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सर्वकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 506 में से

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पृष्ठ 305

धिविधुरबान्धवाङ्गनावर्गगृहीतप्रच्छन्नप्रग्रीवके, संजवनपुञ्जितोद्विग्नपरि-
जने, प्रविष्टकतिपयप्रणयिनि, गम्भीरज्वरारम्भभीतभिषजि, दुर्मनायमान-
मन्त्रिणि, मन्दायमानपुरोधसि, सीदत्सुहृदि, विद्राणविपश्चिति, संतप्ता-
प्रसामन्ते, विचित्तचामरग्राहिणि, दुःखक्षामशिरोरक्षिणि, क्षीयमाणप्रसा-
दवित्तकमनोरथसंपदि, स्वामिभक्तिपरित्यक्ताहारहीयमानबलविकलवल्ल-
भभूभृति, क्षितितलपतितसकलरजनीजागरूकराजपुत्रकुमारके, कुलक्र-
मागतकुलपुत्रनिवहोह्यमानशुचि, शोकसंकुचितकञ्चुकिनि, निरानन्दन-
न्दिनि, निःश्वसन्निशाशासन्नसेवके, निःसृतताम्बूलधूसराधरवारयोषिति,
विलक्षवैद्योपदिश्यमानपथ्याहरणावहितपौरोगवे, अनुजीविपीयमानोच्च-
षकधारावारिविनोद्यमानास्यशोषरुजि, राजाभिलाषभोज्यमानबहुभुजि,
भेषजसामग्रीसंपादनव्यग्रसमग्रव्यवहारिणि, मुहुर्मुहुराहूयमानतोयकर्मा-
न्तिकानुमितघोरातुरातृषि, तुषारपरिकरितकरकशिशिरीक्रियमाणोदश्विति,
स्योपरि प्रासादिका । 'आधिर्ना मानसी पीडा' । 'सजवनं चतुःशाला' । विपश्चि-
त्पण्डितः । आप्ता आश्वस्ताः । प्रसादेन वित्ताः प्रख्याताः प्रसादवित्ताः । जागरूका
जागरणशीलाः । विलक्षो लज्जितः । पौरोगवो महानसाध्यक्षः । उच्चचषकमपगतपान-
भाजनम् । भेषजमौषधम् । तोयकर्मान्तिका तोयकर्मशाला । करको जलभाण्डम् ।
के पैरों की आवाज होती तो प्रतीहार झला पड़ते । सारा काम-काज केवल इशारे के
सहारे किया जा रहा था । राजा का निजी अंगरक्षक कुछ हटकर बैठा था । आचमन का
पात्र लिए हुए सेवक कोने में खड़ा था । पुराने मन्त्री लोग धवलगृह के कोठे पर चुप मारे
बैठे थे । बान्धव स्त्रियाँ अत्यन्त विषादयुक्त अवस्था में सुरक्षित प्रग्रीवक ( मुखशाला,
उठने-बैठने का कमरा ) में बैठी थीं । दुखी मन से सेवक लोग चतुःशाल पर एकत्र थे ।
कुछ ही प्रेमी लोगों ने भीतर प्रवेश किया था । ज्वर-ताप के अधिक बढ़ जाने से वैद्य
लोग डर गए थे । मन्त्री लोग घबराए हुए थे । पुरोहित का बल भी फीका पड़ गया
था । मित्र, विद्वान्, सामन्त—सभी दुःख में डूबे थे । चंवर झलने वाला सेवक व्यग्र था ।
प्रधान अंगरक्षक भी दुःख से कृश था । राजा की प्रसन्नता से धन कमाने वालों के
मनोरथ भी क्षीण हो रहे थे । प्रिय राजा लोग स्वामी की भक्ति में भोजन छोड़ने से
दुर्बल हो गए थे । रातभर जागे रहने की हँरासी से राजपुत्र लोग जमीन पर पड़ कर
सो गए थे । पुस्तैनी कुलपुत्र भी शोक से संतप्त थे । कंचुकी शोक से संकुचित था ।
बन्दीगण भी आनन्दरहित थे और आसन्न-सेवक निराश होकर सांस ले रहे थे । गणि-
काओं के अधर ताम्बूल छोड़ देने से धुंरा गए थे । प्रधान रसोइए अपनी असफलता से