था ।
यतः,—
यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते ।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव हि' ॥ २१५ ॥
क्योंकि—जो निश्चितको छोड़ अनिश्चित पदार्थका आसरा करता है उसके
निश्चित पदार्थ नष्ट हो जाते हैं, और अनिश्चितभी जाता रहता है' ॥ २१५ ॥
ततोऽसौ स्वकर्मवशान्निराशः कटकं प्रविष्टः । मन्थरादयः सर्वे
त्यक्तापदः स्वस्थानं गत्वा तथा सुखमास्थिताः ॥
फिर वह अपने प्रारब्धको दोष लगाता हुआ निराश होकर अपने घर गया ।
मंथर आदिभी सब आपत्तिसे निकल अपने अपने स्थान पर जा कर सुखसे
रहने लगे ।
अथ राजपुत्रैः सानन्दमुक्तम्—‘सर्वं श्रुतवन्तः सुखिनो वयम्।
सिद्धं नः समीहितम् ।' विष्णुशर्मोवाच—‘एतावता भवतामभि-
लषितं संपन्नम् ।
पीछे राजपुत्र प्रसन्न होकर कहने लगे-‘हमने सब सुना और सुखी हुए
हमारा कार्य सिद्ध हुआ ।' विष्णुशर्मा बोले-‘इतना आपका मनोरथ पूरा
हुआ है ॥