सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 254 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 129

[ १२६ ]
था, वे सारी मिट्टी में मिल गईं और वह जैसे खाली हाथ आया था
उसी प्रकार वापिस चला गया ।
विदेशी स्वधर्मियों की सहायता द्वारा दिल्ली-राज्य को, हिन्दुओं
के आक्रमण से बचाने के लिये भारतीय मुसलमानों का यह अन्तिम
प्रयत्न था। उन्होंने पानीपत की लड़ाई को जीता; किन्तु इस जीत के
परिणाम स्वरूप उनकी महाराष्ट्र मंडल की हिन्दू शक्ति को नष्ट करने
या मरहठों की प्राणविनाशक पकड़ से मुसलमानी राज्य के गले को
छुड़ा कर उसकी रक्षा करने के अन्तिम अवसर का भी अन्त हो गया ।
इसके बाद कभी विदेशीय पठान दिल्ली न पहुँच सके। उन्होंने
शीघ्र ही सिंध नदी पार करना बंद कर दिया ।
पानीपत के नाश के पश्चात् हिन्दुओं की एक दूसरी प्रबल शक्ति
का भी पंजाब में बड़ी शीघ्रता से विकास हुआ। यह शक्ति सिक्ख-मंडल
की थी। इन शूरवीरों ने अपनी धार्मिक संस्था को धीरे २ स्थापित किया,
जिसे उन्होंने शहीदों के रक्त से सींच कर शीघ्र ही एक शक्तिशाली
राज्य में परिणत कर दिया। दसवें गुरु गोविन्द सिंह जी तथा वीर
योद्धा और अपने धर्म पर बलि देने वाले बन्दा बहादुर की अध्यक्षता में
सिख लोग हिन्दुओं की स्वतन्त्रता के लिये पंजाब में लड़े इन दोनों महा-
पुरुषों की पूजा हिन्दुस्तान के जातीय हिन्दू-शूरवीरों की श्रेणी में सदैव
होती रहेगी । बन्दा की अध्यक्षता में कुछ समय तक वे अपने
देश के कुछ भाग को स्वतन्त्र करने में सफल हुए किन्तु पंचनद के
अन्तर्गत देश को हिन्दू राज्य के भीतर लाने का काम अब भी मरहठों
के लिये ही सुरक्षित पड़ा था । इस कठिन काम को उन्होंने सम्पूर्ण
किया और यद्यपि मरहठा वीर अपने घरों से सुदूर लड़ रहे थे और
शेर को उसकी नींद में ही ललकार रहे थे तो भी उन्होंने हिन्दू-ध्वजा को सीधे
अटक तक पहुँचा ही दिया । पृथ्वीराज के पश्चात् यह पहला ही मौका था
जब हिन्दुओं की ध्वजा वहां तक पहुँची । जिस समय वे मुसलमानों
तथा उनके सहायक नादिरशाह और अब्दाली के मुग़ल राज्य के