हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
२६६ • • हित चौरासी
तिन बिच अन्तर पल कौ नाहीं।
तऊ तृषित प्रीतम मन माँहीं।।
अद्भुत सहज रंग सुखदाई।
तहाँ प्रेम की एक दुहाई।।
पिय गज मत्त न अंकुस के बस।
परम सुछन्द फिरत अपनैं रस।।
देखत हीं तिनकी परछाँही।
मदन कोटि व्याकुल है जाहीं।।
ते मोहन बस कीनें गोरी।
राखे बाँधि प्रेम की डोरी।।
छुटत न क्यौंहूँ ऐसे अटके।
प्राँन हारि चरनन तर लटके।।
प्रीति की रीति लाल ही जानैं।
तजि प्रभुता बिनु मोल बिकानैं।।
प्रेम मयी रस मैंन विनोदा।
नव नव उपजत है दुहुँ कोदा।।
रहत है दिनहिं प्रेम सरसाई।
तहाँ मान की कहाँ समाई।।
सूच्छम प्रेम न मन में आवै।
स्थूल रूप सबही कौं भावै।।
यह है श्रीहिताचार्य्य का रसमय सिद्धान्त।
जहाँ-नायक तहाँ न नायिका रस करवावत केलि।
सखी उमै संगम सरस पिवत नैन पुट झेलि।।
अब विज्ञ रसज्ञ जन परखें कहाँ रस है और कहाँ रसाभास ? इसीतरह
मान नायक का उचित है या नायिका का तथा किस मान में रस की पूर्णतया
पुष्टि होती है ?
हित चौरासी • • २६७
- ८४ -
अवतरण-आज सम्पूर्ण रात्रि युगल किशोर ने रति रस विलास किया है
पर सखियों की चोरा चोरी। प्रातः काल रति रस के चिह्नों के प्रकाश ने चोरी
प्रकट कर ही दी। श्रीहित सखी ने ठिठोली सी करते हुए अपनी प्राणाधार
स्वामिनी श्रीराधा से कहा-
केदारौ
मूल-आजुऽब देखियत है हो प्यारी रंग भरी।
मोपै न दुरति चोरी वृषभानु की किसोरी;
सिथिल कटि की डोरी, नंद के लालन सौं सुरत लरी।।
मोतियन लर टूटी चिकुर चंद्रिका छूटी;
रहसि रसिक लूटी गंडनि पीक परी।
नैननि आलस बस अधर बिंब निरस;
पुलक प्रेम परस हित हरिवंश री राजत खरी।।८४।।
भावार्थ - (श्रीहित सखी ने कहा-"सखी !) हे प्यारी आज तुम इस
समय आनन्द से भरी हुई दिख रही हो और हम देख रही हैं। हे वृषभानु की
किशोरी ! मुझसे भला आपकी चोरी (छिप छिप कर की गई रति क्रीड़ाएँ,
मिलन, प्रियतम सम्भोग की बातें) कैसे छिपाये छिपेंगी ? नहीं छिप सकतीं।
देखो न; तुम्हारी कटि की डोरी (कटि बन्धन, नीबी) ढीली है; अतः (स्पष्ट है
कि) तुम नन्द के दुलारे श्रीश्याम सुन्दर से अवश्य सुरत युद्ध करती रही हो।
[या अब प्रातःकाल उनसे रति युद्ध करके ही आयी हो।]
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद (सखी भाव से) कहते हैं-"राधे ! तुम्हारी
मोती माला टूट चुकी है और गुँथी हुई केश चन्द्रिका भी छूट चुकी है। कपोलों
पर पीक चिह्न भी अङ्कित हैं (इससे ज्ञात होता है कि) रसिक लाल जी ने तुम्हें
एकान्त में लूट लिया है। अरी ! तुम्हारी आँखें आलस्य वश हैं और बिम्बा फल
से अधर भी रङ्ग हीन या रस हीन से हैं। तुम्हारा सम्पूर्ण शरीर प्रेम के स्पर्श के
कारण पुलकित है। अहा ! तुम अब इन सम्पूर्ण शोभाओं से युक्त होकर कैसी
भली लग रही हो ?" (अर्थात् 'राजत खरी' यह मधुर व्यङ्गोक्ति भी है।)
२६८ • • हित चौरासी
टिप्पणी – इस पद में सम्भोग शृङ्गार की चरम सीमा सुरत विहार का
वर्णन है। ग्रन्थ के इस अन्तिम पद में सुरत विहार का वर्णन करके मानो अपने
सेव्य नित्य विहारी लाल की आनन्दमयी केलि सुरत क्रीड़ा की नित्य स्थिति
का लक्ष्य कराया गया है। प्रथम पद में "जोई जोई प्यारो करै......तरंगनि
न्यारे।"
कह कर युगल सरकार के अत्यन्त गाढ़ एकाकार प्रेम का लक्ष्य कराया
गया था। ग्रन्थ के मध्य में उपपत्ति रूप से उसी रस को नाना केलि कलाओं से
पुष्ट किया गया। मानो इस हित वाणी सुधार्णव में अनेकों लहरियाँ उठीं और
समा गयीं अन्त में उसी रस की गम्भीरता में–
जै श्री हित हरिवंस करौ दिन दोऊ अचल विहार।
इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थ उपक्रम उपपत्ति एवं उपसंहार में आद्यन्त एक
ही रस–प्रेम विलास सुरत क्रीड़ा से ओत प्रोत है। इस अन्तिम पद में केवल
सुरत क्रीड़ा का ही वर्णन करके यह सूचित किया गया कि यह रस नित्य
अविचल और अखण्ड है किंवा श्रीवृन्दावनेश्वरी, श्रीकृष्णआह्लादिनि, नित्यानन्द
मयी नित्य नवल किशोरी श्रीराधा और उनके प्रियतम रसिक शेखर नित्यानन्द
मय उन्नत नवल किशोर सदा एक रस अविचल विहार में मग्न हैं यह सूचना
है। युगल किशोर की भाँति उनका समस्त परिकर सखी गण, खग, मृग,
श्रीवन के लता तरु आदि सभी नित्यानन्द मय, रस मय और विलास से ओत
प्रोत हैं।
यह श्रीहित हरिवंश चन्द्र रसिकाचार्य्यवर्य का आराध्य तत्व रस है,
जिसका विमल विकाश है श्रीवृन्दावन का अत्युज्ज्वल शृङ्गार पूर्ण नित्य विहार
और जिसकी सुमधुर झाँकी इस सम्पूर्ण ग्रंथ में करायी गयी है।
३४ • • हित चौरासी
यह वे राधा हैं, जिनके नाम का एक बार भी उच्चारण कर लेने पर
सबका आकर्षण करने वाले श्रीकृष्ण भी राधा नाम जापक के पास अपने आप
आकर्षित हुए चले आते हैं। तब फिर उस साधक को समस्त पुरुषार्थों में
तुच्छता का स्फुरण होने लगता है। श्रीकृष्ण स्वयं भी इस नाम का जप करते हैं,
सखि जनों के मुख से इस राधा नाम का गान सुना करते हैं, वे कभी कालिन्दी
के तट पर बैठ कर योगीन्द्रों की भाँति इसका ध्यान करते और प्रेमाश्रु पूर्ण हो
जाया करते हैं तो कभी अति रसानन्द के कारण आनन्द मग्न हो जाया करते
हैं। यह राधा नाम देवताओं भक्तों, मुक्तों और श्रीकृष्ण सुहृदों से भी अत्यन्त दूर
है। इस राधा नाम की महिमा अनिर्वचनीय है। इस नाम के प्रताप से राधा नाम
का गान-स्मरण करने वाले को प्रियतम श्रीकृष्ण अदेय वस्तु देकर भी उसके
ऋणी हो जाया करते हैं और उसके अनन्त एवं लेखा न कर सकने लायक
अपराधों को तत्काल ही क्षमा करके उसे अपना बना लेते हैं। श्रीहिताचार्य
पाद कहते हैं-
अनुल्लिख्यानन्तानपि सदपराधान्मधुपति
र्महाप्रेमाविष्टस्तव परम देयं विमृशति।
तवैकं श्रीराधे गृणत इह नामामृत रसं
महिम्नः कः सीमां स्पृशति तव दास्यैक मनसाम्।।
श्रीराधा सुधा निधि श्लो. १५४
अस्तु; श्रीराधा एक अद्भुत रस तत्व है। जो लावण्य की परम अद्भुतता
से परिपूर्ण है, जिसमें लीला गति दृग्भङ्गी, हास आदि की अद्भुतता विराजमान
है। जब अद्भुत प्रणय-कोप से आकुल होती हैं तब महा रसिक-मौलि श्रीलालजी
सभय कौतुक दृष्टि से देखते ही रह जाते हैं। आपका सौन्दर्य भी अत्यद्भुत है।
श्रीमुख के अनुपम रसानन्द कन्द चन्द्र की चन्द्रिका के कला-अणु मात्र से ही
पूर्णिमा का चन्द्र तुच्छ हो जाता है। अरे ! एक चन्द्र की तो बात ही क्या ? यदि
अनेक अनेक राकाशशि एक साथ उदित होकर अपनी प्रेमामृतमयी ज्योति
तरङ्गों से अगणित कोटि ब्रह्माण्डों को आपूरित कर दें, तो शायद इन विचित्र
चन्द्र समूहों की श्रीराधा मुखचन्द्र की एक किरण से उपमा दी जा सकेगी।