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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 254 में से

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पृष्ठ 207

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करती थी। किन्तु जहां कहीं हिन्दू-राष्ट्र या हिन्दू-जाति के अनिष्ट होने
की सम्भावना दिखाई पड़ती थी लोग शीघ्र ही अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा
और स्वार्थ के भाव को दबा देते थे। इस प्रकार पान-हिन्दू आंदोलन के
उत्साह, हिन्दुत्व को पराधीनता और विधर्मियों की बेड़ियों से मुक्त कराने
की प्रबल इच्छा और देशभक्ति के उन्माद ने उनके तुच्छ स्वार्थों को दबा
रक्खा और इन्होंने अपनी स्वाभाविक त्रुटियों का परित्याग कर दिया।
साथ ही ये इस योग्य भी बन गये कि अपन राष्ट्र और धर्म के हित के लिये
सार्वजनिक इच्छानुसार कार्य करें। यह गुण बड़ा शीघ्रता से मरहठों के
भीतर फैला और वे मुसल्मानों से भी इस गुण में बहुत अधिक बढ़
गये और सारे भारतवर्ष में यह विचार फैलने लगा कि व्यक्तिगत
स्वार्थों को त्याग कर राष्ट्रीय और हिन्दू-जातीय हितों की प्रबल कामना
रखने वाले केवल मरहठे ही ऐसे हैं जो एक हिन्दू-साम्राज्य स्थापित कर
के उसे भली भांति चला सकते हैं।
निस्सन्देह हिन्दू-पद-पादशाही की स्थापना मरहठा-जाति की
वीरता और प्रयत्न के कारण हुई, इस लिये इस साम्राज्य को हमें हिन्दू-
पाद-पादशाही के साथ २ मरहठा-पद-पादशाही भी समझना
चाहिये। हिन्दू धर्म से घृणा करने वालों के भयानक आक्रमण को रोक
कर, उन्हें पीछे हटाना और विदेशियों के आक्रमणों से अपनी स्वतन्त्रता
की रक्षा करने की शक्ति तब तक हिन्दुओं में नहीं आ सकती थी जब
तक कि वे संगठित होकर एक सुदृढ़ साम्राज्य अर्थात् हिन्दू-पद-
पादशाही की स्थापना न कर लेते। इस समय महाराष्ट्र के अतिरिक्त
हिन्दुओं का कोई भी ऐसा दृढ़ केन्द्र या कोई आधार नहीं था जो हिन्दू-
जाति को दासता और पराधीनता की बेड़ी से मुक्त करा सकता। यद्यपि
मरहठों में अपने देश के प्रति भक्ति और उत्साह मुसमानों से भी अधिक
था तथा संगठन, कूटनीत और हिन्दूधर्म की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने का
महत्त्वाकांक्षा भारत की अन्य जातियों से अधिक थी, उसपर भी अंग्रेजों