सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

हिन्दू-जातिकी शक्ति १५१
करते या “हिन्दू”नामको ही अस्वीकार करते हैं उन्हें पीछे अनुताप
होगा और यह दिखायी देगा कि हिन्दू-जातिसे अलग होकर
उन्होंने अपने जातीय जीवन और शक्तिके स्रोतसे अपने आपको
अलग कर लिया ।
“हिन्दुत्व” की व्याख्यामें राष्ट्रीयताके जिन लक्षणोंकी मीमां-
सा की गयी उनमेंसे कुछ ही लक्षणोंके होनेसे स्पेन और पुर्तगाल
जैसे राष्ट्र संसारमें सिंह जैसे पराक्रम कर सके । तब, जिस
हिन्दू-जातिमें राष्ट्रीयताके सभी लक्षण मौजूद हैं उसके लिये
संसारमें कौनसी ऐसी बात है जो दुष्प्राप्य हो ?
२२ करोड़ हिन्दू जिनकी कर्मभूमि, पितृभूमि और पुण्यभूमि
हिन्दुस्थान है, जिनका ऐसा दिव्य इतिहास है, जो रक्तसंबंध और
संस्कृतिके बंधनोंसे एक हैं, उनकी तरफ आंख उठाकर कौन देख
सकता है ? सारे संसारको सिर झुकाकर उनकी बात माननी
पड़ेगी । एक दिन वह आनेवाला है जब मानव-जातिको इस
महा-शक्तिका परिचय मिलेगा ।
और यह भी निश्चित है कि जब कभी हिन्दू उस अवस्थाको
प्राप्त करेंगे जब संसारको उनका आदेश सुनना पड़े तब हिन्दू
जातिका वह आदेश गीताके और बुद्धके उपदेशसे भिन्न नहीं
होगा । जब कोई हिन्दू हिन्दुत्वातीत होता है तब उसका हिन्दुत्व
अथाह हो जाता है और भगवान् शङ्कराचार्यकी तरह “वाराणसी
मेदिनी” कहकर समग्र भूमण्डलमें वह अपनी काशीका विस्तार
देखने लगता है, अथवा तुकारामके साथ यह गाने लगता है कि
“आमुचा स्वदेश । भुवनत्रयामध्यें वास । मेरा स्वदेश समग्र
पृथिवीकी चतुःसीमामें व्याप्त है—वही मेरे देशकी चतुः-
सीमा है !”
॥ इति ॥