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सर्वकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 254 में से

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पृष्ठ 106

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गये; किसी को मरहटों की ओर उंगली उठाने का भी साहस न हुआ ।
शीघ्र ही जनकोजी शिन्धे भी अपनी सेना के साथ भाऊ से आ मिला।
सारी महाराष्ट्र-सेना ने उस नौजवान और सुन्दर शूरवीर राजकुमार का
बड़े उत्साह और प्रेम से स्वागत किया और 'बदान' के युद्ध में वीरगति
प्राप्त उसके चाचा दत्ताजी की पुण्यस्मृति की प्रतिष्ठा उसी के प्रति प्रदर्शित
की। भाऊ ने उस शूरवीर राजकुमार के उपलक्ष में, जिसने केवल
१७-१८ वर्ष की अवस्था में ही कई लड़ाइयों में विजय प्राप्त की थी,
और अपनी सेना तथा धर्म-रक्षा के लिये कितनी ही भयानक चोटें खाई
थीं, एक वृहत् सभा की, और उसको सर्वसाधारण के सामने बहुत से
बहुमूल्य उपहार तथा वस्त्रादि भेंट किये। जिस समय वीर विश्वासराव,
जो बालाजी की अनुपस्थिति में महाराष्ट्र जाति का अतिप्रिय नेता था,
जनकोजी से मिलने के लिये आगे बढ़ा, तब उस विशाल जातीय सभा
में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति का हृदय तरंगित हो गया। ये दोनों ही नव-
युवक एक से एक सुन्दर, बहादुर और अपनी जाति वालों के आदर्श और
अभिलाषा को पूर्ण करने वाले तथा हिन्दू-जाति की उठती हुई आशा की
सजीव मूर्ति थे।
नजीबखां को धर्मपुत्र बनाने और दत्ताजी की सहायता के लिये
आने में असावधानी करके भयंकर भूल करने वाले मल्हारराव होल्कर भी
अपने किये का फल भुगत कर यानी दत्ताजी की पराजय के पश्चात् स्वयं
अब्दाली से पराजित होकर भाऊ से आ मिले। अब भाऊ की इच्छा
यमुना पार करके अब्दाली को नदी-तट पर पहुँचने से पहले ही हराने
की हुई। उसने गोविन्द पन्त बुन्देला को आज्ञा दी कि तुम सुअवसर
पाते ही अब्दाली की फ़ौज के पिछले भाग पर आक्रमण करो और उसकी
रसद पहुँचनी बन्द कर दो। पर नदी में बाढ़ आई हुई थी और इतनी
शत्रु सेना उसके दूसरी ओर पड़ा था, इसलिये उसका पार करना अत्यन्त
दुष्कर था; इसलिये भाऊ ने दिल्ली जाकर उसे अब्दाली के पंजे से
छुड़ाने का निश्चय किया। उत्तर भारत के समस्त राजाओं में केवल