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सर्वकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 254 में से

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पृष्ठ 190

लगेगी, जिससे बाहरी शत्रु प्रबल होकर उस हिन्दू-साम्राज्य को, जिसके
लिये सहस्रों वीर आत्मायें बलिदान हो गईं, बड़ी हानि पहुँचायेंगे। नाना
ने त्याग-पत्र दे देना उचित समझा है, कारण, वे गृहकलह पसन्द
नहीं करते।
इन बातों का महादजी पर बड़ा प्रभाव पड़ा और उन्होंने प्रण
किया कि भविष्य में अब वह कभी नाना और उसके दल का विरोध न
करेगा। जैसा मरहठा इतिहास में कई बार पहिले भी हो चुका है, इस
बार भी हुआ। जातीय हित के सामने व्यक्तिगत स्वार्थ को ठुकरा कर दो
बड़े नेता सहयोगपूर्वक काम करने को फिर उद्यत हो गये। दोनों ने
पेशवा के चरणों के पास बैठ कर शपथ खायी कि आज से वे लोग
अपनी पुरानी बातों को भूल जायेंगे और पेशवा तथा इस प्रजातन्त्र की,
जो हिन्दुओं और उनके धर्म का रक्षक है, सेवा में जीवन सफल करेंगे।
नाना फड़नवीस और महादजी के मनोमालिन्य दूर हो जाने का -
समाचार सारे महाराष्ट्र में फैल गया और सब लोगों ने इस बात पर बड़ी
प्रसन्नता प्रकट की। इस का अन्दाजा गोविन्दराव काले के पत्र से-जो
उस समय के महाराष्ट्र-मण्डल का एक बड़ा भारी विद्वान् और देशभक्त
राजनीतिज्ञ था और निज़ाम-राज्य में रेज़ीडेण्ट नियुक्त था-लग सकता
है। यह पत्र निज़ाम की राजधानी से इस प्रकार लिखा गया था-"आप
के पत्र ने मुझे प्रसन्न कर दिया और मेरे आनन्द का पारावार न रहा।
जब सारा विवरण पढ़ चुका तो हृदय में अनेकों विचार उठने लगे।
अटक से हिन्दमहासागर पर्यंत सारा देश हिन्दुओं का होने के कारण
हिंदुस्तान है, न कि तुर्किस्तान। पांडवों के समय से लेकर महाराज विक्र-
मादित्य तक ये ही हमारे देश की सीमाएं रही हैं और उन्होंने देशकी विदे-
शियों से रक्षा की तथा उसपरशासन किया। परन्तु उनके उत्तराधिकारी इतने
अयोग्य और नपुंसक निकले कि भारत के शासन की बागडोर यवनों के
हाथ में चली गई और हमारी स्वाधीनता का नाश हो गया। बाबरके वंशजोंने
हस्तिनापुर या देहली का राज्य जीता और अन्त में औरङ्गज़ेब के शासन-