विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 760, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें७३८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
तात ! इसी बीचमें वैवाहिक सामग्रीका संग्रह करके
मन्त्री कुम्भाण्ड उपस्थित हुए और श्रीकृष्णको नमस्कार
करके बोले ॥ २३ ॥
कुम्भाण्ड उवाच
कृष्ण कृष्ण महाबाहो भव त्वमभयप्रदः ।
शरणागतोऽस्मि देवेश प्रसीदोपैषोऽञ्जलिस्तव ॥ २४ ॥
कुम्भाण्डने कहा—कृष्ण ! कृष्ण ! महाबाहो !
आप मुझे अभय प्रदान करें। देवेश्वर ! मैं आपकी शरणमें
आया हूँ, प्रसन्न होइये ! आपके सामने ये मेरे दोनों हाथ
जुड़े हुए हैं ॥ २४ ॥
नारदस्य वचः श्रुत्वा सर्वं प्रागेव चाच्युतः ।
अभयं यच्छते तस्मै कुम्भाण्डाय महात्मने ॥ २५ ॥
कुम्भाण्ड मन्त्रिणां श्रेष्ठ प्रीतोऽस्मि तव सुव्रत ।
सुकृतं ते विजानामि राष्ट्रिकोऽस्तु भवानिह ॥ २६ ॥
साक्षात्पक्षः सुसुखी निर्वृत्तोऽस्तु भवानिह ।
राज्यं च ते मया दत्तं चिरं जीव ममाश्रयात् ॥ २७ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण नारदजीसे कुम्भाण्डके विषयमें सब
कुछ सुन चुके थे; उनकी उस बातका स्मरण करके वे
महात्मा कुम्भाण्डको अभय देते हुए बोले—'उत्तम व्रतका
पालन करनेवाले मन्त्रिप्रवर कुम्भाण्ड ! तुमने जो सत्कर्म
किया है, उसे मैं जानता हूँ। अब तुम्हीं यहाँके राष्ट्रपति
बनो और अपने बन्धु-बान्धवोंसहित यहाँ परम सुखी तथा
सन्तुष्ट रहो। मैंने तुम्हें यह राज्य अर्पित कर दिया, अब तुम
मेरा आश्रय लेकर चिरजीवी बने रहो'॥ २५-२७ ॥
एवं दत्त्वा राज्यमस्मै कुम्भाण्डाय महात्मने ।
विवाहमकरोत् तस्यानिरुद्धस्य जनार्दनः ।
ततस्तु भगवान् वह्निस्तत्र स्वयमुपस्थितः ॥ २८ ॥
इस प्रकार महात्मा कुम्भाण्डको राज्य देकर श्रीकृष्णने
वहाँ अनिरुद्धका विवाहसंस्कार सम्पन्न किया। उस समय
भगवान् अग्निदेव वहाँ स्वयं उपस्थित हुए थे ॥ २८॥
स विवाहोऽनिरुद्धस्य नक्षत्रे च शुभेऽभवत् ।
ततोऽप्सरोगणश्चैव कौतुकं कर्तुमुद्यतः ॥ २९ ॥
अनिरुद्धका वह विवाह शुभ नक्षत्रमें सम्पन्न हुआ।
उसमें माङ्गलिक कृत्य करनेके लिये अप्सराएँ उपस्थित
हुई थीं ॥ २९ ॥
स्नातस्त्वलंकृतस्तत्र सोऽनिरुद्धः स्वभार्यया ।
ततः स्निग्धैः शुभैर्वाक्यैर्गन्धर्वाश्च जगुस्तदा ॥ ३० ॥
नृत्यन्त्यप्सरसश्चैव विवाहमुपशोभयन् ।
वहाँ अपनी पत्नीके साथ अनिरुद्धने स्नान करके
अलङ्कार धारण किया। तत्पश्चात् मङ्गलसूचक स्निग्ध
वचनोंद्वारा गन्धर्वगण गान करने लगे और अप्सराएँ उस
विवाहकी शोभा बढ़ाती हुई नाचने लगीं ॥ ३०३ ॥
ततो निर्वर्तयित्वा तु विवाहं शत्रुसूदनः ॥ ३१ ॥
अनिरुद्धस्य सुप्रज्ञः सर्वैर्देवगणैर्वृतः ।
आमन्त्र्य वरदं तत्र रुद्रं देवनमस्कृतम् ॥ ३२ ॥
चकार गमने बुद्धिं कृष्णः परपुरंजयः ।
तदनन्तर अनिरुद्धका विवाहसंस्कार सम्पन्न कराकर
समस्त देवताओंसे घिरे हुए परम बुद्धिमान् शत्रुसूदन एवं
परपुरंजय भगवान् श्रीकृष्णने देववन्दित वरदायक रुद्रदेवकी
आज्ञा ले वहाँसे द्वारका जानेका विचार किया ॥ ३१-३२३ ॥
द्वारकाभिमुखं कृष्णं ज्ञात्वा शत्रुनिषूदनम् ॥ ३३ ॥
कुम्भाण्डो वचनं प्राह प्राञ्जलिर्मधुसूदनम् ।
शत्रुसूदन श्रीकृष्णको द्वारका जानेके लिये उद्यत जान
कुम्भाण्डने हाथ जोड़कर उन मधुसूदनसे कहा—॥ ३३३ ॥
बाणस्य गावस्तिष्ठन्ति हस्ते तु वरुणस्य वै ॥ ३४ ॥
यासाममृतकल्पं वै क्षीरं क्षरति माधव ।
तत् पीत्वातिबलश्चैव नरो भवति दुर्जयः ॥ ३५ ॥
'माधव ! बाणासुरकी गौएँ वरुणके हाथमें हैं। जिनके
थनोंसे अमृतके समान गुणकारक दूध बहता रहता है। उस
दूधको पीकर मनुष्य अत्यन्त बलशाली और दुर्जय हो
जाता है' ॥ ३४-३५ ॥
कुम्भाण्डेनैवमाख्याते हरिः प्रीतमनास्तदा ।
गमनाय मतिं चक्रे गन्तव्यमिति निश्चयम् ॥ ३६ ॥
कुम्भाण्डके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीहरिको उस समय
बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने जानेका विचार एवं दृढ़ निश्चय
कर लिया ॥ ३६ ॥
ततस्तु भगवान् ब्रह्मा वर्धाप्य स तु केशवम् ।
जगाम ब्रह्मलोकं स वृतः संभवनालयैः ॥ ३७ ॥
तदनन्तर श्रीकृष्णको बधाई देकर ब्रह्मलोकवासियोंसे
घिरे हुए, भगवान् ब्रह्मा ब्रह्मलोकको चले गये ॥ ३७ ॥
इन्द्रो मरुद्गणयुतो द्वारकाभिमुखो ययौ ।
ततः कृष्णस्ततः सर्वे गच्छन्ति जयकाङ्क्षिणः ॥ ३८ ॥
मरुद्गणोंके साथ इन्द्र द्वारकापुरीकी ओर चल दिये।
जिस ओर श्रीकृष्ण जा रहे थे, उधर ही वे सब लोग उनकी
विजय चाहते हुए यात्रा करने लगे ॥ ३८ ॥
वाहनेन मयूरेण सखीभिः परिवारिता ।
द्वारकाभिमुखी ह्यषा देव्या प्रस्थापिता ययौ ॥ ३९ ॥
साक्षात् पार्वती देवीने उषाको विदा किया। सखियोंसे
घिरी हुई उषा मयूर जुते हुए रथसे द्वारकाकी ओर चली ॥
ततो बलश्च कृष्णश्च प्रद्युम्नश्च महाबलः ।