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सर्वकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 14, कुल 506 में से

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पृष्ठ 14

( ७ )
पहले दिन गर्मी में किसी प्रकार धीरे-धीरे चण्डिकायतन-कानन पार कर वह मल्लकूल
नामक गाँव में गया। वहाँ बाण का भाई और हार्दिक मित्र जगत्पति रहता था, उसने
बाण का सत्कार किया। बाण उस दिन वहीं सुख-पूर्वक ठहरा। दूसरे दिन गङ्गा पार करके
यष्टिगृहक नाम के बनगाँव में रात बिताई। फिर राप्ती (अजिरवती) के किनारे मणितारा
नामक गाँव के पास हर्ष के स्कन्धावार (छावनी) में पहुँचा। जो राज-भवन के
सन्निकट ही था।
स्कन्धावार में स्नान, भोजन और विश्राम के पश्चात् जब एक पहर दिन बाकी था और
जब हर्ष भी भोजन आदि से निवृत्त हो चुके थे तब वह मेखलक के साथ राजद्वार के
लिए चल पड़ा। मार्ग में प्रख्यात राजाओं के अनेक शिविर-सन्निवेश मिले। राजद्वार
पर सम्राट् के दर्शन के लिए नाना देशों से सामन्तगण पधारे हुए थे। झुण्ड के झुण्ड
हाथी, घोड़े और ऊँट खड़े थे और हजारों आतपत्रों से वहाँ श्वेतद्वीप का दृश्य था। सब
लोग राजद्वार के राजकीय अनुयायियों से यह पूछते हुए नहीं थकते थे कि बाह्य कक्षा में
उपस्थित होकर सम्राट् कब दर्शन देंगे ? एक ओर एकान्त में बौद्ध, जैन, पाशुपत, संन्यासी,
वर्णी सम्प्रदायों के साधु, सब देशों के लोग, समुद्री तटों के निवासी, म्लेच्छ और समस्त
द्वीपों से संवाद लेकर लौटे हुए दूत एकत्र थे। राजद्वार के इस दृश्य को देखकर बाण के
मन में आश्चर्य हुआ। द्वारपालों ने मेखलक को दूर ही से पहचान लिया। 'क्षण भर
आप यहीं ठहरें' बाण से यह कह कर मेखलक बेरोक भीतर चला गया। थोड़ी देर बाद
वह महाप्रतीहारों के प्रधान दौवारिक पारियात्र के साथ वापस आया। मेखलक द्वारा
परिचित होकर पारियात्र ने बाण को प्रणाम किया और विनयपूर्वक कहा—'देव के दर्शन
के लिए भीतर पधारिए, आप पर देव की प्रसन्नता है।' बाण ने 'मैं धन्य हूँ, जो देव मुझे इस
प्रकार अपने अनुग्रह का पात्र समझते हैं' यह कहते हुए उसके साथ भीतर प्रवेश किया।
तब बाण ने वनायु, आरट्ट, कम्बोज, भरद्वाज, सिन्ध और पारस देश के राजवल्लभ अश्वों से
भरी हुई मन्दुरा देखी। कुछ दूर हट कर बाईं ओर इभधिष्ण्यागार या हाथियों का लम्बा-
चौड़ा बाड़ा मिला। वहाँ बाण ने सम्राट् के मुख्य हाथी दर्पशात को देखा। उसे देखकर
बाण बहुत आश्चर्यित हुआ और सोचने लगा—निश्चय ही इस महागज के निर्माण में बड़े-
बड़े पर्वत परमाणु बनाए गए होंगे, नहीं तो यह गौरव कहाँ से इसमें आता ? इस प्रकार
फिर तीन कक्ष्याओं को पार कर बाण ने मुक्तास्थानमण्डप के सामने वाले आँगन में
सम्राट् हर्ष के दर्शन किए।
तब सम्राट् के सामने आकर बाण ने दाहिना हाथ उठा कर 'स्वस्ति' शब्द का उच्चारण