हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)
Hind Swaraj by Mahatma Gandhi
मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 37, कुल 150 में से
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चाहिए कि दिन-ब-दिन उसका तेज बढ़ता जाए और लोगों पर उसका असर
होता जाए, लेकिन इससे उल्टे इतना तो सब कुबूल करते हैं कि पार्लियामेन्ट
के मेम्बर दिखावटी और स्वार्थी पाये जाते हैं। सब अपना मतलब साधने की
सोचते हैं। सिर्फ डर के कारण ही पार्लियामेन्ट कुछ काम करती है। जो काम
आज किया वह कल उसे रद्द करना पड़ता है।
आज तक एक भी चीज को पार्लियामेन्ट ने ठिकाने लगाया हो ऐसी
कोई मिसाल देखने में नहीं आती। बड़े सवालों की चर्चा जब पार्लियामेन्ट
[बायाँ स्तंभ] पार्लियामेन्ट को मैंने बेसवा | [दायाँ स्तंभ] में चलती है, तब उसके मेम्बर पैर फैलाकर
[बायाँ स्तंभ] कहा, वह भी ठीक है। | [दायाँ स्तंभ] लेटते हैं या बैठे-बैठे झपकियाँ लेते हैं।
[बायाँ स्तंभ] उसका कोई मालिक नहीं है। | [दायाँ स्तंभ] उस पार्लियामेन्ट में मेम्बर इतने जोरों से
[बायाँ स्तंभ] उसका कोई एक मालिक | [दायाँ स्तंभ] चिल्लाते हैं कि सुनने वाले हैरान-परेशान हो
[बायाँ स्तंभ] नहीं हो सकता, लेकिन मेरे | [दायाँ स्तंभ] जाते हैं। उसके एक महान लेखक ने उसे
[बायाँ स्तंभ] कहने का मतलब इतना ही | [दायाँ स्तंभ] ‘दुनिया की बातूनी’ जैसा नाम दिया है।
[बायाँ स्तंभ] नहीं है। जब कोई उसका | [दायाँ स्तंभ] मेम्बर जिस पक्ष के हों उस पक्ष के लिए
[बायाँ स्तंभ] मालिक बनता है, जैसे | [दायाँ स्तंभ] अपना मत वे बगैर सोचे-विचारे देते हैं, देने
[बायाँ स्तंभ] प्रधानमंत्री, तब भी उसकी | [दायाँ स्तंभ] को बंधे हुए हैं। अगर कोई मेम्बर इसमें
[बायाँ स्तंभ] चाल एक सरीखी नहीं | [दायाँ स्तंभ] अपवाद रूप निकल आये, तो उसकी
[बायाँ स्तंभ] रहती। जैसे बुरे हाल बेसवा | [दायाँ स्तंभ] कम्बख्ती ही समझिये।
[बायाँ स्तंभ] के होते हैं, वैसे ही सदा | [दायाँ स्तंभ] जितना समय और पैसा पार्लियामेन्ट खर्च
[बायाँ स्तंभ] पार्लियामेन्ट के होते हैं। | [दायाँ स्तंभ] करती है उतना समय और पैसा अगर
अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो
जाए। ब्रिटिश पार्लियामेन्ट महज़ प्रजा का
खिलौना है और वह खिलौना प्रजा को भारी खर्च में डालता है। ये
विचार मेरे खुद के हैं ऐसा आप न मानें। बड़े विचारशील अंग्रेज़ ऐसा
विचार रखते हैं।
एक मेम्बर ने तो यहाँ तक कहा है कि पार्लियामेन्ट धर्मिष्ठ आदमी के
लायक नहीं रही। दूसरे मेम्बर ने तो कहा है कि पार्लियामेन्ट एक ‘बच्चा’ है।
बच्चों को कभी आपने हमेशा बच्चा ही रहते देखा है? आज सात सौ बरस
के बाद भी अगर पार्लियामेन्ट बच्चा ही हो, तो वह बड़ी कब होगी?
पाठक : आपने मुझे सोच में डाल दिया। यह सब मुझे तुरन्त मान लेना
चाहिए, ऐसा तो आप नहीं कहेंगे। आप बिल्कुल निराले विचार मेरे मन में
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