विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 710, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें६८८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
जाय तो भी मेरे लिये चिन्ताकी बात नहीं है । भीरु ! तुम
आज मेरा पराक्रम देखो' ॥ ८९ ॥
तस्य सैन्यस्य निनदं श्रुत्वाभ्यागच्छतस्ततः ।
सहसैवोत्थितः श्रीमान् प्रद्युम्निः किमिति ब्रुवन् ॥ ९०॥
अपनी ओर आती हुई उस सेनाका कोलाहल सुनकर
प्रद्युम्नकुमार श्रीमान् अनिरुद्ध 'यह क्या है ?' ऐसा कहते हुए
सहसा उठकर खड़े हो गये ॥ ९० ॥
अथ सोऽपश्यत बलं नानाप्रहरणोद्यतम् ।
स्थितं समन्ततस्तत्र परिवार्य गृहं महत् ॥ ९१ ॥
तदनन्तर उन्होंने देखा कि उस विशाल गृहको चारों
ओरसे घेरकर नाना प्रकारके आयुधोंसे सुसज्जित हुई सेना
खड़ी है ॥ ९१ ॥
ततोऽभ्यगच्छत् त्वरितो यत्र तद्वेष्टितं बलम् ।
क्रुद्धः स्वबलमास्थाय अदशद् दशनच्छदम् ॥ ९२ ॥
तब वे तुरंत ही कुपित हो अपने बलका भरोसा करके
उस स्थानकी ओर चल दिये, जहाँ वह सेना घेरा डालकर
खड़ी थी । उस समय उन्होंने अपने ओठको दाँतों तले
दबा लिया था ॥ ९२ ॥
ततो योद्धमपोढानां बाणेयानां निशम्य तु ।
सा चित्रलेखास्मरत नारदं देवदर्शनम् ॥ ९३ ॥
इतनेमें ही बाणासुरके सैनिकोंको युद्धके लिये उपस्थित
देख चित्रलेखाने देवदर्शी नारदजीका स्मरण किया ॥ ९३ ॥
ततो निमेषमात्रेण सम्प्राप्तो मुनिपुङ्गवः ।
स्मृतोऽथ चित्रलेखायाः पुरं शोणितसाह्वयम् ॥ ९४ ॥
फिर तो चित्रलेखाके स्मरण करनेपर मुनिवर नारदजी
पलक मारते-मारते शोणितपुरमें आ पहुँचे ॥ ९४ ॥
अन्तरिक्षे स्थितस्तत्र सोऽनिरुद्धमथाब्रवीत् ।
मा भयं स्वस्ति ते वीर प्राप्तोऽस्म्यद्य पुरं तव ॥ ९५ ॥
वहाँ आकाशमें स्थित होकर उन्होंने अनिरुद्धसे कहा—
'वीर ! तुम्हारा कल्याण हो । तुम डरना मत । मैं भी अब
तुम्हारे नगरमें आ पहुँचा हूँ' ॥ ९५ ॥
ततश्च नारदं दृष्ट्वा सोऽभिवाद्य महाबलः ।
प्रहृष्टमानसो भूत्वा युद्धार्थमभिवर्तत ॥ ९६ ॥
नारदजीको उपस्थित देख महाबली अनिरुद्धने उन्हें
प्रणाम किया और प्रसन्नचित्त होकर वे युद्धके लिये तैयार
हो गये ॥ ९६ ॥
ततस्तेषां स्वनं श्रुत्वा सर्वेषामेव गर्जताम् ।
सहसैवोत्थितः शूरस्तोत्रार्दित इव द्विपः ॥ ९७ ॥
उस समय गर्जना करते हुए उन सभी सैनिकोंका कोला-
हल सुनकर शूरवीर अनिरुद्ध अङ्कुशसे पीड़ित हुए हाथीकी
भाँति सहसा उठकर चल दिये ॥ ९७ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य संदष्टौष्ठं महाभुजम् ।
प्रासादाच्चावरोहन्तं भयार्ता विप्रदुद्रुवुः ॥ ९८ ॥
ओठको दाँतोंसे दबाकर महलसे उतरते और अपनी ओर
आते हुए महाबाहु अनिरुद्धको देखकर कितने ही सैनिक
भयसे व्याकुल होकर भाग खड़े हुए ॥ ९८ ॥
अन्तःपुरद्वारगतं परिघं गृह्य चातुलम् ।
वधाय तेषां चिक्षेप नानायुद्धविशारदः ॥ ९९ ॥
अन्तःपुरके द्वारपर रखे हुए अनुपम परिघको हाथमें
लेकर नाना प्रकारके युद्धोंमें कुशल अनिरुद्धने उन सैनिकोंके
वधके लिये उसे चलाया ॥ ९९ ॥
ते सर्वे बाणवर्षेण गदाभिर्मुशलैस्तथा ।
असिभिः शक्तिभिः शूलैर्निजघ्नु रणगोचरे ॥ १००॥
तब वे समस्त सैनिक रणभूमिमें दिखायी देनेवाले
अनिरुद्धपर बाण, गदा, मूसल, खड्ग, शक्ति और शूलोंद्वारा
प्रहार करने लगे ॥ १०० ॥
स हन्यमानो नाराचैः परिघैश्च समन्ततः ।
दानवैः समभिक्रुद्धैः प्रद्युम्निः शस्त्रकोविदैः ॥१०१॥
नाक्षुभ्यत् सर्वभूतात्मा नदन् मेघ इवोष्णगे ।
आविध्य परिघं घोरं तेषां मध्ये व्यतिष्ठत ।
सूर्यो दिवि चरन् मध्ये मेघानामिव सर्वशः ॥१०२॥
क्रोधमें भरे हुए शस्त्रकुशल दानवोंद्वारा चारों ओरसे
नाराचों और परिघोंका प्रहार होनेपर भी प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध
क्षुब्ध नहीं हुए; क्योंकि वे सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा हैं । वे
वर्षाकालके मेघकी भाँति गर्जना करते और भयंकर परिघ
घुमाते हुए उन शत्रुओंके बीचमें खड़े हो गये । मानो
आकाशमें मेघमण्डलीके भीतर सब ओर विचरते हुए सूर्य
शोभा पा रहे हों ॥ १०१-१०२ ॥
दण्डकृष्णाजिनधरो नारदो हृष्टमानसः ।
साधु साध्विति वै तत्र सोऽनिरुद्धमभाषत ॥१०३॥
उस समय दण्ड और काला मृगचर्म धारण करनेवाले
नारदजी मनमें हर्ष भरकर अनिरुद्धसे बोले—'वीर ! बहुत
अच्छा ! बहुत अच्छा !!' ॥ १०३ ॥
ते हन्यमाना रौद्रेण परिघेणामितौजसा ।
प्राद्रवन्त भयात् सर्वे मेघा वातेरिता यथा ॥१०४॥
उस अमित ओजवाले भयंकर परिघकी मार खाकर वे
समस्त सैनिक भयसे भाग खड़े हुए । मानो हवाके वेगसे
बादल छिन्न-भिन्न हो गये हों ॥ १०४ ॥
विद्राव्य दानवान् वीरः परिघेण सुविक्रमः ।
अनिरुद्धो रणे हृष्टः सिंहनादं ननाद च ॥१०५॥