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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 275 में से

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पृष्ठ 232

हित चौरासी • • २३३
क्या नहीं है इन नयनों में? अमृत है, विष है और है उन्मत्त बना देने वाली
मदिरा भी। तभी तो ये श्वेत हैं, श्याम हैं और अरुणिम हैं, इसीलिये इनका
घायल जीता है, मरता है और झुक झुक पड़ता-झूम झूम जाता है।
– ७४ –
अवतरण – मानवती श्रीप्रियाजी को प्रियतम के समीप ले आने के लिये
हित सखी ने समझाया, 'प्रिय राधे ! तुम अब मान छोड़कर प्रियतम के निकट
चलो ! देखो, तुम्हारे बिना उनकी दशा कुछ अच्छी नहीं है। वे मुरली में यदि
कुछ गाते हैं तो केवल तुम्हारा नाम। इस समय वे तुम्हारे स्वरूप में ही तन्मय
से हो रहे हैं.....।"
हित सखी ने फिर कहा-
कान्हरौ
मूल-काहे कौं मान बढ़ावतु है बालक मृग लोचनि।
हौंब डरनि कछु कहि न सकति इक बात सँकोचनि।।
मत्त मुरली अंतर तव गावत जागृत सैन तवाकृति सोचनि।
(जै श्री) हित हरिवंश महा मोहन पिय आतुर विट विरहज दुख मोचनि।।७४।।
भावार्थ – "हे मृग छौनों से नेत्र वाली मानिनि ! व्यर्थ मान क्यों बढ़ा रही
हो? मान जाओ ! मैं तुमसे इस समय एक बात कहना चाह कर भी सङ्कोच वश
नहीं कह पा रही हूँ (अर्थात् प्रियतम की दशा कुछ ऐसी है जिसका जिह्वा पर
लाना ही ठीक नहीं; वे अत्यन्त व्याकुल हैं यहाँ तक कि जीवन से भी निराश हो
चुके हैं। मैं कैसे कहूँ भविष्य की बात कि क्या होगा ? कितनी अमङ्गल पूर्ण है
वे बातें ।) वे उन्मत्त हुए मुरली में और अपने हृदय में भी केवल तुम्हारा ही गान
करते एवं सोते जागते प्रत्येक दशा में तुम्हारी ही मुखाकृति का चिन्तन करते
रहते हैं।"
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद (सखी रूप से) कहते हैं-हे प्यारी
राधे ! आप महा मुग्ध एवं प्रेमातुर लम्पट-रसिक प्रियतम के विरह जनित
दुःख का विनाश करने वाली हैं (तब आप अपना यह गुण प्रकट क्यों नहीं करतीं ?)