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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 254 में से

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पृष्ठ 104

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मालोजी तथा अन्यान्य मरहठे-सेनापति वीरता के साथ अपार शत्रु सेना
का सामना करते हुये शहीद हो गये । दुश्मन मिल गये और एक दूसरे
का साथ देने लगे । संयोगवश मरहठों की ध्वजा रुहेला और पठान
सेना के बीच में घिर गई, जिसे बचाने के लिये मरहठे आगे बढ़े और
घमसान का युद्ध होने लगा । दत्ताजी और जनकोजी झण्डे को खतरे में
देखकर आपे से बाहर हो गये । दोनों ही टूट पड़े और लगे शूरवीरता
दिखाने । एकाएक बहादुर जनकोजी को गोली लगी और वह घायल
होकर घोड़े से गिर पड़ा । दत्ताजी ने इसे देखा, पर किसी रक्षित जगह
पर जाकर लड़ने के बजाय सीधे आगे बढ़ा । जो शत्रु सामने आया माग
गया, और अपने अनुयायियों के साथ दत्ताजी आगे बढ़ता ही गया,
और शत्रु सेना में उलझ गया ! आखिर होनी होकर ही रही । दत्ताजी
को भी एक गोली लगी, जिसमें घायल होकर वह पृथ्वी पर गिर पड़ा ।
नजीबखां के धर्मगुरु और पठान षड्यन्त्र के एक उत्साही कार्य-
कर्त्ता कुतुबशाह ने मरहठा-सेनापति को गिरते देखा और वहां जाकर
इस प्रकार व्यङ्गपूर्ण शब्दों में पूछा “पटेल, क्या हम लोगों से फिर
लड़ोगे ?” मरते हुये जनरल ने निर्भीक उत्तर दिया, “हाँ, अगर बचा
तो मैं फिर लड़ूंगा ।” इन शब्दों का उस वीर के मुख से निकलना था
कि उस नीच और कायर का क्रोध भड़क उठा । उसने घायल योद्धा को
पैर की ठोकर मारी और तलवार खींच कर बड़े गर्व के साथ विजयरूप
में उसका सिर काट कर ले गया ।
इस प्रकार दत्ताजी का अन्त हुआ । संसार-भर में आज तक इस
मरहठा वीर की तरह किसी भी सिपाही ने ऐसी सच्चाई, ईमानदारी के
साथ अपनी राष्ट्रीय पताका को न बचाया होगा और न ही उसकी रक्षा
में ऐसी वीरता-पूर्वक अपना बलिदान दिया होगा । इस वीर की मृत्यु और
मरते हुये इस योद्धा के प्रति किये गये कायरतापूर्ण अपमान का समाचार
महाराष्ट्र में पहुँचा । प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में प्रतिहिंसा की अग्नि धधक