सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 742, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 742

७२० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

उस युद्धस्थलमें भगवान् वासुदेवद्वारा उस आग्नेयास्त्रके प्रतिहत हो जानेपर भगवान् शिवने पैशाच, राक्षस, रौद्र तथा आङ्गिरस नामक चार अस्त्र छोड़े, जो प्रलयाग्निके समान तेजस्वी थे ॥ ४४-४५ ॥

वायव्यमथ सावित्रं वासवं मोहनं तथा।
अस्त्राणां वारणार्थाय वासुदेवो व्यमुञ्चत ॥ ४६॥
तब भगवान् वासुदेवने उक्त चारों अस्त्रोंका निवारण करनेके लिये क्रमशः वायव्यास्त्र, सावित्रास्त्र, ऐन्द्रास्त्र तथा मोहनास्त्रका प्रयोग किया ॥ ४६ ॥

अस्त्रैश्चतुर्भिंश्चत्वारि वारयित्वाशु माधवः।
मुमोच वैष्णवं सोऽस्त्रं व्यादितास्यान्तकोपमम् ॥४७॥
उन चारों अस्त्रोंसे उनके चारों अस्त्रोंका तत्काल निवारण करके लक्ष्मापति श्रीकृष्णने वैष्णवास्त्रका प्रयोग किया जो मुँह बाये हुए कालके समान प्रतीत होता था ॥ ४७ ॥

वैष्णवास्त्रे प्रयुक्ते तु सर्व एवासुरोत्तमाः।
भूतयक्षगणाश्चैव बाणानीकं च सर्वशः ॥ ४८ ॥
दिशः सर्वाः प्राद्रवन्त भयमोहेन विह्वलाः।
वैष्णवास्त्रका प्रयोग होनेपर सभी असुरशिरोमणि वीर भूत, यक्षगण एव बाणकी सारी सेना—ये सभी भय और मोहसे व्याकुल हो सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भाग गये ॥ ४८ ॥

प्रमाथगणभूयिष्ठे दीर्णे सैन्ये महासुरः ॥ ४९ ॥
निर्जगाम ततो बाणो युद्धयायाभिमुखस्त्वरन् ।
जिसमें प्रमथगणोंकी अधिकता थी, उस सेनाके भी पलायन कर जानेपर महान् असुर बाण युद्धके लिये उत्सुक हो बड़ी उतावलीके साथ निकला ॥ ४९ ॥

भीमप्रहरणैर्घोरैर्दैत्यैश्च सुमहायलैः।
वृतो महारथैर्वीरैर्वज्रीव सुरसत्तमैः ॥ ५० ॥
जैसे वज्रधारी इन्द्र श्रेष्ठ देवताओंसे घिरे होते हैं, उसी प्रकार वह भयकर अस्त्र-शस्त्रवाले महाबली एवं वार महारथी घोर दैत्योंसे घिरा हुआ था ॥ ५० ॥

वैशम्पायन उवाच
जपैश्च मन्त्रैश्च तथौषधीभि-
र्महात्मनः स्वस्त्ययनं प्रचक्रुः।
स तत्र वस्त्राणि शुभाश्च गावः
फलानि पुष्पाणि तथैव निष्कान् ॥ ५१ ॥
वलेः सुतो ब्राह्मणेष्यः प्रयच्छन्
विराजते तेन यथा धनेशः।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस समय ब्राह्मण-लोग जप, मन्त्र और औषधियोंद्वारा महामनस्वी बाणासुरके लिये स्वस्तिवाचन कर रहे थे और बलिकुमार बाण उन ब्राह्मणोंके लिये बहुत-से वस्त्र, शुभलक्षणा गौएँ, फल, फूल तथा स्वर्ण-मुद्राएँ देता हुआ धनाध्यक्ष कुवेरके समान शोभा पाता था ॥

सहस्रसूर्यो बहुकिङ्किणीकः
परार्ध्यजाम्बूनदरत्नचित्रः ॥ ५२ ॥
सहस्रचन्द्रायुततारकश्च
रथो महानग्निरिवावभाति।
तमास्थितो दानवसंगृहीतं
महाध्वजं कार्मुकधृक् स बाणः॥ ५३ ॥
उसके विशाल रथमें सहस्रों सूर्योंके चिह्न बने थे, बहुत-सी छोटी-छोटी घंटियाँ लगी थीं। वह बहुमूल्य सुवर्ण तथा रत्नोंसे सुसज्जित होकर विचित्र शोभा धारण करता था। उसमें सहस्रों चन्द्रमा तथा दस हजार तारोंके चिह्न बने थे। वह महान् रथ अग्निके समान प्रकाशित हो रहा था। दानव कुम्भाण्डने उस रथकी रास अपने हाथमें ले रखी थी। उसपर विशाल ध्वजा फहरा रही थी और उसपर बैठे हुए बाणासुरने हाथमें धनुष ले रखा था ॥ ५२-५३ ॥

उद्धर्तिष्यन् यदुपूङ्गवाना-
मर्ताय रौद्रं स विभर्ति रूपम्।
स मन्युमान् वीररथौघसंकुलो
विनिर्ययौ तान् प्रति दैत्यसागरः ॥ ५४ ॥
वातप्रवृद्धस्तु तरङ्गसंकुलो
यथार्णवो लोकविनाशनाय।
वह उन यदुपूङ्गव वीरोंका संहार कर डालनेके लिये उद्यत हो अत्यन्त भयंकर रूप धारण किये हुए था, क्रोधमें भरा था और वीर रथियोंके समुदायसे घिरा हुआ था। वह दैत्यसागर उन यादववीरोंकी ओर बढ़ चला; ठीक उसी तरह, जैसे वायुके वेगसे बढ़ा हुआ उत्ताल तरंगोंस व्याप्त महासागर समस्त लोकोंका विनाश करनेके लिये अग्रसर हो रहा हो ॥

भीमानि संत्रासकरैर्वपुर्भि-
स्तान्यग्रतो भान्ति बलानि तस्य ॥ ५५ ॥
महारथान्युच्छ्रितकार्मुकानि
सपर्वतानीव वनानि राजन्।
विनिःसृतः सागरतोयवासा-
दत्यद्भुतश्चाहवद्रष्टुकामः ॥ ५६ ॥
लोगोंके मनमें त्रास उत्पन्न करनेवाले शरीरोंके द्वारा भयंकर प्रतीत होनेवाली बहुत-सी सेनाएँ उसके आगे-आगे चल रही थीं। राजन् ! विशाल रथों और उठे हुए धनुषोंसे युक्त वे सेनाएँ पर्वतसहित वनोंके समान प्रतीत होती थीं। अत्यन्त अद्भुत रूपवाला बाणासुर वह युद्ध देखनेके लिये समुद्रके निकटवर्ती वासस्थानसे निकलकर चला ॥ ५५-५६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुद्रकृष्णयुद्धे चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें भगवान् रुद्र और श्रीकृष्णका युद्धविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२४ ॥