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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 254 में से

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पृष्ठ 188

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इस समाचार को पाकर नाना, हरिपन्त फाड़के और समस्त मन्त्रिवर्ग
चौंक पड़ा। उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य, सम्पूर्ण भारत को महाराष्ट्र के
हिन्दू-साम्राज्य के अन्तर्गत करना था, जिसमें कोई भी स्वतन्त्रराज्य स्थापित
न हो सके, अब अन्धकारमय देख पड़ने लगा। वे इस बात को अपने
जीवन-काल में होता नहीं देख सकते थे। वे भली-भाँति जानते थे कि
अपने पदों से हट जाने के प्रश्न का निपटारा तो हम त्यागपत्र द्वारा कर
लेंगे, पर जनता पर इसका बड़ा बुरा प्रभाव पड़ेगा और वह असन्तुष्ट हो
जायगी, जिससे अनिवार्य रूप से परस्पर युद्ध आरम्भ हो जायगा।
अपना बयान देने के लिये नाना पूना पहुँचा। अपनी सारी सेवाओं
का वर्णन करने के बाद उसने पेशवा से निवेदन किया कि "यदि आप
सोन्धिया के हाथ में कठ-पुतली बन जायेंगे तो राज्य पर इसका बड़ा
बुरा प्रभाव पड़ेगा। महादजी के परामर्श से यदि आप सहसा कोई काम
कर बैठेंगे या कोई नवीन प्रबन्ध शुरू करेंगे तो आपस में लड़ाई छिड़
जायगी और हैदराबाद में तैयारी में लगे हुये मुसलमान तथा राज्य के
नाश के इच्छुक अंग्रेजों की अभिलाषा पूर्ण हो जायगी और वे इस राज्य
को छिन्न-भिन्न कर डालेंगे।" नेत्रों में आँसू भर कर प्रधान मन्त्री ने
कहा—"यदि केवल मुझे अपने पद से हटाने का प्रयत्न है तो मैं प्रसन्नता-
पूर्वक हटने को तैयार हूं, और यह मेरा त्याग-पत्र है। यदि इतने से राष्ट्र
का भला हो और पारस्परिक युद्ध टल जाय तो कृपा करके मुझे आज्ञा
दीजिये कि अब काशीजी जाऊँ और इस संसार से सम्बन्ध विच्छेद
करने की कोशिश करूँ।" नवयुवक पेशवा पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ा
और महाराष्ट्र-निर्माता नाना के इस नम्र निवेदन पर उसका भी हृदय
पिघल गया और उच्च स्वर से कहने लगा—"किन कारणों से आप ऐसा
कह रहे हैं, और किस प्रकार ऐसे विचारों ने आपके हृदय में स्थान
पाया ? आप केवल मेरे मन्त्री ही नहीं, किन्तु मेरे पथ-प्रदर्शक, राज-
नैतिक गुरु और मित्र हैं। इस राज्य का सम्पूर्ण भार आपके कन्धों पर
है और ज्यों ही आप हट जायेंगे यह गिर कर टुकड़े २ हो जायगा।"