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हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 150 में से

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पृष्ठ 137

हिन्द स्वराज्य
मैन्वेस्टर को और भी रुपये भेजकर उसका सड़ा हुआ कपड़ा काम में लें,
क्यों कि उसका कपड़ा काम में लेने से सिर्फ़ हमारे पैसे ही जाएँगे। हिन्दुस्तान
में अगर हम मैन्चेस्टर कायम करेंगे तो पैसा हिन्दुस्तान में ही रहेगा, लेकिन
वह पैसा हमारा खून चूसेगा, क्योंकि वह हमारी नीति को बिल्कुल खत्म कर
देगा। जो लोग मिलों में काम करते हैं उनकी नीति कैसी है, यह उन्हीं से
पूछा जाए। उनमें से जिन्होंने रुपये जमा किये हैं, उनकी नीति दूसरे पैसे वालों
से अच्छी नहीं हो सकती। अमेरिका के रॉकफेलर से हिन्दुस्तान के रॉकफेलर
कुछ कम हैं, ऐसा मानना निरा अज्ञान है। गरीब हिन्दुस्तान तो गुलामी से छूट
सकेगा, लेकिन अनीति से पैसे वाला बना हुआ
हिन्दुस्तान गुलामी से कभी नहीं छूटेगा।
हमें यह स्वीकार करना
होगा कि अंग्रेजी राज्य
को यहाँ टिकाये रखने
वाले ये धनवान लोग ही
हैं। ऐसी स्थिति में ही
उनका स्वार्थ सधेगा।
पैसा आदमी को दीन
बना देता है। ऐसी दूसरी
चीज दुनिया में विषय
योग है। ये दोनों विषय
विषमयं हैं। जब पैसा या
विषय काटता है तब वह
शरीर, ज्ञान, मन सब
कुछ ले लेता है।
मुझे तो लगता है कि हमें यह स्वीकार करना
होगा कि अंग्रेजी राज्य को यहाँ टिकाये रखने वाले
ये धनवान लोग ही हैं। ऐसी स्थिति में ही उनका
स्वार्थ सधेगा। पैसा आदमी को दीन बना देता है।
ऐसी दूसरी चीज दुनिया में विषय योग है। ये दोनों
विषय विषमयं हैं। उनका डंक साँप के डंक से
ज्यादा ज़हरीला है। जब साँप काटता है तो हमारा
शरीर लेकर हमें छोड़ देता है। जब पैसा या विषय
काटता है तब वह शरीर, ज्ञान, मन सब कुछ ले लेता
है, तो भी हमारा छुटकारा नहीं होता। इसलिए हमारे
देश में मिलें कायम हों, इसमें खुश होने जैसा कुछ
नहीं है।
पाठक : तब क्या मिलों को बन्द कर दिया जाए ?
संपादक : यह बात मुश्किल है। जो चीज स्थायी या मजबूत हो गई है, उसे
निकालना मुश्किल है। इसीलिए काम शुरू न करना पहली बुद्धिमानी है।
मिल मालिकों की ओर हम नफ़रत की निगाह से नहीं देख सकते। हमें उन
पर दया करनी चाहिए। वे यकायक मिलें छोड़ दें, यह तो मुश्किल नहीं है,
लेकिन हम उनसे ऐसी बिनती कर सकते हैं कि वे अपने इस साहस को बढ़ाएँ
नहीं। अगर वे देश का भला करना चाहें, तो खुद अपना काम धीरे-धीरे कम
कर सकते हैं। वे खुद पुराने, प्रौढ़, पवित्र चरखे देश के हजारों घरों में दाखिल
कर सकते हैं और लोगों का बुना हुआ कपड़ा लेकर उसे बेच सकते हैं।
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