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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 254 में से

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पृष्ठ 125

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हुये उन्होंने रण-यज्ञ में अपनी आहुतियां डाल दीं । अब मैं किस प्रकार
रणक्षेत्र छोड़ कर अपनी जाति और नाना साहेब को मुँह दिखलाने के
लिये जीवित रह सकता हूँ ? मारो, मारो और मृत्यु पर्य्यन्त शत्रुओं का
संहार करो । यही मेरी अन्तिम आज्ञा है ।”
मुकुन्द शिन्डे ने सेनापति को प्रणाम किया और उसकी इस अंतिम
आज्ञानुसार घोड़े से कूद कर 'हर-हर महादेव' का जयघोष करता हुआ
अन्धाधुन्ध शत्रुओं के मध्य में टूट पड़ा । नवयुवक जनकोजी, यशवन्त-
राव पवार आदि सभी वीरों ने उसी का अनुसरण किया । और भाऊ ?
उस पर तो मानो युद्ध का भूत सवार था, वह भी अन्धाधुन्ध शत्रु-सेना
पर जा टूटा और सेना के बीच ऐसे स्थान पर जा घुसा जहाँ भयंकरतम
युद्ध हो रहा था । अपने शब्दों को सत्य में परिणत करता हुआ, आखिरी
दम तक शत्रुओं का वध करता हुआ तथा जातीय झण्डे की रक्षा करता
हुआ वह वीर गति को प्राप्त हो गया ।
अन्तिम समाचार जो संसार के लोगों के पास उस वीर हिन्दू-
सेनापति के सम्बन्ध में पहुँचा, वह यह था कि पानीपत की लड़ाई में जो
हिन्दू-जाति की मुख्य हानि हुई, उसकी उसने वीरता और कर्त्तव्यपरा-
यणता की आध्यात्मिक महिमा से क्षति-पूर्ति कर दी ।
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पराजय जिसने विजेता को भी नष्ट कर दिया !
❀ “दन्तच्छेदोहि नागानाम् श्लाघ्यो गिरिविदारणे”
पानीपत की लड़ाई से मरहठों की भयंकर हानि हुई, क्योंकि
जिस समय भाऊ और उसके शूरवीर साथी अपने राष्ट्रीय झण्डे के
चारों ओर अपूर्व युद्ध लड़ रहे थे, उस समय मरहठे सब मोर्चों से
खदेड़े जा रहे थे और शत्रु बड़े उत्साह से उनका पीछा कर रहे थे । सहस्रों
❀ पर्वतों को उखाड़ने के लिये हाथियों के दांत ही समर्थ होते हैं ।