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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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संगठित थे। परन्तु यह शत्रु इंगलैंड का था। अब इस युद्ध का फल वही
निकला जिसकी सम्भावना थी।
उस समय इंगलैंड के पास, मरहठों की अपेक्षा राज्यों के विजय
करने के साधन अधिक श्रेष्ठ थे। उनके देश में बड़ी-बड़ी गृह कलहयें,
वार आफ रोजज़ धार्मिक उपद्रव और स्टार चैम्बर की क्रूरता की
घटनाएं हो चुकी थीं जिन के कारण उन में युद्ध-सम्बन्धी उन्नति अधिक
हो गई थी। मरहठों मे आज्ञा-पालन, शासन करना, अपने देश और
राजा के प्रति भक्ति रखना, अपने झंडे पर अभिमान करना, जातीय-
मिलाप, और दृढ़ विचार इत्यादि गुण एशिया वासियों के अन्य लोगों
से अधिक थे, किन्तु अङ्गरेजों की अपेक्षा बहुत ही कम थे।
उस पर भी वे बड़ी वीरता से लड़े, क्योंकि वे भली भांति जानते
थे कि इस समय जीवन-मरण का प्रश्न है। किसी-किसी देश-भक्त ने
जैसे बापू गोकुल ने, प्रण कर लिया था कि वे मर जायेंगे, किन्तु हथियार
नहीं रक्खेंगे। उन्होंने अङ्गरेजी सेनापति से कह दिया कि--'हम अपने
कफ़न को अपने सिरों पर लिये हुए हैं और हमने हाथ में तलवार लिये
लड़ कर मर जाने का दृढ़ निश्चय कर लिया है'। जिस समय सारे योग्य
और राजनीतिज्ञ सेनापति-महादाजी, नाना फडनवीस, राघोजी, तुकोजी
और फाड़के काम करते-करते मृत्यु की भेंट हो चुके थे, उस समय
निकम्मा बाजीराव द्वितीय मरहठों का सेनापति था और इंगलैंड जैसा
शक्तिशाली था उनका शत्रु इस लिए युद्ध का फल पहले ही से ज्ञात
हो गया था। मरहठे पराजित हुए, उनके साथ-साथ भारत के अन्तिम
हिन्दू-साम्राज्य का अन्त हो गया। केवल पञ्जाब में सिक्ख हिन्दू-
स्वतन्त्रता के चिराग की बत्ती की भांति टिमटिमा रहे थे, पर वह भी
इन्हीं कारणों से बुझने ही वाले थे।
हम यह मानते हैं कि हम दुःख का अनुभव करते हुए अपने महान
राष्ट्रीय साम्राज्य की समाधि पर स्मरणलेख लिख रहे हैं। किंतु हम

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इंग्लैंड की विजय पर ईर्ष्या नहीं करते। हम तो खिलाड़ियों की तरह
निष्पक्ष हो कर उन की चतुराई और शक्ति की प्रशंसा करते हैं जिस
के कारण उसने समुद्रों, द्वीपों और प्रदेशों पर हाथ फैलाते हुए हमारे
संघर्षमय हाथों से भारत साम्राज्य को छीन लिया और उसकी नींव पर
उस ने एक शानदार विश्वव्यापी अद्वितीय साम्राज्य की स्थापना कर
ली, जिसका कि इतिहास में कोई और उदाहरण नहीं मिलता।
सन् १८१८ में हमारे सब से अंतिम और सब से शानदार
हिन्दू साम्राज्य की समाधि बन गई। इस की रखवाली करो। निराश मत
बनो और ईसाकी माता मेरी की तरह चिंतायुक्त होने पर भी प्रार्थना
करते रहो — क्योंकि पता नहीं कि कब यह हिंदू साम्राज्य पुनर्जीवित
हो जाये।
॥ ओम् शम् ॥
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