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सर्वकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 254 में से

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पृष्ठ 177

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का प्रयत्न भी किया, पर सर्वदा असफल रहे थे। अंग्रेज़ इस बात को
भलीभांति जानते थे कि यदि मरहठे कुछ समय तक और वज़ीर के पद
पर वर्त्तमान रहे, तो अवश्य ही कुछ दिनों में खुलमखुला खुद महा-
राजाधिराज के पद पर आरूढ़ हो जायेंगे। पर मरहठे तो प्रायः पहले
ही ऐसा कर चुके थे। इन सब कारणों से मुग़लपादशाह के अधिकारों
को अपने हाथ में करने के लिये अंग्रेज़ बड़े ही व्यग्र हो रहे थे।
अब हम अपने पाठकों का ध्यान मरहठा-सेनापति के उस उत्साह-
वर्धक पत्र की ओर आकर्षित करना चाहते हैं जो उन्होंने पूना में नाना
के यहां भेजा था। उसमे लिखा था "हम लोग बृहत् साम्राज्य की हित
कामना के लिये ही जीवित तथा प्रजातन्त्र राज्य के अधिपति के भक्त
हैं। हमें व्यक्तिगत डाह और द्वेष का परित्याग कर देना चाहिये। यदि
किसी को मेरे सम्बन्ध में किसी प्रकार का सन्देह हो तो उसे वह अपने
दिल से निकाल दे। मैंने इस प्रजातन्त्र राज्य की जो सेवा की है, वह
उन निन्दकों को चुप करा देने के लिये काफ़ी है जो हम लोगों के वास्त-
विक शत्रु हैं और जो हम में फूट डाल कर लाभ उठाना चाहते हैं।
अब हम लोगों को समयानुसार काम करने के लिये उद्यत तथा बाद-
शाही झण्डे के चारों ओर एकत्रित हो जाना परमावश्यक है, जिस से
हम अपने उस जातीय महान् ध्येय को, जिसे हमारे पूर्वजों ने हमें
सौंपा है, सारे भारतवर्ष में सुरक्षित रख सकें और अपने इस महान्
साम्राज्य को टुकड़े २ होने और नष्ट होने से बचा सकें"।
नाना सेनापति की इस प्रार्थना को उस समय अनसुनी करने वाला
मनुष्य न था, जब कि जातीय-कार्य संकट में पड़ा हुआ था। हम लोग
ऊपर कह आये हैं कि वह टीपू के साथ युद्ध कर रहा था। किन्तु जब वह
टीपू को भलीभांति नीचा दिखा चुका, त्योंही होल्कर और अलीबहादुर
को महादजी की सहायता के लिये भेज दिया। अब जबकि उनके
पूर्वजों की वांच्छित हिन्दू-पद-पादशाही स्थापित हो चुकी थी और सारा
भारतवर्ष उसकी छत्र-छाया में आना ही चाहता था, राजपूतों और
मरहठों को उस समय युद्ध के लिये उद्यत और शत्रुओं को सिर उठाने