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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 254 में से

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पृष्ठ 150

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स्वीकार करते हुए कहा—मुझे इस अपराध का प्रायश्चित बताइये। राम
शास्त्री ने कहा—इस महापाप के लिये आपको अवश्य प्रायश्चित्त करना
पड़ेगा और ऐसे नीच कर्म के लिये सिवाय प्राणदण्ड के और कोई
प्रायश्चित्त नहीं। इस पर राघोबा के साथियों में से किसीने कहा कि आप
ऐसा न कहें। रामशास्त्री ने पुनः गम्भीर स्वर से कहा, "मुझे किसी
राघोबा का भय नहीं है, मैं प्रजा का न्यायाधीश हूँ; इसलिये मैंने अपना
उचित कर्त्तव्य पालन किया है। यदि राघोबा चाहे तो मुझे भी मारकर
अपने पाप में वृद्धि कर ले। मैं ऐसे राज्य में एक क्षण भी न रहूंगा और
न अन्न-जल ग्रहण करूंगा, जिस पर ऐसे अन्यायी राजा राज्य करते हैं।"
इस प्रकार क्रोधाग्नि से जलता हुआ निशंक ब्राह्मण महल से बाहर
निकला, शहर छोड़ दिया, और अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार तब तक अन्न-
जल ग्रहण न किया जब तक पवित्र कृष्णानदी के तट पर न पहुंच गया।
रघुनाथराव अवाक् सा देखता रह गया, उसके मुख से एक शब्द भी न
निकल सका। पर अपने साथियों के सामने इन सारी बातों से उसे पूर्ण
अनुभव हो गया कि वास्तव में पाप का फल बुरा होता है।

ठीक उसी समय यह बात सब को विदित हो गई कि मृत पेशवा
नारायणराव की विधवा स्त्री गर्भवती है और उसे अवश्य कोई सन्तान-
रत्न पैदा होगा। इस समाचार को पाकर राजपरिवर्त्तन करने वाली सभा
की शक्ति और भी बढ़ गई तथा भावी सुखकी आशालता लहलहाने लगी।

इसके पश्चात् मोरोबा दादा, कृष्णराव हरिपन्त फडके, त्र्यम्बकराव
मामा, काले, तोपखाने के सरदार रास्ते पटवर्धन, धायगुड़े, नैरो अप्पाजी
आदि और भी दूसरे राजकर्मचारियों ने नाना फड़नवीस तथा सखाराम
बापू जैसे महान् नेताओं की अध्यक्षता में प्रथम यह निश्चित किया कि
पहले तो राघोबा को लड़ाई में ले चलें और पीछे राजद्रोह कर दें।
इस प्रकार सब ने विचार निश्चित कर रघुनाथराव को शीघ्र ही दक्खिन
पर चढ़ाई करने के लिये विवश किया। ज्योंही रघुनाथने दक्खिन के लिये